Tobacco Plus India

Tobacco Plus India Magazine dedicated to smokeless to***co and perfume industry This trade magazine is promoted by Mr.

Arif Farooqui, who is the promoter Editor of the trade journal “To***co Plus” he has more than 12 years of experience in editing the to***co plus magazine and has a very good understanding of the to***co trade and the problems faced by this Industry.

26/08/2026
23/08/2026

कर्नाटक में पान मसाला प्रतिबंध को लेकर स्थिति स्पष्ट, तंबाकू-निकोटीन युक्त उत्पाद ही निशाने पर
कर्नाटक सरकार द्वारा गुटखा और पान मसाला पर लगाए गए एक वर्ष के प्रतिबंध को लेकर बाजार में कई तरह की चर्चाएं हैं। खास तौर पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह प्रतिबंध सभी प्रकार के तंबाकू उत्पादों और सामान्य तंबाकू-मुक्त पान मसाला पर भी लागू है। अधिसूचना की भाषा को देखा जाए तो प्रतिबंध का मुख्य दायरा तंबाकू या निकोटीन युक्त गुटखा तथा पान मसाला तक सीमित दिखाई देता है।
कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग की अधिसूचना में स्पष्ट रूप से ऐसे चबाने वाले उत्पादों का उल्लेख किया गया है जिनमें तंबाकू, निकोटीन या संबंधित सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। खाद्य सुरक्षा कानून के प्रावधानों के तहत खाद्य पदार्थों में तंबाकू और निकोटीन को सामग्री के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। इसी आधार पर सरकार ने ऐसे उत्पादों के निर्माण, भंडारण, वितरण, परिवहन और बिक्री पर रोक लगाई है।
इसका महत्वपूर्ण पहलू यह है कि तंबाकू या निकोटीन युक्त पान मसाला और गुटखा को प्रतिबंधित श्रेणी में रखने का अर्थ यह नहीं है कि राज्य में हर प्रकार के तंबाकू उत्पाद पर स्वतः प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसी तरह, यदि कोई पान मसाला उत्पाद तंबाकू और निकोटीन से पूरी तरह मुक्त है तथा उसमें प्रतिबंधित सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया गया है, तो केवल इस अधिसूचना के आधार पर उसे प्रतिबंधित मानना उचित नहीं होगा।
बाजार के लिए यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पान मसाला और तंबाकू दो अलग-अलग उत्पाद श्रेणियां हैं। पान मसाला सामान्यतः एक खाद्य/माउथ-फ्रेशनर श्रेणी का उत्पाद हो सकता है, जबकि तंबाकू एक अलग उत्पाद है। समस्या उस स्थिति में उत्पन्न होती है जब पान मसाला में तंबाकू या निकोटीन को मिलाया जाता है अथवा अलग-अलग पैक किए गए उत्पादों को इस तरह बाजार में उपलब्ध कराया जाता है कि उनका इस्तेमाल प्रतिबंधित संयोजन के रूप में किया जा सके।
इसलिए कर्नाटक की वर्तमान कार्रवाई को समझते समय “तंबाकू-निकोटीन युक्त पान मसाला और गुटखा” तथा “तंबाकू-मुक्त सामान्य पान मसाला” के बीच अंतर करना जरूरी है। इसी तरह केवल अधिसूचना के आधार पर सभी तंबाकू उत्पादों पर व्यापक प्रतिबंध मान लेना भी सही नहीं होगा। किसी विशेष उत्पाद पर प्रतिबंध लागू है या नहीं, इसका अंतिम निर्धारण उसके घटकों, लेबलिंग, उत्पाद की प्रकृति और अधिसूचना में निर्धारित शर्तों के आधार पर किया जाना चाहिए।
कर्नाटक के बाजार में इस स्पष्टीकरण का सीधा असर निर्माताओं, वितरकों, थोक कारोबारियों और पान विक्रेताओं पर पड़ सकता है। कारोबारियों के लिए यह जरूरी होगा कि वे अपने उत्पाद की श्रेणी और उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री की स्पष्ट जानकारी रखें तथा किसी भी प्रवर्तन कार्रवाई की स्थिति में संबंधित अधिसूचना और अपने उत्पाद के दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट कर सकें।
कुल मिलाकर, कर्नाटक की अधिसूचना को सभी पान मसाला और सभी तंबाकू उत्पादों पर blanket ban के रूप में देखने के बजाय उसके वास्तविक शब्दों और कानूनी दायरे के आधार पर समझना अधिक उचित होगा। विशेष रूप से तंबाकू एवं निकोटीन युक्त गुटखा और पान मसाला प्रतिबंध के केंद्र में हैं, जबकि तंबाकू-मुक्त सामान्य पान मसाला पर इस अधिसूचना का प्रभाव अलग तरीके से देखा जाना चाहिए।

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12/08/2026

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12/08/2026

पान मसाला बाजार में पैकेजिंग रीसेट: FSSAI ने प्लास्टिक और एल्युमिनियम लेयर पर लगाई रोक
नई दिल्ली। पान मसाला उद्योग में पैकेजिंग को लेकर बड़ा बदलाव होने जा रहा है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पान मसाला की पैकेजिंग में प्लास्टिक, निर्धारित सिंथेटिक सामग्री, एल्युमिनियम फॉयल और मेटलाइज्ड लेयर्स के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया है। FSSAI ने यह अंतिम संशोधन 7 अगस्त 2026 को अधिसूचित किया।
पेपर, सेलुलोज, टिन और ग्लास होंगे अनुमत विकल्प
नए प्रावधानों के तहत पान मसाला की पैकेजिंग के लिए पेपर, पेपरबोर्ड, सेलुलोज और अन्य प्राकृतिक रूप से प्राप्त सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकेगा। हालांकि इन सामग्रियों में किसी भी प्रकार का प्लास्टिक शामिल नहीं होना चाहिए।
पॉलीएथिलीन (PE), पॉलीप्रोपाइलीन (PP), पॉलीएस्टर, PVC, सिंथेटिक पॉलिमर, को-पॉलिमर और प्लास्टिक आधारित लैमिनेट्स को पैकेजिंग से बाहर रखा गया है। इसके अलावा एल्युमिनियम फॉयल और मेटलाइज्ड लेयर का उपयोग भी प्रतिबंधित रहेगा। टिन और ग्लास कंटेनर अनुमत पैकेजिंग विकल्पों में बने रहेंगे।
प्लास्टिक पाउच पर भी सख्ती
संशोधन में Plastic Waste Management Rules, 2016 के प्रावधानों को भी शामिल किया गया है। इनके तहत गुटखा, तंबाकू और पान मसाला को रखने, पैक करने या बेचने के लिए प्लास्टिक सैशे के इस्तेमाल पर रोक है। यानी पान मसाला उद्योग में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे पारंपरिक प्लास्टिक आधारित पाउच को अब वैकल्पिक पैकेजिंग से बदलना होगा।
₹48,456 करोड़ का बाजार प्रभावित
यह फैसला ऐसे समय आया है जब भारतीय पान मसाला बाजार बड़े पैमाने पर पाउच पैकेजिंग पर निर्भर है। IMARC के अनुसार, 2025 में भारतीय पान मसाला बाजार का आकार लगभग ₹48,455.9 करोड़ था और कुल बाजार में पाउच पैकेजिंग की हिस्सेदारी करीब 72.4 प्रतिशत थी।
IMARC के अनुमान के मुताबिक भारतीय पान मसाला बाजार 2025 के ₹48,455.9 करोड़ से बढ़कर 2034 तक ₹67,034.8 करोड़ तक पहुंच सकता है।
पैकेजिंग उद्योग के लिए नई संभावनाएं
नई व्यवस्था से पान मसाला निर्माताओं को अपने मौजूदा पैकेजिंग फॉर्मेट की समीक्षा करनी होगी। वहीं पेपर, पेपरबोर्ड, सेलुलोज, टिन और ग्लास आधारित पैकेजिंग के निर्माताओं के लिए नए कारोबारी अवसर पैदा हो सकते हैं।
हालांकि FSSAI के संशोधन में पैकेजिंग कंपनियों के लिए किसी विशेष बाजार हिस्सेदारी, खरीद या सोर्सिंग की अनिवार्यता तय नहीं की गई है। तत्काल प्रभाव से मुख्य जिम्मेदारी पान मसाला निर्माताओं और उनके पैकेजिंग फॉर्मेट को नए नियमों के अनुरूप बनाने की होगी।
अप्रैल में आया था ड्राफ्ट
FSSAI ने इस बदलाव की दिशा में 28 अप्रैल 2026 को ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर हितधारकों से आपत्तियां और सुझाव मांगे थे। विचार-विमर्श के बाद अब अंतिम संशोधन अधिसूचित किया गया है।
पान मसाला उद्योग के लिए यह बदलाव केवल पैकेजिंग सामग्री बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पैकेजिंग डिजाइन, उत्पादन प्रक्रिया, मशीनरी, लागत और सप्लाई चेन पर भी असर पड़ने की संभावना है। आने वाले समय में उद्योग में प्लास्टिक-मुक्त और प्राकृतिक सामग्री आधारित पैकेजिंग के नए विकल्पों की मांग तेजी से बढ़ सकती है।

25/07/2026

कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पान मसाला निर्माताओं पर HSNS सेस का मनमाना प्रावधान रद्द
बेंगलुरु। पान मसाला उद्योग को बड़ी राहत देते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने Health Security-cum-National Security (HSNS) Cess Act, 2025 के उस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया है, जिसके तहत पाउच पैकिंग मशीनों की उत्पादन क्षमता (Production Capacity) के आधार पर सेस वसूला जा रहा था। अदालत ने कहा कि संसद को ऐसा कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन सेस लगाने का तरीका संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी निर्माता से वास्तविक उत्पादन के बजाय मशीन की अनुमानित क्षमता के आधार पर सेस वसूलना मनमाना (Arbitrary) और अतार्किक है। इसलिए अधिनियम के संबंधित प्रावधान, इसके तहत बनाए गए नियम तथा इस संबंध में जारी अधिसूचनाएं असंवैधानिक हैं।

क्या था विवाद?
HSNS Cess Act, 2025 के तहत पान मसाला निर्माताओं से सेस की गणना उनके कारखानों में लगी पाउच पैकिंग मशीनों की क्षमता के आधार पर की जा रही थी। यानी यदि कोई मशीन प्रति मिनट 500 पाउच बनाने में सक्षम है, तो सेस उसी अनुमानित क्षमता के आधार पर लगाया जाता था, भले ही वास्तविक उत्पादन इससे कम क्यों न हो। इस व्यवस्था को कई पान मसाला कंपनियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संसद के पास अवशिष्ट (Residuary) विधायी शक्तियों के तहत ऐसा सेस लगाने का अधिकार है और इस आधार पर कानून को चुनौती स्वीकार नहीं की जा सकती। लेकिन अदालत ने कहा कि कराधान का आधार वास्तविक उत्पादन होना चाहिए, न कि केवल मशीन की संभावित क्षमता। इसलिए वर्तमान व्यवस्था अनुच्छेद 14 की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

उद्योग पर संभावित प्रभाव
इस फैसले को पान मसाला उद्योग के लिए महत्वपूर्ण राहत माना जा रहा है। यदि यह निर्णय आगे भी बरकरार रहता है, तो मशीन क्षमता आधारित सेस व्यवस्था समाप्त हो सकती है और सरकार को नया, अधिक न्यायसंगत एवं वास्तविक उत्पादन आधारित तंत्र तैयार करना पड़ सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार के पास इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने का विकल्प उपलब्ध है।
— To***co Plus News Desk

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23/07/2026

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21/07/2026

एफएसएसएआई पैकेजिंग में अनियमितता से विदेशी मूल साबित नहीं होता: गौहाटी हाईकोर्ट ने 17,200 किलोग्राम सुपारी को रिहा करने का दिया आदेश
टोबैको प्लस | विशेष कानूनी रिपोर्ट
सुपारी व्यापार से जुड़े कारोबारियों के लिए गौहाटी हाईकोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एफएसएसएआई (FSSAI) पैकेजिंग नियमों में कथित अनियमितता मात्र के आधार पर किसी सुपारी (Areca Nut) को विदेशी मूल (Foreign Origin) का मानकर सीमा शुल्क (Customs) विभाग द्वारा जब्त नहीं किया जा सकता।
मामले में कस्टम विभाग ने 17,200 किलोग्राम सूखी सुपारी को यह संदेह जताते हुए जब्त कर लिया था कि वह अवैध रूप से विदेश, विशेषकर म्यांमार, से भारत लाई गई है। हालांकि व्यापारी ने खरीद-बिक्री से संबंधित टैक्स इनवॉइस, जीएसटी दस्तावेज, ई-वे बिल तथा अन्य आवश्यक व्यावसायिक अभिलेख प्रस्तुत किए, जिनसे माल के वैध भारतीय व्यापारिक लेन-देन का प्रमाण मिला।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि कस्टम विभाग के पास ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था जिससे यह सिद्ध हो सके कि सुपारी विदेशी मूल की थी या उसकी तस्करी की गई थी। न्यायालय ने कहा कि एफएसएसएआई पैकेजिंग संबंधी कथित कमियां विदेशी मूल का प्रमाण नहीं मानी जा सकतीं और केवल इन्हीं आधारों पर कस्टम अधिनियम के तहत जब्ती की कार्रवाई उचित नहीं है।
अदालत ने यह भी दोहराया कि कस्टम अधिनियम, 1962 की धारा 110 के तहत जब्ती की कार्रवाई तभी वैध होगी जब विभाग के पास "विश्वसनीय कारण (Reason to Believe)" और पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हों। केवल संदेह या तकनीकी अनियमितताओं के आधार पर व्यापारिक माल को जब्त नहीं किया जा सकता।
व्यापार जगत के लिए महत्व
यह निर्णय सुपारी व्यापार से जुड़े आयातकों, व्यापारियों और परिवहनकर्ताओं के लिए राहत देने वाला माना जा रहा है। इससे यह सिद्धांत और मजबूत हुआ है कि यदि किसी माल के विदेशी मूल का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है, तो केवल पैकेजिंग संबंधी त्रुटियों के आधार पर उसे तस्करी का माल मानकर जब्त नहीं किया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में सुपारी और अन्य कृषि उत्पादों से जुड़े ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल साबित हो सकता है, जहां विभाग केवल संदेह के आधार पर जब्ती की कार्रवाई करता है।

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