07/06/2026
कॉकरोच जनता पार्टी का आज जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन था। विरोधियों ने तस्वीरें देखकर फैसला सुना दिया कि भीड़ इतनी थी कि अगर सब लोग एक साथ छींक देते, तो धरना स्थल खाली हो जाता। वहीं समर्थकों का तर्क है कि 40 डिग्री तापमान में जो लोग घर की एसी छोड़कर आए, वही असली क्रांतिकारी हैं।
सच कहें तो इसकी तुलना अन्ना हजारे आंदोलन से करना वैसा ही है जैसे मोहल्ले के क्रिकेट टूर्नामेंट की तुलना वर्ल्ड कप से करना। अन्ना आंदोलन का सेटअप राष्ट्रीय था, जबकि कॉकरोच जनता पार्टी फिलहाल सोशल मीडिया की प्रयोगशाला से निकलकर सड़क तक पहुंची है। केरल और तमिलनाडु तो दूर, यूपी और पंजाब से भी लोग दिल्ली आ जाएं, यह उम्मीद करना अभी जल्दबाजी होगी।
लेकिन असली सवाल भीड़ का नहीं है। असली सवाल यह है कि ऐसी पार्टियां, ऐसे आंदोलन और ऐसे हैशटैग पैदा ही क्यों होते हैं?
आंदोलन वैसे ही नहीं उग आते जैसे बरसात में घास उग आती है। इनके पीछे नाराजगी की खाद और उपेक्षा का पानी लगता है। जब लोगों को लगता है कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है, तब वे पहले ट्वीट करते हैं, फिर पोस्ट लिखते हैं और आखिर में सड़क पर उतर आते हैं।
आज युवाओं की नाराजगी के मुद्दे भी किसी से छिपे नहीं हैं—पेपर लीक, भर्ती परीक्षाएं, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा और भविष्य को लेकर बढ़ती अनिश्चितता। कोई छात्र कई साल तैयारी करे और परीक्षा से पहले पेपर टेलीग्राम यूनिवर्सिटी में पहुंच जाए, तो उसका गुस्सा स्वाभाविक है। जब लाखों लोग वही गुस्सा महसूस करने लगें, तो वह व्यक्तिगत समस्या नहीं रहती, सामाजिक मुद्दा बन जाती है।
NEET और दूसरी परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने इस भावना को और बढ़ाया है। ऐसे मामलों में जनता अक्सर जवाबदेही की उम्मीद करती है। लेकिन जब बड़े विवादों के बाद भी किसी जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती, तो लोगों को लगता है कि व्यवस्था खुद को जवाबदेह मानने को तैयार नहीं है।
इतिहास भी यही बताता है। 1970 के दशक में बिहार और गुजरात के छात्र आंदोलनों ने देश की राजनीति बदल दी थी। जयप्रकाश नारायण आंदोलन की ताकत भी युवाओं की नाराजगी से आई थी। 2011 का अन्ना आंदोलन भी अचानक आसमान से नहीं टपका था। वह वर्षों से जमा गुस्से का नतीजा था। दुनिया में भी अरब स्प्रिंग से लेकर फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन तक, लगभग हर बड़े आंदोलन की जड़ में यही भावना थी कि "ऊपर बैठे लोग हमारी सुन नहीं रहे।"
समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब संस्थाएं और मीडिया दोनों जनता की चिंताओं को हल्के में लेने लगते हैं। अगर कोई छात्र परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए और जवाब में उसे देशद्रोही, विदेशी एजेंट या पड़ोसी देश का प्रतिनिधि घोषित कर दिया जाए, तो बहस खत्म नहीं होती, सिर्फ भरोसा खत्म होता है।
कॉकरोच जनता पार्टी के इरादे क्या हैं, उसके नेता कौन हैं और उनका भविष्य क्या होगा—इन सब पर सवाल उठाए जा सकते हैं। लोकतंत्र में उठने भी चाहिए। लेकिन यह मान लेना कि जनता के भीतर कोई नाराजगी है ही नहीं, शायद सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी।
महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्ट व्यवस्था और पेपर लीक जैसे मुद्दे उस नाराजगी को लगातार ऑक्सीजन दे रहे हैं। आज लोग भीड़ गिन रहे हैं। कल वही लोग भीड़ के लिए कैलकुलेटर ढूंढते नजर आ सकते हैं।
इतिहास की एक दिलचस्प आदत है। बड़े आंदोलन अक्सर छोटी सभाओं से शुरू होते हैं। शुरुआत में लोग उनका मजाक उड़ाते हैं, फिर उनका विरोध करते हैं और आखिर में पूछते हैं—"ये इतना बड़ा हो गया, किसी ने बताया क्यों नहीं?"
इसलिए सरकारों के लिए सबसे समझदारी वाला रास्ता यही होता है कि वे नाराजगी को पैदा होने से पहले सुन लें। क्योंकि आंदोलन का सबसे खतरनाक चरण वह नहीं होता जब लोग सड़क पर उतरते हैं, बल्कि वह होता है जब लोग यह मान लेते हैं कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है।
और जहां तक राजनीति का सवाल है, वहां एक पुराना नियम हमेशा लागू होता है—राजा को बचाने के लिए प्यादे की बलि दी जाती है। अगर कभी हालात ऐसे बन जाएं कि प्यादे को बचाने के लिए राजा की प्रतिष्ठा दांव पर लगने लगे, तो समझ लीजिए शतरंज की बिसात पर कहीं न कहीं गणित गड़बड़ा गया है।
यह संस्करण व्यंग्यात्मक है, लेकिन व्यक्तिगत हमलों से बचते हुए राजनीतिक टिप्पणी की पेशेवर शैली बनाए रखता है।