Angel Hina

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14/09/2026
06/09/2026

⚖️ देश के 8 हाई कोर्ट को मिले नए मुख्य न्यायाधीश 🇮🇳

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश के कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश के आठ हाई कोर्ट में नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने शनिवार रात नियुक्तियों की जानकारी साझा की।

📌 किस हाई कोर्ट की कमान किसे मिली?

🔹 पटना हाई कोर्ट — जस्टिस वल्लूरी कामेश्वर राव
🔹 कलकत्ता हाई कोर्ट — जस्टिस रविंद्र वी. घुगे
🔹 राजस्थान हाई कोर्ट — जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल
🔹 बॉम्बे हाई कोर्ट — जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी
🔹 पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट — जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा
🔹 छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट — जस्टिस कृष्ण राम महापात्र
🔹 मध्य प्रदेश हाई कोर्ट — जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे
🔹 जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट — जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी

⚖️ राजस्थान हाई कोर्ट की नियुक्ति अहम

राजस्थान हाई कोर्ट में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय प्रकाश शर्मा के स्थान पर अब छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल को नियमित मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। कॉलेजियम ने 31 अगस्त को उनके नाम की सिफारिश की थी और केंद्र ने 5 सितंबर को नियुक्ति अधिसूचित कर दी।

वहीं राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी को जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया है।

यह नियुक्तियां उच्च न्यायपालिका के प्रशासनिक नेतृत्व में महत्वपूर्ण बदलाव हैं और आने वाले समय में संबंधित हाई कोर्ट के कामकाज पर इनका प्रभाव देखने को मिलेगा।

⚖️ न्यायपालिका | हाई कोर्ट | कॉलेजियम | न्यायिक नियुक्तियां

Law Expert and Judiciary Exam

06/09/2026

🚨 सहारनपुर PNB करेंसी चेस्ट में बड़ा खुलासा! 🚨

💰 7.40 करोड़ की कथित जाली करेंसी…
💸 4.36 लाख रुपये कैश कम!

सहारनपुर के घंटाघर स्थित सोफिया मार्केट की PNB करेंसी चेस्ट में ऑडिट के दौरान सामने आई गड़बड़ी ने बैंकिंग व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

🔴 एक मामले में 7.40 करोड़ रुपये की करेंसी जाली पाए जाने का दावा
🔴 दूसरे मामले में मुख्यालय भेजी गई नकदी 4.36 लाख रुपये कम मिली
🔴 दोनों मामलों में अलग-अलग मुकदमे दर्ज
🔴 पुलिस ने जांच शुरू कर दी है

अब सबसे बड़ा सवाल है—

❓ इतनी बड़ी मात्रा में कथित जाली करेंसी करेंसी चेस्ट तक पहुंची कैसे?

चूंकि करेंसी चेस्ट में अलग-अलग बैंक शाखाओं से नकदी आती है, इसलिए जांच का दायरा अब उन सभी शाखाओं तक पहुंच सकता है जिन्होंने यहां नकदी जमा कराई थी।

पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि जाली नोट—

👉 एक साथ पहुंचे या अलग-अलग समय में?
👉 किन शाखाओं से नकदी आई?
👉 नोटों की गिनती और पैकिंग किसने की?
👉 चेस्ट में जमा करते समय कौन-कौन कर्मचारी मौजूद थे?
👉 नकदी को आगे भेजने से पहले उसकी जांच किस स्तर पर हुई?

वहीं, 4.36 लाख रुपये की नकदी कम मिलने के मामले में भी कैश के रखरखाव, गिनती और मुख्यालय भेजने की प्रक्रिया की जांच की जा रही है।

⚖️ फिलहाल किसी की दोषसिद्धि नहीं हुई है। पुलिस जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित जाली नोटों का स्रोत क्या था और नकदी की कमी के लिए वास्तविक रूप से कौन जिम्मेदार है।

🔥 करोड़ों की कथित जाली करेंसी आखिर बैंक की करेंसी चेस्ट तक पहुंची कैसे?

यह सवाल अब सिर्फ एक बैंक का नहीं, बल्कि बैंकिंग सिस्टम की कैश-सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था का भी है।

06/09/2026

🚩🌺 श्रीरामचरितमानस की संपूर्ण कथा 🌺🚩

🕉️ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन की दिव्य गाथा 🕉️

॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

भारत की महान आध्यात्मिक परंपरा में श्रीरामचरितमानस का स्थान अत्यंत पवित्र और अद्वितीय है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा अवधी भाषा में रचित यह महाकाव्य भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्श, त्याग, धर्म, करुणा, मर्यादा और भक्तिभाव की अमर कथा प्रस्तुत करता है।

श्रीरामचरितमानस सात काण्डों—बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तरकाण्ड—में विभाजित है।

आइए भगवान श्रीराम की इस पावन कथा को क्रमबद्ध रूप से जानते हैं।

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🌺 1. बालकाण्ड — भगवान श्रीराम का अवतार 🌺

जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ने लगा और राक्षसों के अत्याचार से ऋषि-मुनि तथा साधु-संत परेशान होने लगे, तब देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की।

इसी समय अयोध्या के राजा दशरथ भी संतान प्राप्ति के लिए अत्यंत चिंतित थे। गुरु वशिष्ठ की सलाह पर उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया।

यज्ञ के फलस्वरूप राजा दशरथ की तीन रानियों—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—से चार पुत्रों का जन्म हुआ।

माता कौशल्या के गर्भ से श्रीराम, कैकेयी से भरत, तथा सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।

अयोध्या में चारों ओर उत्सव मनाया गया। श्रीराम के जन्म से पूरी नगरी आनंद से भर उठी।

चारों भाइयों ने गुरुजनों से शिक्षा प्राप्त की। श्रीराम और लक्ष्मण के बीच विशेष प्रेम था।

एक दिन महान ऋषि विश्वामित्र राजा दशरथ के पास आए। उन्होंने अपने यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ भेजने का आग्रह किया।

राजा दशरथ पहले चिंतित हुए, लेकिन गुरु वशिष्ठ के समझाने पर श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ चले गए।

श्रीराम ने राक्षसी ताड़का का वध किया और ऋषियों के यज्ञ की रक्षा की। आगे चलकर उन्होंने मारीच और सुबाहु जैसे राक्षसों को भी परास्त किया।

इसके बाद विश्वामित्र दोनों भाइयों को लेकर मिथिला पहुँचे, जहाँ राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर का आयोजन किया था।

स्वयंवर की शर्त थी कि जो वीर भगवान शिव के महान धनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा देगा, वही सीता का वरण करेगा।

अनेक राजा-महाराजा प्रयास करके असफल हो गए।

तब श्रीराम ने गुरु की आज्ञा से शिवधनुष को उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाने लगे। धनुष उनके हाथों में टूट गया।

राजा जनक अत्यंत प्रसन्न हुए और माता सीता ने श्रीराम को पति रूप में स्वीकार किया।

इसके बाद श्रीराम और सीता का विवाह हुआ। साथ ही भरत-माण्डवी, लक्ष्मण-उर्मिला और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति के विवाह भी संपन्न हुए।

अयोध्या लौटने के मार्ग में भगवान परशुराम का प्रसंग आया। अंततः श्रीराम की दिव्यता को पहचानकर परशुराम शांत हुए।

इस प्रकार बालकाण्ड भगवान श्रीराम के अवतार, बाल जीवन, शिक्षा, विश्वामित्र के साथ यात्रा और माता सीता से विवाह की पावन कथा के साथ आगे बढ़ता है।

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🌿 2. अयोध्याकाण्ड — वनवास और पिता के वचन की रक्षा 🌿

समय बीतता गया। श्रीराम के गुणों और लोकप्रियता से पूरी अयोध्या प्रभावित थी।

राजा दशरथ ने निर्णय लिया कि श्रीराम को अयोध्या का राजा बनाया जाए।

पूरी नगरी उत्सव की तैयारी में लग गई।

लेकिन तभी परिस्थितियाँ बदल गईं।

रानी कैकेयी की दासी मंथरा ने उन्हें राजा दशरथ द्वारा दिए गए दो वरदानों की याद दिलाई।

कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वर माँगे—

पहला—भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए।
दूसरा—श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए।

राजा दशरथ यह सुनकर अत्यंत दुखी हो गए।

लेकिन श्रीराम ने पिता के वचन को सर्वोपरि माना।

उन्होंने बिना किसी विरोध के वन जाने का निर्णय स्वीकार कर लिया।

माता सीता ने कहा कि पत्नी का धर्म है कि वह अपने पति के साथ रहे। उन्होंने भी वन जाने का निश्चय किया।

भाई लक्ष्मण ने भी श्रीराम का साथ छोड़ने से इनकार कर दिया।

इस प्रकार श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन की ओर प्रस्थान कर गए।

अयोध्या की जनता उनके पीछे-पीछे चल पड़ी।

श्रीराम ने सभी को समझाकर वापस भेजा।

उधर राजा दशरथ पुत्र-वियोग में अत्यंत दुखी हुए और अंततः श्रीराम का नाम लेते हुए उन्होंने शरीर त्याग दिया।

जब भरत को यह समाचार मिला तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने श्रीराम को वापस लाने का निश्चय किया।

भरत वन में श्रीराम के पास पहुँचे और अयोध्या लौटने का आग्रह किया।

लेकिन श्रीराम ने कहा कि पिता का वचन पूरा करना उनका धर्म है।

तब भरत ने श्रीराम की पादुकाएँ लेकर उन्हें अयोध्या के सिंहासन पर स्थापित किया और स्वयं उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन करने लगे।

भरत का यह त्याग भाई-प्रेम और धर्मनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण बन गया।

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🌳 3. अरण्यकाण्ड — वन जीवन और सीता हरण 🌳

श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अनेक ऋषियों के आश्रमों में गए।

उन्होंने वन में निवास करते हुए साधु-संतों की रक्षा का संकल्प लिया।

इसी दौरान राक्षसी शूर्पणखा श्रीराम को देखकर आकर्षित हुई और विवाह का प्रस्ताव रखा।

श्रीराम ने उसे समझाया। बाद में उसने सीता को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया, जिसके कारण लक्ष्मण ने उसका अपमान किया।

शूर्पणखा ने अपने भाइयों को यह बात बताई।

इसके बाद खर-दूषण सहित अनेक राक्षस श्रीराम से युद्ध करने आए। श्रीराम ने उन्हें परास्त कर दिया।

शूर्पणखा ने लंका के राजा अपने भाई रावण को सीता के अद्भुत सौंदर्य के बारे में बताया।

रावण ने सीता का हरण करने की योजना बनाई।

मारीच को स्वर्ण-मृग का रूप धारण करने के लिए कहा गया।

स्वर्ण-मृग को देखकर माता सीता ने श्रीराम से उसे लाने का आग्रह किया।

श्रीराम उसके पीछे चले गए।

कुछ समय बाद मारीच ने श्रीराम की आवाज जैसी पुकार लगाई।

सीता की चिंता के कारण लक्ष्मण भी श्रीराम की खोज में निकल गए।

इसी अवसर का लाभ उठाकर रावण साधु का वेश धारण करके आया और माता सीता का हरण कर लिया।

जब रावण सीता को लेकर जा रहा था, तब वृद्ध पक्षीराज जटायु ने उसे रोकने का प्रयास किया।

जटायु ने धर्म की रक्षा के लिए रावण से युद्ध किया, लेकिन अंततः घायल होकर धरती पर गिर पड़े।

श्रीराम और लक्ष्मण जब लौटे तो उन्हें सीता कहीं नहीं मिलीं।

वे सीता की खोज में व्याकुल होकर वन-वन भटकने लगे।

इसी दौरान उन्हें जटायु मिले। जटायु ने सीता हरण की पूरी घटना बताई और भगवान श्रीराम के चरणों में प्राण त्याग दिए।

श्रीराम ने जटायु को पिता के समान सम्मान देकर उनका अंतिम संस्कार किया।

आगे चलकर श्रीराम की भेंट शबरी से हुई।

शबरी वर्षों से भगवान श्रीराम की प्रतीक्षा कर रही थीं।

भगवान ने उनकी भक्ति को स्वीकार किया।

यहीं से कथा उन्हें किष्किन्धा की ओर ले जाती है।

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🐒 4. किष्किन्धाकाण्ड — हनुमान जी से मिलन 🐒

सीता की खोज करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण की भेंट हनुमान जी से हुई।

हनुमान जी ने पहली ही भेंट में श्रीराम को पहचान लिया और उनके परम भक्त बन गए।

हनुमान जी उन्हें सुग्रीव के पास ले गए।

सुग्रीव अपने भाई वाली से भयभीत होकर ऋष्यमूक पर्वत पर रह रहे थे।

सुग्रीव ने श्रीराम को अपनी पीड़ा बताई।

श्रीराम ने सुग्रीव की सहायता करने का वचन दिया।

इसके बाद श्रीराम और वाली के बीच धर्म और कर्तव्य से जुड़ा प्रसिद्ध प्रसंग आया। श्रीराम की सहायता से सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य प्राप्त हुआ।

अब सुग्रीव ने वचन दिया कि वह सीता की खोज में श्रीराम की सहायता करेंगे।

चारों दिशाओं में वानर दल भेजे गए।

दक्षिण दिशा में हनुमान जी, अंगद, जाम्बवान और अन्य वानर सीता की खोज में निकले।

समुद्र के किनारे पहुँचकर उन्हें पता चला कि सीता लंका में हैं।

अब सबसे बड़ी चुनौती थी—समुद्र को पार करना।

जाम्बवान ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया।

हनुमान जी ने अपना विशाल स्वरूप धारण किया और समुद्र पार करने के लिए तैयार हो गए।

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🌊 5. सुन्दरकाण्ड — हनुमान जी की अद्भुत भक्ति 🌊

सुन्दरकाण्ड को श्रीरामचरितमानस का अत्यंत भावपूर्ण और लोकप्रिय काण्ड माना जाता है।

हनुमान जी समुद्र पार करके लंका पहुँचे।

मार्ग में उन्हें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी बुद्धि, शक्ति और विवेक से सभी बाधाओं को पार किया।

लंका पहुँचकर हनुमान जी ने माता सीता की खोज शुरू की।

अंततः उन्होंने माता सीता को अशोक वाटिका में देखा।

माता सीता रावण के महल में रहने के बावजूद अपने मन और हृदय से केवल श्रीराम का स्मरण कर रही थीं।

हनुमान जी ने श्रीराम की मुद्रिका देकर माता सीता को विश्वास दिलाया कि वे श्रीराम के दूत हैं।

उन्होंने श्रीराम का संदेश सुनाया और माता सीता को आश्वस्त किया कि भगवान श्रीराम शीघ्र ही उन्हें मुक्त कराने आएँगे।

इसके बाद हनुमान जी ने अशोक वाटिका में रावण की सेना को अपनी शक्ति का परिचय दिया।

उन्हें रावण के सामने ले जाया गया।

रावण ने हनुमान जी को दंड देने का आदेश दिया।

हनुमान जी की पूँछ में आग लगाने का प्रयास किया गया।

हनुमान जी ने उसी अग्नि का उपयोग करते हुए लंका के अनेक भागों में आग लगा दी और फिर समुद्र पार करके श्रीराम के पास लौट आए।

उन्होंने माता सीता का समाचार श्रीराम को दिया।

श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए।

अब लंका की ओर प्रस्थान की तैयारी होने लगी।

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⚔️ 6. लंकाकाण्ड — धर्म और अधर्म का महासंग्राम ⚔️

श्रीराम ने समुद्र के तट पर पहुँचकर लंका जाने का मार्ग बनाया।

वानर सेना ने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया।

श्रीराम की सेना लंका पहुँच गई।

रावण को समझाने के लिए अनेक प्रयास किए गए।

भगवान श्रीराम ने अंतिम समय तक युद्ध टालने और धर्म का मार्ग अपनाने का अवसर दिया।

लेकिन रावण ने अहंकार के कारण किसी की बात नहीं मानी।

युद्ध प्रारंभ हुआ।

वानर सेना और राक्षस सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ।

रावण की ओर से मेघनाद, कुंभकर्ण और अनेक शक्तिशाली योद्धा युद्ध में उतरे।

श्रीराम की ओर से हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान, नल, नील और अन्य वानर वीर युद्ध कर रहे थे।

कुंभकर्ण का युद्ध हुआ और अंततः वह पराजित हुआ।

मेघनाद अत्यंत शक्तिशाली योद्धा था। उसने लक्ष्मण को गंभीर संकट में डाल दिया।

तब हनुमान जी जीवनदायिनी औषधि लाने के लिए पर्वत की ओर गए और पूरा पर्वत ही उठा लाए।

लक्ष्मण स्वस्थ हुए और अंततः मेघनाद का अंत हुआ।

अब श्रीराम और रावण के बीच अंतिम युद्ध का समय आया।

रावण अत्यंत शक्तिशाली था, लेकिन उसका अहंकार और अधर्म उसके विनाश का कारण बना।

अंततः भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया।

माता सीता को रावण के बंधन से मुक्ति मिली।

इसके बाद श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे।

उनके लौटने पर अयोध्या में दीप जलाए गए।

इसी आनंदमय परंपरा से दीपावली का संबंध जोड़ा जाता है।

श्रीराम का अयोध्या लौटना केवल एक राजा की वापसी नहीं थी, बल्कि यह धर्म की अधर्म पर विजय और प्रकाश की अंधकार पर विजय का प्रतीक बन गया।

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👑 7. उत्तरकाण्ड — श्रीराम का रामराज्य 👑

श्रीराम के अयोध्या लौटने के बाद उनका राज्याभिषेक हुआ।

भगवान श्रीराम ने ऐसा शासन स्थापित किया जिसमें प्रजा की सुख-समृद्धि और न्याय को सर्वोच्च स्थान मिला।

श्रीराम का शासन भारतीय परंपरा में रामराज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

रामराज्य का अर्थ केवल एक राजा का शासन नहीं, बल्कि ऐसा आदर्श शासन है जिसमें न्याय, सत्य, करुणा, कर्तव्य और लोककल्याण सर्वोपरि हों।

उत्तरकाण्ड में भगवान श्रीराम के जीवन के आगे के प्रसंगों के साथ अनेक आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षाएँ भी मिलती हैं।

इसी काण्ड में रावण के जन्म और उसके परिवार से जुड़े प्रसंग, श्रीराम की महिमा, भक्तिभाव और जीवन के गूढ़ सिद्धांतों का वर्णन मिलता है।

भगवान श्रीराम का चरित्र हमें सिखाता है कि शक्ति होने के बावजूद विनम्र रहना चाहिए, अधिकार होने के बावजूद कर्तव्य को प्राथमिकता देनी चाहिए और कठिन परिस्थितियों में भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।

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🌺 श्रीरामचरितमानस का संदेश 🌺

श्रीरामचरितमानस केवल भगवान श्रीराम की कथा नहीं है।

यह जीवन जीने की कला भी सिखाती है।

श्रीराम से हमें मर्यादा और कर्तव्य की शिक्षा मिलती है।

सीता माता से धैर्य, पवित्रता और दृढ़ता की प्रेरणा मिलती है।

लक्ष्मण से सेवा और समर्पण सीखने को मिलता है।

भरत से त्याग और भाई-प्रेम की प्रेरणा मिलती है।

शत्रुघ्न से निष्ठा और कर्तव्यपरायणता का संदेश मिलता है।

हनुमान जी से निःस्वार्थ भक्ति, विनम्रता और सेवा की प्रेरणा मिलती है।

जटायु से धर्म के लिए साहस सीखने को मिलता है।

शबरी से सरल और निष्कपट भक्ति का संदेश मिलता है।

विभीषण से यह शिक्षा मिलती है कि जब अपना ही परिवार अधर्म के मार्ग पर हो, तब भी सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

और रावण का चरित्र हमें चेतावनी देता है कि ज्ञान, शक्ति और वैभव होने के बावजूद यदि व्यक्ति अहंकार और अधर्म के मार्ग पर चला जाए, तो उसका पतन निश्चित है।

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🕉️ श्रीरामचरितमानस का अमर संदेश 🕉️

सत्य की अंततः विजय होती है।
धर्म का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन वही कल्याणकारी है।
अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है।
सच्ची भक्ति में स्वार्थ नहीं होता।
कर्तव्य से बड़ा कोई धर्म नहीं।
और प्रभु के प्रति समर्पित हृदय में असंभव भी संभव हो जाता है।

भगवान श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को सत्य, धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।

जय श्रीराम 🚩
जय सियाराम 🌺
पवनपुत्र हनुमान की जय 🚩
सनातन धर्म की जय 🕉️
सनातन धर्म

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06/09/2026

| प्राचीन कथा प्रसंग |

महर्षि शुकदेव जी के जन्म की यह अलौकिक कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध (पहले स्कंध) के अध्याय 2 और 4 में संक्षेप में आती है, तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण और देवी भागवत पुराण में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।

अमर कथा का प्रभाव

एक बार भगवान शिव कैलाश पर माता पार्वती को परम गोपनीय अमर कथा (श्रीमद्भागवत का गूढ़ ज्ञान) सुना रहे थे। कथा सुनते-सुनते पार्वती जी को नींद आ गई, लेकिन पास के वृक्ष पर बैठा एक तोते का बच्चा (शुक) 'हाँ-हाँ' भरकर पूरी कथा सुन गया। जब शिव जी को पता चला कि यह कथा किसी अन्य जीव ने सुन ली है, तो वे क्रोधित होकर अपना त्रिशूल लेकर उस शुक के पीछे दौड़े।

त्रिशूल से जान बचाने के लिए वह शुक उड़ता हुआ महर्षि वेदव्यास जी के आश्रम पहुंचा। वहां व्यास जी की पत्नी देवी वाटिका (या पिंजला) जम्हाई ले रही थीं। शुक सूक्ष्म रूप धारण करके उनके मुख के मार्ग से उनके गर्भ में प्रवेश कर गया।

गर्भ में 12 वर्ष का प्रवास

गर्भ में प्रवेश करने के बाद वह बालक बाहर आने को तैयार ही नहीं हुआ। सामान्य रूप से 9-10 महीने में शिशु का जन्म होता है, लेकिन वह दिव्य बालक पूरे 12 वर्षों तक माता के गर्भ में ही रहा।

व्यास जी ने चिंतित होकर गर्भस्थ बालक से पूछा— "हे पुत्र! तुम बाहर क्यों नहीं आते? अपनी माता को पीड़ा क्यों दे रहे हो?"

गर्भ से बालक ने उत्तर दिया— "हे पिताश्री! यदि मैं बाहर आया तो भगवान विष्णु की यह माया मुझे तुरंत अपने जाल में जकड़ लेगी। माया के प्रभाव से मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को भूलकर काम, क्रोध, मोह और सांसारिक बंधनों में बंध जाता है। मैं इस संसार की माया में नहीं फंसना चाहता, इसलिए मैं यहीं (गर्भ में) नारायण के ध्यान में मग्न रहना चाहता हूँ।"

श्री कृष्ण का आश्वासन और जन्म

जब बालक किसी भी तरह बाहर आने को तैयार नहीं हुआ, तो महर्षि वेदव्यास जी स्वयं द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण के पास गए और उनसे सहायता मांगी।

भगवान श्री कृष्ण व्यास जी के आश्रम पधारे और उन्होंने गर्भस्थ बालक को संबोधित करते हुए आश्वासन दिया— "हे दिव्य शिशु! तुम बेझिझक बाहर आओ। मेरी यह योगमाया तुम्हें कभी स्पर्श नहीं करेगी। तुम जन्म लेते ही सांसारिक बंधनों से मुक्त (जीवन्मुक्त) रहोगे और संसार में परम भागवत ज्ञानी के रूप में पूजे जाओगे।"

साक्षात भगवान के आश्वासन और वचनों पर विश्वास करके वह बालक 12 वर्ष बाद माता के गर्भ से बाहर आया।

जन्म लेते ही गृह त्याग

गर्भ से बाहर आते ही उनका नाम 'शुकदेव' पड़ा। जन्म लेते ही न तो उनका कोई संस्कार हुआ और ना ही उन्होंने सांसारिक जीवन की ओर देखा। वे जन्म के तुरंत बाद, बिना किसी वस्त्र के, सीधे वन की ओर तपस्या करने के लिए चल दिए। व्यास जी उनके पीछे-पीछे "पुत्र! पुत्र!" पुकारते हुए दौड़े, लेकिन शुकदेव जी ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। वृक्षों और हवाओं से गूंजती ध्वनियों ने व्यास जी को उत्तर दिया कि शुकदेव तो सर्वव्यापी, समदर्शी और आत्मा में लीन ब्रह्मज्ञानी हैं।

आगे चलकर यही महर्षि शुकदेव जी राजा परीक्षित को गंगा तट पर श्रीमद्भागवत महापुराण की पावन कथा सुनाते हैं।

सनातन धर्म

जय श्री राधेकृष्णा 🙏🏻
04/09/2026

जय श्री राधेकृष्णा 🙏🏻

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