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हिंदू धर्म की रक्षा के लिए पिता गुरु तेग बहादुर जी के दिल्ली में बलिदान के बाद मात्र नौ वर्ष की आयु में गुरु गद्दी पर आस...
28/10/2025

हिंदू धर्म की रक्षा के लिए पिता गुरु तेग बहादुर जी के दिल्ली में बलिदान के बाद मात्र नौ वर्ष की आयु में गुरु गद्दी पर आसीन होने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी का एक ही संकल्प था 'सुभ करमन ते कबहू न टरों'। इसे सिद्ध करने के लिए उन्होंने अनंतशक्ति 'सवा लाख सों एक लड़ाऊं" का आहवान किया और विकारों से मुक्त सशक्त अंतर और अन्याय से रहित धर्मानुकूल समाज बनाने के लिए खालसा की साजना की। विचार और आचार की शुद्धता को स्थापित करने में अपना पूरा जीवन लगा देने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी की गुरुशबद की देग और गुरुकृपा की तेग दोनों साथ-साथ चलीं और एक अभूतपूर्व इतिहास बना। यह कैसे संभव हुआ इसे समझने और अहसास करने में यह पुस्तक सहायक है। गुरु गोबिंद सिंह जी के बारे में समग्र दृष्टि प्रदान करने वाली, राष्ट्रभाषा हिंदी में लिखी गई यह पहली पुस्तक है जो भावनाओं से जोड़ने वाली है।

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16/10/2025
"संत मीराँबाई और उनकी पदावली"मीराँबाई की गति अपने मूल की ओर है। बीज-भाव की ओर है। भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों प...
16/10/2025

"संत मीराँबाई और उनकी पदावली"
मीराँबाई की गति अपने मूल की ओर है। बीज-भाव की ओर है। भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तित्त्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुईं। अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है। मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चट्टानें तोड़ती, राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे-रोक बढ़ती चली गई। वर्जनाओं के टूटने की झंकार से मीराँ की कविता अपना शृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं को क्रमशः तोड़ती चली गईं। राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान समाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की शृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकी और मुक्त हो गई। इतना ही नहीं, तत्कालीन धर्म-संप्रदाय की वर्जनाओं को भी अस्वीकार कर दिया। तभी मीराँ, मीराँ बनीं।

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स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास का वह एक ऐसा कालखंड था, जब निकट अतीत की व्यक्तिवादी, भ्रष्ट एवं सर्वसत्तावादी निरंकुश प्...
15/10/2025

स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास का वह एक ऐसा कालखंड था, जब निकट अतीत की व्यक्तिवादी, भ्रष्ट एवं सर्वसत्तावादी निरंकुश प्रवृत्तियाँ चरम पर पहुँच गई थीं और लोकतंत्र आधी रात को किसी भी दरवाजे पर पड़ने वाली दस्तक के आतंक से सहमा हुआ था। उस दौर में कुछ आवाजें बिना बोले भी बहुत कुछ कह रही थीं। …और कैसे जी रहा था देश का आम आदमी ? …वह आम आदमी, जो देश के विभाजन की भयावह स्मृतियाँ लिए द्विभाजित मानसिकता में जीने को अभिशप्त था। …और वह आम आदमी, जो पाश्चात्य देशों को स्वर्ग मान बैठा था। महाकाव्यात्मक आयाम लिए उस कालखंड के भारतीय समाज की कथा, जिसमें इतिहास के साथ-साथ भविष्यदृष्टि भी विद्यमान है।

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सुप्रसिद्ध साहित्यकार नरेन्द्र कोहली का रचना-संसार बहुआयामी है। विभिन्न विधाओं में उन्होंने रेखांकित करने योग्य रचनाएं ल...
15/10/2025

सुप्रसिद्ध साहित्यकार नरेन्द्र कोहली का रचना-संसार बहुआयामी है। विभिन्न विधाओं में उन्होंने रेखांकित करने योग्य रचनाएं लिखी हैं। पौराणिक व जीवनीपरक उपन्यासों के क्षेत्र में तो उन्हें शीर्षस्थ लेखक स्वीकार किया जाता है। नरेन्द्र कोहली के लेखन का एक जरूरी पक्ष उनका व्यंग्य साहित्य है। ‘व्यंग्य सर्जक: नरेन्द्र कोहली’ पुस्तक में इस पक्ष का कई दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण किया गया है। संपादक प्रेम जनमेजय ने पूरे कौशल के साथ व्यंग्य की परंपरा में कोहली को स्थापित किया है। ‘व्यंग्य का नरेन्द्र कोहलीय दृष्टिकोण’ में यज्ञ शर्मा, प्रेम जनमेजय, हरीश नवल, मनोहर पुरी आदि लेखकों ने कोहली के व्यंग्य लेखन में उनकी रचनात्मक विशिष्टता तलाशी है। प्रेम जनमेजय के शब्दों में, "व्यंग्य में शिल्प के विभिन्न कोणों एवं रूपों की प्रस्तुति नरेन्द्र कोहली की व्यंग्य रचनाओं के महत्त्व को रेखांकित करती है। निश्चित ही व्यंग्यकार की व्यंग्य रचनाओं ने व्यंग्य साहित्य की परंपरा को जीवित रखा है, उसे दृढ़ता एवं नवीनता प्रदान की है।" पुस्तक के दूसरे हिस्से ‘एक व्यक्ति नरेन्द्र कोहली’ में कोहली के व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर ज्ञान चतुर्वेदी, सूर्यबाला, गिरीश पंकज, मधुरिमा कोहली, कमलेश भारतीय, विवेकी राय, मीरा सीकरी आदि ने संस्मरण-शिल्प में उनसे जुड़ी बातें व्यक्त की हैं। प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित यह पुस्तक सामान्य पाठकों व शोधकर्ताओं के लिए समानरूपेण उपयोगी है।

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प्रख्यात रचनाकार डॉ. एस. एल, भैरप्पा के बहुचर्चित उपन्यास -पर्व- https://www.amazon.in/dp/B0B1MYP6PQआवरण- https://www.am...
29/09/2025

प्रख्यात रचनाकार डॉ. एस. एल, भैरप्पा के बहुचर्चित उपन्यास -

पर्व- https://www.amazon.in/dp/B0B1MYP6PQ

आवरण- https://www.amazon.in/dp/B0B1M2956B

वंश वृक्ष- https://www.amazon.in/dp/8188118273

द्विधा- https://www.amazon.in/dp/9385054090

सार्थ- https://www.amazon.in/dp/8193432894

उत्तर काण्ड- https://www.amazon.in/dp/8194069416

जिज्ञासा- https://www.amazon.in/dp/818985948X

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विख्यात उपन्यासकार डॉ. एस. एल. भैरप्पा की आत्मकथा। क्रय करने हेतु यहाँ क्लिक करें - https://www.amazon.in/dp/B0B124ZT5J
25/09/2025

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प्रख्यात कथाकार एवं विचारक डॉ० एस० एल० भैरप्पा को विनम्र श्रद्धांजलि स्मृति शेष : 24 सितंबर, 2025🙏
25/09/2025

प्रख्यात कथाकार एवं विचारक डॉ० एस० एल० भैरप्पा को विनम्र श्रद्धांजलि

स्मृति शेष : 24 सितंबर, 2025

🙏

हिंदी साहित्य के प्रख्यात लेखक डॉ० सीतेश अलोक  को विनम्र श्रद्धांजलि।🙏स्मृति शेष : 16 सितंबर, 2025🙏
25/09/2025

हिंदी साहित्य के प्रख्यात लेखक डॉ० सीतेश अलोक को विनम्र श्रद्धांजलि।🙏
स्मृति शेष : 16 सितंबर, 2025
🙏

हिंदी के मूर्धन्य आलोचक, मार्क्सवाद के प्रबल प्रवक्ता तथा महाप्राण निराला की 'निराला की साहित्य साधना' के सर्जक डॉ० रामव...
22/09/2025

हिंदी के मूर्धन्य आलोचक, मार्क्सवाद के प्रबल प्रवक्ता तथा महाप्राण निराला की 'निराला की साहित्य साधना' के सर्जक डॉ० रामविलास शर्मा का लेखन हिंदी की अनन्य साहित्यिक धरोहर है।अपनी विगत छह दशकों की शाब्दिक तथा वैचारिक यात्रा को डॉ० शर्मा ने वार्ताकारों की जिज्ञासा की प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्त किया है। ऐसी प्रायः सभी उपलब्ध वार्ताओं को यहाँ एक साथ प्रस्तुत किया जा रहा है।प्रस्तुत पुस्तक 'मेरे साक्षात्कार' के विषय में डॉ० शर्मा का कहना था कि “कुछ वार्ताकारों ने मेरे व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी प्रश्न किए हैं। ये अपवाद हैं।अनेक मित्रों ने मेरी योजनाओं और लेखन को लेकर प्रश्न किए हैं। इनके उत्तर आज के सवालों को समेट लेते हैं। इधर हिंदी के समाचार-पत्रों में एक नया रुझान दिखाई दिया है, वे राजनीतिक घटनाओं पर साहित्यकारों के वक्तव्य भी प्रकाशित करते हैं।मैं इस रुझान का स्वागत करता हूँ। इस से साहित्यकार अपने दायरे से बाहर निकलकर राजनीति से जुड़ते हैं। "हिंदी, स्वदेशी और मार्क्सवाद के प्रबल प्रवक्ता डॉ० शर्मा का कथन है कि “वार्ताकार अकसर मार्क्सवाद के बारे में सीधे प्रश्न करते हैं; साहित्य के मूल्यांकन से, सामाजिक सांस्कृतिक इतिहास के विश्लेषण से उसका क्या संबंध हो सकता है? ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने के कारण यह पुस्तक एक हद तक मार्क्सवाद की व्याख्या और साहित्य, राजनीति, इतिहास के क्षेत्रों में उस व्याख्या को लागू करने का प्रयोग बन गई है।

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🇮🇳  स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं  🇮🇳
15/08/2025

🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं 🇮🇳

खैरातीलाल का कुर्सीतंत्र’ का लिखा जाना निश्चित ही स्वागत योग्य है। नाटक का कथानक पूरी तरह से राजनीति पर आधारित है-एक मुख...
08/08/2025

खैरातीलाल का कुर्सीतंत्र’ का लिखा जाना निश्चित ही स्वागत योग्य है। नाटक का कथानक पूरी तरह से राजनीति पर आधारित है-एक मुख्यमंत्री है जो येन-केन प्रकारेण अपनी कुर्सी को बचाना चाहता है और इसके लिए जितनी भी तिकड़म हो सकती है, वह उसे पूरा करने में एक क्षण काभी सोच-विचार नहीं करता। कुल जमा 50 पृष्ठ और 9 दृश्यों में उसके कुर्सीतंत्र का खेल चलता है और इसमें उसक भागीदार हैं उसकी कैबिनेट के तीन मंत्री, विपक्ष का नेता, टिकटार्थी, रिपोर्टर, चीफ सेक्रेटरी, मुख्यमंत्री का पी.ए. और उनकी पत्नी चुनरी देवी।

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