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दोपहर का वक्त था। घर के काम निपटाकर राधिका अपने सात साल के बेटे आरव को स्कूल से लेकर लौटी ही थी कि फोन की घंटी बज उठी। स...
07/09/2026

दोपहर का वक्त था। घर के काम निपटाकर राधिका अपने सात साल के बेटे आरव को स्कूल से लेकर लौटी ही थी कि फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर 'माँ' लिखा देख राधिका के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान आ गई, लेकिन दिल के किसी कोने में एक अजीब सी घबराहट भी थी। राधिका आठ महीने की गर्भवती थी और उसके मायके से लगातार उसे डिलीवरी के लिए घर बुलाने का दबाव आ रहा था।
"हेलो माँ, कैसी हो?" राधिका ने फोन उठाते ही पूछा।
दूसरी तरफ से माँ की ममता से भरी लेकिन कुछ उदास सी आवाज आई, "मैं तो ठीक हूँ बिटिया, पर तू कब आ रही है? आठवां महीना खत्म होने वाला है। तेरे बाबूजी भी रोज पूछते हैं कि राधिका कब आएगी। पहला बच्चा भी तो यहीं हुआ था, इस बार भी तू यहीं आ जा। मेरी आंखों के सामने रहेगी तो तसल्ली रहेगी।"
राधिका ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक लंबी सांस लेते हुए अपने मन को कठोर किया। "माँ, मैंने आपको कल भी बताया था न, इस बार मैं डिलीवरी के लिए वहां नहीं आ पाऊंगी। आरव अब बड़ा हो गया है, उसकी पढ़ाई का नुकसान होगा। और फिर, यहाँ मेरी डॉक्टर बहुत अच्छी है, मेरी पूरी हिस्ट्री उन्हें पता है। मैं यहीं ससुराल में ही अपनी डिलीवरी करवाऊंगी।"
माँ की आवाज में एक पीड़ा छलक उठी, "बेटा, आरव की छुट्टियां पड़ने वाली हैं। और डॉक्टर तो यहाँ भी अच्छे हैं। तू बहाने मत बना। मुझे पता है तू क्यों नहीं आना चाहती..."
माँ आगे कुछ कह पाती, उससे पहले ही राधिका ने बात काटते हुए कहा, "नहीं माँ, ऐसी कोई बात नहीं है। बस यहाँ सब सेट है। आप लोग परेशान मत होइए, मैं फोन रखती हूँ, आरव को खाना देना है।" राधिका ने जल्दी से फोन काट दिया क्योंकि वह जानती थी कि अगर वह थोड़ी देर और बात करती, तो उसके आंसू छलक पड़ते।
राधिका की सास, सुमित्रा जी, जो दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थीं, अंदर आईं। उन्होंने राधिका के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "राधिका, तुम्हारी माँ का फोन था न? वो तुम्हें डिलीवरी के लिए बुला रही हैं। तू मना क्यों कर रही है? पहली डिलीवरी में भी तो बेटियां मायके ही जाती हैं और दूसरी में भी। तू चली जा, आरव को मैं और समीर मिलकर संभाल लेंगे। तू आराम से अपने मायके जा।"
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07/09/2026

अमरनाथ के रहस्यमयी अघोरी और सिद्ध कबूतर की कहानी!

आज बरसों पुरानी अपनी एक किताब के पन्ने पलटते हुए अचानक एक सूखा हुआ गुलाब का फूल नीचे गिर पड़ा। उस सूखे हुए फूल को देखते ...
07/09/2026

आज बरसों पुरानी अपनी एक किताब के पन्ने पलटते हुए अचानक एक सूखा हुआ गुलाब का फूल नीचे गिर पड़ा। उस सूखे हुए फूल को देखते ही मुझे अवंतिका याद आ गई। हाँ, अवंतिका... मेरा वो बचपन का प्यार, जिसे मैंने कभी शब्दों में तो कुछ नहीं कहा, लेकिन मेरी खामोशियों ने हमेशा उसी का नाम पुकारा। दूधिया गोरी रंगत, बड़ी-बड़ी गहरी आंखें और एक बेहद शांत, सौम्य स्वभाव। बचपन की उसकी एक आदत अब भी ज्यों की त्यों थी—जब भी वह बात करते हुए थोड़ी झेंप जाती, तो अपनी झुकी हुई पलकों के साथ, माथे पर झूलती अपनी रेशमी लटों को उंगलियों से धीरे से कान के पीछे अड़ा लेती। उफ्फ! उसकी वो सादगी भरी अदा देखकर तो आज भी मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू हो जाती थीं।

बचपन से ही मैं उसके आगे-पीछे घूमता रहता था। हम दोनों के घर एक ही मोहल्ले में आमने-सामने थे। बीच में बस एक संकरी सी पक्की सड़क थी, जो हमारे घरों को बाँटती थी। बचपन में हम उस सड़क को दिन में दसियों बार नापते थे। कभी किसी छोटी सी बात पर उससे खूब झगड़ा होता, तो कभी घंटों बैठकर एक-दूसरे को स्कूल के किस्से सुनाए जाते। उसकी वो मासूम सी नजरें तब भी यह बिना कहे बयां कर देती थीं कि उसे मेरा आस-पास रहना बहुत पसंद था। मैं भी मोहल्ले के लड़कों से लड़ पड़ता था अगर कोई उसे कुछ कह दे।

लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, हमारे बीच की वो बेबाक बातचीत कम होती चली गई। बचपन में हमारी जितनी ज्यादा बातें होती थीं, जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वो उतनी ही कम हो गईं। अब हम एक-दूसरे के घर यूँ ही बेधड़क नहीं जा सकते थे। बीच की वो सड़क, जो कभी हमारा खेल का मैदान हुआ करती थी, अब समाज की एक अदृश्य मर्यादा की लकीर बन गई थी।

अब बस कभी समय मिलता, तो मैं अपनी छत की मुंडेर से उसके घर की तरफ ताक-झांक करता रहता, केवल उसके एक दीदार के लिए। जब कभी वो कपड़े सुखाने या तुलसी में जल चढ़ाने अपनी छत पर आती, तो हमारे बीच नजरों का वो मीठा सा युद्ध शुरू हो जाता। मैं उसे देखता, वो मुझे देखती, फिर अचानक वो अपनी लटों को कान के पीछे करती और शर्मा कर नीचे चली जाती। इन अनकहे और खामोश पलों में ही हमारे प्यार की एक पूरी दुनिया बस चुकी थी।

लेकिन जिंदगी हमेशा खामोश नजारों से नहीं चलती। एक दिन हमारे इस मूक प्रेम कहानी में एक ऐसा तूफान आया जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया। सर्दियों की एक ठंडी शाम थी। मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था, तभी बाहर से कुछ शोर और रोने की आवाजें आईं। मैं दौड़कर बालकनी में गया तो देखा कि अवंतिका के घर के बाहर भीड़ लगी है। अवंतिका के पिता, जिन्हें हम सभी सम्मान से 'मास्टर जी' कहते थे, उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा था। अवंतिका का कोई भाई नहीं था और उसकी माँ बदहवास होकर रो रही थीं। अवंतिका भी डरी-सहमी सी दरवाजे पर खड़ी कांप रही थी।

बिना एक पल सोचे, मैं घर से बाहर भागा। मैंने मास्टर जी को अपनी गाड़ी में लिटाया और सीधे शहर के सबसे बड़े अस्पताल की तरफ गाड़ी दौड़ा दी। रास्ते भर अवंतिका पीछे बैठी रो रही थी। मैंने गाड़ी चलाते हुए पीछे मुड़कर देखा और पहली बार इतने सालों की खामोशी तोड़ते हुए कहा, "रो मत अवंतिका, मैं हूँ ना। मास्टर जी को कुछ नहीं होगा।" मेरे उन चंद शब्दों ने शायद उसे वो हिम्मत दी जिसकी उसे उस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत थी।

अस्पताल में अगले तीन दिन बहुत भारी गुजरे। मास्टर जी आईसीयू में थे। दवाइयों का इंतजाम करने से लेकर, अस्पताल के भारी-भरकम बिलों को चुकाने और रात-रात भर आईसीयू के बाहर जागने तक, मैंने एक बेटे की तरह हर जिम्मेदारी निभाई। मेरी अपनी माँ भी अवंतिका की माँ को ढांढस बंधाने के लिए दिन-भर अस्पताल में ही रहती थीं। इन तीन दिनों में अवंतिका ने मुझे सिर्फ एक पड़ोसी या बचपन के दोस्त के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान के रूप में देखा जो उसके परिवार के लिए एक मजबूत ढाल बनकर खड़ा था।

एक रात जब मैं अस्पताल के कॉरिडोर में कॉफी पी रहा था, अवंतिका मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसकी आंखें सूजी हुई थीं। उसने मुझे देखा, अपनी वो लट कान के पीछे की और रुंधे हुए गले से बोली, "अगर तुम नहीं होते, तो शायद मैं अपने पापा को खो देती। मुझे नहीं पता कि मैं तुम्हारा यह अहसान कैसे चुकाऊंगी।"

मैंने कॉफी का कप नीचे रखा और उसके आंसुओं को देखते हुए कहा, "अपनों के बीच अहसान नहीं होते, अवंतिका। मैंने वो किया जो मेरा दिल हमेशा से तुम्हारे लिए करना चाहता था—तुम्हारा ख्याल रखना।"

उस दिन हमारी नजरें मिलीं, लेकिन इस बार कोई झिझक नहीं थी। उन नजरों में एक गहरी कृतज्ञता और एक ऐसा प्यार था, जिसे अब किसी खामोशी की चादर की जरूरत नहीं थी।

मास्टर जी जब ठीक होकर घर लौटे, तो दोनों परिवारों के बीच का रिश्ता पूरी तरह बदल चुका था। बीच की वो सड़क अब फासला नहीं रही थी। मास्टर जी ने खुद एक दिन मेरे पिता से बात की। उन्होंने कहा कि जिस लड़के ने बिना किसी रिश्ते के उनके परिवार को इतने बुरे वक्त में संभाल लिया, उससे बेहतर जीवनसाथी उनकी बेटी के लिए और कोई हो ही नहीं सकता। जब मेरी माँ ने मेरे कमरे में आकर मुझे यह बात बताई, तो मुझे लगा जैसे मेरी बचपन से लेकर जवानी तक की सारी अनकही मन्नतें पूरी हो गई हों।

आज जब मैं उस सूखे हुए गुलाब को देखता हूँ, तो अवंतिका रसोई से चाय लेकर आती है। वो आज भी जब मुझे देखती है, तो अपनी वही लट कान के पीछे अड़ा लेती है। हमारा वो खामोश प्यार, जो कभी सिर्फ छतों और खिड़कियों से पनपा था, आज एक खूबसूरत परिवार में बदल चुका है।

आप अपने प्यार से क्या चाहते हैं? सिर्फ मीठी बातें या एक ऐसा इंसान जो आपके परिवार को अपना मान कर आपके बुरे वक्त में साथ खड़ा रहे? हमें अपने विचार जरूर बताएं।

“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद”

लेखिका : लक्ष्मी अग्रवाल

पति के अचानक हुए देहांत और ससुराल वालों के धोखे ने सुधा से उसकी छत छीन ली थी। दुनिया की ठोकरें खाने जेठ की चिलचिलाती धूप...
07/09/2026

पति के अचानक हुए देहांत और ससुराल वालों के धोखे ने सुधा से उसकी छत छीन ली थी। दुनिया की ठोकरें खाने जेठ की चिलचिलाती धूप में पसीने से लथपथ, अपने दोनों हाथों में सात साल के आरव और पांच साल की पीहू का हाथ पकड़े जब सुधा अपने मायके के दरवाजे पर पहुंची, तो उसकी आंखें आंसुओं और थकान से भारी हो चुकी थीं। के बाद उसे सिर्फ अपना मायका याद आया था, जहां उसने अपना बचपन बिताया था। दरवाजे की आहट सुनकर अंदर से उसकी बूढ़ी और अस्थमा की मरीज मां, कौशल्या देवी बाहर आईं। अपनी लाडली बेटी को इस बदहाल अवस्था में देखकर मां का कलेजा फट गया। उन्होंने दौड़कर सुधा और दोनों बच्चों को अपने गले से लगा लिया। मां के सीने से लगते ही सुधा का सालों का दर्द आंसुओं के रूप में फूट पड़ा। मां रोते हुए बस इतना ही कह पाई, "तू आ गई मेरी बच्ची, अब कहीं जाने की जरूरत नहीं है। यह तेरा ही घर है।"
लेकिन मां का यह प्यार और आश्वासन उस घर की दीवारों से टकराकर दम तोड़ने वाला था। आंगन के दूसरे कोने से सुधा की दोनों भाभियों, मीनाक्षी और रश्मि की तल्ख आवाजें आना शुरू हो गईं। वे दोनों बरामदे में खड़ी मुंह बिचकाते हुए सुधा को ऊपर से नीचे तक घूर रही थीं। मीनाक्षी ने रश्मि की तरफ देखकर तंज कसते हुए कहा, "लो, आ गई महारानी! अब इस घर में यही देखना बाकी रह गया था। वैसे ही महंगाई ने कमर तोड़ रखी है, हमारे अपने बच्चों के खर्चे पूरे नहीं होते और अब ये तीन नए लोग आ धमके। इनका खर्चा क्या आसमान से गिरेगा?" रश्मि ने भी सुर में सुर मिलाते हुए कहा, "और नहीं तो क्या! हम लोग क्या यहां कोई धर्मशाला खोल कर बैठे हैं? भाइयों की कमाई क्या इन्हीं पर लुटाने के लिए है?"
भाभियों के ये शब्द सुधा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गिरे। मां ने अपनी बहुओं को डपटने की कोशिश की, लेकिन उम्र और बीमारी से जर्जर शरीर वाली कौशल्या देवी की आवाज में अब वो रुतबा नहीं बचा था जो कभी हुआ करता था। खांसते-खांसते वो निढाल हो गईं। सुधा समझ गई थी कि जिस आंगन में उसने भाई के साथ खेलकर बचपन बिताया था, वो आंगन अब उसका नहीं रहा। वह वहां एक अनचाही मेहमान, एक बोझ बन चुकी थी।
सुधा ने अपने आंसुओं को पीते हुए भाभियों के सामने हाथ जोड़ लिए। उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन उसमें एक मां की मजबूरी थी। "भाभियों, मैं जानती हूं कि मेरे आने से आप लोगों की परेशानियां बढ़ेंगी। लेकिन मेरा और मेरे बच्चों का इस दुनिया में अब कोई और ठिकाना नहीं है। मुझे बस कुछ दिनों के लिए अपने आंगन के एक कोने में आसरा दे दीजिए। मैं यहां बैठकर मुफ्त की रोटियां नहीं तोडूंगी। मुझे बस चार-पांच दिन का वक्त दे दीजिए, मैं कोई न कोई काम ढूंढ लूंगी और यहां से चली जाऊंगी।"
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बनारस के एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज के खचाखच भरे ऑडिटोरियम में आज तालियों की गड़गड़ाहट रुकने का नाम नहीं ले रही थी। मंच ...
07/09/2026

बनारस के एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज के खचाखच भरे ऑडिटोरियम में आज तालियों की गड़गड़ाहट रुकने का नाम नहीं ले रही थी। मंच पर शहर की सबसे होनहार युवा सर्जन, डॉ. सान्या शर्मा को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जा रहा था। जब सान्या ने माइक संभाला, तो पूरा हॉल शांत हो गया। उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं और नज़रें सामने की कतार में बैठे दो बुजुर्ग चेहरों पर टिकी थीं।

पहली पंक्ति में बैठे 75 वर्षीय दीनानाथ जी के हाथ कांप रहे थे और उनके बगल में बैठी उनकी पत्नी, कावेरी देवी की आँखों से लगातार खुशी के आँसू बह रहे थे। सान्या मंच से उतरी और सीधा जाकर अपने दादा-दादी के पैरों में गिर पड़ी। हॉल में मौजूद कुछ पत्रकारों ने फुसफुसाते हुए एक सवाल पूछा जो वहां हर किसी के मन में था— "डॉक्टर सान्या, आज आपके जीवन का इतना बड़ा दिन है, लेकिन आपके माता-पिता कहीं नज़र नहीं आ रहे?"

सान्या ने अपने दादा का झुर्रियों भरा हाथ कसकर पकड़ा और एक गहरी साँस लेते हुए बड़ी शांति से जवाब दिया, "मेरे माता-पिता को लगता था कि महंगे सपनों की उड़ान में बुजुर्गों का साथ एक अड़चन होता है। उन्होंने अपने आसमान चुन लिए और मैंने अपनी ज़मीन। आज मैं जो भी हूँ, इसी ज़मीन की बदौलत हूँ।"

ऑडिटोरियम में सन्नाटा छा गया। लेकिन यह कहानी इस शानदार मंच से शुरू नहीं हुई थी। इस कहानी की जड़ें आज से पंद्रह साल पीछे, बनारस की एक पुरानी बस्ती के उस छोटे से घर में छिपी थीं, जहाँ रिश्तों की बुनियाद को पैसे की दीमक ने खोखला कर दिया था।

दीनानाथ जी डाकखाने में एक साधारण क्लर्क थे। उनकी पूरी जिंदगी पाई-पाई जोड़कर अपने इकलौते बेटे मयंक का भविष्य संवारने में बीत गई थी। मयंक पढ़ाई में होशियार था, इसलिए दीनानाथ जी ने अपनी छोटी सी पेंशन और पुश्तैनी ज़मीन का एक टुकड़ा बेचकर उसे दिल्ली के एक बड़े कॉलेज से इंजीनियरिंग करवाई। मयंक को नौकरी मिली और जल्द ही उसने अपने साथ काम करने वाली अंजलि से शादी कर ली। शादी के बाद मयंक और अंजलि बनारस के उसी पुराने घर में रहने लगे। कुछ सालों बाद उनके घर एक बेटी का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया—सान्या।

दीनानाथ और कावेरी के लिए सान्या कोई आम बच्ची नहीं थी, वह उनके बुढ़ापे का सबसे खूबसूरत वसंत थी। मयंक और अंजलि दोनों वर्किंग थे, इसलिए उनके पास न घर के लिए समय था और न ही अपनी बच्ची के लिए। सुबह नौ बजे से रात आठ बजे तक उनकी जिंदगी दफ्तर की फाइलों और लैपटॉप की स्क्रीन में सिमटी रहती। सान्या ने पहली बार चलना दीनानाथ जी की उंगली पकड़कर सीखा। उसे पहला निवाला कावेरी देवी ने अपने हाथों से खिलाया। जब सान्या को रात में डर लगता, तो वह अपनी माँ के पास जाने के बजाय दौड़कर दादी की रजाई में छुप जाती।

दीनानाथ जी रोज सुबह अपनी पुरानी साइकिल पर सान्या को स्कूल छोड़ने जाते। रास्ते में वह उसे महापुरुषों की कहानियां सुनाते और कहते, "बिटिया, बड़े होकर चाहे कितनी भी बड़ी कुर्सी पर बैठ जाना, लेकिन कभी यह मत भूलना कि उस कुर्सी के पाये ज़मीन पर ही टिके होते हैं।" सान्या उन बातों को अपने बाल-मन में गांठ बांध लेती।

वक्त पंख लगाकर उड़ने लगा। मयंक की तरक्की होती गई। घर में कार आ गई, एसी लग गया, लेकिन इन सुविधाओं के साथ-साथ मयंक और अंजलि का स्वभाव भी बदलने लगा। उन्हें अब अपने ही घर का पुरानापन और माता-पिता का 'देहाती' रहन-सहन खटकने लगा था। जब भी उनके दफ्तर के दोस्त घर आते, अंजलि दीनानाथ और कावेरी को उनके कमरे में ही रहने की हिदायत दे देती।

"प्लीज पापा, आप लोग बाहर मत आइएगा। मेरे कॉरपोरेट फ्रेंड्स हैं, उन्हें आप लोगों का यह पुराना पहनावा अजीब लगेगा," अंजलि अक्सर बड़ी बेरुखी से कह देती। दीनानाथ जी चुपचाप सुन लेते। उन्होंने जीवन में कभी अपने बेटे से कुछ नहीं मांगा था, इसलिए यह अपमान भी वे एक घूंट की तरह पी गए।

सान्या अब चौदह साल की हो चुकी थी। वह यह सब देखती और उसका बाल-मन विद्रोह कर उठता। जब दीनानाथ जी के घुटनों का दर्द बढ़ने लगा और कावेरी देवी को अस्थमा की शिकायत हो गई, तो घर में दवाओं का खर्च अचानक बढ़ गया। दोनों को महीने में दो बार डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता।

एक सर्द रात, सान्या पानी पीने के लिए उठी तो उसने अपने माता-पिता के कमरे से आती हुई तेज़ आवाज़ें सुनीं।

"मयंक, मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती!" अंजलि झल्लाते हुए कह रही थी। "तुम्हारे माता-पिता की बीमारियों का खर्च अब हमारी ईएमआई पर भारी पड़ रहा है। कल हमें अपनी नई कार का डाउन पेमेंट देना था और तुमने उनके टेस्ट में पैसे लगा दिए। हम कब तक इनकी वजह से अपनी जिंदगी से समझौता करते रहेंगे?"

मयंक ने धीमी आवाज़ में बचाव करते हुए कहा, "तो मैं क्या करूँ अंजलि? सड़क पर तो नहीं छोड़ सकता ना उन्हें।"

"सड़क पर छोड़ने को किसने कहा है?" अंजलि ने एक योजनाबद्ध तरीके से कहा। "शहर के बाहर जो नया 'शांति निवास' वृद्धाश्रम बना है, वो बहुत अच्छा है। वहाँ इनके जैसे कई लोग हैं। इनका मन भी लगा रहेगा और वहाँ का महीने का खर्च इनकी दवाइयों के खर्च से भी कम है। हमें भी अपनी प्राइवेसी मिलेगी और हम दिल्ली वाले बड़े प्रोजेक्ट के लिए आसानी से मूव कर सकेंगे।"

मयंक कुछ देर चुप रहा और फिर उसने हामी भर दी। "ठीक है, मैं कल ही पापा से बात करता हूँ।"

दरवाजे के बाहर खड़ी चौदह साल की सान्या के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिन दादा-दादी ने अपना पेट काटकर उसके पिता को पढ़ाया, आज वही पिता उन्हें वृद्धाश्रम भेजने का सौदा कर रहा था। सान्या रात भर सो नहीं पाई।

अगली सुबह नाश्ते की मेज पर भारी खामोशी थी। मयंक ने हिम्मत जुटाकर गला साफ किया और दीनानाथ जी की ओर देखते हुए कहा, "पापा... मुझे और अंजलि को कंपनी की तरफ से दिल्ली शिफ्ट होना पड़ रहा है। हम आपको वहाँ नहीं ले जा सकते, वहाँ फ्लैट बहुत छोटे होते हैं। हमने सोचा है कि आप और माँ शहर वाले वृद्धाश्रम में..."

मयंक अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि दीनानाथ जी ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। उनकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक ऐसा खालीपन था जो किसी भी पिता को अंदर से मार देता है।

"तुझे सफाई देने की ज़रूरत नहीं है बेटा," दीनानाथ जी ने भर्राई हुई आवाज़ में कहा। "हम समझ रहे हैं। तू हमारी फिक्र मत कर, हम चले जाएंगे। तू बस खुश रह।" कावेरी देवी ने अपने पल्लू से मुँह दबा लिया ताकि उनके रोने की आवाज़ बाहर न आ सके।

तभी सान्या, जो अब तक चुपचाप खड़ी थी, बीच में आ गई। उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो मयंक और अंजलि ने पहले कभी नहीं देखी थी।

"दादा-दादी कहीं नहीं जाएंगे पापा," सान्या की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज उठी।

"सान्या, बड़ों के बीच में मत बोलो। तुम अभी बच्ची हो, तुम्हें प्रैक्टिकल दुनिया की समझ नहीं है," अंजलि ने डांटते हुए कहा।

"मुझे आपकी प्रैक्टिकल दुनिया समझनी भी नहीं है माँ," सान्या ने पलटकर जवाब दिया। "जिस दुनिया में इंसानियत की कीमत ईएमआई और प्राइवेसी से कम हो, वो दुनिया मुझे नहीं चाहिए। अगर दादा-दादी इस घर से जाएंगे, तो मैं भी उनके साथ जाऊंगी।"

मयंक ने गुस्से से मेज पर हाथ मारा। "दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा? हम तुम्हारे भले के लिए दिल्ली जा रहे हैं। तुम्हें अच्छे स्कूल में डालेंगे, तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी। ये दोनों तो अपनी जिंदगी जी चुके हैं, अब ये सिर्फ हम पर बोझ हैं!"

'बोझ' शब्द सुनकर दीनानाथ जी की आँखें बंद हो गईं। सान्या ने अपने दादा का हाथ कसकर पकड़ लिया और अपने पिता की आँखों में आँखें डालकर कहा, "अगर ये आप पर बोझ हैं, तो मैं भी तो बोझ हूँ। कल को मेरी पढ़ाई, मेरी शादी का खर्च भी आपको बोझ लगेगा। तो आप मुझे भी किसी अनाथालय छोड़ देना। पापा, दादा-दादी ने आपको चलना सिखाया और आज जब उनके पैर कांप रहे हैं, तो आप उनका हाथ छोड़ रहे हैं। आप दिल्ली जाइए अपनी बड़ी नौकरी और कार के साथ। मैं यहीं रहूंगी, अपने भगवान के साथ।"

अंजलि ने व्यंग्य से हँसते हुए कहा, "बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है सान्या। दो दिन बिना एसी और सुख-सुविधाओं के रहेगी ना, तो सारा बुखार उतर जाएगा। चलो मयंक, इसे अपनी ज़िद पूरी करने दो। जब भूखी मरेगी तो खुद दिल्ली आ जाएगी।"

उसी शाम मयंक और अंजलि अपना सारा सामान लेकर घर से चले गए। घर में बचे तो सिर्फ तीन लोग—दो टूटे हुए बुजुर्ग और एक चौदह साल की बच्ची, जिसकी आँखों में बचपन की जगह एक भयानक परिपक्वता ने ले ली थी।

दीनानाथ जी ने रोते हुए सान्या को गले लगा लिया। "बिटिया, तूने हमारे लिए अपनी जिंदगी दांव पर क्यों लगा दी? हम तो कुछ दिन के मेहमान हैं, तेरी तो पूरी जिंदगी पड़ी है।"

सान्या ने उनके आँसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा, "दादा, आपने ही तो सिखाया था कि जो जड़ें पेड़ को खड़ा रखती हैं, उन्हें काटा नहीं जाता। अब से आप दोनों मेरी जिम्मेदारी हैं।"

उस दिन के बाद सान्या का बचपन कहीं पीछे छूट गया। मयंक ने कुछ महीनों तक थोड़े बहुत पैसे भेजे, लेकिन फिर वो भी बंद हो गए। दीनानाथ जी की छोटी सी पेंशन से घर का खर्च और उनकी दवाइयां चलना नामुमकिन हो रहा था। सान्या ने हार नहीं मानी। उसने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मोहल्ले के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया।

वह सुबह चार बजे उठकर घर का काम करती, दादी की दवाइयों का हिसाब रखती, स्कूल जाती और लौटकर ट्यूशन पढ़ाती। कई बार ऐसा होता कि घर में सिर्फ दो रोटियां होतीं, तो सान्या यह कहकर भूखी सो जाती कि उसने बाहर सहेली के घर खाना खा लिया है। दीनानाथ जी और कावेरी देवी उसे अपनी आँखों के सामने इस तरह तपता हुआ देखकर अंदर ही अंदर घुटते, लेकिन सान्या के चेहरे पर कभी कोई शिकन नहीं आई।

समय अपनी रफ्तार से चलता रहा। सान्या ने अपनी मेहनत और दादा-दादी के आशीर्वाद से बारहवीं में पूरे राज्य में टॉप किया। उसे सरकारी मेडिकल कॉलेज में स्कॉलरशिप मिल गई। मेडिकल की पढ़ाई का सफर आसान नहीं था, लेकिन हर रात जब वह थककर चूर हो जाती, तो कावेरी देवी उसके सिर में तेल की मालिश करतीं और दीनानाथ जी उसे हौसला देते।

इन सालों में मयंक और अंजलि कभी वापस नहीं आए। वे दिल्ली की चकाचौंध में इतना खो चुके थे कि उन्हें कभी यह जानने की फुर्सत ही नहीं मिली कि उनके बूढ़े माता-पिता ज़िंदा भी हैं या नहीं।

आठ साल की कड़ी तपस्या के बाद, आज सान्या एक कामयाब डॉक्टर बन चुकी थी। जब अखबारों में उसकी सफलता की खबर छपी और टीवी पर उसका इंटरव्यू आया, तो दिल्ली में बैठे मयंक और अंजलि को अपनी गलती का नहीं, बल्कि अपनी बेटी की हैसियत का एहसास हुआ। वे उसी दिन बनारस भागे चले आए।

आज जब सान्या ऑडिटोरियम के बाहर निकली, तो मयंक और अंजलि गुलदस्ता लिए सामने खड़े थे। मयंक ने आगे बढ़कर कहा, "हमें तुम पर बहुत गर्व है बेटा। हम जानते थे तुम एक दिन हमारा नाम रोशन करोगी। चलो, अब हम सब साथ मिलकर दिल्ली में रहेंगे।"

सान्या रुकी। उसने उस गुलदस्ते को देखा, फिर अपने माता-पिता के चेहरों को। उसकी आँखों में कोई नफरत नहीं थी, बस एक अजीब सी दया थी।

"मेरा नाम डॉ. सान्या शर्मा है, श्री दीनानाथ शर्मा की पोती," सान्या ने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा। "आपने तो मुझे उस दिन ही छोड़ दिया था जब मुझे आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। मुझे इस मुकाम तक इन दो बुजुर्गों ने पहुँचाया है, जिन्हें आपने 'बोझ' समझा था। आप दिल्ली वापस चले जाइए मिस्टर मयंक। मेरी दुनिया मेरे दादा-दादी के कदमों में है, और वहाँ किसी स्वार्थी इंसान के लिए कोई जगह नहीं है।"

मयंक और अंजलि के हाथ से गुलदस्ता छूटकर ज़मीन पर गिर गया। वे बस सान्या को जाते हुए देखते रह गए, जो अपने दादा-दादी के दोनों हाथ पकड़कर पूरे गर्व के साथ अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ रही थी। उस दिन मयंक को समझ में आ गया कि उसने कुछ पैसे और झूठे रुतबे के लिए अपनी असली दौलत हमेशा के लिए खो दी है।

रिश्तों की कीमत पैसों से नहीं, बल्कि बुरे वक्त में साथ निभाने से तय होती है। क्या आपको भी लगता है कि आधुनिक सुख-सुविधाओं की चाहत में हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं? क्या सान्या ने अपने माता-पिता के साथ जो किया वह सही था? कृपया अपने विचार कमेंट बॉक्स में साझा करें।

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07/09/2026

बेटी पैदा हुई तो 500 के नोटों से तौलकर निभाई मन्नत!

मैं दौड़कर उसके पास गई और बिना कुछ सोचे, बिना किसी झिझक के, मैंने उस गंदे तौलिए में लिपटे बच्चे को अपने सीने से लगा लिया...
06/09/2026

मैं दौड़कर उसके पास गई और बिना कुछ सोचे, बिना किसी झिझक के, मैंने उस गंदे तौलिए में लिपटे बच्चे को अपने सीने से लगा लिया। मैंने अपना पल्लू हटाया और उसे दूध पिलाने लगी। जैसे ही उस बच्चे ने दूध पीना शुरू किया, मेरे अंदर का सारा गुरूर, सारी ऊंच-नीच की दीवारें और बचपन से सिखाई गई हर झूठी मर्यादा आंसुओं के रूप में मेरी आँखों से बह निकली। उस औरत ने हाथ जोड़कर मेरे पैर छूने चाहे, पर मैंने उसे रोक दिया। आज मुझे एहसास हुआ था कि ममता का कोई रंग नहीं होता,
दिसंबर की सर्द रात थी और लखनऊ रेलवे स्टेशन के वीआईपी वेटिंग रूम में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। कोहरे के कारण हमारी ट्रेन चार घंटे लेट थी। मैं, पल्लवी, अपने छः महीने के बेटे रुद्रांश को सीने से लगाए बैठी थी। रुद्रांश भूख से रो रहा था, इसलिए मैंने अपनी शॉल की आड़ में उसे दूध पिलाना शुरू कर दिया। मेरे पति, समीर, पास ही बैठे अखबार के पन्ने पलट रहे थे। मेरा जन्म एक बेहद रूढ़िवादी और संभ्रांत परिवार में हुआ था। बचपन से ही मुझे सिखाया गया था कि हम ऊंचे कुल के हैं, हर किसी के छुए बर्तन में पानी नहीं पीना, नीची जाति वालों से दूरी बनाकर रखना और अपनी 'पवित्रता' को हर हाल में बचाए रखना। यही संस्कार मेरी रगों में लहू बनकर दौड़ते थे।
रुद्रांश अभी दूध पी ही रहा था कि वेटिंग रूम का कांच का दरवाजा खुला और एक बूढ़ी सफाई कर्मचारी अंदर आई। उसके मैले कपड़े और बिखरे हुए बाल बता रहे थे कि वह दिन भर की थकी हुई है, लेकिन उसकी बाहों में कुछ ऐसा था जिसने मेरा ध्यान खींच लिया। एक पुराना, गंदा सा तौलिया, जिसमें लिपटा एक नवजात बच्चा बुरी तरह रो रहा था। उसकी रोने की आवाज़ इतनी तेज और दर्दनाक थी कि वेटिंग रूम में बैठे कुछ लोग झुंझलाकर उस बूढ़ी औरत को बाहर जाने का इशारा करने लगे।
वह औरत डरी-सहमी सी एक कोने में खड़ी होकर उस बच्चे को चुप कराने की कोशिश कर रही थी। तभी उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। मैं रुद्रांश को दूध पिला रही थी। उस औरत की आँखों में अचानक एक ऐसी चमक और उम्मीद जागी, जिसे देखकर ही मैं अंदर तक सिहर उठी। मुझे अंदाज़ा हो गया था कि वह क्या सोच रही है। मैंने तुरंत अपनी नज़रें चुरा लीं और रुद्रांश को शॉल से और अच्छे से ढंक लिया।
लेकिन मेरी आशंका सच साबित हुई। वह सफाई वाली औरत धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई मेरे पास आ गई। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने बहुत ही दबी और मिन्नत भरी आवाज़ में कहा, "बहू जी... स्टेशन के पीछे वाले गंदे नाले के पास, कूड़ेदान में पड़ा मिला है यह अभागा। शायद कल रात का ही जन्मा है। भूख से इसकी जान निकली जा रही है। मैंने इसे पानी पिलाने की कोशिश की, पर यह कुछ निगल नहीं पा रहा। मेरे तो थन बरसों पहले सूख गए। अगर आप अपनी छाती से लगाकर इसे दो घूंट दूध पिला दें, तो शायद इस बेसहारे की जान बच जाए।"
यह सुनते ही मेरे अंदर का वो संभ्रांत और रूढ़िवादी संस्कार फन फैलाकर खड़ा हो गया। मैंने घबराहट और गुस्से से समीर की तरफ देखा। समीर ने तुरंत उस औरत को डांटते हुए कहा, "क्या बकवास कर रही हो? चलो हटो यहाँ से। पता नहीं कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं मुंह उठाकर।"
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क्या एक बेमेल रिश्ता सिर्फ एक सामाजिक समझौता होता है, या उसके पीछे एक घुटती हुई जवानी की अनगिनत अनकही सिसकियाँ दफन होती ...
06/09/2026

क्या एक बेमेल रिश्ता सिर्फ एक सामाजिक समझौता होता है, या उसके पीछे एक घुटती हुई जवानी की अनगिनत अनकही सिसकियाँ दफन होती हैं?

कस्बे के सबसे पुराने चौराहे पर दीनानाथ की कपड़ों की एक बड़ी सी दुकान थी और उसी दुकान के ठीक पीछे उनका पुश्तैनी मकान था। दीनानाथ उम्र के उस पड़ाव पर था जहाँ बालों की सफेदी को छिपाना अब मुमकिन नहीं रह गया था। चेहरे पर चेचक के गहरे दाग और चलने में एक हल्का सा लंगड़ापन, दीनानाथ के व्यक्तित्व को और भी नीरस बना देता था। लेकिन इसी दीनानाथ के घर की देहरी पर जब नंदिनी ने अपने कदम रखे थे, तो पूरे कस्बे में कानाफूसी शुरू हो गई थी। नंदिनी, मानो साक्षात संगमरमर से तराशी गई कोई मूरत थी। उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, दूधिया रंगत और लंबी घनी जुल्फें किसी को भी एक पल में सम्मोहित कर सकती थीं।

नंदिनी और दीनानाथ की उम्र में पूरे बाइस साल का फासला था। यह विवाह किसी प्रेम या आकर्षण का परिणाम नहीं था, बल्कि परिस्थितियों की एक क्रूर साजिश थी। नंदिनी के पिता एक साधारण से स्कूल मास्टर थे, जो एक गंभीर बीमारी का शिकार हो गए थे। परिवार पर कर्ज का पहाड़ टूट पड़ा था। उस मुश्किल घड़ी में दीनानाथ ने न केवल उनके कर्ज चुकाए, बल्कि उनके इलाज का भी पूरा खर्च उठाया। बदले में, कर्ज के बोझ तले दबे पिता ने अपनी सबसे कीमती पूंजी, अपनी बेटी नंदिनी का हाथ दीनानाथ के हाथों में सौंप दिया। नंदिनी ने भी एक आदर्श बेटी की तरह बिना कोई सवाल किए इस बेमेल रिश्ते को स्वीकार कर लिया। दीनानाथ स्वभाव का बुरा नहीं था, वह नंदिनी की जरूरतें पूरी करता था, लेकिन एक जवान लड़की को जिस भावनात्मक जुड़ाव, जिस प्रेम और जिस हमउम्र साथी की लालसा होती है, वो उस घर की ऊँची दीवारों में कहीं घुट कर रह गई थी।

सर्दियों की एक उदास और कोहरे भरी सुबह थी। नंदिनी हमेशा की तरह घर के बाहरी बरामदे में बैठी स्वेटर बुन रही थी। यह बरामदा सीधे मुख्य सड़क की तरफ खुलता था। दीनानाथ अंदर कमरे में अपनी दवाइयाँ खाकर अभी भी गहरी नींद में सो रहा था, और उसकी भारी खर्राटों की आवाजें बाहर तक आ रही थीं। नंदिनी की नजरें अपनी सलाईयों पर थीं, लेकिन उसका मन कहीं दूर अतीत के उन पन्नों में खोया था, जहाँ उसने भी कभी किसी राजकुमार के सपने देखे थे। उसके चेहरे पर एक अजीब सी रिक्तता और गहरी उदासी छाई हुई थी।

तभी कोहरे को चीरती हुई एक मोटरसाइकिल दुकान के बाहर आकर रुकी। उस पर शहर के दो नौजवान लड़के बैठे थे। शायद वे किसी सफर पर निकले थे और रास्ता भटक गए थे। कड़ाके की ठंड से दोनों काँप रहे थे। उनमें से एक लड़का, जो दिखने में बेहद सुदर्शन और ऊर्जावान था, बरामदे की तरफ बढ़ा।

"जी सुनिए..." लड़के की आवाज सुनकर नंदिनी ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं।

नंदिनी को देखते ही वह लड़का जैसे ठिठक सा गया। उसकी नजरें नंदिनी के सौन्दर्य पर कुछ पल के लिए ठहर सी गईं। फिर थोड़ा झिझकते हुए उसने कहा, "माफ़ कीजिएगा, हम रास्ता भटक गए हैं और हमारी गाड़ी का क्लच वायर टूट गया है। क्या यहाँ आस-पास कोई मैकेनिक मिलेगा? और अगर थोड़ी सी आग तापने की जगह मिल जाती तो..."

नंदिनी ने बिना कुछ बोले पास ही रखी अँगीठी उनकी तरफ खिसका दी और मैकेनिक का रास्ता बताने के लिए अंदर से दीनानाथ को आवाज दी। दीनानाथ खांसते हुए, अपने बिखरे हुए सफेद बालों और ढीले-ढाले कपड़ों में लंगड़ाते हुए बाहर आया। उसने अपनी कर्कश आवाज में उन लड़कों को रास्ता समझाया।

दोनों लड़के आग तापते हुए मैकेनिक का इंतजार करने लगे। दीनानाथ वापस अंदर जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। नंदिनी फिर से अपना स्वेटर बुनने लगी। लेकिन उन दोनों लड़कों की नजरें बार-बार नंदिनी और अंदर बैठे दीनानाथ के बीच झूल रही थीं। वे आपस में बहुत धीमी आवाज में बात करने लगे, लेकिन सुबह के उस सन्नाटे में उनकी फुसफुसाहट नंदिनी के कानों तक पहुँच ही गई।

"यार, दुनिया में वाकई कोई न्याय नहीं है," पहले लड़के ने गहरी सांस लेते हुए कहा। "देखा तुमने? कितनी खूबसूरत है ये, बिल्कुल किसी अप्सरा जैसी। और वो आदमी... उसे तो ठीक से चला भी नहीं जा रहा। कम से कम बीस साल का फर्क होगा दोनों में।"

दूसरे लड़के ने अपनी जैकेट की जिप चढ़ाते हुए सहमति में सिर हिलाया, "सच में यार, किस्मत भी कैसी-कैसी चाल चलती है। बेचारी की जिंदगी तो एक तरह से कैद ही है। ऐसे बूढ़े और कुरूप इंसान के साथ ये अपनी जवानी कैसे काट रही होगी? क्या इसे कभी प्यार का एहसास भी हुआ होगा?"

"पैसे का खेल होगा या कोई मज़बूरी," पहले ने अफ़सोस जताते हुए कहा। "पर जो भी हो, देखकर बहुत तकलीफ होती है। एक गुलाब का फूल जैसे बबूल के पेड़ पर खिल गया हो।"

मैकेनिक के आने पर दोनों लड़के उठ खड़े हुए। जाने से पहले उन्होंने एक आखिरी बार गहरी और सहानुभूति भरी नजरों से नंदिनी को देखा। उनके चेहरे पर उस बेमेल जोड़ी के लिए एक स्पष्ट तरस था। वे अपनी गाड़ी लेकर वहाँ से चले गए और धुंध में कहीं गायब हो गए।

नंदिनी वहीं अपनी जगह पर बुत बनी बैठी रही। उसके हाथ रुक गए थे। उन अजनबी लड़कों की बातें किसी नुकीले तीर की तरह उसके सीने के आर-पार हो गई थीं। उन्होंने वो सच कह दिया था जिसे वह खुद से भी छिपाने की कोशिश कर रही थी। उसने मुड़कर अंदर देखा, जहाँ दीनानाथ अपनी उसी दुनिया में मगन था, इस बात से पूरी तरह बेखबर कि उसकी युवा पत्नी के मन में क्या उथल-पुथल मची है। नंदिनी ने अपनी पलकें नहीं झपकाईं, लेकिन उसकी आँखों की कोर से एक गर्म आँसू छलक कर उसके हाथ में पकड़े आधे बुने स्वेटर पर आ गिरा। वह आँसू सिर्फ उन लड़कों की बातों का नहीं था, बल्कि उसके उस जीवन का था जो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया था।

आपको क्या लगता है, क्या हमारे समाज में ऐसे बेमेल विवाहों में स्त्री की खामोशी उसकी मज़बूरी होती है या परिवार के लिए उसका महान त्याग? क्या उसे अपनी खुशियों का गला घोंटने का अधिकार है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर बताएँ।

उसने कबीर को अपने सीने से लगा लिया। उसका स्पर्श इतना कोमल था जैसे कोई माँ अपने ही बच्चे को सहला रही हो। उसने अपने बैग से...
06/09/2026

उसने कबीर को अपने सीने से लगा लिया। उसका स्पर्श इतना कोमल था जैसे कोई माँ अपने ही बच्चे को सहला रही हो। उसने अपने बैग से एक साफ रुमाल निकाला, उसे अपनी पानी की बोतल से गीला किया और कबीर के तपते माथे पर रख दिया। फिर वह धीरे-धीरे उसकी पीठ सहलाते हुए एक पुरानी लोरी गुनगुनाने लगी। उसकी आवाज़ में इतना दर्द और इतना सुकून था कि पूरा डिब्बा जो कुछ देर पहले कबीर के रोने से परेशान था, अब एकदम शांत होकर उस दृश्य को देख रहा था।
सर्दियों की एक धुंध भरी सुबह थी। मैं अपने पति विकास और तीन साल के बेटे कबीर के साथ लखनऊ से दिल्ली की यात्रा कर रही थी। ट्रेन अपनी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी, लेकिन मेरे अंदर एक अजीब सी घबराहट चल रही थी। कबीर को पिछले दो दिन से तेज़ बुखार था। डॉक्टर ने कहा था कि शायद मौसम का बदलाव है, लेकिन ट्रेन के इस बंद और घुटन भरे एसी कोच में उसकी हालत और बिगड़ती जा रही थी। वह लगातार रो रहा था और उसका शरीर तवे की तरह तप रहा था। मैंने और विकास ने उसे चुप कराने की हर संभव कोशिश कर ली थी, लेकिन वह किसी भी तरह शांत नहीं हो रहा था।
हमारे आस-पास बैठे सहयात्रियों की आँखों में अब सहानुभूति की जगह चिड़चिड़ाहट ने ले ली थी। सामने बैठे एक बुजुर्ग सज्जन ने तो यहाँ तक कह दिया, "अरे भाई, अगर बच्चा इतना बीमार था तो ट्रेन में सफर क्यों कर रहे हो? दूसरों की नींद भी खराब कर दी।" उनके इस तंज से मेरी आँखें भर आईं। विकास उन्हें जवाब देने ही वाले थे कि तभी कोच का दरवाज़ा खुला और वो चिर-परिचित तालियों की आवाज़ गूँज उठी।
चार किन्नरों की एक टोली हमारे कोच में दाखिल हुई। अमूमन ट्रेन में किन्नरों को देखकर लोग असहज हो जाते हैं। कोई अपना पर्स छिपाने लगता है, तो कोई गहरी नींद में सोने का नाटक करने लगता है। सहयात्रियों ने भी अपने चेहरे फेर लिए। वो टोली हर सीट पर जाकर पैसे मांग रही थी, कुछ लोग खुशी से दे रहे थे, तो कुछ झिड़क रहे थे। कबीर उनके आने की आवाज़ से और ज़ोर से डरकर रोने लगा। मैं उसे सीने से चिपकाकर खिड़की की तरफ मुँह करके बैठ गई, ताकि कोई कबीर को परेशान न करे।
तभी मेरी नज़र उस टोली की एक किन्नर पर पड़ी। वह बाकी सब से बिल्कुल अलग थी। न कोई भड़कीला कपड़ा, न चेहरे पर थोपा हुआ भारी मेकअप और न ही बात-बात पर तालियां बजाकर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश। उसने एक बेहद सादी सी सूती साड़ी पहनी हुई थी। माथे पर एक छोटी सी बिंदी और आँखों में एक अजीब सा ठहराव था। उसकी उम्र यही कोई पैंतीस-चालीस के आस-पास रही होगी। वह बहुत सुंदर थी, पर उसकी सुंदरता उसके रूप से ज्यादा उसकी सादगी और उसके शांत व्यक्तित्व से छलक रही थी। वह किसी से पैसे नहीं मांग रही थी, बस चुपचाप अपनी एक साथी के पीछे चल रही थी।
कबीर के लगातार रोने की आवाज़ सुनकर उस टोली की एक मुखिया जैसी दिखने वाली किन्नर हमारे पास आई और मज़ाकिया लहजे में बोली, "अरे बाबूजी, बच्चा क्यों रो रहा है? लाओ हमारी नेग दो, हम दुआ देंगे तो बच्चा एकदम चुप हो जाएगा।" विकास ने झुंझलाकर अपनी जेब से दस का नोट निकाला और उसे देकर आगे बढ़ने का इशारा किया।
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दिसंबर के महीने की वह कंपा देने वाली सर्द रात थी। पूरे शहर को एक घने और दमघोंटू कोहरे ने अपनी सफेद चादर में लपेट रखा था।...
06/09/2026

दिसंबर के महीने की वह कंपा देने वाली सर्द रात थी। पूरे शहर को एक घने और दमघोंटू कोहरे ने अपनी सफेद चादर में लपेट रखा था। मैं अपने ऑफिस के काम से देर रात निवृत्त होकर बस स्टैंड पर खड़ा था। ठंडी हवाएं सीधे हड्डियों को भेद रही थीं और वहां खड़े चंद लोग अलाव तापने या मफलर में अपना चेहरा छिपाने की जद्दोजहद में लगे थे। शहर की वह भागदौड़ और गाड़ियों का शोर उस रात के सन्नाटे में कहीं दब सा गया था। मैं अपने हाथों को रगड़कर गर्माहट पैदा करने की कोशिश कर रहा था, तभी मेरी नज़र एक ऐसे दृश्य पर पड़ी जिसने मुझे भीतर तक सुन्न कर दिया।

कोहरे को चीरते हुए एक बेहद वृद्ध और जर्जर शरीर वाले बुजुर्ग धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए मेरी तरफ आ रहे थे। उनकी उम्र कम से कम अस्सी साल रही होगी। कमर इस कदर झुक गई थी कि उनका शरीर लगभग एक धनुष के आकार का हो गया था। उनके शरीर पर एक पुराना, कई जगह से उधड़ा हुआ सूती स्वेटर और एक मटमैली शॉल थी, जो उस हाड़ कंपा देने वाली सर्दी को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही थी। उनके हाथों में प्लास्टिक की एक छोटी सी डलिया थी, जिसमें कुछ सस्ते पेन, चाबियों के छल्ले और रुमाल रखे हुए थे। ठंड और कमजोरी के कारण उनके हाथ इस तरह कांप रहे थे जैसे हवा में कोई सूखा पत्ता कांपता है। उनके चलने की गति इतनी धीमी थी कि मानो हर एक कदम उठाने के लिए उन्हें अपनी बची-खुची सारी ऊर्जा लगानी पड़ रही हो।

वहाँ मौजूद लोग उन्हें अनदेखा कर रहे थे। कुछ लोग तो उन्हें देखकर ही मुंह फेर लेते, जैसे कोई अवांछित वस्तु देख ली हो। वह बुजुर्ग किसी के सामने हाथ नहीं फैला रहे थे, बस अपनी कांपती आवाज़ में धीरे से कहते, "बाबूजी, एक पेन ले लीजिए... बेटा, एक रुमाल ले लो।" उनका यह स्वर इतना धीमा था कि गाड़ियों की आवाज़ में गुम हो जाता। तभी अचानक एक जल्दबाजी में जाते हुए व्यक्ति का कंधा उनसे टकरा गया। बुजुर्ग का संतुलन बिगड़ा और वह नीचे गिरते-गिरते बचे, लेकिन उनके हाथों की डलिया छिटक कर गिर गई। सारे पेन और छल्ले उस ठंडी सड़क पर बिखर गए। वह आदमी बिना मुड़कर देखे या क्षमा मांगे वहां से चला गया।

मुझसे यह दृश्य देखा नहीं गया। मैं तुरंत अपनी जगह से भागा और उनके पास पहुंचकर ज़मीन पर बिखरे सामान को बटोरने लगा। मेरी मदद करते देख बुजुर्ग की धुंधली और मोतियाबिंद से सफेद हो चुकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उन्होंने अपने कांपते हाथों से मेरे सिर पर हाथ रखा और भर्राई हुई आवाज़ में बोले, "जीते रहो बेटा, भगवान तुम्हें बहुत तरक्की दे।" मैंने उनका सारा सामान डलिया में रखा और उन्हें सहारा देकर पास ही चाय की एक दुकान के किनारे रखी बेंच पर बिठाया। उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था। मैंने चाय वाले को दो कड़क गर्म चाय देने का इशारा किया।

चाय का कुल्हड़ उनके हाथों में देते हुए मैंने बहुत संकोच के साथ पूछा, "बाबा, इतनी भयानक सर्दी की रात में आप इस तरह सड़क पर क्यों घूम रहे हैं? आपके घर में कौन-कौन है? क्या आपके बेटे-पोते नहीं हैं जो आपको इस उम्र में काम करना पड़ रहा है?"

मेरे इन सवालों को सुनते ही उनके चेहरे की झुर्रियों में छिपी एक गहरी उदासी छलक पड़ी। चाय का घूंट भरते हुए उनकी आंखें डबडबा आईं। कुछ पल के सन्नाटे के बाद उन्होंने एक गहरी आह भरी और बोले, "बेटे तो हैं बाबूजी... बल्कि सच कहूं तो मेरा एक ही बेटा है, जो मेरी जान का टुकड़ा था। मैं एक सरकारी स्कूल में मास्टर था। जीवन भर ईमानदारी की रोटी खाई और पाई-पाई जोड़कर अपने बेटे को एक बड़े शहर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाई। खुद सालों तक फटे जूते पहने, अपनी पत्नी के गहने तक गिरवी रख दिए, ताकि मेरे बेटे के सपनों में कोई कमी न आए।"

उनकी बातें मेरे दिल में सुई की तरह चुभ रही थीं। उन्होंने आगे बताया, "बेटे को अच्छी नौकरी मिल गई। उसने शहर में एक बड़ा घर बनाने की सोची। मैंने अपनी जिंदगी भर की कमाई, अपनी पेंशन और प्रोविडेंट फंड का सारा पैसा उसके उस नए घर में लगा दिया। मुझे लगा कि बुढ़ापे में मैं और मेरी पत्नी अपने पोते-पोतियों के साथ उसी बड़े आंगन में खेलेंगे। लेकिन घर बनते ही बेटा बदल गया। बहू को मेरे खांसने की आवाज़ से चिढ़ होने लगी। उसे मेरा पुराने ढंग से रहना और मेरे कपड़े गंदे लगने लगे। पहले मुझे मेरे ही पैसों से बने उस घर के एक छोटे से स्टोर रूम में शिफ्ट किया गया। मेरी पत्नी तो यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई और दो साल पहले ही मुझे अकेला छोड़कर चली गई।"

बुजुर्ग की आंखों से अब आंसू बहकर उनकी सफेद दाढ़ी में समा रहे थे। उन्होंने अपनी शॉल से आंसू पोंछते हुए कहा, "पत्नी के जाने के बाद मैं उनके लिए एक बोझ बन गया। रोज़ के ताने और तिरस्कार सहना मेरी नियति बन गई। और फिर... पिछले महीने की कड़कड़ाती ठंड में, मेरे ही बेटे ने मुझे घर के दरवाज़े से बाहर निकाल दिया और कहा कि मेरे रहने से उनके घर का माहौल खराब होता है और उनके दोस्तों के सामने उनकी बेइज्जती होती है।"

मैं अवाक रह गया। मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। मैंने गुस्से और दुख के मिले-जुले भाव से पूछा, "बाबा, तो आपने पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की? आप इस तरह भीख क्यों... मेरा मतलब है, आप इस तरह दर-बदर क्यों भटक रहे हैं?"

उन्होंने एक फीकी सी मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखा, जिसमें स्वाभिमान की एक अद्भुत झलक थी। "शिकायत किसकी करूं बेटा? अपने ही खून की? अगर उसे सज़ा हो गई तो क्या मैं चैन से सो पाऊंगा? और रही बात मेरे भटकने की, तो मैं भीख नहीं मांगता। जब तक इन हाथों में थोड़ी भी जान है, मैं मेहनत करके दो वक्त की रोटी कमाऊंगा। किसी के आगे हाथ फैलाने से बेहतर है कि मैं अपना स्वाभिमान बचाकर रखूं। इंसान जब भीख मांगता है, तो वह केवल पैसे नहीं, अपना आत्मसम्मान भी उस कटोरी में डाल देता है।"

मेरी बस आ चुकी थी और वह हॉर्न बजा रही थी, लेकिन मेरे कदम उस जगह से हिलने का नाम नहीं ले रहे थे। मैंने उस बुजुर्ग को देखा, जो अपनी डलिया उठाकर वापस कोहरे में विलीन होने के लिए तैयार थे। मैंने अपनी जेब में पड़े सारे पैसे निकाले और उनके हाथ में देने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने सख़्ती से मना कर दिया और केवल दस रुपये लेकर मुझे एक पेन पकड़ा दिया।

वह धीरे-धीरे अपनी लाठी के सहारे अंधेरे में ओझल हो गए, लेकिन मेरे मन में एक ऐसा तूफ़ान छोड़ गए जो कभी शांत नहीं होने वाला था। मैं बस में अपनी सीट पर बैठ गया और खिड़की से बाहर देखते हुए बस यही सोच रहा था कि इंसानियत किस कदर मर चुकी है। हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ एक पिता अपने बच्चों के लिए खुद को राख कर देता है, और वही बच्चे उसी पिता को कचरे की तरह बाहर फेंक देते हैं।

दोस्तों, इस कहानी को पढ़ने के बाद आपके मन में क्या विचार आ रहे हैं? क्या आज के दौर में रिश्तों की अहमियत सिर्फ पैसों और सहूलियत तक सिमट कर रह गई है? क्या एक पिता का जीवन भर का बलिदान इतना सस्ता होता है कि उसे इस तरह बेघर कर दिया जाए? कृपया अपने विचार कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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