Poet : Bhawana Chopra Arohi

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भावों का अभिनंदन कविता!
आत्मा का स्पंदन कविता!
अनुभूति के शब्द लपेटे
महका-महका चंदन कविता!
~ भावना आरोही
चिकित्सक | लेखिका | कवयित्री | गीतकार
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स्वरचित एवम् कॉपीराइट ©® [email protected]

19/09/2026

आँखों में दिखा दे कोई, ज़ज्बात का पानी।
ज्यों पत्तियों पे ओस बने, रात का पानी।
वो छत, वो आसमान, सुराही, वो मटकियाँ;
काग़ज़ की नाव और वो बरसात का पानी।
©️ डॉ.भावना चोपड़ा आरोही

जिस लेखन में वर्षों की तपस्या थी, AI ने उस तपस्या को एक पल में छीन लिया! अब सभी की मात्रिक त्रुटियाँ ग़ायब हो गईं और सभी...
07/09/2026

जिस लेखन में वर्षों की तपस्या थी, AI ने उस तपस्या को एक पल में छीन लिया! अब सभी की मात्रिक त्रुटियाँ ग़ायब हो गईं और सभी लेखक और कवि बन गए हैं।

कोई अच्छा लिखे तो भी लोग AI का समझते हैं, सिर्फ़ उन्हें छोड़कर, जो आपको पहले से लिखते हुए देख रहे हैं। कहीं AI प्रेरित लेख पढ़-पढ़ के पाठक की शैली ही न बदल जाए!

तस्वीरें कलात्मक रूप से edit की जाएँ, तो पंक्तियों के साथ अच्छी लगती हैं लेकिन AI मनचाहे रिज़ल्ट नहीं देता।

आपके क्या विचार हैं?

~ भावना चोपड़ा आरोही

06/09/2026
06/09/2026

#हिन्दीगीत

एक दिशा में तो बात को रखिए;वरना  चर्चा  बहुत  निरर्थक  है ! ~भावना आरोहीEk disha  me  toh  baat  ko  rakhie....Varna cha...
12/08/2026

एक दिशा में तो बात को रखिए;
वरना चर्चा बहुत निरर्थक है !
~भावना आरोही
Ek disha me toh baat ko rakhie....
Varna charcha bahut nirarthak hai....
~Bhawana Arohi
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Words & Pic : Dr. Bhawana Arohi
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23/07/2026

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क्या ख़ुद ही लिखती हो कविता? एक महाशय पूछ रहे हैं।
मैं कैसे उनको समझाऊँ ? "कविता" तो मुझमे रहती है।

शब्द-शब्द की मैं हूँ साधक
काव्य रसों को मैं पीती हूँ।
अलंकार मेरे आभूषण
गीतों में ही मैं जीती हूँ।
मेरी जितनी विषम वेदना
आधी तो कविता सहती है; कविता तो मुझमे रहती है।
(क्रमशः)
~डॉ. भावना आरोही

तेरी नज़रों की निगहबानी मिली जब से मुझे,अब  किसी  और आसरे की आरज़ू भी नहीं।              Teri nazron ki nigahbani mili j...
26/06/2026

तेरी नज़रों की निगहबानी मिली जब से मुझे,
अब किसी और आसरे की आरज़ू भी नहीं।

Teri nazron ki nigahbani mili jab se mujhe,
Ab kisi aur aasre ki aarzu bhi nahin.

✍️ डॉ.भावना चोपड़ा आरोही








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क्या फ़ायदा!
25/06/2026

क्या फ़ायदा!

कभी-कभी किसी बच्चे को खेलते हुए देखती हूँ तो मन में एक प्रश्न उठता है; क्या हम भी कभी ऐसे ही थे? हाँ, हम भी ऐसे ही तो थे...
24/06/2026

कभी-कभी किसी बच्चे को खेलते हुए देखती हूँ तो मन में एक प्रश्न उठता है; क्या हम भी कभी ऐसे ही थे? हाँ, हम भी ऐसे ही तो थे!

हम भी बिना किसी झिझक के हँसते थे .... मासूमियत में रो लेते थे .... जो अच्छा लगता था, कह देते थे ..... जो बुरा लगता था, उससे दूर हो जाते थे ..... हमें यह चिंता नहीं होती थी कि लोग क्या सोचेंगे ...... हमारी छवि कैसी बनेगी .....या हमारी बात का क्या अर्थ निकाला जाएगा।

बचपन में हम सहज थे। फिर धीरे-धीरे जीवन ने हमें "समझदार" बनाना शुरू किया। हमें सिखाया गया कि हर बात मन की नहीं कहनी चाहिए ..... हर भावना दिखानी नहीं चाहिए ..... आँसू बहाना कमज़ोरी है।

फिर हमने लोगों को ख़ुश रखना सीखा .....अपनी भावनाओं को छिपाना सीखा ..... और कई बार तो स्वयं से भी दूर होना सीख लिया। उम्र बढ़ती गई और परतें चढ़ती गईं! एक परत सामाजिक अपेक्षाओं की, एक परत सफल दिखने की, एक परत दूसरों को निराश न करने की, और एक परत स्वयं को मजबूत साबित करने की, और इन सब परतों के नीचे कहीं वह सहज व्यक्ति आज भी मौजूद है, जो बिना किसी दिखावे के जीना चाहता है। पर क्या सचमुच हम फिर से वैसे हो सकते हैं?

शायद बिल्कुल वैसे नहीं क्योंकि बचपन की सहजता अज्ञान की सहजता थी। हमें दुनिया की जटिलताओं का पता नहीं था। आज अनुभव हैं, जिम्मेदारियाँ हैं, रिश्तों की पेचीदगियाँ हैं; लेकिन एक दूसरी तरह की सहजता संभव है; वह सहजता जो समझ के बाद आती है; जहाँ हम हर किसी को खुश करने का बोझ छोड़ देते हैं .... जहाँ "नहीं" कहने पर अपराधबोध नहीं होता ..... जहाँ अपनी कमियों को छिपाने के बजाय स्वीकार कर लेते हैं ..... जहाँ हर समय मजबूत दिखने की मजबूरी नहीं रहती ..... और जहाँ हम अपने आँसू, अपनी हँसी और अपनी संवेदनाओं से शर्मिंदा नहीं होते।

बचपन में सहज होना स्वाभाविक था। परिपक्वता में सहज होना एक साधना है। और शायद जीवन का सबसे सुंदर पड़ाव वही होता है, जब हम अनुभवों की लंबी यात्रा के बाद फिर से अपने भीतर लौट आते हैं।

सहजता कोई खोई हुई चीज़ नहीं है, जिसे ढूँढ़कर वापस लाना हो। वह तो हमारे भीतर ही रहती है, पर शोर, भय, अपेक्षाओं और दिखावे की परतों के नीचे दब जाती है। जीवन का सौंदर्य इसी में है कि धीरे-धीरे हम उन परतों को हटाते जाएँ और एक दिन फिर स्वयं से मिल सकें; बिना अभिनय के, बिना प्रमाणपत्र के, बिना किसी भूमिका के; बस एक मनुष्य की तरह।

✍️भावना चोपड़ा आरोही
Poet : Bhawana Chopra Arohi ©️®️

🎉 I earned the emerging talent badge this week, recognising me for creating engaging content that sparks an interest amo...
23/06/2026

🎉 I earned the emerging talent badge this week, recognising me for creating engaging content that sparks an interest among my fans! Thank You!

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