07/10/2025
रात बहुत गहरी थी…
मैं थका हुआ था, पूरे दिन की भागदौड़ जैसे शरीर से नहीं, रूह से भी पसीना निकाल चुकी थी।
लैपटॉप बंद किया, लाइट्स बुझाईं… और छत पर जाकर आसमान देखा।
सितारे चुपचाप टिमटिमा रहे थे — जैसे किसी पुराने दोस्त की आँखों में अधूरी बातें।
मैंने धीरे से कहा —
“कभी-कभी लगता है, अब बस और नहीं…”
तभी हवा चली… और मुझे लगा जैसे किसी ने कान में फुसफुसाया —
"तो रुक क्यों गया? तुम ही तो वो हो जो आगे बढ़ने के लिए बने हो।"
मैं चौंका।
देखा, आसमान में एक तारा और ज्यादा चमक रहा था।
मुझे याद आया — वो तारा शायद अब है ही नहीं…
कहते हैं, वो सालों पहले बुझ चुका है।
फिर भी उसकी रौशनी आज भी चल रही है —
लाखों मीलों का सफ़र तय करके, सिर्फ़ मुझ तक पहुँचने के लिए।
तभी समझ आया —
ज़िन्दगी जीतने वाले लोग वो नहीं होते जो कभी नहीं थकते,
बल्कि वो होते हैं जो थककर भी चलते रहते हैं।
वैज्ञानिक, कवि, खोजकर्ता — सबके भीतर यही आग जलती है।
कभी कोई प्रयोग सौ बार फेल होता है,
कभी कविता कोई नहीं सुनता,
कभी दुनिया कहती है — "अब छोड़ दो!"
पर वो रुकते नहीं…
क्योंकि उन्हें मालूम होता है —
हर कोशिश, ब्रह्मांड से एक जवाब और करीब ले आती है।
और मैं मुस्कुरा पड़ा।
थकान अब भी थी, लेकिन अब वो बोझ नहीं लगी।
क्योंकि सितारों ने सिखा दिया —
"थक जाना बुरा नहीं, बुझ जाना बुरा है।"
💫
कल सुबह जब सूरज उगेगा,
तो याद रखना —
रात की थकान ने तुम्हें रोका नहीं,
वो तो बस यह याद दिलाने आई थी…
कि तुम्हारे भीतर भी एक तारा है,
जिसे अभी बहुत दूर तक चमकना है। 🌟