15/01/2026
कहो नरेनदर मज़ा आ रहा?
चौक पे मूर्ति ऊँची हुई,
नींव में भूख दबी रह गई
नारा बदला, झंडा बदला
पर जेब वहीँ की वहीँ रह गई
काग़ज़ बोले—रिकॉर्ड बना
घर बोले—चूल्हा ठंडा है
टीवी चिल्लाए—अमृतकाल
मजदूर बोले—आज भी फंदा है
किसान मौसम से हार गया
बाज़ार ने और निचोड़ा
कर्ज़ लिखा है नाम के आगे
नींद लिखी है किस्तों में तोड़ा
धर्म सिखाया आपस में
रोटी से रिश्ता टूट गया
सवाल पूछने वालों का
हर सपना आधा छूट गया
महलों में जश्न, ढोल बजे
गलियों में सन्नाटा है
देश जले या आदमी गिरे
सिंहासन को क्या नाता है
देश हमारा कहाँ जा रहा?
कहो सरकार—मज़ा आ रहा?