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समयांतर का मार्च 2026 अंक वेबसाइट पर उपलब्ध है. देखें:
15/03/2026

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08/02/2026

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समयांतर का जनवरी 2026 विशेष  अंक वेबसाइट पर उपलब्ध है. देखें:
09/01/2026

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जनवरी 2026
04/01/2026

जनवरी 2026

20/12/2025

पंकज बिष्ट ने समयांतर पत्रिका की शुरुआत स्वेच्छा से रिटायरमेंट लेने के बाद की. उस समय वह 52 वर्ष के थे और केंद्र सरकार के प्रकाशन विभाग में नौकरी कर रहे थे. रिटायरमेंट तक उनके दो उपन्यास, ‘लेकिन दरवाज़ा’ और ‘उस चिड़िया का नाम’, सहित कई कहानियां भी प्रकाशित हो चुकी थीं. वह पहले से जानते थे कि उन्हें एक ऐसी हिंदी पत्रिका निकालनी है जो समाज और राजनीति पर बात करे. इससे पहले वह 1970 और 1977 में भी ऐसा करने की कोशिश कर चुके थे, लेकिन ख़ास सफलता नहीं मिली. हालांकि, उनकी इच्छा लगभग आधे लिखे उपन्यास को पहले पूरा कर लेने की थी. उन्होंने क़रीब 200 पन्ने लिख लिए थे, लेकिन एक दिन कंप्यूटर फ़ाइल करप्ट हो गई. वह बताते हैं कि 'एडिट करते-करते कुछ ग़लत हो गया. सोचा बाद में ठीक कर लूंगा.' फिर उन्होंने ध्यान वापस एक पत्रिका पर लगाया, जो आगे चलकर समयांतर बनी. उनका कहना था कि यह वह दौर था जब माहौल में ‘घुटन’ बढ़ रही थी. अख़बार कई बातें लिखने से हिचकिचाने लगे थे. लिखने और बोलने की आज़ादी कम हो रही थी.

ऐसे घुटन भरे माहौल में बिष्ट ने खुल कर सांस लेने का विकल्प चुना. उन्होंने बताया, 'मैं ऐसी पत्रिका निकालना चाहता था जिसमें मैं खुल कर, बिना डरे, वही कह सकूं जो कहना चाहता हूं.'

पढ़ें समयान्तर पत्रिका पर विष्णु शर्मा का पूरा लेख, लिंक कमेन्ट बॉक्स में.

19/12/2025

कारवां के नए अंक में:
इस साल अक्टूबर में हिंदी की मासिक पत्रिका समयांतर ने अपने प्रकाशन के 26 वर्ष पूरे कर लिए. इसके चार हज़ार से अधिक पाठकों के लिए पत्रिका का हर अंक उस भारत का दस्तावेज़ है, जो इन वर्षों में धीरे-धीरे बदलते हुए लगभग अपरिचित हो गया है. शुरुआती दौर में लिखने वाले कई लेखक अब इस दुनिया में नहीं हैं, जबकि कई नए नाम समयांतर के माध्यम से उभर कर आज स्थापित पत्रकार, लेखक और बुद्धिजीवी के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं.

शुरुआत दिनों में, जब 1990 के दशक में भारत विश्व बाज़ार के लिए खुल रहा था, समयांतर का मुख्य ध्यान वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के असर और महिलाओं, किसानों, मज़दूरों के संघर्षों पर था, पर आज पत्रिका में बढ़ते लोकतांत्रिक संकट, हिंदुत्व राजनीति के उभार और जाति के प्रश्नों पर लगातार विमर्श होता है. 2002 में गुजरात में हुए मुसलमान-विरोधी नरसंहार के बाद पत्रिका ने ‘बहुसंख्यक हिंसा और धर्म का भारतीय राजनीति व समाज में हस्तक्षेप’ जैसे विषयों पर लेखों, रिपोर्टों और संपादकियों की एक महत्त्वपूर्ण शृंखला प्रकाशित करनी शुरू की.

पढ़ें समयांतर पर विष्णु शर्मा का लेख, क़ंदील : हिंदी संसार की दरिद्रता से टकराती समयांतर पत्रिका के 26 साल, लिंक कमेंट बॉक्स में.

नवंबर २०२५ अंक
04/11/2025

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