23/02/2026
माता शाकम्भरी देवी अवतरण दिवस विशेष
3 जनवरी को है माता श्री शाकम्भरी देवी जयंती पर्व
3 जनवरी को शाकंभरी अवतरण दिवस और 25 दिसम्बर से शाकंभरी नवरात्र शुरू
भारत के धार्मिक इतिहास में देवी-देवताओं की कथाएं सदियों से आस्था और श्रद्धा का आधार रही हैं। उनमें से माँ शाकंभरी देवी का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण है वे अपराजिता शताक्षी दुर्गा कही जाती हैं और उन्हें पोषण और वनस्पति की देवी कहा जाता है। यह जो चारों तरफ प्राकृतिक सुंदरता बिखरी पड़ी हैं उनका ही प्रभाव है ऐसा माना जाता है कि प्राचीन समय में जब पृथ्वी भयंकर शतवार्षिकी अकाल और सूखे से जूझ रही थी, तब माँ महामाई शाकंभरी प्रकट हुईं और शताक्षी रूप में अपने आंसुओं से वमाता शाकम्भरी देवी अवतरण दिवस विशेष
3 जनवरी को है माता श्री शाकम्भरी देवी जयंती पर्व
3 जनवरी को शाकंभरी अवतरण दिवस और 25 दिसम्बर से शाकंभरी नवरात्र शुरू
भारत के धार्मिक इतिहास में देवी-देवताओं की कथाएं सदियों से आस्था और श्रद्धा का आधार रही हैं। उनमें से माँ शाकंभरी देवी का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण है वे अपराजिता शताक्षी दुर्गा कही जाती हैं और उन्हें पोषण और वनस्पति की देवी कहा जाता है। यह जो चारों तरफ प्राकृतिक सुंदरता बिखरी पड़ी हैं उनका ही प्रभाव है ऐसा माना जाता है कि प्राचीन समय में जब पृथ्वी भयंकर शतवार्षिकी अकाल और सूखे से जूझ रही थी, तब माँ महामाई शाकंभरी प्रकट हुईं और शताक्षी रूप में अपने आंसुओं से वर्षा करके धरती को हरा-भरा किया। उनके द्वारा प्रदान किया गया भोजन और सब्जियां लोगों के लिए जीवनदाई बन गईं। इसी कारण वे जगदम्बा ‘शताक्षी’ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं.
प्राचीनकाल में दुर्गम नामक राक्षस ने भगवान ब्रह्मा से चारों वेद प्राप्त कर उन्हें छिपा दिया था। इसके कारण धरती पर धर्म-कर्म समाप्त हो गया और भयंकर अकाल पड़ गया। वनस्पति समाप्त होने लगी और जीवन संकट में आ गया। धरती असंतुलित हो गई।देवताओं और ऋषि-मुनियों ने इस संकट से निपटने के लिए हिमालय की शिवालिक घाटी में माता भगवती की तपस्या की। उनकी गहन साधना से प्रसन्न होकर आदिशक्ति माँ पराम्बा आयोनिजा स्वयंप्रकट रूप में प्रकट हुई और शताक्षी बन वृष्टि की। तत्पश्चात वे दिव्य शाकंभरी रूप में प्रकट हुईं और शाक से सृष्टि का भरण पोषण किया। शाकम्भरी स्वरूप में ही उन्होंने दुर्गम राक्षस का वध किया और दुर्गा कहलाई। उनके आंसुओं से बाण गंगा फूटी, जिससे वर्षा हुई और पृथ्वी पर जीवन लौट आया।2026 में शाकंभरी जयंती शनिवार, 3 जनवरी को मनाई जाएगी। यह दिन पूर्णिमा तिथि पर पड़ता है, जो 2 जनवरी 2026 को शाम 6:53 बजे से शुरू होकर 3 जनवरी 2026 को दोपहर 3:32 बजे समाप्त होगी।माता शाकम्भरी देवी अवतरण दिवस विशेष
3 जनवरी को है माता श्री शाकम्भरी देवी जयंती पर्व
3 जनवरी को शाकंभरी अवतरण दिवस और 25 दिसम्बर से शाकंभरी नवरात्र शुरू
भारत के धार्मिक इतिहास में देवी-देवताओं की कथाएं सदियों से आस्था और श्रद्धा का आधार रही हैं। उनमें से माँ शाकंभरी देवी का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण है वे अपराजिता शताक्षी दुर्गा कही जाती हैं और उन्हें पोषण और वनस्पति की देवी कहा जाता है। यह जो चारों तरफ प्राकृतिक सुंदरता बिखरी पड़ी हैं उनका ही प्रभाव है ऐसा माना जाता है कि प्राचीन समय में जब पृथ्वी भयंकर शतवार्षिकी अकाल और सूखे से जूझ रही थी, तब माँ महामाई शाकंभरी प्रकट हुईं और शताक्षी रूप में अपने आंसुओं से वर्षा करके धरती को हरा-भरा किया। उनके द्वारा प्रदान किया गया भोजन और सब्जियां लोगों के लिए जीवनदाई बन गईं। इसी कारण वे जगदम्बा ‘शताक्षी’ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं.
प्राचीनकाल में दुर्गम नामक राक्षस ने भगवान ब्रह्मा से चारों वेद प्राप्त कर उन्हें छिपा दिया था। इसके कारण धरती पर धर्म-कर्म समाप्त हो गया और भयंकर अकाल पड़ गया। वनस्पति समाप्त होने लगी और जीवन संकट में आ गया। धरती असंतुलित हो गई।देवताओं और ऋषि-मुनियों ने इस संकट से निपटने के लिए हिमालय की शिवालिक घाटी में माता भगवती की तपस्या की। उनकी गहन साधना से प्रसन्न होकर आदिशक्ति माँ पराम्बा आयोनिजा स्वयंप्रकट रूप में प्रकट हुई और शताक्षी बन वृष्टि की। तत्पश्चात वे दिव्य शाकंभरी रूप में प्रकट हुईं और शाक से सृष्टि का भरण पोषण किया। शाकम्भरी स्वरूप में ही उन्होंने दुर्गम राक्षस का वध किया और दुर्गा कहलाई। उनके आंसुओं से बाण गंगा फूटी, जिससे वर्षा हुई और पृथ्वी पर जीवन लौट आया।2026 में शाकंभरी जयंती शनिवार, 3 जनवरी को मनाई जाएगी। यह दिन पूर्णिमा तिथि पर पड़ता है, जो 2 जनवरी 2026 को शाम 6:53 बजे से शुरू होकर 3 जनवरी 2026 को दोपहर 3:32 बजे समाप्त होगी।माता शाकम्भरी देवी अवतरण दिवस विशेष
3 जनवरी को है माता श्री शाकम्भरी देवी जयंती पर्व
3 जनवरी को शाकंभरी अवतरण दिवस और 25 दिसम्बर से शाकंभरी नवरात्र शुरू
भारत के धार्मिक इतिहास में देवी-देवताओं की कथाएं सदियों से आस्था और श्रद्धा का आधार रही हैं। उनमें से माँ शाकंभरी देवी का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण है वे अपराजिता शताक्षी दुर्गा कही जाती हैं और उन्हें पोषण और वनस्पति की देवी कहा जाता है। यह जो चारों तरफ प्राकृतिक सुंदरता बिखरी पड़ी हैं उनका ही प्रभाव है ऐसा माना जाता है कि प्राचीन समय में जब पृथ्वी भयंकर शतवार्षिकी अकाल और सूखे से जूझ रही थी, तब माँ महामाई शाकंभरी प्रकट हुईं और शताक्षी रूप में अपने आंसुओं से वर्षा करके धरती को हरा-भरा किया। उनके द्वारा प्रदान किया गया भोजन और सब्जियां लोगों के लिए जीवनदाई बन गईं। इसी कारण वे जगदम्बा ‘शताक्षी’ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं.
प्राचीनकाल में दुर्गम नामक राक्षस ने भगवान ब्रह्मा से चारों वेद प्राप्त कर उन्हें छिपा दिया था। इसके कारण धरती पर धर्म-कर्म समाप्त हो गया और भयंकर अकाल पड़ गया। वनस्पति समाप्त होने लगी और जीवन संकट में आ गया। धरती असंतुलित हो गई।देवताओं और ऋषि-मुनियों ने इस संकट से निपटने के लिए हिमालय की शिवालिक घाटी में माता भगवती की तपस्या की। उनकी गहन साधना से प्रसन्न होकर आदिशक्ति माँ पराम्बा आयोनिजा स्वयंप्रकट रूप में प्रकट हुई और शताक्षी बन वृष्टि की। तत्पश्चात वे दिव्य शाकंभरी रूप में प्रकट हुईं और शाक से सृष्टि का भरण पोषण किया। शाकम्भरी स्वरूप में ही उन्होंने दुर्गम राक्षस का वध किया और दुर्गा कहलाई। उनके आंसुओं से बाण गंगा फूटी, जिससे वर्षा हुई और पृथ्वी पर जीवन लौट आया।2026 में शाकंभरी जयंती शनिवार, 3 जनवरी को मनाई जाएगी। यह दिन पूर्णिमा तिथि पर पड़ता है, जो 2 जनवरी 2026 को शाम 6:53 बजे से शुरू होकर 3 जनवरी 2026 को दोपहर 3:32 बजे समाप्त होगी।