Rashtriya Bal Vikas

Rashtriya Bal Vikas Rashtriya Bal Vikas is an educational newspaper in English and Hindi Edition for children of all age

प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-मन का खेलगर्मी का समय था, मैं अपने किसी काम से घर से बाहर निकला। काम निपटा कर जब वापस घर ...
13/09/2026

प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-

मन का खेल

गर्मी का समय था, मैं अपने किसी काम से घर से बाहर निकला। काम निपटा कर जब वापस घर आने लगा तो गर्मी बहुत ज़्यादा बढ़ गई थी। मुझे सामने एक शीशम का पेड़ दिखा। मैंने सोचा थोड़ी देर इस पेड़ की छाँव में बैठ जाऊँ और अपना पसीना सुखा लूं।

मैं पेड़ के नीचे जाकर खड़ा हो गया। इतनी देर में सामने वाले घर की खिड़की खुली और जिस आदमी ने खिड़की खोली उसने मुझसे पूछा पानी पियोगे। मुझे बहुत ज़ोरों की प्यास लगी थी। मैंने हाँ कह दिया।

हम दोनों में से बोला कोई भी नहीं था। हमारे बीच बस इशारों में ही बात हुई थी। मैं सोचने लगा कि कितना अच्छा आदमी है। न जान, न कोई पहचान फिर भी उसे कैसे पता चला कि मुझे प्यास लग रही होगी? बहुत संवेदनशील आदमी है।

मैं वहीं खड़ा रहा। 5 मिनट हो गए, 7 मिनट हो गए, 10 मिनट हो गए, वह आया ही नहीं। मैंने मन में सोचा कि यह क्या बात हुई? पानी पिलाना ही नहीं था, तो पूछा क्यों और यहाँ खड़ा क्यों कर दिया? मैं इतनी देर यहाँ खड़ा तो नहीं रहता, अपने घर चला जाता। कैसा कठोर दिल है!! मेरे मन में उसके प्रति बुरे-बुरे विचार आ रहे थे।

इतनी देर में सामने का गेट खुला। वह आदमी हाथ में जग लेकर आ रहा था। उसने बोला, "भाई साहब माफ करना, मैंने सोचा, कोरा पानी क्या पिलाऊं, गर्मी बहुत तेज़ है इसलिए शिकंजी बनाने लग गया। मैं आपके लिए शिकंजी लाया हूँ।"

मेरे विचारों के प्रवाह की दिशा फिर बदल गई। मैं सोचने लगा, कितना बड़ा दिल है इसका! मैं ही गलत सोच रहा था। उसने गिलास में शिकंजी डाल दी। जैसे ही गिलास मुँह के लगाई, उसमें मीठा तो था ही नहीं। फिर सोचा, अच्छा बेवकूफ़ बनाया इस आदमी ने। शिकंजी बनाई वो भी फीकी, शिकंजी में शक्कर नहीं डाल कर लाया। ऐसी शिकंजी किस काम की। इससे तो पानी ही ले आता!! एक ही पल में विचारों के काफ़िले ने दिशा बदल दी।

इतनी देर में उसने अपने जेब में से पुड़िया निकाली और बोला, "भाई साहब, मैंने सोचा पता नहीं कितनी चीनी पसंद हो और कहीं आप चीनी लेते भी हो या नहीं! इसलिए मैं चीनी अलग से ले आया हूँ।"

मैं फिर सोचने लग गया कि आदमी तो बहुत अच्छा है। यह तो है मन का खेल, जो हमारा मन हर पल हम पर खेल रहा है!

हमारी राय इतनी जल्दी-जल्दी बदलती है कि हम परिस्थितियों को पूरी तरह से समझे बिना ही अपनी धारणा बना लेते हैं। वास्तव में हमारे मन में उठने वाले विचारों का प्रवाह बाहरी परिस्थितियों से ज़्यादा भीतर की दशा से प्रभावित होकर, बाहर सही और गलत के धागों का एक जाल अपने चारों ओर बुनता जाता है...और हम प्रतिक्रिया के रूप में हर पल उसमें उलझते जा रहे हैं...और हम बन गए मन के खेल के शिकार... मन के गुलाम!!

“मन को स्थिर और शान्त करने में ही सारे सुखों का रहस्य छिपा हुआ है।”

♾️

"सच्चा आध्यात्मिक प्रशिक्षण वह है जो हमारे मन को अनुशासित और नियमित बनाता है। अपनी नियति के निर्माण के लिए हमें अपने मन रूपी सूक्ष्म शरीर को परिष्कृत करना होता है।”

12/09/2026

90 saaal purani panting me smartphone

प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-संस्कार और सभ्यतावासु भाई और वीणा बेन गुजरात के एक शहर में रहते हैं। वे पेशे से चिकित्सक ...
12/09/2026

प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-

संस्कार और सभ्यता

वासु भाई और वीणा बेन गुजरात के एक शहर में रहते हैं। वे पेशे से चिकित्सक हैं, इसलिए लंबा अवकाश नहीं ले सकते। परंतु जब भी दो-तीन दिन का अवकाश मिलता, वे एक छोटी यात्रा पर निकल जाते हैं। इस बार 3 दिन का अवकाश था, और उनका इंदौर-उज्जैन जाने का विचार था।

वे दोनों एक ही मेडिकल कॉलेज में साथ पढ़ते थे, और वहीं से मित्रता प्रेम में परिवर्तित हो गई। और फिर 2 वर्ष पूर्व, उन्होंने परिवार की स्वीकृति से विवाह कर लिया। अभी कोई सन्तान नहीं है, इसलिए यात्रा का आनंद लेते रहते हैं।

विवाह के बाद दोनों ने अपना निजी अस्पताल खोलने का फैसला किया, बैंक से लोन लिया। वीणाबेन स्त्री-रोग विशेषज्ञ और वासु भाई डाक्टर आफ मैडिसिन हैं। दोनों की विशेषज्ञता के कारण अस्पताल अच्छा चल निकला।

यात्रा पर रवाना हुए, आकाश में बादल घुमड़ रहे थे। मध्य-प्रदेश की सीमा लगभग 200 कि.मी. दूर थी; बारिश होने लगी थी। म.प्र. सीमा से 40 कि.मी. पहले छोटा शहर पार करने में समय लगा। कीचड़ और भारी यातायात में बड़ी कठिनाई से दोनों ने रास्ता पार किया।

भोजन तो मध्यप्रदेश में जाकर करने का विचार था परंतु चाय का समय हो गया था। उस छोटे शहर से ४-५ कि.मी. आगे निकले तो सड़क के किनारे एक छोटा सा मकान दिखाई दिया, जिसके आगे चिप्स के पैकेट लटक रहे थे। उन्होंने विचार किया कि यह चाय का ढाबा है।

वासुभाई ने वहाँ पर गाड़ी रोकी, दुकान पर गए, वहाँ कोई नहीं था। आवाज लगाई! अंदर से एक महिला निकल कर आई। उसने पूछा, "क्या चाहिए भाई?"

वासुभाई ने दो पैकेट चिप्स के और एक पैकेट बिस्कुट लिया और कहा, "बेन, दो कप चाय बना देना; थोड़ी जल्दी बना देना, हमको दूर जाना है।" पैकेट लेकर गाड़ी में गए। दोनों ने चिप्स और बिस्कुट का नाश्ता किया। चाय अभी तक आई नहीं थी। दोनों कार से निकल कर दुकान में रखी हुई कुर्सियों पर बैठे। वासुभाई ने फिर आवाज लगाई।

थोड़ी देर में वह महिला अंदर से आई और बोली, "भाई! बाड़े में तुलसी लेने गई थी। तुलसी के पत्ते लेने में देर हो गई, अब चाय बन रही है।" थोड़ी देर बाद एक प्लेट में दो पुराने से कप में वह गरमा गरम चाय लाई।

मैले पुराने कप देखकर वासु भाई एकदम से निराश हो गए और कुछ बोलना चाहते थे; परंतु वीणाबेन ने हाथ पकड़कर उन्हें रोक दिया। चाय के कप उठाए; उनमें से अदरक और तुलसी की सुगंध निकल रही थी।

दोनों ने चाय का एक घूंट लिया। ऐसी स्वादिष्ट और सुगंधित चाय जीवन में उन्होंने पहली बार पी थी। उनके मन की हिचकिचाहट दूर हो गई।

उन्होंने महिला को चाय पीने के बाद पूछा, "कितने पैसे?" महिला ने कहा, "तीस रुपये।" वासुभाई ने सौ का नोट दिया। महिला ने कहा कि, "भाई छुट्टा नहीं है; 30 ₹ छुट्टा दे दो।" वासुभाई ने छुट्टे दे दिये। महिला ने सौ का नोट वापस किया।

वासुभाई ने कहा कि, "हमने तो चिप्स और बिस्कुट के पैकेट भी लिए हैं!" महिला बोली, "यह पैसे उसी के हैं; चाय के नहीं।"
"अरे! चाय के पैसे क्यों नहीं लिए?"
जवाब मिला, "हम चाय नहीं बेंचते हैं। यह होटल नहीं है।"

"फिर आपने चाय क्यों बना दी?"

"अतिथि आए!! आपने चाय मांगी, हमारे पास दूध भी नहीं था। यह बच्चे के लिए दूध रखा था, परंतु आपको मना कैसे करते, इसलिए इसके दूध की चाय बना दी।"

"अब बच्चे को क्या पिलाओगे।"

"एक दिन दूध नहीं पिएगा तो मर नहीं जाएगा। इसके पापा बीमार हैं। वह शहर जाकर दूध ले आते, पर उनको कल से बुखार है। आज अगर ठीक हो गऐ तो कल सुबह जाकर दूध ले आएँगे।" वासुभाई, वीणा बेन उसकी बात सुनकर सन्न रह गये। निःशब्द हो गए!

वासुभाई सोचने लगे, "इस महिला ने होटल न होते हुए भी अपने बच्चे के दूध से चाय बना दी और वह भी केवल इसलिए कि मैंने कहा था, अतिथि रूप में आकर..? संस्कार और सभ्यता में महिला मुझसे बहुत आगे है।"

उन्होंने कहा, "हम दोनों डॉक्टर हैं, आपके पति कहाँ हैं ?" महिला उनको भीतर ले गई; अंदर गरीबी पसरी हुई थी। एक खटिया पर सज्जन सोए हुए थे; बहुत दुबले पतले थे। वासुभाई ने जाकर उनके माथे पर हाथ रखा; माथा और हाथ गर्म हो रहे थे और वह कांप भी रहे थे।

वासुभाई वापस गाड़ी में गए; दवाई का अपना बैग लेकर आए; उनको दो-तीन टेबलेट निकालकर खिलाई और कहा, "इन गोलियों से इनका रोग ठीक नहीं होगा। मैं पीछे शहर में जा कर इंजेक्शन और दवाई की बोतल ले आता हूँ।" वीणाबेन को उन्होंने मरीज के पास बैठने को कहा।

गाड़ी लेकर गए, आधे घंटे में शहर से बोतल, इंजेक्शन ले कर आए और साथ में दूध की थैलियां भी लेकर आये। मरीज को इंजेक्शन लगाया, बोतल चढ़ाई और जब तक बोतल लगी दोनों वहीं बैठे रहे। एक बार और तुलसी अदरक की चाय बनी। दोनों ने चाय पी और उसकी तारीफ़ की। जब मरीज 2 घंटे में थोड़ा ठीक हुआ, तब वे दोनों वहाँ से आगे बढ़े।

3 दिन इंदौर-उज्जैन में रहकर, जब लौटे तो उनके बच्चे के लिए कुछ खिलौने और दूध की थैलियां लेकर आए। वापस उस दुकान के सामने रुके और महिला को आवाज लगाई। दोनों बाहर आए और उनको देखकर बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा, "आपकी दवाई से दूसरे दिन ही बिल्कुल ठीक हो गये।"

वासुभाई ने बच्चे को खिलौने और दूध के पैकेट दिए। फिर से चाय बनी, बातचीत हुई, अपनापन स्थापित हुआ। वासुभाई ने अपना एड्रेस कार्ड देकर कहा, "जब कभी उधर आना हो तो जरूर मिलना।" और दोनों वहाँ से अपने शहर की ओर लौट गये।

शहर पहुँचकर वासु भाई ने उस महिला की बात याद रखी और एक फैसला लिया। अपने अस्पताल में रिसेप्शन पर बैठे हुए व्यक्ति से कहा कि, "अब आगे से जो भी मरीज आयें, केवल उनका नाम लिखना, फीस नहीं लेना; फीस मैं खुद लूँगा।"

और जब मरीज आते तो अगर वह गरीब मरीज होते तो उन्होंने उनसे फीस लेना बंद कर दिया। केवल संपन्न मरीज देखते तो ही उनसे फीस लेते।

धीरे-धीरे शहर में उनकी प्रसिद्धि फैल गई। दूसरे डाक्टरों ने सुना तो उन्हें लगा कि इससे तो हमारी प्रैक्टिस भी कम हो जाएगी और लोग हमारी निंदा करेंगे। उन्होंने एसोसिएशन के अध्यक्ष से कहा।

एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. वासुभाई से मिलने आए और उनसे पूछा, "आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?"

तब वासुभाई ने जो जवाब दिया, उसे सुनकर उनका मन भी पुलकित हो गया।

वासुभाई ने कहा, "मैं अपने जीवन में हर परीक्षा में मैरिट में पहले स्थान पर आता रहा हूँ। एम.बी.बी.एस. में भी, एम.डी. में भी गोल्ड मेडलिस्ट बना परंतु सभ्यता, संस्कार और अतिथि सेवा में, गाँव की वह गरीब महिला मुझसे आगे निकल गयी, तो मैं अब पीछे कैसे रहूंँ? इसलिए मैं अतिथि-सेवा और मानव-सेवा में भी गोल्ड मैडलिस्ट बनूँगा। इसलिए मैंने यह सेवा प्रारंभ की है। और मैं यह कहता हूँ कि हमारा व्यवसाय मानव सेवा का है, धन कमाने का नहीं है। परमात्मा ने हमें मानव-सेवा का अवसर प्रदान किया है।"

एसोसिएशन के अध्यक्ष ने वासुभाई को प्रणाम किया और धन्यवाद देकर उन्होंने कहा, "मैं भी आगे से ऐसी ही भावना रखकर चिकित्सा-सेवा करूंगा।"

♾️

“हमारे द्वारा की गई सेवा में उत्साह होना चाहिए, हम जो भी करें उसे करते समय बदले में कुछ भी पाने की मंशा न रखते हुए, इसे अपने दिल से करें।”

“बच्चों की प्रतिभा, सपनों और अधिकारों को समर्पित हमारे मासिक समाचार पत्र राष्ट्रीय बाल विकास की प्रति माननीय डॉ. रश्मि स...
09/09/2026

“बच्चों की प्रतिभा, सपनों और अधिकारों को समर्पित हमारे मासिक समाचार पत्र राष्ट्रीय बाल विकास की प्रति माननीय डॉ. रश्मि सिंह जी, IAS, सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग को सादर भेंट की। बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उनके मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से हमें नई ऊर्जा मिली। 🙏📰✨” Rashmi Singh
Rajnath Singh Kapil Mishra

05/09/2026

Pig ki kidney ke sahare jinda raha banda

02/09/2026

Behan se panga lena pada bhari

31/08/2026

Bharat kaa sabse purana Airport

29/08/2026

Nepal Flood | “नेपाल में अचानक क्यों आई इतनी भयानक बाढ़? 😱 जानिए असली वजह और बचाव के जरूरी उपाय”

नेपाल में आई इस विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। आखिर बिना किसी बड़े चेतावनी संकेत के इतना पानी अचानक कैसे आया?

इस वीडियो में जानिए:
🌊 नेपाल में बाढ़ आने की असली वजह क्या थी?
🏔️ ग्लेशियर और पहाड़ों के टूटने का इसमें क्या योगदान रहा?
⚠️ ऐसी फ्लैश फ्लड इतनी खतरनाक क्यों होती है?
🛟 बाढ़ आने पर खुद को और परिवार को सुरक्षित रखने के लिए क्या करना चाहिए?

यह घटना हमें याद दिलाती है कि पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं के लिए पहले से तैयारी और समय पर चेतावनी कितनी जरूरी है।


26/08/2026

Vande Mataram

प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-अनजानी मददरात के 11:00 बजे थे और अचानक घर की घंटी बजी। रवि चौंक गया!! इतनी रात को कौन आया...
26/08/2026

प्रतिदिन 1 प्रेरणादायक कहानी :-

अनजानी मदद

रात के 11:00 बजे थे और अचानक घर की घंटी बजी। रवि चौंक गया!! इतनी रात को कौन आया? दरवाजा खोल कर घर के बाहर आया तो देखता है कि सामने एक वृद्ध सज्जन खड़े हैं। एक ऑटो पर आए हुए तेजी से हाफ रहें थे और उन सज्जन ने उससे पूछा, "बेटा, आपका नाम?"
उसने बोला ,"रवि"

वृद्ध सज्जन ने कहा, "हे भगवान तेरा लाख-लाख शुक्रिया, घर मिल गया।" रवि को कुछ समझ नहीं आया, वृद्ध सज्जन ने कहा,"पानी मिलेगा?" रवि ने कहा, "आइए, घर के अंदर आइए।" और रवि ने उनको पानी पिलाया।

उसके बाद वृद्ध सज्जन ने रवि के हाथ में एक चिट्ठी दी। रवि ने उस चिट्ठी को पढ़ा, पढ़कर वह दूसरे कमरे मे गया। 3-4 मिनट्स मे रवि वहाँ वापिस आया और उस ऑटो वाले को कहा,"भाई साहब आप चले जाइए।" और वृद्ध सज्जन का सामान उतार कर घर के अंदर ले आया और कहा, "अंकल रात बहुत हो गई है, आप सो जाइए। मैं आपका काम कल सुबह कर दूँगा।"

उस चिट्ठी में रवि के पिता ने रवि के लिए कुछ लिखा था। और वृद्ध सज्जन ने कहा कि, "आपके पिता ने मुझे भरोसा दिलाया है कि मेरा लड़का आपका काम जरूर से जरूर करेगा, आप बिना किसी चिंता के निसंकोच वहाँ चले जाओ।"

बात यह थी कि उस वृद्ध सज्जन के एकमात्र बेटे का अचानक एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था। सिर्फ बुजुर्ग दंपत्ति घर में थे और लालन-पालन की दिक्कत होने लग गई थी। यहाँ तक कि दैनिक जीवन के खर्चों की भी पूर्ति नही कर पा रहे थे। वह तो नहीं चाहते थे, अपने बेटे की मृत्यु का कंपनसेशन लेना, लेकिन जब कोई रास्ता ना बचा तो मजबूरी में उनको कंपनसेशन लेने का सोचना पड़ा और जब सोचना पड़ा तो उन्हें पता चला कि एक कागज है जो उन्हें दिल्ली में जाकर सर्टिफाई कराना पड़ेगा।

सालों साल वृद्ध सज्जन अपने छोटे से गाँव से बाहर निकले नहीं थे, दिल्ली उनके लिए बहुत डरावनी और बहुत बड़ी जगह थी। इतने में उनके पुराने मालिक ने अपने बेटे के नाम से चिट्ठी बनाकर दी कि जाओ मेरा बेटा रवि आपकी मदद करेगा।

अगले दिन सुबह अंकल उठे, रवि ने उनको बढ़िया नाश्ता कराया। अपनी गाड़ी में बिठाया। रवि ने छुट्टी ली और छुट्टी लेकर रवि उस ऑफिस में गया, फिर बहुत मेहनत मशक्कत करके आखिर वह दस्तावेज निकाल दिए। दस्तावेज सर्टिफाइड कराने के बाद अंकल के बस की टिकट करा दी। टिकट के साथ मिठाई का एक डब्बा दिया और बस स्टैंड पर छोड़कर निकलने ही वाला था कि इतने में वृद्ध सज्जन ने हाथ जोड़कर कहा, "रवि तुम्हारे पिता धन्य है कि उन्होंने तुम्हारे जैसी संतान को पैदा किया। वे बहुत भाग्यशाली है। तुम कुछ कहना चाहते हो क्या? मैं आपके पिता को संदेश दे दूँगा। कहना तो मुझे भी बहुत कुछ है, पर अगर आपकी कोई बात पहुँचानी हो तो....."

रवि एक पल के लिए एकदम शांत हो जाता है। फिर धीरे से कहता है, "माफ कीजिएगा अंकल, आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।" वे सज्जन बोले, "कहिए न बेटा।" रवि ने कहा, "अंकल मैं वह रवि नहीं हूँ।" उस पर उस वृद्ध सज्जन ने हैरानी से कहा, "पर बेटा तुम्हारे मकान के बाहर तो रवि निवास लिखा था।"

"हाँ, वह मेरा रवि निवास है। मेरा नाम भी रवि है, लेकिन मैं वह रवि नहीं हूँ, जिसे आप ढूँढने आए थे।"

उस वृद्ध सज्जन को कुछ समझ नहीं आया, तो रवि बोला, "कल रात को जब आप आए थे, तब आप हाफ रहे थे, लेकिन आपकी आँखों में वह उम्मीद थी कि उनका बेटा आपकी मदद जरूर करेगा। जब मैंने चिट्ठी पढ़ी तो मैंने आपके वाले रवि को फोन किया। वह एकदम से परेशान हो गया और असमंज मे पड़ गया क्योंकि वह कहीं बाहर गया हुआ था और आठ दस दिन बाद आने वाला था। साथ ही आपको देखकर मुझे मेरे पिता याद आ गए, जिनके लिए मैं जीवन भर कुछ ना कर पाया। मेरे पास हिम्मत भी नहीं थी कि मैं आपकी उम्र और भावना को देखते हुए आपको वापस भेज सकूँ। तब मैंने निर्णय लिया कि आपका यह काम मैं करूँगा।"

उस वृद्ध व्यक्ति की आँखों से आँसु बहने लगे और वह बोले कि, "तुम रवि को जानते नहीं हो?" रवि बोला, "अंकल मैं उसको नही जानता , आपकी चिट्ठी में उनका फोन नंबर था, मैंने उन्हें फोन लगाया।"

उस पर उन्होंने फिर से पूछा, "तुम वह रवि भी नहीं हो?" वह फिर से बोला, "हाँ, मैं वह रवि भी नहीं हूँ।" उस पर उस वृद्ध ने कहा, "फिर भी तुमने मेरे लिए छुट्टी ली और इतना किया। कौन कहता है भगवान नहीं होता, कौन कहता है कि खुदा नहीं होता।" इसको बार-बार दोहराते हुए वह बस में बैठ कर चले गए। रवि अपने घर पहुँचा और उस रात उसे अपने जीवन की सबसे ज्यादा सुकून वाली नींद आई।

साथियों जीवन में हम अपने रिश्तेदारों की, दोस्तों की अपने परिवार वालों की अपने साथ काम करने वालो की मदद करते है, इतने में ही हमारी दुनिया सिमट जाती है। पर
क्या कभी हमने बिना किसी कारण के किसी अनजान की, जिसे हम जानते नही, पहचानते नही, उनकी मदद की है?

एक बार ऐसा करके देखें, हम भी चैन की ऐसी दशा का अनुभव करेंगे जिसे शायद हम सभी खोज रहे है।

♾️

"सेवा आध्यात्मिक जीवन की प्रेरक शक्ति है। यदि आप स्वयं को दिव्य शक्ति के अधीन रखकर प्रेम और दृढ़ विश्वास के साथ सेवा करें तो चाहे यह सक्रिय सेवा हो या निष्क्रिय, पर्याप्त है और इसका उद्देश्य पूर्ण हो जाता है।"

Address

Bal VIkas Prakashan Pvt. Ltd
Delhi

Opening Hours

Monday 11am - 8pm
Tuesday 11am - 8pm
Wednesday 11am - 8pm
Thursday 11am - 8pm
Friday 11am - 8pm
Saturday 11am - 1:45am

Telephone

+919310050124

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Rashtriya Bal Vikas posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Rashtriya Bal Vikas:

Shortcuts

Share