Rashtriya Bal Vikas

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07/06/2026
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प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-भगवान या उनकी महिमापांडवों और कौरवों के बीच युद्ध की तैयारी अंतिम चरण में थी। पांडवों ने ...
07/06/2026

प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-

भगवान या उनकी महिमा

पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध की तैयारी अंतिम चरण में थी। पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण से संपर्क करने का फैसला किया और उनसे युद्ध में उनका पक्ष लेने का अनुरोध करने का विचार किया। इस विचार के साथ, अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण से मिलने के लिए तुरंत द्वारका के लिए रवाना हुए।

जब अर्जुन द्वारका पहुँचे तो भगवान श्रीकृष्ण अपने बिस्तर पर विश्राम कर रहे थे। यह सोचकर कि उनकी नींद में खलल न पड़े, अर्जुन साष्टांग प्रणाम करके, हाथ जोड़कर और सिर नीचे करके उनके चरणों के पास खड़े हो गये।

दुर्योधन भी श्रीकृष्ण से संपर्क करना चाहते थे और उनसे युद्ध में कौरवों का पक्ष लेने का अनुरोध करना चाहते थे क्योंकि उस युद्ध में श्रीकृष्ण की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। इसी विचार के साथ दुर्योधन भी श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुँचे।

अभिमानी दुर्योधन श्रीकृष्ण के सिर के पीछे बैठ गये। जब श्रीकृष्ण उठे तो उन्होंने अर्जुन को अपने चरणों में खड़ा देखा, उन्होंने पहले अर्जुन को देखा और जब वे उठने की तैयारी कर रहे थे, तो उन्होंने दुर्योधन को अपने सिर की ओर बैठा देखा।

उन दोनों को देखकर श्रीकृष्ण मुस्कुराए। वह पहले से ही जानते थे कि उन दोनों के मन में क्या है। सो उन्होंने उनसे पूछा, "मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?" चूँकि दुर्योधन और अर्जुन दोनों एक ही प्रस्ताव के साथ वहाँ थे, उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध में उनका पक्ष लेने का अनुरोध किया। यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा, "मैं विवाद नहीं चाहता। मैं यह भी नहीं चाहता कि आप दोनों में से कोई भी ऐसा महसूस करे कि आपके साथ गलत हुआ।

तो, एक पक्ष के लिए, मैं शारीरिक रूप से साथ रहूँगा, लेकिन न तो लडूंगा और न ही हथियारों को संभालूंगा। दूसरी तरफ, मैं अपनी पूरी नारायणी सेना भेजूंगा जो अच्छी तरह से सशस्त्र है और अच्छी तरह से लड़ेगी। अब मैं आप पर छोड़ता हूँ कि आप दोनों क्या चुनना चाहते हैं।"

और फिर कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, "अर्जुन यहाँ पहले थे, इसलिए उन्हें पहले चुनने का अधिकार मिलेगा।"

यह सुनकर दुर्योधन चिंतित हो गया। हालाँकि अर्जुन ने कहा, "भले ही आप युद्ध नहीं करेंगे, मैं व्यक्तिगत रूप से आपसे पांडवों के पक्ष में भाग लेने का अनुरोध करता हूँ।"

जब दुर्योधन ने यह सुना, तो उसने राहत की सांस ली और एक दुर्भावनापूर्ण हँसी के साथ कहा, "क्या मैं आपकी पूरी सेना का अनुरोध कर सकता हूँ?" इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उन दोनों को प्रसन्न किया।

अंत में हम सभी जानते हैं कि महाभारत का युद्ध हुआ था और पांडवों की जीत हुई थी।

ईश्वर अगर दुनिया का सारा वैभव हमें दे दे, लेकिन स्वयं को ही देने से वंचित रखे तो वास्तव में हमें कुछ भी हासिल नहीं हो पाता, लेकिन जब कोई ईश्वर को चाहता है तो, उसके साथ हमें वह सब कुछ मिल जाता है जो ईश्वर का है। शायद यह महाभारत की महान शिक्षा है।

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"यदि हम गीता को ठीक से समझ लें तो यह हमारे दिमाग को समझ के एक बड़े स्तर पर ले जाती है। यह हमें जीवन की लड़ाई के लिए तैयार करती है। जीवन के दैनिक मामलों में हम जो लड़ाई लड़ते हैं वह भी कम नहीं है।"

06/06/2026

प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-पक्का साधकएक बार एक गुरूजी अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए समझा रहे थे कि, "बेटा, पक्के सा...
06/06/2026

प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-

पक्का साधक

एक बार एक गुरूजी अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए समझा रहे थे कि, "बेटा, पक्के साधक बनो, कच्चे साधक ना बने रहो!" कच्चे पक्के साधक की बात सुनकर एक नये शिष्य के मन में सवाल पैदा हुआ!

उसने पूछ ही लिया “गुरूजी ये पक्के साधक कैसे बनते हैं ?”

गुरूजी मुस्कुराये और बोले, "बेटा, एक गाँव में एक हलवाई रहता था। हलवाई हर रोज़ कई तरह की मिठाइयाँ बनाता था, जो एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट होती थी। आस पास के गाँवो में भी हलवाई की बड़ी धाक जमी हुई थी, अक्सर लोग हलवाई की मिठाईयों और पकवानों का आनंद लेने आते थे।

एक दिन हलवाई की दुकान पर एक पति पत्नी आये। उनके साथ उनका छोटा सा बच्चा भी था, जो बहुत ही चंचल था। उसके पिता ने हलवाई को हलवा बनाने को कहा।

फिर वह दोनों तो प्रतीक्षा करने लगे, लेकिन वह बच्चा बार–बार आकर हलवाई से पूछता, “हलवा बन गया क्या?” हलवाई कहता, “अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी।”

वह थोड़ी देर प्रतीक्षा करता और फिर आकर हलवाई को आकर पूछता– “खुशबू तो अच्छी आ रही है, हलवा बन गया क्या?” हलवाई कहता, “अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी।” एक बार, दो बार, तीन बार, बार–बार उसके ऐसा पूछने से हलवाई थोड़ा चिढ़ गया ।

उसने एक प्लेट उठाई और उसमें कच्चा हलवा रखा और बोला, “लो खा लो।”

बच्चे ने खाया तो बोला, “ये हलवा तो अच्छा नहीं है।”

हलवाई फौरन बोला, “अगर अच्छा हलवा खाना है तो चुपचाप जाकर वहाँ बैठ जाओ और प्रतीक्षा करो।” इस बार बच्चा चुपचाप जाकर बैठ गयाI

जब हलवा पककर तैयार हो गया तो हलवाई ने थाली में सजा दिया और उनकी टेबल पर परोस दिया।

इस बार जब उस बच्चे ने हलवा खाया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा। उसने हलवाई से पूछा, “हलवाई काका! अभी थोड़ी देर पहले जब मैंने इसे खाया था, तब तो यह बहुत ख़राब लगा था। अब इतना स्वादिष्ट कैसे बन गया?”

तब हलवाई ने उसे प्रेम से समझाते हुए कहा, “बच्चे, जब तुम ज़िद कर रहे थे, तब यह हलवा कच्चा था और अब यह पक गया है। कच्चा हलवा खाने में अच्छा नहीं लगता। यदि फिर भी उसे खाया जाये तो पेट ख़राब हो सकता है। लेकिन पकने के बाद वह स्वादिष्ट और पोष्टिक हो जाता है।”

अब गुरूजी अपने शिष्य से बोले, "बेटा, कच्चे और पक्के साधक का फर्क समझ में आया कि नहीं?”

शिष्य हाथ जोड़ कर बोला, "गुरूजी, हलवे के कच्चे और पक्के होने की बात तो समझ आ गई, लेकिन एक साधक के साथ यह कैसे होता है?”

गुरूजी बोले, "बेटा, साधक भी हलवाई की तरह ही है। जिस तरह हलवाई हलवे को आग की तपिश से धीरे-धीरे पकाता है, उसी तरह साधक को भी स्वयं को निरन्तर साधना और अभ्यास से पकाना पड़ता है। जिस तरह हलवे में सभी आवश्यक चीज़ें डालने के बाद भी जब तक हलवा कच्चा है, तो उसका स्वाद अच्छा नहीं लगता ।

उसी तरह एक सेवक भी चाहे कितना ही ज्ञान जुटा ले, कर्मकाण्ड कर ले जब तक ध्यान साधना की अग्नि में नहीं तपता, तब तक वह कच्चा ही रहता है। जिस तरह हलवे को अच्छे से पकाने के लिए लगातार उसका ध्यान रखना पड़ता है, उसी तरह साधक को भी अपने मन की चौकीदारी(जागरूकता) करते रहना पड़ता है। जब पकते–पकते हलवे का रँग बदल जाये, उसमें से खुशबु आने लगे और उसे खाने में आनन्द का अनुभव हो, तब उसे पका हुआ कहते है। उसी तरह जब साधना, साधक और साध्य तीनों एक हो जाये, साधक के शरीर से प्रेम की खुशबू आने लगे, तब समझना चाहिए कि साधक पक्का हो चुका है।”

जब तक साधक का अभ्यास पक्का न हो जाये, उसे सावधानी और सतर्कता की हर पल जरूरत रहती है! वरना माया बड़ी आकर्षक होती है, साधक को कभी भी अपने रास्ते से गुमराह कर सकती है ।

"ज्ञानी अपने ध्येय को ही सब कुछ मानकर संतुष्ट हो लेते हैं, लेकिन अभ्यास के बिना यह भी हासिल नहीं हो सकता।"

अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है!

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“सहज अभ्यास अपनाएँ। इस रहस्य को जान लें कि अभ्यास के बिना कुछ भी हासिल नहीं होता। केवल अध्यात्म में ही नहीं बल्कि सांसारिक मामलों में भी अभ्यास की ज़रूरत होती है।”

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