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जूते पॉलिश करने वाला लड़का और 20 करोड़ की मशीन“मैम… मैं इस इंजन को ठीक कर सकता हूँ।”कमरे में सन्नाटा छा गया।फिर एक ठहाका...
28/02/2026

जूते पॉलिश करने वाला लड़का और 20 करोड़ की मशीन

“मैम… मैं इस इंजन को ठीक कर सकता हूँ।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।
फिर एक ठहाका गूंजा।

“क्या बकवास है!”
“इसे पता भी है ये क्या बोल रहा है?”
“हम 10 दिन से फँसे हैं और ये बच्चा मशीन ठीक करेगा?”

लेकिन उस 15 साल के लड़के की आँखों में डर नहीं था।
बस एक अजीब-सा भरोसा था।

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पहचान कपड़ों से नहीं, कर्मों से होती हैसुबह के लगभग आठ बजे थे। शहर के सबसे प्रतिष्ठित निजी विद्यालय सूर्यनगरी इंटरनेशनल ...
28/02/2026

पहचान कपड़ों से नहीं, कर्मों से होती है

सुबह के लगभग आठ बजे थे। शहर के सबसे प्रतिष्ठित निजी विद्यालय सूर्यनगरी इंटरनेशनल स्कूल के मुख्य गेट के बाहर हमेशा की तरह चहल-पहल थी। महंगी गाड़ियां आ-जा रही थीं, बच्चे नए-नए यूनिफॉर्म में चमक रहे थे और सिक्योरिटी गार्ड व्यवस्था संभाल रहे थे।

इसी भीड़ में एक महिला धीरे-धीरे स्कूल के गेट की ओर बढ़ रही थी। फीकी नीली साड़ी, किनारों से उधड़ी हुई, पैरों में साधारण चप्पलें और हाथ में एक पुराना लेदर बैग, जिस पर कभी “टीचर्स प्राइड” लिखा हुआ था—अब लगभग मिट चुका था।

वह महिला थीं सुनीता शर्मा, उम्र लगभग पचपन वर्ष। चेहरे पर सादगी, आंखों में अनुभव की गहराई और चाल में वह गरिमा, जो सिर्फ एक सच्चे शिक्षक में होती है।

जैसे ही वह गेट पर पहुंचीं, गार्ड ने उन्हें रोक लिया।
“मैडम, कहां जाना है?”

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हवा से रोशनी तक: आरव यादव की कहानीउत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले का एक छोटा-सा गांव। धूल भरी गलियां, टूटी-फूटी झोपड़ियां ...
28/02/2026

हवा से रोशनी तक: आरव यादव की कहानी

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले का एक छोटा-सा गांव। धूल भरी गलियां, टूटी-फूटी झोपड़ियां और सीमित सपने। इसी गांव में रहता था उन्नीस साल का एक दुबला-पतला लड़का—आरव यादव। घर की हालत ऐसी थी कि दीवारें ईंटों से ज़्यादा उम्मीदों पर टिकी थीं। पिता खेतों में मजदूरी करते थे, मां दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाती थीं। लेकिन आरव का मन किताबों और मशीनों में बसता था।

जहां बाकी बच्चे मोबाइल पर गाने सुनते थे, वहीं आरव पुराने रेडियो खोलकर उनके तार और पुर्ज़े निकालता रहता। लोग उसे “पागल इंजीनियर” कहकर चिढ़ाते थे। कोई नहीं समझ पाता था कि उस लड़के की आंखों में चमक क्यों रहती है।

एक दिन गांव के स्कूल में बिजली चली गई। गर्मी से बच्चे बेहाल थे। शिक्षक ने मज़ाक में कहा,
“आरव, ज़रा देख तो ट्रांसफॉर्मर में क्या हुआ है?”

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रात की सुनसान सड़क… साधु ने IPS मैडम को रोका — फिर हुआ ऐसा, सुनकर रूह कांप जाएगी!”रात के ठीक 11 बजे थे। पटना की सड़कें ल...
27/02/2026

रात की सुनसान सड़क… साधु ने IPS मैडम को रोका — फिर हुआ ऐसा, सुनकर रूह कांप जाएगी!”

रात के ठीक 11 बजे थे। पटना की सड़कें लगभग सुनसान हो चुकी थीं। चारों ओर सन्नाटा पसरा था, केवल स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी और दूर-दूर से आती हवा की सरसराहट उस वीरानी को और भी डरावना बना रही थी। इसी अंधेरे के बीच एक गाड़ी से उतरकर तेज़ कदमों से अपने घर की ओर बढ़ रही थीं अनीता चौहान — एक निडर, कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार IPS अफसर।

उस दिन एक अहम मीटिंग की वजह से अनीता को देर हो गई थी। ड्यूटी उनके लिए कभी बोझ नहीं रही, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह रात उनकी ज़िंदगी की सबसे खौफनाक और सबसे साहसी रातों में से एक बन जाएगी।

सुनसान सड़क और रहस्यमय साधु

जैसे ही अनीता एक सुनसान मोड़ पर पहुंचीं, उन्होंने देखा कि सड़क के बीचों-बीच एक बूढ़ा साधु खड़ा है। सफेद कपड़े, झोली और माथे पर तिलक — बाहर से देखने में वह एक धार्मिक व्यक्ति लग रहा था। लेकिन उसकी आंखों में कुछ ऐसा था जिसने अनीता को असहज कर दिया।

जब अनीता उसके पास से निकलने लगीं, तो वह साधु अचानक रास्ते में आकर खड़ा हो गया। उसकी नज़रें अनीता को ऊपर से नीचे तक घूर रही थीं। अनीता ने स्थिति को समझते हुए उसे नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन साधु पीछे-पीछे चलने लगा।

डर की शुरुआत

अंधेरे में कदमों की आहट और पीछा करता हुआ वह व्यक्ति — अनीता का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। अचानक उस बूढ़े साधु ने अनीता का रास्ता रोक लिया और उनके बाजू पकड़ लिए। उसके चेहरे पर अजीब सा नशा और बेशर्मी थी।

“कहां से आ रही हो?” उसने अश्लील लहजे में पूछा।

अनीता ने संयम बनाए रखते हुए कहा कि वह काम से लौट रही हैं। लेकिन साधु हंस पड़ा। उसने उनके बाल पकड़कर खींचे और बदतमीजी करने लगा। अब अनीता समझ चुकी थीं कि मामला बेहद गंभीर है।
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परदेस की कमाई, अपनों की कीमतक्या आपने कभी सोचा है कि जो इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी अपनों की खुशियों के लिए जला देता है, उसे...
27/02/2026

परदेस की कमाई, अपनों की कीमत

क्या आपने कभी सोचा है कि जो इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी अपनों की खुशियों के लिए जला देता है, उसे आख़िर में क्या मिलता है?

यह कहानी है सुलेमान की।

सुलेमान ने अपने जीवन के बीस साल ओमान की तपती धूप में गुज़ार दिए। सीमेंट की बोरियां उठाते हुए, लोहे की छड़ें मोड़ते हुए, उसने हर दिन खुद को थोड़ा-थोड़ा खत्म किया—सिर्फ इसलिए ताकि नूरपुर गांव में उसका परिवार सुकून की ज़िंदगी जी सके।

मस्कट इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर जब वह अपना पुराना, घिसा हुआ सूटकेस लिए खड़ा था, उसके हाथ कांप रहे थे। यह वही सुलेमान नहीं था जो बीस साल पहले चौड़ा सीना और सपनों से भरी आंखें लेकर परदेस गया था। अब उसकी पीठ झुक चुकी थी, चेहरे पर झुर्रियां थीं और शरीर बीमारियों से टूटा हुआ था।

उसने अपनी जवानी परिवार के नाम लिख दी थी।

हर महीने की पहली तारीख को वह अपनी पूरी तनख्वाह घर भेज देता। खुद के लिए सिर्फ उतना रखता जितना ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी हो। कभी बहन की शादी, कभी भाई की पढ़ाई, कभी घर की छत—हर ज़रूरत पर सुलेमान चुपचाप और ज़्यादा काम करने लगता।

वह सोचता था,
“जब लौटूंगा तो ये सब मेरी ढाल बनेंगे।”

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गरीब मां के भूखे बच्चे को करोड़पति लड़की ने दूध पिलाया… आगे जो हुआ इंसानियत हिल गईप्रस्तावनादिल्ली की दोपहरें अक्सर भागत...
27/02/2026

गरीब मां के भूखे बच्चे को करोड़पति लड़की ने दूध पिलाया… आगे जो हुआ इंसानियत हिल गई
प्रस्तावना
दिल्ली की दोपहरें अक्सर भागती दौड़ती रहती हैं। मंदिरों में घंटियों की आवाज, सड़क पर गाड़ियों का शोर, और लोगों की भीड़—हर कोई अपनी-अपनी जिंदगी में उलझा हुआ। लेकिन उसी शहर के एक कोने में, फुटपाथ पर बैठी एक मां और उसका बच्चा, इस भीड़ में गुमनाम हैं। उनकी जिंदगी, उनकी तकलीफें, उनकी भूख—इन सबका शोर मंदिरों के शोर में कहीं दब जाता है। कहते हैं, पाप हाथों से नहीं, नजर फेर लेने से होता है। और आज, इसी नजर फेरने की आदत ने एक मां को अपने बच्चे को सूखी छाती से बहलाने पर मजबूर कर दिया है।
भाग 1: सावित्री की दुनिया
सावित्री, उम्र में बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन उसके चेहरे पर थकान और दर्द की गहरी लकीरें थीं। उसके कपड़े फटे हुए, होठ सूखे, और आँखों में डर और बेबसी तैरती रहती थी। उसकी गोद में उसका छह महीने का बच्चा था, जो लगातार रो रहा था। यह रोना तेज नहीं था, बल्कि कमजोर और टूटता हुआ था—जैसे उसमें भी अब ताकत नहीं बची हो।
दो दिन से सावित्री ने खुद भी कुछ नहीं खाया था। शरीर में ताकत नहीं थी और दूध भी लगभग खत्म हो चुका था। एक मां होकर भी वह अपने बच्चे को पेट भरकर नहीं खिला पा रही थी। सड़क से गुजरते लोग, कभी-कभी रुकते, एक नजर डालते और फिर आगे बढ़ जाते। किसी ने कहा, "आजकल लोग नाटक बहुत करते हैं।" किसी ने शक की नजर से देखा, और किसी ने तो देखने की जरूरत भी नहीं समझी।
गरीबी ने सावित्री को यह सिखा दिया था कि मदद मांगना भी कई बार अपमान जैसा लगता है। उसने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा। उसकी आत्मा में एक अजीब सी चुप्पी थी, जैसे उसने दुनिया से उम्मीद करना छोड़ दिया हो।
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जिस बच्चे को भिखारी समझ रहे थे वह निकला MBBS डॉक्टर। फिर बच्चे ने जो कियाशहर के सबसे बड़े और आलीशान हॉस्पिटल "सिटी लाइफ ...
27/02/2026

जिस बच्चे को भिखारी समझ रहे थे वह निकला MBBS डॉक्टर। फिर बच्चे ने जो किया
शहर के सबसे बड़े और आलीशान हॉस्पिटल "सिटी लाइफ हॉस्पिटल" की इमारत आसमान को छूती थी। कांच की दीवारों से बनी यह इमारत जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही डरावनी भी। यहां हर दिन जिंदगी और मौत का सौदा होता था। इसी हॉस्पिटल के ठीक सामने सड़क के किनारे एक पुरानी सी टपरी थी। यह टपरी रामलाल की थी। सुबह के छह बजे बजते ही अदरक और इलायची वाली चाय की महक पूरे इलाके में फैल जाती थी। रामलाल अपनी बूढ़ी हड्डियों के साथ चाय बनाता और उसका बेटा रवि ग्राहकों को चाय सर्व करता।
रवि कोई साधारण लड़का नहीं था। उसकी उम्र मुश्किल से बीस साल थी। उसके एक हाथ में चाय की केतली होती थी और दूसरे हाथ में ग्रेस एनाटॉमी जैसी मोटी मेडिकल किताबें। उसके कपड़े भले ही पुराने थे, लेकिन उसकी आंखों में एक चमक थी - डॉक्टर बनने की चमक। वह शहर के मेडिकल कॉलेज में कार्डियोलॉजी का सबसे होनहार छात्र था, जिसे स्कॉलरशिप मिली हुई थी। लेकिन घर की गरीबी ऐसी थी कि कॉलेज के बाद उसे अपने पिता का हाथ बटाना पड़ता था।
रामलाल अक्सर रवि को किताबों में डूबा देख भावुक हो जाते। वे कहते, "बेटा, मेरे हाथ तो चाय छानते-छानते घिस गए, लेकिन तू इन हाथों से लोगों की जिंदगी बचाएगा। तू इस सामने वाले अस्पताल का सबसे बड़ा डॉक्टर बनेगा।" रवि मुस्कुरा देता, "जरूर पापा, एक दिन मैं उस हॉस्पिटल में चाय देने नहीं, इलाज करने जाऊंगा।"
लेकिन किस्मत ने उस दिन कुछ और ही तय कर रखा था।
सोनू सिंघानिया का दिल का दौरा
दोपहर के दो बजे थे। सूरज आग उगल रहा था। अचानक शहर का माहौल बदल गया। हॉस्पिटल के गेट पर सायरन की गूंज सुनाई दी। यह एंबुलेंस का सायरन नहीं था, बल्कि पुलिस और प्राइवेट सिक्योरिटी का काफिला था। काली गाड़ियों का एक लंबा रेला हॉस्पिटल के पोर्च पर रुका। गाड़ियों से दर्जनों बॉडीगार्ड उतरे और उन्होंने घेरा बना लिया। बीच वाली गाड़ी का दरवाजा खुला और बाहर निकला सोनू सिंघानिया।
सोनू सिंघानिया नाम ही काफी था। शहर का सबसे बड़ा बिजनेस टाइकून, जिसका कारोबार रियल एस्टेट से लेकर अंडरवर्ल्ड तक फैला था। कहते थे कि शहर की पुलिस भी उसकी इजाजत के बिना सांस नहीं लेती थी। लेकिन आज वह ताकतवर इंसान लड़खड़ा रहा था। उसका चेहरा पसीने से तर-बतर था। बायां हाथ सीने पर जकड़ा हुआ था और उसकी आंखों में वह खौफ था जो उसने आज तक दूसरों की आंखों में देखा था - मौत का खौफ।
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“भेष बदलकर निकली DM पूजा और पकड़ा सिस्टम का गंदा सच |प्रस्तावनाशहर की सुबह हमेशा शोरगुल भरी रहती थी। हर कोई अपने-अपने का...
27/02/2026

“भेष बदलकर निकली DM पूजा और पकड़ा सिस्टम का गंदा सच |
प्रस्तावना
शहर की सुबह हमेशा शोरगुल भरी रहती थी। हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त, अपनी-अपनी ज़िंदगी की जद्दोजहद में डूबा हुआ। लेकिन आज की सुबह कुछ अलग थी। सिटी लाइफ हॉस्पिटल के सामने भीड़ लगी थी, मीडिया के कैमरे चमक रहे थे, पुलिस की गाड़ियाँ खड़ी थीं और हर किसी की नज़र अस्पताल के दरवाज़े पर थी। इस शहर का सबसे बड़ा बिजनेस टाइकून सोनू सिंघानिया अस्पताल के अंदर ज़िंदगी और मौत के बीच लड़ रहा था। लेकिन आज की कहानी सोनू सिंघानिया की नहीं, बल्कि उस लड़के की है, जो अस्पताल के सामने अपने पिता की छोटी सी चाय की टपरी पर चाय बेचता था - रवि कुमार।
रामलाल की टपरी
रवि के पिता, रामलाल, पिछले तीस साल से उसी टपरी पर चाय बेचते थे। सुबह के छह बजे से ही उनकी टपरी पर अदरक और इलायची वाली चाय की खुशबू फैल जाती थी। रामलाल के हाथों में उम्र की लकीरें थीं, लेकिन आँखों में अपने बेटे के लिए सपने थे। रवि, उनका इकलौता बेटा, मेडिकल कॉलेज में पढ़ता था। कार्डियोलॉजी में टॉप करता था, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि उसे कॉलेज के बाद टपरी पर आकर पिता का हाथ बँटाना पड़ता था।
रवि का सपना था डॉक्टर बनना, बड़े अस्पताल में काम करना, गरीबों का मुफ्त इलाज करना। लेकिन उसकी ज़िंदगी संघर्षों से भरी थी। वह दिन में किताबें पढ़ता, रात में चाय बनाता। उसके दोस्त मज़ाक उड़ाते, “डॉक्टर बनेगा या चायवाला रहेगा?” लेकिन रवि की आँखों में उम्मीद थी।
अस्पताल की हलचल
एक दिन, दोपहर के वक्त, शहर में अफरा-तफरी मच गई। काली गाड़ियों का काफिला अस्पताल के सामने रुका। बॉडीगार्ड्स ने घेरा बना लिया। सोनू सिंघानिया, शहर का सबसे ताकतवर आदमी, गाड़ी से उतरा। उसके चेहरे पर डर था, सीने में दर्द था। वह लड़खड़ाता हुआ अस्पताल के अंदर गया और अचानक गिर पड़ा। डॉक्टरों ने उसे तुरंत आईसीयू में शिफ्ट किया। मीडिया वालों ने खबर चला दी - सोनू सिंघानिया को दिल का दौरा पड़ा है।
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करोड़पति लड़का बोला: खाना दूँगा, पर रूम चलो—गरीब लड़की ने सोचा भी नहीं था, आगे जो हुआ…प्रस्तावनाभारत के उत्तर प्रदेश राज...
27/02/2026

करोड़पति लड़का बोला: खाना दूँगा, पर रूम चलो—गरीब लड़की ने सोचा भी नहीं था, आगे जो हुआ…
प्रस्तावना
भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित वाराणसी, जिसे काशी या बनारस भी कहा जाता है, केवल धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कारों और संघर्षों की भूमि है। यहां गंगा के घाटों पर रोज़ हजारों कहानियाँ जन्म लेती हैं, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो समाज की सोच बदल देती हैं। यह कहानी मीरा की है—एक गरीब, भूखी लेकिन स्वाभिमानी लड़की की, और आदित्य की—एक करोड़पति युवक, जिसने दौलत से ज़्यादा इंसानियत को महत्व दिया। इन दोनों की मुलाकात, संघर्ष, प्रेम और बदलाव की यात्रा न सिर्फ दिल को छूती है, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है कि असली अमीरी क्या होती है।
2. वाराणसी के घाट और मीरा की तन्हाई
शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। गंगा मैया की आरती की तैयारियाँ चल रही थीं। घाटों पर भीड़ थी, हवा में घी और फूलों की खुशबू थी। हर कोई अपने-अपने जीवन में मग्न था। लेकिन उसी भीड़ के बीच एक सीढ़ी पर बैठी थी मीरा—20 साल की, बेहद खूबसूरत लेकिन थकी हुई। फटे सलवार सूट, छेददार दुपट्टा, बिना चप्पल के फटी एड़ियाँ, सूखे गाल और होंठ, आंखों के नीचे गहरे काले घेरे—उसका शरीर गरीबी और संघर्ष की गवाही दे रहा था।
मीरा की आंखों में भीख नहीं थी। उसमें सिर्फ एक सवाल था—क्या मैं इंसान नहीं हूं? लोग आरती देखते, प्रसाद लेते और घर लौट जाते। किसी की नजर उस लड़की पर नहीं पड़ती, जो उसी घाट की सीढ़ियों पर बैठी ज़िंदगी से जूझ रही थी।
3. भूख और स्वाभिमान की लड़ाई
मीरा का पेट लगातार चीख रहा था, लेकिन आवाज़ नहीं कर रहा था। भूख ऐसी थी, जो अंदर से इंसान को खोखला कर देती है। तभी भीड़ के बीच से एक हट्टा-कट्टा हलवाई गुजरता है। उसके हाथ में गरम-गरम समोसे थे। घी की खुशबू हवा में फैल गई। मीरा का पेट ऐंठ गया। हलवाई ने एक समोसा कुत्ते को फेंका, दूसरा मीरा की तरफ। कुत्ता झपटा, मीरा भी आगे बढ़ी, लेकिन रुक गई। समोसा जमीन पर गिरा था, कुत्ते के पास। इतनी भूख में भी मीरा ने उसे उठाया नहीं। उसका हाथ वहीं रुक गया। उसने सोचा, जानवर और इंसान में कुछ तो फर्क होना चाहिए। वह चुपचाप पीछे हट गई। कुत्ता समोसा लेकर भाग गया।
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सुबह की हवा में सड़ांध घुली हुई थी। रेलवे लाइन के पास पड़ा कूड़े का ढेर सूरज की पहली किरणों में चमक रहा था। प्लास्टिक, स...
25/02/2026

सुबह की हवा में सड़ांध घुली हुई थी। रेलवे लाइन के पास पड़ा कूड़े का ढेर सूरज की पहली किरणों में चमक रहा था। प्लास्टिक, सड़ी सब्जियां, फटे अखबार और ऐसी चीज़ें जिनकी पहचान करना भी मुश्किल था। उसी ढेर के पास झुका हुआ एक लड़का अपने फटे बोरे में कूड़ा भर रहा था। उसका नाम अमन था।

लोग उसे नाम से नहीं जानते थे। कोई “कूड़े वाला” कह देता, कोई “अबे हट”। अमन को फर्क नहीं पड़ता था। अगर किसी चीज़ से फर्क पड़ता था, तो वह थी उसके भीतर गूंजती एक आवाज़। जब वह कूड़े में से काम की चीज़ें छांटता, उसके होंठ अपने आप हिलने लगते। कभी कोई पुराना भजन, कभी कोई फिल्मी गीत और कभी बस टूटी-फूटी धुनें। उसकी आवाज़ साफ थी। इतनी साफ कि पास से गुजरते लोग एक पल के लिए रुक जाते।

“अरे, यह तो अच्छा गाता है…”

लेकिन अगले ही पल नाक सिकोड़कर आगे बढ़ जाते।

उस दिन भी ऐसा ही हुआ। एक आदमी ने ₹5 का सिक्का उसकी ओर उछाल दिया।
“ले, गाना बंद कर और काम कर।”

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This Is IndiaEmily Roberts and Sarah Williams grew up together in California. Their friendship began in childhood and fo...
25/02/2026

This Is India

Emily Roberts and Sarah Williams grew up together in California. Their friendship began in childhood and followed them through college and into adulthood. Emily became a travel blogger, always chasing new places and stories. Sarah chose a different path—she became a documentary filmmaker, driven by a desire to understand real lives beyond polished headlines.

Between them, they had traveled to dozens of countries. But there was one place that always felt distant, mysterious, and controversial.

India.

What they knew about India came mostly from social media clips, half-baked news reports, and negative stereotypes—heat, crowds, poverty, noise, danger. Those words lingered in their minds. Yet beneath the assumptions was curiosity.

One evening, Emily finally said it out loud.

“If we truly want to understand the world,” she said, “we can’t keep ignoring India.”

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