Bhakti Temple

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​🔱 "भक्ति टेम्पल" में आपका स्वागत है। यहाँ पाइए देवी-देवताओं की दिव्य कथाएँ, पौराणिक कहानियाँ और सनातन धर्म का सच्चा ज्ञान। प्रभु चरणों से जुड़ने और मन की शांति के लिए अभी Follow करें! 🙏✨

14/09/2026

“आस्था कहती है—जहाँ विश्वास सच्चा हो, वहाँ एक छोटी-सी ज्योति भी अंधकार को चुनौती दे सकती है।” 🙏🔥

24/08/2026

आखिर क्यों कन्हैया ने माई की खाली मटकी भर दी? जानिए इस प्रेम की अद्भुत कहानी…”

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21/08/2026

आखिर क्यों केवट ने प्रभु श्रीराम को नाव में बैठाने से पहले उनके चरण धोए?

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" केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से ...
19/08/2026

" केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "

एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए।* *आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।

पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ?* *उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।

बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।

उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। आपकी भक्ति को प्रणाम।

जय श्री महाकाल।

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प्राचीन समय में सुंद और उपसुंद नाम के दो असुर भाई थे। दोनों में इतना प्रेम था कि वे कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होते थे। उन...
18/08/2026

प्राचीन समय में सुंद और उपसुंद नाम के दो असुर भाई थे। दोनों में इतना प्रेम था कि वे कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होते थे। उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया कि उन्हें कोई देवता, दानव या मानव न मार सके।

वरदान मिलते ही दोनों असुर अत्याचारी बन गए। उन्होंने स्वर्गलोक तक पर आक्रमण कर दिया। देवता भयभीत होकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे और रक्षा की प्रार्थना करने लगे।

तब ब्रह्माजी ने एक अद्भुत योजना बनाई। उन्होंने विश्वकर्मा को आदेश दिया कि संसार की सबसे सुंदर स्त्री की रचना की जाए। विश्वकर्मा ने समस्त सृष्टि के श्रेष्ठ गुणों और सौंदर्य के अंश लेकर एक दिव्य अप्सरा बनाई। उसका नाम रखा गया — तिलोत्तमा।

तिलोत्तमा इतनी अद्भुत सुंदर थी कि देवता भी उसे देखकर मोहित हो गए। कहा जाता है कि जब वह भगवान शिव के सामने से गुज़री, तो उन्हें उसे देखने के लिए चारों दिशाओं में मुख प्रकट करने पड़े।

ब्रह्माजी ने तिलोत्तमा को सुंद और उपसुंद के पास भेजा। जैसे ही दोनों असुरों ने उसे देखा, वे उसके प्रेम में पड़ गए। दोनों उसे अपनी पत्नी बनाना चाहते थे।

धीरे-धीरे विवाद बढ़ा और वही भाई, जो कभी अलग नहीं होते थे, तिलोत्तमा के कारण एक-दूसरे के शत्रु बन गए। क्रोध में आकर दोनों ने युद्ध किया और अंततः एक-दूसरे का वध कर दिया।

इस प्रकार तिलोत्तमा की रचना केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि अधर्म और अहंकार के विनाश के लिए हुई थी।

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यह कथा है माता हिंगलाज शक्तिपीठ की...कहते हैं, जब त्रेता युग में लंकापति रावण का अंत हुआ और माता सीता को बंधन से मुक्ति ...
18/08/2026

यह कथा है माता हिंगलाज शक्तिपीठ की...

कहते हैं, जब त्रेता युग में लंकापति रावण का अंत हुआ और माता सीता को बंधन से मुक्ति मिली, तब पूरी पृथ्वी ने राहत की सांस ली। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और भगवान श्रीराम की विजय का गुणगान किया।

लेकिन उस विजय के पीछे एक ऐसा सत्य भी था जिसने स्वयं श्रीराम के हृदय को बेचैन कर दिया।

रावण केवल एक अत्याचारी राजा ही नहीं था। वह महर्षि विश्रवा का पुत्र था, वेदों का ज्ञाता था और ब्राह्मण कुल में जन्मा था। इसी कारण रावण के वध के बाद श्रीराम पर ब्रह्महत्या दोष लग गया।

अयोध्या लौटने के बाद भी प्रभु के मन को शांति नहीं मिली। तब गुरु वशिष्ठ ने उनसे कहा, "हे रघुनंदन, इस दोष से मुक्ति पाने के लिए तुम्हें आदि शक्ति की शरण में जाना होगा।"

गुरु की आज्ञा सुनकर श्रीराम ने बिना विलंब यात्रा प्रारंभ कर दी। उनके साथ माता सीता और भ्राता लक्ष्मण भी थे। यह यात्रा आसान नहीं थी।

उन दिनों जिस स्थान को आज बलूचिस्तान कहा जाता है, वहां पहुंचना अत्यंत कठिन माना जाता था। ऊंचे-ऊंचे पथरीले पर्वत...तपती हुई रेत...निर्जन घाटियां...और चारों ओर फैला हुआ भयावह सन्नाटा...

लेकिन प्रभु राम बिना रुके आगे बढ़ते रहे। कहते हैं कि यात्रा के दौरान एक स्थान पर उन्होंने विश्राम किया था। वह स्थान आज भी "राम झरोखा" के नाम से प्रसिद्ध है। वहीं एक पवित्र कुंड भी है, जिसे लोग माता सीता के स्नान स्थल के रूप में याद करते हैं।

यात्रा आगे बढ़ी। रास्ते में उन्हें एक अद्भुत स्थान मिला। वह था चंद्रकूप। एक ऐसा ज्वालामुखी, जिसके भीतर से उबलता हुआ कीचड़ निकलता रहता था।

मान्यता है कि माता के दर्शन से पहले प्रत्येक यात्री को वहां अपने जीवन के पापों और भूलों को स्वीकार करना पड़ता था। प्रभु राम भी उस ज्वालामुखी के सामने खड़े हुए। उन्होंने प्रकृति को साक्षी मानकर स्वीकार किया कि रावण का वध धर्म की रक्षा के लिए था, लेकिन उसके कारण उन पर ब्रह्महत्या दोष भी लगा है।

इसके बाद वे माता हिंगलाज की पवित्र गुफा में पहुंचे। गुफा के भीतर दिव्य शांति थी। वातावरण में ऐसी शक्ति थी जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव था। प्रभु राम ने वहां बैठकर कठोर तपस्या आरंभ की।

दिन बीत गए...रातें बीत गईं...लेकिन उनकी साधना नहीं टूटी। अंततः उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं आदिशक्ति प्रकट हुईं। पूरा गुफा क्षेत्र दिव्य प्रकाश से भर गया। माता ने ज्योति स्वरूप में दर्शन दिए।

उन्होंने कहा, "हे राम, तुमने धर्म की स्थापना के लिए अधर्म का नाश किया है। तुम्हारा दोष आज समाप्त होता है।"

माता के इन वचनों के साथ ही ब्रह्महत्या का पाप नष्ट हो गया।

प्रभु राम ने कृतज्ञ होकर माता को प्रणाम किया और यह स्थान युगों-युगों तक पवित्र तीर्थ बन गया।

लेकिन यह कथा यहीं समाप्त नहीं होती। असल कहानी तो इसके बाद शुरू होती है।

समय बीतता गया। युग बदलते गए। राज्य बदलते गए। लेकिन माता हिंगलाज का यह धाम अपनी दिव्यता के साथ वहीं बना रहा।

कहा जाता है कि भगवान लक्ष्मण के सूर्यवंशी वंशजों ने इस क्षेत्र की रक्षा का दायित्व संभाला, बाद के काल में गुर्जर प्रतिहार जैसे शक्तिशाली राजवंशों ने इस क्षेत्र में अपनी शक्ति स्थापित की।उनके वीर योद्धा माता के धाम को सुरक्षित रखने के लिए सदैव तैयार रहते थे। उन्होंने आक्रमणकारियों का सामना किया। उन्होंने मंदिरों और तीर्थों की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया।

सदियों तक यह संघर्ष चलता रहा। फिर इतिहास का एक कठिन दौर आया। बाहरी आक्रमण बढ़ने लगे। मंदिरों को तोड़ने के प्रयास हुए। स्थानीय लोगों पर भारी अत्याचार किए गए। कई परिवारों को अपनी परंपराएं छुपाकर जीवित रहना पड़ा। कई लोगों को परिस्थितियों के कारण अपना बाहरी स्वरूप बदलना पड़ा।

लेकिन उनके हृदय में माता के प्रति श्रद्धा समाप्त नहीं हुई। आज भी बलूचिस्तान के अनेक स्थानीय लोग इस पवित्र स्थल को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। वे इसे "नानी माता" या "नानी पीर" के नाम से पुकारते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि सदियों के बदलाव के बाद भी वहां श्रद्धा की परंपरा जीवित है।

लोग आज भी दूर-दूर से आते हैं। मन्नतें मांगते हैं।प्रार्थना करते हैं। और उस दिव्य शक्ति के सामने सिर झुकाते हैं जिसने कभी स्वयं भगवान श्रीराम को भी अपने चरणों में स्थान दिया था। आज भी हिंगलाज शक्तिपीठ केवल एक मंदिर नहीं है। वह आस्था का प्रतीक है। वह त्याग का प्रतीक है।

वह उन अनगिनत लोगों की श्रद्धा का प्रमाण है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी भक्ति को जीवित रखा।

कहते हैं, जो भक्त सच्चे मन से माता हिंगलाज का स्मरण करता है, माता उसकी पुकार अवश्य सुनती हैं। और शायद यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी बलूचिस्तान के वीरान पहाड़ों के बीच स्थित यह पवित्र धाम आज भी श्रद्धा का दीपक बनकर जल रहा है।

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17/08/2026

“आखिर क्यों छप्पन भोग छोड़कर कृष्ण ने खाए राधा के सादे चावल?”
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कांची के राजा ने पुरी के गजपति महाराज का अपमान किया। कारण यह था कि रथयात्रा के दौरान गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण झाड़ू (छे...
16/08/2026

कांची के राजा ने पुरी के गजपति महाराज का अपमान किया। कारण यह था कि रथयात्रा के दौरान गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण झाड़ू (छेरा पहंरा) से भगवान जगन्नाथ के रथ की सेवा करते थे। कांची के राजा ने इस सेवा का वास्तविक अर्थ समझे बिना उनका उपहास किया और अपनी पुत्री का विवाह गजपति महाराज से करने से इंकार कर दिया।

अपमानित होकर गजपति महाराज ने कांची पर चढ़ाई की, लेकिन पहली बार उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। तब उन्होंने पूरी श्रद्धा से महाप्रभु श्रीजगन्नाथ और भगवान बलभद्र की शरण ली।

कहा जाता है कि दूसरी बार युद्ध के लिए जब गजपति महाराज निकले, तब स्वयं भगवान बलभद्र काले घोड़े पर और महाप्रभु श्रीजगन्नाथ सफेद घोड़े पर दिव्य योद्धा बनकर सेना का नेतृत्व करने लगे। मार्ग में उन्होंने ग्वालिन माणिका से दही पिया और बदले में अपनी अंगूठी दे दी। बाद में वही अंगूठी गजपति महाराज को मिली, जिससे उन्हें विश्वास हो गया कि स्वयं महाप्रभु उनके साथ युद्ध कर रहे हैं।

भगवान की कृपा से कांची पर विजय प्राप्त हुई। कांची की राजकुमारी पद्मावती का विवाह गजपति महाराज से हुआ और साक्षी गोपाल तथा कांची गणेश को सम्मानपूर्वक पुरी लाया गया।

इसी दिव्य विजय की स्मृति में आज भी श्रीजगन्नाथ मंदिर में कांची अभियान की परंपरा श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है। जय श्रीजगन्नाथ!

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एक बार नारद जी ने देखा कि एक साधारण सा भक्त जंगल में बैठा निरंतर कृष्ण का नाम जप रहा था। उसके पास न रहने को घर था, न खान...
16/08/2026

एक बार नारद जी ने देखा कि एक साधारण सा भक्त जंगल में बैठा निरंतर कृष्ण का नाम जप रहा था। उसके पास न रहने को घर था, न खाने को भोजन, पर उसके चेहरे पर गजब का संतोष था।

नारद जी ने कृष्ण से पूछा— "प्रभु, यह आपका इतना अनन्य भक्त है, फिर भी आप इसे इतनी गरीबी और कष्ट में क्यों रखे हुए हैं?"

श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा— "नारद, मैं इसे कष्ट में नहीं, बल्कि 'सुरक्षा' में रखे हुए हूँ। चलो, आज तुम्हें इसका कारण दिखाते हैं।"

भगवान ने उस भक्त के सामने प्रकट होकर कहा— "पुत्र, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। मांगो, क्या चाहिए? धन, राज-पाठ या स्वर्ग का सुख?"

भक्त ने आँखें खोलीं और शांत भाव से बोला— "प्रभु, यदि आप प्रसन्न हैं, तो बस इतना कीजिए कि मेरी इस फटी हुई चादर को सिलने के लिए मुझे एक सुई दे दीजिए।"

नारद जी हैरान रह गए! उसने साक्षात् भगवान से केवल एक 'सुई' मांगी?

जब भगवान अंतर्ध्यान हो गए, तो नारद जी ने उस भक्त से पूछा— "मूर्ख! तूने राज-पाठ क्यों नहीं मांगा?"

भक्त हंसा और बोला— "देवर्षि, अगर मैं राज-पाठ मांगता, तो मेरा ध्यान उस राज्य को संभालने में लग जाता और मैं अपने कृष्ण को भूल जाता। अभी मेरे पास कुछ नहीं है, इसलिए मेरा पूरा समय और मन केवल उन्हीं में लगा रहता है। उन्होंने सुई इसलिए दी ताकि मैं अपनी चादर सिलूँ और फिर से उनके भजन में लग जाऊँ।"

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हरिदास कोई बड़ा पंडित नहीं था। ना ही उसके पास धन था। लेकिन उसके पास एक चीज थी अटूट भक्ति। हरिदास का जीवन बस एक ही काम के...
16/08/2026

हरिदास कोई बड़ा पंडित नहीं था। ना ही उसके पास धन था। लेकिन उसके पास एक चीज थी अटूट भक्ति। हरिदास का जीवन बस एक ही काम के लिए था भगवान जगन्नाथ की सेवा। वो पूरा दिन भगवान जगन्नाथ की मूर्ति पूजा, सेवा और जगन्नाथ की मूर्ति को अपना हृदय मानता था।

चाहे कड़कड़ाती ठंड हो या झुलसाती गर्मी या मूसलाधार बारिश, कोई भी समय हो हरिदास भगवान की सेवा करता और रोज सुबह नहा धोकर भगवान जगन्नाथ को नए वस्त्र धारण कराता और पूजा विधि करता।

सर्दियों में वह भगवान के लिए ठंडे जल से स्नान कराता और स्वच्छ वस्त्र से साफ करता और गर्म वस्त्र धारण कराता और कहता, "प्रभु आपको ठंड ना लगे।"

गर्मियों में वह पंखा झलता रहता घंटों तक। पसीना उसके शरीर से बहता लेकिन उसका ध्यान सिर्फ एक था। प्रभु को गर्मी ना लगे।

बारिश में वो मंदिर में पानी ना घुसे इसका ध्यान रखता और हर बार यही कहता, "प्रभु आपकी सेवा ही मेरा जीवन है।"

मंदिर में कुछ लोग उसका मजाक उड़ाते और उसे बातें सुनाते। बोलते कि भगवान को क्या गर्मी सर्दी लगती है। यह सब दिखावे के लिए करता है और ढोंग करता है।

हरिदास कहता, "वो मेरा भगवान जानता है। मेरे लिए तो जगन्नाथ ही मेरा जीवन है।"

समय बीता। गर्मी का मौसम आया। इतनी भयंकर गर्मी थी कि लोग मंदिर आना भी कम कर चुके थे। लेकिन हरिदास वो रोज आता। वो घंटों तक पंखा फेरता। उसके हाथ कांपने लगते लेकिन वो रुकता नहीं। उसकी आंखों में सिर्फ प्रेम था कि मेरे प्रभु जगन्नाथ कैसे भी मुझसे प्रसन्न हों और मुझे और भी भक्ति प्रदान करें।

एक दिन वैकुंठ में लक्ष्मी जी नारायण के पैर दबा रही थी। तभी माता लक्ष्मी जी ने कहा, "प्रभु यह भक्त आपकी बहुत सेवा करता है। बेचारा गर्मी में रात दिन पंखा झलता है। वो खुद गर्मी में पसीने से भीग जाता है पर आपकी सेवा करके वो आपको खुश रखता है। तो कृपा करके उसे प्रसन्न होकर आशीर्वाद दें।"

नारायण बोले, "वह मेरा भक्त है। परीक्षा तो करनी ही पड़ेगी।"

एक दिन जब हरिदास भगवान को पंखा फेर रहा था तब कुछ अजीब हुआ। भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अचानक नीचे गिरने लगी और भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में पसीना आने लगा।

हरिदास जगन्नाथ की मूर्ति को सीधा करके फिर पंखा फेरने लगा पर जगन्नाथ जी का पसीना रुक ही नहीं रहा था।

हरिदास जोर-जोर से पंखा फेरने लगा पर कोई असर नहीं हुआ। फिर हरिदास के हाथ थक गए पर पसीना बंद नहीं हो रहा था।

नारायण भी वैकुंठ में मुस्कुरा रहे थे।

हरिदास रोने लगा कि "प्रभु मुझसे कोई अपराध हो गया तो माफ कर देना। मुझसे कुछ भूल हो गई तो माफ कर देना।"

माता लक्ष्मी जी ने कहा, "आपकी इतनी सेवा करता है फिर भी आप ऐसी लीला करते हो। बंद कर दो यह सब।"

माता लक्ष्मी का क्रोध देखकर भगवान के रूप में पसीना बंद हो गया।

परंतु भगवान नारायण ने सोच ही लिया था कि मैं यह लीला जरूर पूरी करूंगा।

गर्मी के समय में फिर एक दिन जगन्नाथ की मूर्ति नीचे गिर गई। तभी हरिदास वहां था। प्रभु को पंखा झल रहा था।

जगन्नाथ की मूर्ति अचानक गिरने से हरिदास जोर से पंखा झलने लगा और पानी लाकर जगन्नाथ की आंखों में डाला। तभी जगन्नाथ का पसीना और बढ़ गया।

हरिदास बोला, "जगन्नाथ जी इतनी गर्मी में नहीं रह पा रहे हैं। मुझे कुछ करना पड़ेगा।"

ऐसा सोचकर भगवान की मूर्ति पर पानी छिड़कने लगा और उसकी आंखों में से आंसू आ रहे थे। वो आंसू भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के ऊपर पड़े और जगन्नाथ जी प्रसन्न हुए।

मूर्ति में से अद्भुत तेज निकला। हरिदास उस तेज में कुछ देख नहीं पाया। और प्रभु कृपा से उस तेज में भगवान जगन्नाथ का अद्भुत रूप दिखाई दिया।

भगवान बोले, "तुमने मेरी इस कड़ी गर्मी में रात दिन बिना थके सेवा की है।"

भगवान जगन्नाथ ने उसे कृतार्थ किया और उसके हाथ में पंखा लेकर जगन्नाथ जी खुद हरिदास को पंखा झलने लगे।

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