26/02/2026
*आस्था का मंच और मर्यादा की रेखा*
धार्मिक जागरण और झांकियां भारतीय समाज की जीवंत परंपरा हैं। श्रीराम की लीला हो या भगवान कृष्ण की झांकी—इनका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और नैतिक मूल्यों का संप्रेषण रहा है।
लेकिन हाल के वर्षों में एक नई बहस उभरी है—जब कुछ कलाकार, जिनकी धार्मिक पृष्ठभूमि अलग है, भगवान का रूप धारण कर प्रस्तुति देते हैं, और कहीं-कहीं उस प्रस्तुति में गंभीरता की जगह हल्कापन या मज़ाक झलकता है। इससे कई श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत होती हैं।
यहाँ दो बातों में अंतर समझना आवश्यक है। पहला—किसी कलाकार की व्यक्तिगत आस्था या पंथ। दूसरा—उसकी प्रस्तुति की मर्यादा। कला का क्षेत्र परंपरागत रूप से सीमाओं से परे रहा है; कई बार विभिन्न समुदायों के कलाकारों ने एक-दूसरे की सांस्कृतिक परंपराओं को मंच पर जीवंत किया है। इसे स्वभावतः गलत नहीं कहा जा सकता।
समस्या तब पैदा होती है, जब किसी भी धर्म या देवी-देवता के रूप को केवल तमाशा बना दिया जाए—चाहे वह किसी भी समुदाय का व्यक्ति क्यों न कर रहा हो। अगर प्रस्तुति में श्रद्धा, अनुशासन और सम्मान का भाव नहीं है, तो वह आस्था के मंच को हल्का करती है। और यदि उद्देश्य केवल भीड़, चंदा या वायरल वीडियो बनाना रह जाए, तो यह और भी चिंताजनक है।
इसलिए समाधान किसी समुदाय-विशेष पर प्रश्न खड़ा करने में नहीं, बल्कि स्पष्ट आचार-संहिता तय करने में है। आयोजकों को चाहिए कि—
कलाकारों का चयन संवेदनशीलता के आधार पर करें,
प्रस्तुति की रिहर्सल और स्क्रिप्ट की निगरानी करें,
अशालीन या भड़काऊ अंशों पर सख्ती बरतें,
और यह सुनिश्चित करें कि मंचन श्रद्धा का प्रतीक बने, व्यंग्य का नहीं।
धर्म का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा, जब हम उसे जिम्मेदारी से निभाएंगे। कलाकार कोई भी हो—जरूरी यह है कि मंच पर उतरते समय वह उस रूप की गरिमा को समझे, जिसका वह प्रतिनिधित्व कर रहा है। आस्था का मंच सबके लिए खुला हो सकता है, पर मर्यादा की रेखा सबके लिए समान होनी चाहिए।
*रोहित भारद्वाज*
*मुख्य संपादक*
*NEWS ABN18*