03/06/2026
प्रत्यक्षा के उपन्यास ‘शीशाघर’ का एक अंश
फिर रात को हमने एक-एक करके संगीत सुना, क़व्वाली, फिर रवि शंकर का सितार फिर जामफिर का पैन पाईप। रात को उस दिन आँगन में चारपाइयों पर लेटे इक़बाल कुरैशी संगीत के बीच-बीच कुछ बताने लगते। अपने किसी जिगरी दोस्त की बात। हरी जो उनके साथ फ़ोर्स में था। साथ-साथ कई जगह पोस्टिंग्स हुई। कैसे बाबरी मस्जिद वाली रात वो घर आया था। हरी और निभा। बहुत देर उन्होंने बात की थी। तब हम हिन्दू-मुसलमान नहीं थे। हम सिर्फ़ तीन सेंसिबल अडल्ट्स थे जो समाज के भीतर पनप आई हिंसा और बदले की भावना को एक तरफ़ रखकर ये समझने की कोशिश कर रहे थे कि क्या इस समय में ग़लत बातें डिस्सेमिनेट करना ज़्यादा आसान है, लोग कैसे तर्क से दूर जाकर हिप्नोटाइज हो जाते हैं। मुझे याद है निभा ने हिटलर के जर्मनी की बात की थी, आर्यन प्रोपैगैंडा की बात की थी और हम चुप हो गए थे।
दिक़्क़त सिर्फ़ इतनी है कि हम इतिहास को आज के लेंस से देखते हैं। हर समय की अपनी मजबूरियाँ होती हैं, अपने डायनामिक्स, अपनी बुनावट और राजनीतिक संरचना। वो बदलती रहती है। अब इस बदल जाने वाले मेट्रिक्स से पीछे के समय को देखना सिर्फ़ साज़िशन बात हो सकती है। अब आज के समय के जिन मुद्दों को हम वाजिब क़रार देते हैं, वही अगले पचास सालों में हमारी आने वाली नस्ल हमें बन्दूक़ की नोक पर पूछेगी, ये क्यों किया कैसे किया?हम इनसानों की फ़ितरत ही यही है। हर अच्छे के साथ कई गुना ज़्यादा बुरा भी साथ-साथ चलता है। ज़रूरत है अच्छे को बचाए रखने की।
अमृत गौहर जान का क़िस्सा सुनाने लगते हैं—
गौहर जान पैदा हुईं थीं 1873 में और मज़े की बात कि आर्मेनियाई मूल के परिवार में आज़मगढ़ में। अब सोचो ये आर्मेनियाई परिवार कैसे पहुँचा होगा आज़मगढ़? उनके पिता बर्फ़ के कारख़ाने में काम करते थे, रॉबर्ट एओवर्ड और उन्होंने ब्याह किया एक एंग्लो से। बाद में ये ब्याह टूटा और गौहर जिसका शुरू में नाम, एलीन एंजेलीना था, उनकी माँ ने दूसरा ब्याह मुसलमान से किया और बाद में मलका जान के नाम से मशहूर हुईं और इस तरह एलीन भी गौहर जान बनीं। वह भारत में 78 आरपीएम रिकॉर्ड पर संगीत रिकॉर्ड करने वाली पहली कलाकारों में से एक थीं, उन्हें 'ग्रामोफ़ोन गर्ल' और 'भारत की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार' के रूप में जाना जाने लगा। तो देखो कैसी-कैसी कहानियाँ हैं, कैसे घालमेल हैं। एक तरह से उस समय इन मामलों में हम कहीं ज़्यादा आगे नहीं थे? आज समाज ज़्यादा कंजर्वेटिव हो गया है। खाँचे ज़्यादा कठोर हो रहे हैं।
इक़बाल कुरैशी कहते हैं, और इसी तरह मेरा एक पुरखा, अल्लाह जन्नत नशीं करें उनको, या ये कहो स्वर्ग दे उनको क्योंकि वो तो हिन्दू थे। हमारी परदादी की परदादी या उससे भी पहले की बात, लगभग सन् अठारह सौ के आसपास की दुनिया में जो हैदर अली थे उनकी बेगम सुरबहार बानो के नाना सेठ साहब हिन्दू थे और नानी बिलकिस बानू गौहर जान की अम्माँ मलका जान की तरह तवायफ़।तो यही दुनिया है। ऐसी है इसीलिए इसमें इतने रंग हैं।