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जय जाट देवता !                                                                                            10 मार्च के बा...
28/01/2022

जय जाट देवता !

10 मार्च के बाद अपनी तुलना चवन्नी से भी करने लायक़ नहीं रह जाएंगे जयंत चौधरी !

दयानंद पांडेय

वैसे चवन्नी देखे ज़माना हो गया था जयंत चौधरी। आप को आज देखा तो धन्य हो गया। नास्टेल्जिया सा हो गया। एक समय था कि आप के ग्रैंड फादर चौधरी चरण सिंह के साथ बागपत जाया करता था। यह 1983 -1984 के दिन थे। क्या तो सम्मान था उन का , उस इलाक़े में। कितने बड़े , कितने सरल और विद्वान आदमी थे। राजनीतिज्ञ से पहले अर्थशास्त्री थे। बागपत में गन्ने के खेत के बीच उन्हें देखता तो गन्ने से अधिक मिठास उन के सौम्य और निर्मल व्यक्तित्व से छलकती दिखती। सफ़ेद कुर्ते में , अपने कुर्ते से ज़्यादा धवल वह दीखते।

गले तक करीने से बंद बटन वाले कुर्ते में उन का सलीक़ा , लहजा और बड़प्पन देखते बनता था। भाषण में भी कभी चीख़-पुकार नहीं करते थे। आंकड़ों में बात करते थे। बिना किसी नोट के। किसी से कभी तू-तकार करते नहीं देखा उन को। एक पैसे का दाग़ नहीं लगा उन पर कभी। लखनऊ में पुराने लोग बताते हैं कि कई बार लखनऊ से दिल्ली जाने के लिए टिकट के लिए भी उन के पास पैसे नहीं होते थे। दोस्तों से टिकट कटवाने के लिए कहते थे। तब जब कि वह मुख्य मंत्री रह चुके थे। चौधरी चरण सिंह और बागपत चुनाव को कवर किया है। चौधरी चरण सिंह का इंटरव्यू भी किया है। बहुत नाप-तौल कर बोलते थे। और एक आप हैं कि ख़ुद अपनी तुलना , चवन्नी से कर बैठे हैं। समय-समय का फेर है। आधी इज्ज़त तो उन की आप के पिता अजित सिंह ने मिट्टी में मिला दी थी। बाक़ी चवन्नी आप ने मिला दी है।

बता दूं जयंत चौधरी कि जिस अखिलेश यादव के चरणों में आप इन दिनों समर्पित हैं , इन्हीं अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव , चौधरी चरण सिंह के चरणों में , ज़मीन पर बैठते थे। कुर्सी पर नहीं। ऐसा मैं ने कई बार देखा है। दिल्ली में तुगलक रोड पर चौधरी चरण सिंह के घर पर भी और फ़िरोज़शाह शाह रोड पर लोकदल के कार्यालय में भी। एक समय उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने दस्यु उन्मूलन के तहत मुलायम सिंह यादव का पुलिस इनकाऊण्टर करने के लिए आदेश दे दिया था। तब मुलायम भाग कर साइकिल से खेत-खेत होते हुए , पगडंडियों से दिल्ली पहुंचे थे चौधरी चरण सिंह की शरण में। चरण सिंह ने मुलायम की तब जान बचाई थी। इन्हीं मुलायम सिंह यादव ने आप के पिता अजीत सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री नहीं बनने दे कर अपमानित किया। ख़ुद मुख्य मंत्री बन बैठे।

हां , झेंप मिटाने के लिए लखनऊ एयरपोर्ट का नाम चौधरी चरण सिंह के नाम पर तब ज़रुर कर दिया। तो भी मुलायम सिंह से खिन्न अजीत सिंह अपने भाषणों में कहा करते थे कि अगर किसी गाड़ी में दिख जाए सपा का झंडा तो समझो उस के अंदर गुंडा ! ख़ैर , समय ऐसे भी बदलता है , नहीं जानता था। कि आप अपने पुरखों की चंपू करने वालों की चंपू करने लगे हैं। भूल गए हैं कि सपा की अखिलेश सरकार में आप के जाट बंधुओं की बहन , बेटियों के साथ कैसे एक ख़ास संप्रदाय के लोग बलात्कार और बदतमीजियां करते रहे हैं। जाट समुदाय द्वारा इस का विरोध करने पर मुजफ्फर नगर दंगा हुआ था।

दंगे में कमान तब के सपा के सब से ताक़तवर मंत्री आज़म ख़ान ने दंगाइयों और पुलिस की कमान थाम ली थी। पुलिस को दंगाइयों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं करने दी। थाने में थानेदार को आज़म खान सीधे निर्देश देते थे। चैनलों के स्टिंग ऑपरेशन में यह बात सामने आई थी। जयंत चौधरी आप कैराना का पलायन भी भूल गए। क्या सिर्फ़ चवन्नी से अपनी तुलना करने के लिए। अजब है यह भी। और आप भी। खैर , फिकर नॉट ! 10 मार्च को आप को अपने जाट समुदाय के फ़ैसले पर बहुत फ़ख्र होगा। तब और जब आप जानेंगे कि अपनी बहू-बेटियों की इज्ज़त की हिफ़ाजत वह बिना किसी हिंसा के , एक वोट दे कर भी कर सकते हैं। किसान आंदोलन को कैश करने का भूत तब उतर जाएगा। तब अपनी तुलना चवन्नी से भी करने लायक़ नहीं रह जाएंगे जयंत चौधरी , यह लिख कर कहीं रख लीजिए। वह गाना सुना ही होगा , ये पब्लिक है , ये सब जानती है ! हां , लेकिन जोड़ी अच्छी जमेगी , एक टोटी और एक हैंडपंप की।

दयानंद पांडेय वैसे चवन्नी देखे ज़माना हो गया था जयंत चौधरी। आप को आज देखा तो धन्य हो गया। नास्टेल्जिया सा हो गया। एक ...

16/01/2022

निशाना

~प्रवीण शुक्ल 'पृथक'

उत्तर प्रदेश चुनावों में सब कोई अपनी अपनी सहूलियत से अपना प्रतिद्वंद्वी चुन रहा हैं। बहुजन समाज पार्टी कहती है की भाजपा ने जानबूझकर के अपना विपक्ष अखिलेश यादव को चुना है क्योंकि भाजपा को यह पता है कि पिछले चुनाव और उससे पहले हुए हर चुनाव में करीबन 2 करोड वोट नियमित रूप से बसपा को मिले हैं। वही अखिलेश की समाजवादी पार्टी का ट्रैक रिकॉर्ड वोटों के मामले में उतना अच्छा नहीं है मगर अखिलेश भाजपा को सूट करते हैं इसलिए भाजपा उन्हें अपना प्रमुख विपक्ष मान कर हमलावर है।

कमोबेश यही बात अब कांग्रेस के लिए भी लोग कहने लगे हैं, कांग्रेसी नेत्री प्रियंका गांधी पिछले कई दिनों से अखिलेश यादव पर हमला वार है आखिर हो भी क्यों ना, कांग्रेस की कुल 6 विधानसभा सीटों में से 2 सीटों पर विजय दिलाने वाले और कांग्रेस के मजबूत मुसलमान चेहरे इमरान मसूद को समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से उड़ा लिया।

अभी हाल ही में एक इंटरव्यू में जब समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार अखिलेश यादव से कांग्रेस से गठबंधन के विषय मे पूछा गया तब उन्होंने कहा कांग्रेस कुछ नहीं कर रही है सिर्फ दिल्ली से बैठ कर केवल साजिश कर रही है। उनके इस बयान से तिलमिलाई हुई प्रियंका गांधी अब अखिलेश यादव से पूछ रही है -

"बिजनौर में हत्याएं हुईं, उम्भा में नरसंहार हुआ, उन्नाव और हाथरस में महिलाओं पर अत्याचार हुआ, लखीमपुर में किसानों का नरसंहार हुआ, क्या अखिलेश जी आए? तो अब चुनाव के समय क्यों आ रहे हैं? जब कांग्रेस सड़कों पर लड़ रही थी, तब वे कहां थे?"

वैसे यह सवाल कोई गलत नहीं है यह सवाल बिल्कुल वाजिब सवाल है हाल के कुछ वर्षों में अखिलेश यादव ने अपने आप को अपने घर की चारदीवारी में सीमित कर दिया था। वह पूरे कोरोना काल में भी जनता से नहीं मिले और जिस प्रकार से राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा भिन्न-भिन्न मुद्दों पर योगी सरकार को सक्रिय रूप से घेरते रहे उस वजह से गांधी परिवार द्वारा अखिलेश का यह घेराव उचित जान पड़ता है।

स्वामी प्रसाद मौर्य और भाजपा का संबंध वैसे भी कहु रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग वाला ही था-दयानंद पांडेय गुप्त गुंडा शब...
16/01/2022

स्वामी प्रसाद मौर्य और भाजपा का संबंध वैसे भी कहु रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग वाला ही था

-दयानंद पांडेय

गुप्त गुंडा शब्द सुना है कभी ? तो स्वामी प्रसाद मौर्य गुप्त गुंडा ही हैं। सामाजिक न्याय की आड़ में गुंडों की तरह तेजाबी बोली भी उन की देखने लायक़ है। ओमप्रकाश राजभर की गुंडई जल्दी ही खुल गई थी। वह गुप्त गुंडा नहीं हैं। सो पानी मिले दूध की तरह उफन कर गिर पड़े। रात दो बजे मुख्य मंत्री के घर पहुंचे। किसी क्लर्क को अपना इस्तीफ़ा रिसीव करवा दिया। क्यों कि परिवारीजनों को राज्य सभा और विधान परिषद भिजवाने की ब्लैक मेलिंग में सफल नहीं हुए थे। फिर पांच साल में पांच मुख्य मंत्री और दस उप मुख्य मंत्री का नुस्खा ले कर ओवैसी से हाथ मिलाते हुए कहने लगे अखिलेश यादव को बरबाद कर दूंगा। अब उसी अखिलेश यादव का अर्दली बन कर उपस्थित हैं।

स्वामी प्रसाद मौर्य , ओमप्रकाश राजभर से बड़े उस्ताद हैं। पूरी मलाई काट कर अब योगी सरकार में खामियां बताने लगे हैं। तब जब कि बेटी को भाजपा सांसद बनवा चुके हैं। सचाई यह है कि मायावती की पीठ में छुरा मार कर भाजपा में एक भी दिन वह मन से नहीं रहे। कारण यह है कि उन की विचारधारा राम के विरोध की है। सवर्ण विरोध की है। भाजपा की विचारधारा उन्हें कभी रास नहीं आई। मिले मुलायम , कांशीराम , हवा में उड़ गए जय श्री राम जैसा नारा लगाने में स्वामी प्रसाद मौर्य आगे रहे हैं। तिलक , तराजू और तलवार , इन को मारो जूते चार जैसे नारे को तन-मन से जीने के आज भी हामीदार हैं , स्वामी प्रसाद मौर्य। ऐसे विषयों पर बोलते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य शब्द नहीं , तेज़ाब उगलते रहे हैं। समझ नहीं आता कि अमित शाह और योगी ने जाने कौन सा केंचुआ , अपनी कंटिया में लगा कर , स्वामी प्रसाद मौर्य को अभी तक मछली बना कर भाजपा में फंसाए रखा। समग्र हिंदू की अवधारणा में उन्हें समायोजित कर के रखा। भाजपा यहीं गच्चा खा गई। सब का साथ , सब का विकास , सब का विशवास , सब का प्रयास के खोखले नारे में जैसे निरंतर गच्चा खा रही है।

रही बात स्वामी प्रसाद मौर्य तो सिर्फ़ सत्ता की मलाई चाटने के लिए भाजपा में निभा रहे थे। कहु रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग। वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग। वाली स्थिति थी भाजपा और स्वामी प्रसाद मौर्य की। इस चुनाव में जब उन्हें लगा कि भाजपा उन्हें अब और बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। तो क्रांतिकारी बनते हुए भाजपा छोड़ बैठे। अरे इतनी असहमति थी तो यह बताने में इतना समय क्यों लगा। ऐन चुनाव की चौखट पर ही क्यों असहमति का कांटा चुभा। बाक़ी कुछ और लोग भी भाजपा छोड़ेंगे। कुछ लोग बसपा , सपा , कांग्रेस छोड़ेंगे। कई सपाई भी भाजपा में आए हैं। कुछ बसपाई भी सपा में। यह आना-जाना हर चुनाव में , हर पार्टी में होता है। सामान्य बात है।

भगदड़ मचती ही है हर चुनाव में , हर पार्टी में। इसी लिए राजनीति सांप , सीढ़ी का खेल बन गया है। कब किस को कौन डस ले , कौन निगल ले , कौन सीढ़ी बन जाए किसी की , किसी को पता नहीं। कहा ही जाता है कि राजनीति में कोई दोस्त नहीं होता , कोई दुश्मन नहीं होता। जब कि लोहिया कहते थे कि बड़े बदमाश को मारने के लिए , छोटे बदमाश से दोस्ती कर लेना चाहिए। और अब तो लोग छोटे दुश्मन को मारने के लिए बड़े दुश्मन से दोस्ती कर लेते हैं। कौन कब किस का दोस्त हो जाए , कौन दुश्मन , कोई नहीं जानता।

रही बात स्वामी प्रसाद मौर्य की तो वह अब बसपा में लौट नहीं सकते थे। कभी मायावती के पैरों में रहते थे पर अब मायावती उन्हें फूटी आंख भी नहीं देखना चाहतीं। तो सपा ही उन के लिए विकल्प थी। अब शायद अगला पड़ाव कांग्रेस हो , स्वामी प्रसाद मौर्य का। क्यों कि सपा में भी बहुत समय तक वह नहीं चलने वाले। वैसे भाजपा अगर उन्हें , उन के बेटे और चमचों को टिकट दे दे तो क्या पता , भाजपा में ही लौट आएं। सत्ता सुख बहुत ही शर्मनाक खेल होता है। गुप्त गुंडा लोगों का खेल और भी शर्मनाक। स्वामी प्रसाद मौर्य वैसे भी बदबू मारने वाली जातिवादी राजनीति के सौदागर हैं। जातीय नफ़रत और सवर्ण विरोध , ख़ास कर ब्राह्मण विरोध ही उन की सारी ताक़त है। जहां भी रहेंगे , सामाजिक न्याय की आड़ में आग मूतते रहेंगे , जातिवादी बदबू फैलाते रहेंगे। अब अलग बात है कि अपनी जाति में भी उन के पास कोई आधार नहीं है। लेकिन होता यह है कि उखाड़ी टाइल जाती है , बदनाम टोटी होती है। पर मक़सद दोनों का एक ही होता है। आप ही यह बताइए कि दुनिया में कौन सी ऐसी टाइल है , जो उखाड़ने के बाद फिर लग जाती है। फिर इत्र की तरह बदनाम हो कर बदबू मारने लगती है।

वैसे स्वामी प्रसाद मौर्य ने योगी सरकार से इस्तीफ़ा दे कर भी एक चाल चली है। अभी भी वह भाजपा को ब्लैक मेल कर , भाजपा में अपना स्पेस खोज रहे हैं। जानने वाले जानते हैं कि मंत्री इस्तीफ़ा मुख्य मंत्री को दिया करते हैं। मुख्य मंत्री अपनी संस्तुति के साथ राज्यपाल को भेजते हैं। फिर राज्यपाल इस्तीफ़ा स्वीकार करते हैं। लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपना इस्तीफ़ा सीधे राज्यपाल को भेज दिया है। देखिए क्या होता है। लेकिन तकनीकी पेंच तो है। मुख्य मंत्री की सिफारिश के बिना राज्यपाल द्वारा किसी मंत्री का इस्तीफ़ा मंज़ूर करने की परंपरा फ़िलहाल नहीं है। फिर इस्तीफ़ा राज्यपाल को संबोधित है। मुख्य मंत्री उस में कुछ नहीं कर सकते। सामाजिक न्याय के बिगुल बजाने के लाभ हैं यह।

दयानंद पांडेय गुप्त गुंडा शब्द सुना है कभी ? तो स्वामी प्रसाद मौर्य गुप्त गुंडा ही हैं। सामाजिक न्याय की आड़ में गुं....

कुछ एक्स्ट्रा करने की चाह में कांग्रेस के दलित मुख्यमंत्री।~  पृथक बटोहीकांग्रेस सरकार के पंजाब में सत्तारूढ़ मुख्यमंत्र...
16/01/2022

कुछ एक्स्ट्रा करने की चाह में कांग्रेस के दलित मुख्यमंत्री।

~ पृथक बटोही

कांग्रेस सरकार के पंजाब में सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री श्री चरणजीत सिंह 'चन्नी' वास्तविकता में दलित समुदाय के नेता है। पंजाब जहां जाट सिखों की तूती बोलती है वहां दलित सिख होना, थोड़ा सा असहज होता है। ऐसे में दलित सिख हमेशा अपने को सक्षम दिखाने की कोशिश करते हैं। इसी जुगाड़ में चन्नी ने आदरणीय प्रधानमंत्री मोदी की सुरक्षा में सेन्धमारी करा कर के अपने आका राहुल गांधी को प्रसन्न करने की कोशिश की हैं जो अब धीरे धीरे सुबूतों के आधार पर छन कर आ रहा हैं।
मुख्यमंत्री चन्नी आज जिस गद्दी पर बैठे हैं वह गद्दी उन्हें पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पटियाला के महाराज सरदार अमरेंद्र सिंह को अपदस्थ करके मिली है। दशकों तक कांग्रेस में रहे महाराज अमरेंद्र सिंह को मुख्यमन्त्री पद से हटाए जाने हेतु आरोप क्या थे, जरा उनको भी समझ लीजिए।
उन पर जो आरोप लगे थे, उसमे यह प्रमुख था कि वह दिल्ली में जाकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करते हैं। उनके विरोधियों ने इन औपचारिक मुलाकातों को राज्य- केंद्र के सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध की जगह, महाराज अमरेंद्र सिंह के द्वारा भाजपा के प्रति प्रेम का रूप दिया गया। महाराज अमरेंद्र सिंह को भाजपा के नेतृत्व खासतौर पर मोदी को इज्जत बख्शने के लिए कांग्रेस के भीतर प्रताड़ित किया गया। ऐसे में कांग्रेस में वही चल सकरा है जो इसके उलट काम करे, मुख्यमंत्री चन्नी अगर भाजपा प्रधानमंत्री मोदी का अपमान करें तो यह बात उनको कांग्रेस में गहराई से जमायेगी, उनके मोदी विरोध को सराहा जाएगा। इन्ही सब बातों को ताड़ कर लगता है मुख्यमंत्री चन्नी आलाकमान को खुश करने के चक्कर मे ऐसी चूक कर गए।
चन्नी इस बात को बिल्कुल नहीं समझे कि उनके द्वारा किया गया यह एक्स्ट्रा एफर्ट कांग्रेस के नेतृत्व को पसन्द आने की जगह नागवार गुजर सकता है। समझने वाली बात यह है कि गांधी परिवार को अपनी सुरक्षा सबसे प्रिय है, इसीलिए रॉबर्ट वाड्रा को भी सोनिया राज में एसपीजी की सुरक्षा मुहैया कराई गयी थी। इस परिवार को यह भी पता है कि नरेंद्र मोदी कोई अटल बिहारी वाजपेई नहीं जो राहुल गांधी को यूरोप से छुड़ा लाए थे, नरेंद्र मोदी अपने सख्त रुख के लिए जाने जाते हैं और इसी वजह से शायद पहले कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया जी ने सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक को बड़ी गलती माना और अब प्रियंका गांधी ने चन्नी की खबर ली है।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि कांग्रेस के किसी दलित मुख्यमंत्री ने अपने नेतृत्व को रिझाने के लिए कुछ अतरंगी सा कार्य किया हो , चन्नी से पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री टी अंजैया और पोंडिचेरी के मुख्यमंत्री नारायणस्वामी भी ऐसा ही कारनामा कर चुके हैं। अस्सी के दशक में अविभाजित आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे टी अंजैया की पृष्ठभूमि की बात की बात की जाए तो वे ऑलविन कंपनी में एक छोटे से मजदूर से चलकर बड़े यूनियन लीडर बने और फिर वही से राज्य की असेंबली में चुने गए। कांग्रेस पार्टी के प्रति इनकी निष्ठा के चलते इंदिरा जी ने उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया हालांकि यह बात सबको पता थी कि अंजैया जी इतने योग्य व्यक्ति नहीं थे।
इनके मुख्यमंत्री काल के दौरान उस समय युवा तुर्क समझे जाने वाले कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी और इंदिरा जी के शेष बचे पुत्र राजीव गांधी ने आंध्र प्रदेश का दौरा करना तय किया। अंजैया ने इसे सही अवसर मानते हुए कुछ एक्स्ट्रा करने की इच्छा अपने समर्थकों को बताई । मुख्यमंत्री के सहयोग से एयरपोर्ट पर इनके विश्वस्तों ने कुछ 200 लोगों को बैंड बाजे, नारे तख्तियों इत्यादि के साथ तैनात कर दिया । यह लोग वीआईपी प्लेन के टारमेक के काफी नजदीक आ गए थे साथ ही एयरपोर्ट पर सैकड़ों झालरों- स्वागत द्वार को लगवा दिया गया। इस प्रकार से सुरक्षा में की गई ढिलाई और अव्यवस्था को देख राजीव गांधी काफी कुपित हो गए। उनका गुस्सा होना जायज था क्योंकि दो वर्ष पहले ही संजय गांधी संदिग्ध हालातों में हवाई जहाज की दुर्घटना में मारे गए थे। अपने क्रोध को पीने की जगह और राजनीति में अनुभवहीनता के कारण राजीव गांधी ने अंजैया को सैकड़ों लोगों के सामने ही फटकार लगा दी। इस घटना पर अंजैया इतने घबरा गए कि वह राजीव गांधी से वही पर माफी मांगने लगे। राजीव बहुत देर तक एयरपोर्ट से ही वापस दिल्ली जाने के लिए अड़ गए। हालांकि बाद में बहुत समझाने बुझाने के बाद उन्होंने राज्य में अपने तय कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। मीडिया ने इस घटना को भरपूर तरीके से रिपोर्ट किया जिससे पूरे आंध्र प्रदेश में कांग्रेस एक्सपोज हो गई ।
आंध्र प्रदेश की जनता को लगा की पहले तो इन्होंने दलित मुख्यमंत्री के नाम पर एक रबर स्टैंप उनके ऊपर चस्पा कर दी है और वह भी जब के आंध्र प्रदेश कांग्रेस का अविजित गढ़ था। कांग्रेस को यहां भरपूर समर्थन मिलता था उस के बाद कांग्रेस के द्वारा एक लचर नेतृत्व को आंध्र की जनता पर काबिज कर दिया गया और फिर उसी नेतृत्व को हाईकमान द्वारा सरेआम बेइज्जत कर देना जनता को बहुत ही नागवार गुजरा।
इसका भरपूर फायदा उस समय तेलगु फ़िल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार रहे एन टी रामाराव ने उठाया। उन्होंने 'तेलुगू बिड्डा' यानी धरती पुत्र नाम से आंदोलन छेड़ दिया। पूरे राज्य में तेलगु सबनेशनलिज्म की बयार चल पड़ी। इस घटना के करीब नौ माह बाद कांग्रेस आंध्र प्रदेश में हुए विधानसभा में राव की नई पार्टी तेलुगू देशम के हाथों बुरी तरह हार गई।
इस क्रम में तीसरे दलित मुख्यमंत्री वी नारायणस्वामी है जिन्हें कांग्रेस में पहले केंद्र में मंत्री और बाद में बिना चुनाव लड़े ही पांडिचेरी राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया।
साल 2015 में जब कांग्रेस की सरकार केंद्र की सत्ता से बाहर हो गई तब राहुल गांधी ने दक्षिण का दौरा प्रारम्भ किया। उस समय समुद्री तूफान से आई हुई तबाही देखने वे पांडिचेरी गए। अपने दौरे में एक जगह राहुल गांधी पानी के अंदर जाने के लिए अपने जूते उतार नंगे पांव चलने लगे तब केंद्र में मंत्री रहे नारायणस्वामी ने तुरंत अपनी चप्पल ऑफर कर दी। उनकी इस हरकत को मीडिया ने कवर करते हुए नारायणस्वामी पर कांग्रेस के भीतर चाटुकारिता की संस्कृति बढ़ावा देने का आरोप लगाया। अगले वर्ष साल 2016 में वी नारायणस्वामी को कांग्रेस ने पांडिचेरी का मुख्यमंत्री बना दिया, वे तब पांडिचेरी विधानसभा के सदस्य भी नही थे।
राजनीतिक गलियारों में 'नारी' (तमिल मे लोमड़ी) के नाम से मशहूर मुख्यमंत्री नारायण स्वामी उस वक्त चर्चा में आ गए जब राहुल गांधी फरवरी 2021 में पांडिचेरी में पुनः चक्रवात निवार से पीड़ित मछुआरों से मिलने पांडिचेरी गए और वहां केंद्र सरकार से अलग से मत्स्य पालन मंत्रालय बनाने की गुहार लगाई। उनकी इस मांग पर सोसियल मीडिया में राहुल पर खूब तंज किया गया। दरअसल हुआ यूं कि मछुआरों से मिलन के कार्यक्रम में जब एक वृद्ध मछुआरन ने तमिल भाषा में राहुल गांधी से कहां की है- चक्रवात में कोई भी हमारी मदद के लिए नहीं आया, यह जो आपके साथ में खड़े हैं (मुख्यमंत्री नारायणस्वामी) यह भी नही आये। इस पर राहुल ने बड़े गुमान के साथ नारायणस्वामी से कहा कि आप इनको भरोसा दिलाइये की हम इनकी मदद करेंगे। प्रतिउतर में नारायण स्वामी ने अपना दोष स्वीकारने की जगह कुछ एक्स्ट्रा करते हुए करते हुए राहुल गांधी को चक्रवात निवार के दौरान किये गए अपने प्रयासों के बारे में बताया।
सोशल मीडिया ने नारायण स्वामी की इस चालाकी को पकड़ लिया और बताया कि किस प्रकार राहुल गांधी को नारायणस्वामी ने महिला की तमिल में कही बात का गलत ट्रांसलेशन अनुवाद बताया है । बाद में मीडिया ने भी इस स्टोरी को कवर दिया जिससे इस मुद्दे पर राहुल गांधी की काफी किरकिरी हुई।उसी वर्ष जब नारायणस्वामी के नेतृत्व में कांग्रेस विधायकों में हुई टूट-फूट हुई तो नारायणस्वामी को कांग्रेस ने उठाकर ठंडे बस्ते में डाल दिया।
ऐसी घटनाओं से जान पड़ता है कांग्रेस मजबूरी में दलितों को मुख्यमंत्री तो बना देती है मगर उन मुख्यमंत्री को जबरदस्त दबाव में काम करना पड़ता है। दलित मुख्यमंत्री को हर वक़्त अपनी काबलियत साबित करनी पड़ती है साथ ही हर वक्त उन्हें अपने हाईकमान को खुश करने की कोशिश में भी लगे रहना पड़ता है। इस सब की वजह से वह ना तो मुख्यमंत्री पद की गरिमा को बनाए रख पाते हैं और ना ही उस पद के दायित्व को निभा पाते हैं।

कट गया इमरान मसूद का 'टिकट,'- प्रवीण शुक्ल 'पृथक'सहारनपुर में काजी घराना हमेशा सियासी चर्चा में रहता है इस खानदान के काज...
16/01/2022

कट गया इमरान मसूद का 'टिकट,'

- प्रवीण शुक्ल 'पृथक'

सहारनपुर में काजी घराना हमेशा सियासी चर्चा में रहता है इस खानदान के काजी रशीद मसूद आठ बार सांसद तथा केंद्रीय मंत्री बने थे। काजी रशीद मसूद को देखकर ही उनके भतीजे इमरान मसूद और नोमान मसूद ने भी सियासत में कदम रखे।पांच भाइयों में से इमरान और नोमान जुड़वां भाई हैं, जिसमे इमरान चंद मिनट बड़े हैं। इस बार नोमान बसपा से चुनावी कमान संभाले हैं पर इमरान का मामला गड़बड़ा गया है।

अभी 12 जनवरी को कांग्रेस छोड़ इमरान मसूद और उनके समर्थक विधायक मसूद अख्तर सपा में शामिल हुए थे। मुस्लिम वोटों का सपा की तरफ झुकता हुआ देख इमरान ने सपा का दामन तो थाम लिया पर सपा ने इमरान और मसूद अख्तर दोनों में से किसी को भी उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए टिकट नहीं दिया है।

कांग्रेस नेता इमरान मसूद के सपा में जाने से सहारनपुर जिले में कांग्रेस की पकड़ कमजोर हो गई हैं , मसूद ने 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को यहां से बेहट और देहात विधानसभा सीट पर जीत दिलाई थी। कांग्रेस ने केवल छह विधानसभा सीटों में से दो सीटें सहारनपुर की थी। इमरान मसूद को कांग्रेस का कद्दावर नेता माना जाता था, पश्चिमी यूपी में उनका काफी वर्चस्व माना जाता है मगर चुनाव में उनकी हालत पतली ही रहती है, इमरान 2017 के चुनाव में सहारनपुर की नकुड़ विधानसभा सीट से लड़ते हुए बीजेपी के धर्म सिंह सैनी से हार गए थे। इमरान इस बार खुद बेहट से चुनाव लड़ना चाहते पर सपा ने वहाँ से अपने एमएलसी उमर अली को टिकट दे दिया हैं। जबकी बेहट सीट में उनके सहयोगी कांग्रेस के नरेश सैनी ने भाजपा के महावीर सिंह राणा को 25,586 वोटों से हराया था। अब नरेश सैनी भाजपा में तो इमरान सपा में आ गए है, जहां नरेश सैनी को भाजपा की टिकट पा गए है वही इमरान खाली हाथ रह गए हैं।

समाजवादी पार्टी ने सहारनपुर देहात से आशु मलिक को और बेहट से जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी के दामाद उमर अली उमर अली को टिकट देने का मन बनाया है। ऐसे में इमरान कही फिट होते नही दिख रहे। इंटरमीडिएट तक ही पढे इमरान सर्वप्रथम सहारनपुर नगर पालिका के अध्यक्ष चुने गए। इमरान 2007 में मुजफ्फराबाद सीट से निर्दलीय विधायक चुने गए, 2012 में नकुड़ से कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े। 2014 में कांग्रेस से लोकसभा चुनाव लड़ा और हार गए 2017 में वे कांग्रेस में राष्ट्रीय सचिव तथा दिल्ली प्रभारी बने उससी साल 2017 के चुनाव में भाजपा के धर्म सिंह सैनी से नकुड़ विधानसभा सीट हार गए। 2019-लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर सहारनपुर से चुनाव लड़ा, तीसरे स्थान पर रहे।

उधर, धर्म सिंह सैनी की बात करें तो वह नकुड़ विधानसभा सीट से चार बार विधायक रह चुके हैं। वह योगी सरकार में आयुष राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे मगर ऐन चुनाव मर सपा के साथ चले गए हैं।धर्म सिंह सैनी 2002 में सरसावा सीट से बसपा के टिकट पर पहली बार विधायक बने थे, 2007 में दोबारा सरसावा से बसपा के टिकट पर विधायक बने और बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री (बेसिक शिक्षा मंत्री) रहे। इसके बाद 2012 में तीसरी बार बसपा के टिकट पर ही नकुड़ से विधायक बने और लोक लेखा समिति के चेयरमैन रहे। इसके बाद 2017 में उन्‍होंने भाजपा की टिकट पर नकुड़ से विधायक बने। स्वामी प्रसाद मौर्य के बेहद करीबी नेताओं में शुमार धर्म सिंह सैनी अब बीजेपी छोड़कर अब सपा में हैं।

16/01/2022

साल 1998 में अपने गुरु महंत अवेद्यनाथ के उत्तराधिकारी के तौर पर 26 साल की उम्र में योगी ने राजनीति में कदम रखा था. 1998 में लोकसभा के मध्यवधि चुनाव में योगी ने सपा के जमुना प्रसाद निषाद को हराकर चुनाव जीता. 1999 में योगी ने दूसरी बार भी जमुना प्रसाद को हराकर ही चुनाव जीता. 2004 में योगी लगातार तीसरी बार गोरखपुर से सांसद चुने गए. इसके बाद साल 2009 और 2014 में भी जीत हासिल की. 2017 में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद पार्टी ने उन्हें सीएम बना दिया. इसके बाद उन्होंने संसदीय सीट से इस्तीफा दे दिया. और एमएलसी बन गए.

कलि विलोकि जगहित हर गिरिजा।
साबर मंत्रजाल जिन्ह सिरजा॥

कहा जाता शाबर मंत्रों का सृजन गुरु गोरखनाथ ने किया था । मंत्र कैसे काम करते हैं , करते भी हैं या नहीं यह नहीं कहा जा सकता पर मध्यकाल में ये बहुत लोकप्रिय रहे हैं । इन्हें सिद्ध करने की जरूरत नहीं होती । वैदिक मंत्र तो सिद्धि के लिए जप तप और साधना की अपेक्षा करते हैं । कलिकाल में अब वे साधक कहाँ ? साबर मंत्र बिना सिद्धि के ही काम करते हैं । साँप का जहर उतारने वाले ओझा जोगी आदिवासी सब साबर मंत्र ही प्रयोग करते हैं ।

सूफ़ी कलंदरों के साथ भारत में नक़्श सुलेमानी आया । आयतों के अलावा भी झाड़ फूँक में अनेक अरबी फारसी और जनभाषा के मंत्रों का प्रयोग किया जाने लगा । जनता मंत्रमुग्ध होकर झाड़ फूँक करवाने लगी । कुरानी सूरा के शुरू में अवतरित रहस्यमय अक्षरों को खाँचे में लिख कर लोह ए कुरानी बना ली गई जिसका पाठ कर के तमाम जादू टोनों से बचा जा सकता था । इस्लाम जो जादू टोने के ख़िलाफ़ था उसने ख़ुद एक बड़ा तांत्रिक तंत्र खड़ा कर लिया । जिन्नात सिद्ध करने वाले भी बड़े फ़कीर पैदा हो गए । दिल्ली को तो जिन्नों का शहर ही कहा जाता है ।

भारत विभिन्न धर्मों और आदिवासी समाज में फैले जादू टोने तंत्र मंत्र का अखाड़ा बन गया । ऐसे माहौल में गुरु गोरखनाथ अपने अद्भुत चमत्कारों से तंत्र जगत में छा गये । हिंदू मुसलमान तमाम उनकी शिष्य परंपरा में शामिल हो गये । गोरखनाथ के नाम से इतने चमत्कारों की कहानियाँ प्रचलित हैं कि गोरखनाथ के अबूझ चमत्कारों को अलग से गोरखधंधा नाम ही दे दिया गया ।

गोरखनाथ के तीर्थ पेशावर से बंगाल और दक्षिण मे महाराष्ट्र और हैदराबाद तक फैले हुए हैं । नेपाली गोरखा तो बड़ी भक्ति भाव से गोरक्षनाथ पीठ के प्रति समर्पित हैं । बहुत से मुसलमान जोगी भी नाथ पंथ को मानते हैं ।

एक साबर मंत्र “ जल तू जलाल तू आई बला को टाल तू” तो मैंने भी खूब आजमाया है और वह हमेशा काम आया ।

समाज में व्याप्त शाबर मंत्रों के प्रभाव की अनदेखी तो तुलसीदास भी न कर पाये । वह इनका श्रेय भगवान शंकर को देते हैं ,

अनमिल आखर अरथ न जापू।
प्रगट प्रभाउ महेश प्रतापू ॥

मान्यता यह है गोरखनाथ की पीठ पर जो बैठता है उसे परंपारा से ही बहुत सारी सिद्धियाँ मिल जाती हैं ।

83 में से 20 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर आई भाजपा की पहली लिस्ट।~प्रवीण शुक्ल 'पृथक'भाजपा ने शनिवार को 107 उम्मीदवारों...
15/01/2022

83 में से 20 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर आई भाजपा की पहली लिस्ट।

~प्रवीण शुक्ल 'पृथक'

भाजपा ने शनिवार को 107 उम्मीदवारों की सूची जारी की है, इस सूची में 44 सीटे अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी), 19 दलित और 10 महिलाओं का नाम है। इस सूची में 21 नए चेहरे हैं। जिन 107 सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम जारी किए गए हैं, उनमें से 83 सीटों पर अभी भाजपा के विधायक हैं। उनमें से सिर्फ 63 विधायकों को ही टिकट मिल पाया है। इस तरह पार्टी ने 20 विधायकों की टिकट काट दी है और 20 नए चेहरों को शामिल किया है।

जिसके मुताबिक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर सिटी से चुनाव लड़ेंगे इसका मतलब मौजूदा भाजपा विधायक डॉ राधा मोहन अग्रवाल का टिकट कट गया। उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सिराथू से उम्मीदवार होंगे, मतलब मौजूदा भाजपा विधायक शीतला प्रसाद पटेल का टिकट कट गया हैं। उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को आगरा ग्रामीण सीट से उम्मीदवार बनाया गया है।

आगरा

पार्टी ने आगरा जिले की नौ विधानसभा सीटों में से पांच विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी बदले हैं। इनमें एत्मादपुर से निवर्तमान विधायक राम प्रताप सिंह चौहान, आगरा ग्रामीण (एससी) से हेमलता दिवाकर, खेरागढ़ से महेश गोयल, फतेहपुर सीकरी से चौधरी उदयभान सिंह और फतेहाबाद से जितेंद्र वर्मा का टिकट कट गया है।एत्मादपुर विधानसभा सीट से डॉक्टर धर्मपाल सिंह को प्रत्याशी बनाया गया है। वह एत्मादपुर से बसपा के विधायक रह चुके हैं। समाजवादी पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं। एत्मादपुर सीट से निवर्तमान विधायक रामप्रताप सिंह चौहान का टिकट कटा है। इसी तरह खेरागढ़ से विधायक महेश गोयल की जगह भाजपा ने भगवान सिंह कुशवाहा को प्रत्याशी बनाया है। फतेहाबाद से विधायक जितेंद्र वर्मा की जगह छोटेलाल वर्मा को टिकट मिला है।पिछले चुनाव में भाजपा ने जिले की सभी सीटों पर जीत दर्ज की थी।

मथुरा

मथुरा की पांच से चार सीटों पर पुराने चेहरों को उतारा है, जबकि एक सीट पर प्रत्याशी बदला है। मथुरा से प्रदेश में ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ,छाता से चौधरी लक्ष्मीनारायण, बलदेव (सु) से पूरन प्रकाश जाटव को फिर से प्रत्याशी बनाया गया है।
वहीं गोवर्धन के मौजूदा विधायक कारिंदा सिंह का टिकट काटकर उनकी जगह जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष ठाकुर मेघश्याम सिंह को और मांट से पिछली बार चुनाव हार गए एसके शर्मा की जगह राजेश चौधरी मैदान में उतारा गया है।

मेरठ

मेरठ में सभी सात विधानसभा सीटों के लिए भाजपा ने प्रत्याशियों के नाम तय हो गए है।
मेरठ जिले में सरधना से संगीत सोम, दक्षिण विधानसभा से युवा विधायक सोमेन्द्र तोमर, किठौर से सतवीर त्यागी, हस्तिनापुर (सु) से दिनेश खटीक को फिर टिकट मिला है, जबकि दो विधायक सिवालखास के जितेन्द्र पाल सिंह और लगातार चार बार विधायक रहे सत्यप्रकाश अग्रवाल और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी को इस बार मौका नहीं दिया गया हैं। नए नामों में मेरठ नगर से कमल दत्त शर्मा, सिवालखास से मनिंदरपाल और मेरठ कैंट से अमित अग्रवाल को पार्टी ने मौका दिया हैं। पिछले चुनाव में वाजपेयी चुनाव हार गए थे और सत्यप्रकाश अग्रवाल अब 80 वर्ष से ऊपर हो गए है सो कुल मिलाकर सही मायनों में सिवालखास से जितेंद्र सतवई का ही टिकिट कटा है।

मुजफ्फरनगर

मुजफ्फरनगर की सभी छह विधानसभा सीट पर प्रत्याशी घोषित हुए हैं। इनमें चार सीटों पर वर्तमान विधायक को टिकट दिया है, जबकि दो के टिकट काट कर नए चेहरों को भी टिकट मिला है। सदर सीट पर वर्तमान विधायक और राज्यमंत्री कपिल देव अग्रवाल,खतौली सीट पर विधायक विक्रम सैनी, पुरकाजी से विधायक प्रमोद ऊटवाल, जाटलैंड के नाम से मशहूर बुढाना विधानसभा सीट पर उमेश मलिक को फिर से मौका दिया गया है।उमेश मलिक काफी चर्चाओं में रहे, जिसमें सिसौली में उनकी गाड़ी पर स्याही फेंकने का प्रकरण प्रमुख रहा। टिकैत परिवार से उनकी तल्खी भी सामने आई। विक्रम सैनी ने पिछले चुनाव में सपा प्रत्याशी चंदन चौहान को 30 हजार से अधिक वोटों से हराया था जो जिले में मतों के आधार पर सबसे बड़ी जीत थी।कपिल देव अग्रवाल उपचुनाव समेत दो बार एमएलए निर्वाचित हुए हैं। दो नए नामों में चरथावल विधानसभा सीट से सपना कश्यप जो पूर्व राज्यमंत्री विजय कश्यप की धर्मपत्नी है और गुर्जर बहुल मीरापुर विधानसभा सीट पर भाजपा ने बाहरी प्रत्याशी प्रशांत गुर्जर को रण में उतारा हैं। वर्ष 2017 में भाजपा से विधायक रहे अवतार सिंह भड़ाना भी बाहरी थे लेकिन जीतने के बाद क्षेत्र में नहीं आएं, जिससे लोगों में काफी नाराजगी रही।

शामली

शामली जिले की तीन सीटों में शामली सीट से वर्तमान विधायक तेजेंद्र निर्वाल, थानाभवन सीट से गन्ना मंत्री सुरेश राणा फिर से पार्टी के प्रत्याशी होंगे। कैराना सीट से भाजपा ने मृगांका सिंह को फिर से मौका दिया है। बाबू हुकुम देव की पुत्री मृगांका सिंह 2017 में सपा के नाहिद हसन से 21,162 वोटों से चुनाव हार गई थीं। 2018 में हुकुम सिंह के निधन के बाद कैराना लोकसभा सीट रिक्त हुई थी। तब मृगांका सिंह भाजपा से उपचुनाव लड़ी थीं लेकिन सपा-रालोद गठबंधन उम्मीदवार तबस्सुम हसन से हार गईं थीं।थानाभवन सीट पर भी अशरफ अली काफी कम अंतर से हारे थे एक बार फिर वे रालोद की तरफ से मैदान में हैं।

सहारनपुर

सहारनपुर की सभी 7 सीटों के उम्मीदवारों की भी घोषणा हुई है इनमे देवबंद से मौजूदा विधायक कुंवर ब्रजेश सिंह, रामपुर मनिहारान ( सुरक्षित) से विधायक देवेंद्र निम और गंगोह से विधायक कीरत सिंह को पार्टी ने फिर से प्रत्याशी बनाया है। सहारनपुर शहर से पूर्व विधायक राजीव गुंबर जो पिछली बार सपा के संजय गर्ग से चुनाव हार गए थे वे भी पुनः टिकट पा गए हैं। सहारनपुर में जो बदलाव हुए है उनमें बेहट सीट से कांग्रेस से आये मौजूदा विधायक नरेश सैनी को प्रत्याशी बनाया गया है। नकुड सीट से पंचायत सदस्य और कभी इमरान मसूद के साथी रहे मुकेश चौधरी को मौका दिया गया है क्योंकि इस सीट के वर्तमान विधायक धर्म सिंह सैनी सपा में चले गए हैं। सहारनपुर देहात से मौजूदा बसपा विधायक जगपाल को प्रत्याशी बनाया है। जगपाल पिछले तीन बार के बसपा से विधायक रह चुके हैं । पिछले साल हुए जिला पंचायत चुनाव के बाद जगपाल का कद घट गया था उनके बेटे योगेश को बसपा ने जिलाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था।

गौतमबुद्ध नगर

गौतमबुद्ध नगर जिले की तीनों विधानसभा सीटों के उम्मीदवारों की घोषणा हो गयी है,तीनो मौजूदा विधायक फिर से टिकट पा गए हैं। नोएडा से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, दादरी से तेजपाल सिंह नागर और जेवर से धीरेंद्र सिंह वापिस मैदान में हैं।

गाजियाबाद

गाजियाबाद से भी सभी पांच मौजूदा विधायक पुनः टिकट पा गए हैं शहर से अतुल गर्ग, साहिबाबाद सीट से सुनील शर्मा, लोनी से नंद किशोर गुर्जर, मोदीनगर से डॉ. मंजू सिवाच, मुरादनगर से अजित पाल त्यागी को टिकट फिर से टिकट दिया गया है।

अलीगढ़

अलीगढ़ की सात में से छह सीटों पर प्रत्याशी घोषित हुए है एक सीट सिटी पर इंतजार हो रहा हैं।अतरौली से पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पोते और मंत्री संदीप सिंह, कोल से विधायक अनिल पाराशर, छर्रा से विधायक रवेंद्र पाल सिंह, इगलास से विधायक राजकुमार सहयोगी, खैर से विधायक अनूप प्रधान को दोबारा टिकट दिया गया है। बरौली से ठाकुर दलवीर सिंह का टिकट काटकर एमएलसी ठाकुर जयवीर सिंह को टिकट दिया है। बसपा सरकार में दो बार कैबिनेट मंत्री रह चुके ठाकुर जयवीर और उनका परिवार अलीगढ़ की राजनीति में खास दबदबा रखता हैं। बीमार चल रहे दलबीर सिंह की जगह जयवीर सिंह को टिकट मिलना कुछ हद तक ठीक भी हैं हालांकि दलबीर अपने पोते अजय सिंह को उम्मीदवार बनने चाहते थे। एमएलसी जयवीर 2002 में पहली बार बसपा के टिकट पर बरौली से ही निर्वाचित हुए और मायावती मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने। 2007 में दुबारा जीते और बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। 2012 में हारने के बाद वे बसपा से विधान परिषद सदस्य बने, बसपा से ही 2009 में जयवीर सिंह की धर्मपत्नी राजकुमारी चौहान लोकसभा सदस्य बनी तो 2016 में भतीजा उपेंद्र सिंह नीटू जिला पंचायत अध्यक्ष बने। उनका बेटा भी डॉ अभिमन्यु भी लोकसभा चुनाव में भाग्य आजमा चुके हैं, साल 2018 में यह कुनबा भाजपा में शामिल हो गया।अलीगढ़ की शहर विधानसभा सीट पर मंथन जारी है मौजूदा विधायक संजीव राजा को एक 23 साल पुराने मामले में दो साल कैद की सजा हुई है ऐसे में उनका टिकट कट सकता हैं।

मुरादाबाद

मुरादाबाद की छह सीटों में भाजपा के दो विधायक है जिनमें नगर सीट से विधायक रितेश गुप्ता, कांठ से विधायक राजेश कुमार सिंह चुन्नू है इन दोनों को ही दुबारा टिकट मिला है। पिछली बार हारी हुई सीटों में देहात से के के मिश्रा, कुंदरकी से कमल प्रजापति, बिलारी परमेश्वर लाल सैनी को प्रत्याशी बनाया गया है। ठाकुरद्वारा सीट पर पूर्व सांसद ठाकुर सर्वेश सिंह की दावेदारी की वजह से नाम अभी घोषित नहीं किया गया है।

प्रियंका गांधी के पाशुपास्त्र से उपजी ऊष्मा~ पंकज शर्माउत्तर प्रदेश के चुनाव में प्रियंका ने स्त्री को अन्याय के खि़लाफ़ ...
15/01/2022

प्रियंका गांधी के पाशुपास्त्र से उपजी ऊष्मा

~ पंकज शर्मा

उत्तर प्रदेश के चुनाव में प्रियंका ने स्त्री को अन्याय के खि़लाफ़ संघर्ष के इतने सशक्त प्रतीक की तरह स्थापित कर दिया है कि जाति, बिरादरी, समुदायों और धर्म के भरोसे चुनावों की सामाजिक यंत्रकारी करने वाले राजनीतिक दल हकबका गए हैं। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में उन्नाव से ले कर लखनऊ तक उन महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया है, जिन्होंने अपनी सामर्थ्य में मदमस्त तबके के अत्याचारों का डट कर जवाब दिया। सो, जब मुट्ठी तान कर हुंकार होती है कि ‘लड़की हूं’ तो इस भावार्थ की बारिश आधी आबादी के आसमान से होने लगती है कि ऐरीग़ैरी नहीं हूं – लड़की हूं। और, जब सुर गूंजता है कि ‘लड़ सकती हूं’ तो शंखनाद होता है कि अब हाथों की चूंड़ियां खनखनाती ही नहीं हैं, समय आने पर घनघनाती भी हैं।

इसलिए राजनीति का नया व्याकरण रचने के लिए जो यज्ञ प्रियंका कर रही हैं, मैं तो उसकी अग्नि से उपजने वाली ऊष्मा का अभिनंदन करूंगा। चुनावी अंकगणित के क्षुद्र उठापटकीय उपक्रम तो होते रहे हैं और होते रहेंगे। मगर सियासत के ढर्रे में बुनियादी बदलाव लाने के काम कभी-कभी होते हैं और कोई-कोई ही उसे कर पाता है। आम स्त्रियों के मनोबल को कुएं की तलहटी से बाहर खींच कर लोकतंत्र के रजवाड़े का तोरण बना देना मामूली पहलक़दमी नहीं है। इस एक सार्थक कर्म का पुण्य ही प्रियंका के राजनीतिक जीवन को आने वाले दिनों में अर्थवान बनाए रखने के लिए काफी है।

दो दशक में उत्तर प्रदेश की विधानसभा के लिए सबसे ज़्यादा -583- महिला प्रत्याशी 2012 का चुनाव लड़ी थीं। 2007 के चुनाव में 370 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं। 2002 में उनकी संख्या 344 थी। पांच साल पहले 2017 में 482 महिला प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था। इस बार फरवरी-मार्च में हो रहे चुनाव में तक़रीबन 160 महिला उम्मीदवार तो कांग्रेस अकेले ही मैदान में उतार रही है। स्त्रियों के राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए इस प्रियंका-छलांग को हलके में लेने वाले जल्दी ही अपना माथा पीटेंगे। जो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के दो-चार सीटों पर सिमट जाने की आकाशवाणियां कर रहे थे, अब उनकी घिग्धी बंधी हुई है।

बार-बार यह आंकड़ा दे कर कांग्रेस को कमतर बताने की ख़ुराफ़ात में मशगूल संघ-कुनबा यह सोच कर ख़ुश है कि 2017 के चुनाव में सिर्फ़ सवा छह प्रतिशत वोट पा कर सात सीटें हासिल करने वाली पार्टी को इस बार कहीं भी ठौर नहीं मिलेगा। लेकिन वे बेचारे जानते ही नहीं हैं कि असलियत यह है कि जितनी सीटों पर कांग्रेस पांच साल पहले का चुनाव लड़ी थी, उन पर उसे औसतन 22 प्रतिशत वोट मिले थे। अपने ऐसे दुर्दिनों में भी कांग्रेस सवा 54 लाख मतदाताओं की पहली पसंद थी। उत्तर प्रदेश के पिछले चार विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस को साढ़े आठ से साढ़े ग्यारह फ़ीसदी के बीच वोट मिलने पर वह 22 से 28 के बीच सीटें जीत जाती है। क्या आपको लगता है कि भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ मौजूदा ज़लज़ले में कांग्रेस के वोट इस बार चार-छह प्रतिशत भी नहीं बढ़ेंगे?

मत भूलिए कि उत्तर प्रदेश के 15 करोड़ मतदाताओं में 7 करोड़ महिलाएं हैं। नए जुड़े 52 लाख मतदाताओं में पौने 29 लाख महिलाएं हैं। साढ़े 14 लाख युवा मतदाता इस चुनाव में पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। भाजपा से बेतरह नाराज़ मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को जो देख कर भी नहीं देखना चाहते हैं, उनका तो कोई कर क्या सकता है, लेकिन अगर 10 करोड़ लोग भी मतदान केंद्रों तक गए तो इस बार का चुनाव योगी के मठ और नरेंद्र भाई मोदी के हठ को पूरी तरह ले बैठेगा। बीस बरस के चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि कांग्रेस को मिलने वाले मतों की संख्या अगर 90 लाख तक भी पहुंच गई तो उसकी सीटों की तादाद 40 को छू जाएगी। मुझे लगता है कि मतदाताओं के मन में प्रियंका के लिए पैदा हुआ नया भरोसा इस बार सवा-डेढ़ करोड़ मतदाताओं के वोट तो कांग्रेस को दिलाएगा ही और ऐसा हुआ तो उसे मिलने वाली सीटें आपको आंखें मसलने पर मजबूर कर देंगी।

‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ की मारक क्षमता के देशव्यापी फलक पर भी ज़रा मेरे साथ एक नज़र डाल लीजिए। भारत की आबादी में 48 प्रतिषत महिलाएं हैं। पिछले डेढ़ दशक में स्त्रियों की आबादी थोड़ी बढ़नी शुरू हुई है, वरना उसके पहले के चार-पांच दशक के दौरान वह थोड़ी गिरती ही रही है। अभी 67 करोड़ महिलाएं हैं। उनमें 18 से 19 साल के बीच की लड़कियों की तादाद डेढ़ करोड़ है। 20 से 24 बरस के बीच पौने 6 करोड़, 25 से 29 साल के बीच साढ़े 5 करोड़, 30 से 34 साल के बीच सवा 5 करोड़, 35 से 39 साल के बीच 5 करोड़, 40 से 45 बरस के बीच साढ़े 4 करोड़, 45 से 49 साल के बीच 4 करोड़, 50 से 54 बरस के बीच साढ़े 3 करोड़ और 55 से 59 साल के बीच 3 करोड़ स्त्रियां देश में हैं। 60 बरस से ज़्यादा उम्र की महिलाओं के आंकडों को छोड़ भी दें तो 19 से 59 साल के बीच की इन सवा 38 करोड़ स्त्रियों पर प्रियंका के पड़ने वाले भावी असर का कुछ तो अंदाज़ आप लगा ही सकते हैं। आपको याद है न कि लोकसभा के पिछले चुनाव में जब भाजपा को 23 करोड़ लोगों ने वोट दिए थे तो कांग्रेस को भी 12 करोड़ लोगों के वोट मिले थे। 2019 के चुनाव में महिलाएं नरेंद्र भाई मोदी के ऐसी ख़िलाफ़ नहीं थीं, जैसी आज हैं। 2024 आते-आते तो वे रणचंडी बन जाएंगी। इसलिए प्रियंका के फेंके पाशुपतास्त्र को जो आज हंसी में उड़ाएंगे, वे कल आंसू बहाएंगे।

(लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।)

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