08/07/2020
जिला काँगड़ा,हिमाचल प्रदेश के पौंग बाँध विस्थापित पाँच दशकों से हो रहे अन्याय,शोषण व अमानवीय व्यवहार के कारण तत्काल भारत के राष्ट्रपति/यशस्वी प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी/गृहमंत्री अमित शाह से लगा रहे है इन्साफ की गुहार
काँगड़ा,हिमाचल प्रदेश के पौंग बाँध विस्थापितों के साथ पाँच दशकों से हो रहे अन्याय,शोषण व अमानवीय व्यवहार की व्यथा को तत्काल भारत के राष्ट्रपति/यशस्वी प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी/गृहमंत्री अमित शाह जी के ध्यानार्थ लाएँ।जिससे जिला काँगड़ा,हिमाचल प्रदेश के प्रत्येक पौंग बाँध विस्थापित को केंद्रीय कैबिनेट के द्वारा श्रीगंगानगर (राजस्थान) जिले की जमीन का मूल्य व पचास बर्षों के आर्थिक,मानसिक व सामाजिक शोषण का हर्जाना जोकि लगभग सात करोड़ रुपये बनता है,एकमुश्त देते हुए मॉनिटरी कम्पेनसेशन प्रदान किया जा सके।मॉनिटरी कम्पेनसेशन की इस राशि की कटौती केंद्र सरकार द्वारा राजस्थान सरकार को प्रदत्त बार्षिक बजट में से की जा सकती है क्योंकि धारा 6A राजस्थान की सरकारों द्वारा बनाया गया बिल्कुल अवैध कानून है जो कि पौंग बाँध विस्थापितों को प्रताड़ित व शोषित करने के बनाया गया है,लगभग पचास बर्षों में हमारे सैंकड़ों विस्थापितों को राजस्थान में शरेआम मार दिया गया।अधिकांश विस्थापित राजस्थान सरकार की नकारात्मक नीतियों के कारण वहाँ बसने के इच्छुक भी नहीं हैं।यह धारा केंद्र सरकार,तत्कालीन पंजाब,हरियाणा की सरकारोँ के मध्य हुए एमओयू की शरेआम अवहेलना करती है।सुप्रीम कोर्ट के सन 1996 के ऐतिहासिक फैसले में राजस्थानियों के इन सभी अवैध कब्जों का बिजली व पानी का कनैक्शन बंद करने के आदेश हैं,लेकिन पौंग बाँध विस्थापितों के हितों व अधिकारों की रक्षा करने में हिमाचल प्रदेश की सभी सरकारें विफल रही हैं,न तो सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले को राजस्थान की सरकारों से अक्षरशः लागू करवा पाया, न ही हिमाचल प्रदेश की सरकारें उचित दवाब बना पाईं।हालांकि कई बार हिमाचल प्रदेश की सरकारों ने समय समय पर इस अवैध धारा को को खत्म करने व इन जमीनों को पौंग बाँध विस्थापितों को एलॉट करने की मांग हाई पॉवर कमेटी के समक्ष रखी है, लेकिन आज दिन तक कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आए हैं।पौंग विस्थापितों के लिए आरक्षित श्रीगंगानगर जिले के 2.20 लाख एकड़ भूखंड की जमीनों को जानबूझकर विवादित बनाने का खेल राजस्थान की सरकारों ने रचा है।राजस्थान की सरकारें अपने लोगों की अवैध मांगों को मानते हुए 6A की रचना करती हैं जबकि हिमाचल प्रदेश की सरकारें अपने विस्थापितों की वैध मांगों को भी उचित ढंग से रखने में विफल साबित हुई हैं।राजस्थान की सरकार हमें जैसलमेर जिले में जानबूझकर 55 डिग्री के ज्वलनशील टेम्परेचर में धकेल रही हैं लेकिन हमारी आवाज को सुनने वाला आज तक कोई नहीं है।
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50 साल,तीन पीढ़ियां लगातार धोखे का शिकार हो रही हैं ।सरकारें अपने ही समझौतों को नहीं मान रहीं । सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही ।
किसी को समृद्ध वनाने के लिए अपने को उजाड़ देना किसी भी सूरत में शहादत से कम नहीं है । नमक और मिट्टी के तेल के अतिरिक्त हर खाद्यान पैदा करने वाली अन्न का कटोरा काँगड़ा की हल्दून घाटी के हज़ारों परिवारों को राजस्थान को हरा भरा वनाने के लिए और पंजाब हरियाणा को रोशन करने के लिए उजाड़ दिया गया ।पंजाब हरियाणा रोशन हो गए राजस्थान मरू भूमि से स्वर्ण भूमि में परिवर्तित हो गया मगर हल्दून के बाशिंदों की शहादत को सम्मान तो नहीं मिला अलबत्ता हर कदम पर धोखा और अपमान जरूर मिला ।अपने ही घर में बिस्तर का कोना बदलने पर नीद नहीं आती परन्तु हज़ारों परिबारों के डेढ़ लाख से अधिक लोगों को यूँ ही बेघर कर अंधेरे में धक्का दे दिया गया ।इन्होंने अपने आशियाने जमींन जायदाद ही नहीं अपने देवी देवता अपना धार्मिक व सामाजिक भाईचारा अपनी जीवन शैली सब कुछ खोया है ।
पांच दशकों में चार राज्य और केंद्र सहित पांच सरकारें लागू नहीं कर पाईं अपने ही समझौते को
3 और 4 सितम्बर 1970 को नई दिल्ली में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में तत्कालीन सिचाई और ऊर्जा मंत्री एच एल राव की अध्यक्षता में समझौता हुआ ।जिसमे चार राज्यों के मुख्यमंत्री सम्मिलित रहेपंजाब के तत्कालीन और वर्तमान मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसी लाल और हिमाचल के मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार शामिल थे ।इसके अतिरिक्त इस समिति के सचिव के रूप ओ पी चड्ढा उप सचिव सि. व ऊर्जा मंत्रालय वी एस चारी सचिव सि. व ऊर्जा मंत्रालय पी आर आहूजा चेयरमैन तुंगभद्रा बोर्ड पंजाब के सि. और ऊर्जा मंत्री सोहन सिंह बस्सी राजस्थान के सिंचाई मंत्री आर पी लड्डा उपनिवेश मंत्री सोभा राम और हरियाणा के सि. और ऊर्जा मंत्री रामधारी गौड़ शामिल थे।इस हाई पावर समिति में मद संख्या दो में यह निर्णय हुआ कि 31 मार्च 1961 को या उससे पूर्व स्थायी रूप वसे प्रत्येक पौंग बांध विस्थापित को 15.625 एकड़ जमीन राजस्थान में आबंटित की जाएगी ।और इसके लिए राजस्थान में 2.25 लाख एकड़ भूमि उपलव्ध करवाई जाएगी।मद संख्या 13 में इस बात का स्पष्ट उलेख है कि विस्थापित हो रहे 20722 परिबारों को 15.625 एकड़ के हिसाब से 3.25 लाख एकड़ भूमि की आवश्यकता होगी परन्तु हिमाचल के मुख्यमंत्री ने 2.25 लाख एकड़ लेने को ही सहमति दे दी...हिमाचल के मुख्यमंत्री ने यह अंडरटेकिंग भी दी कि अगर कोई विस्थापित उपरोक्त भूमि में आवंटन होने से छूट जाता है तो हिमाचल सरकार उसे हिमाचल में इसी ढंग से भूमि आवंटित करेगी*
परन्तु हकीकत यह है कि केवल 162000 एकड़ भूमि ही आरक्षित की गई है । जिसमे से अधिकतर पर राजस्थानियों का कब्जा है। 63000 एकड़ कोआज लगभग पांच दशक बाद तक भी चिन्हित क्षेत्र में आरक्षित नहीं किया गया है....उपलव्ध जानकारी के अनुसार राजस्थान के रहनुमाओं ने 1920 में ही राजस्थान के बाशिंदों के लिए ही पौंग बांध की योजना बना ली थी ।जबकि 1960 में निर्माण शुरू होने के दस साल बाद 1970 तक निर्माण पूरा हो गया..परन्तु तब तक भी हिमाचल के विस्थापित हो रहे लोगों के लिए मुआबजे और बसाने का कोई निर्णय नहीं हुआ था।1970 में पौंग डैम विस्थापित समिति के झंडे तले 4000 से अधिक लोगों द्वारा दो सप्ताह तक बाँध पर धरने के बाद इस मसले पर बात शुरू हुई।
मगर यह बेहद अफसोस जनक स्थिति है कि केंद्र की अगुवाई में चार राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों मंत्रियों और अधिकारियों में लिखित समझौता हो और लगभग पांच दशकों में भी इस पर अमल न हो ।इन पांच दशकों में विस्थापितों की दो से तीन पीढ़ियां मर खप्प गईं । चौथी से पांचवी पीढ़ी इंसाफ के लिए संघर्षरत है । किए गए समझौते के अनुसार न राजस्थान सरकार जमीन दे रही है न हिमाचल सरकार अपनी अंडरटेकिंग पर अमल कर रही है ।आखिर लोगों का सरकारों पर भरोसे का क्या ?
उच्चतम न्यायलय का निर्णय भी नहीं हुआ लागू
विस्थापितों की सरकारी स्तर पर कोई सुनबाई न हुई ।उन्हें मुरब्बा मिला ही नहीं । मिला तो कैंसिल हो गया दुबारा नहीं मिला। अगर अलाट भी हो गया तो कब्ज़ा पहले ही किसी राजस्थानी के पास था वह कब्ज़ा छोड़ नहीं रहा । झूठे दस्तावेज वना कर खुर्द वुर्द कर दिया गया । इस तरह की तमाम परेशानियों से आजिज़ आकर उन्होंने मुकद्दमा दायर किया ।उच्चतम न्यायलय ने प्रदेश पौंग बांध विस्थापित समिति राजस्थान व अन्य वनाम केंद्र सरकार व अन्य के मुकद्दमे सी डव्लू पी 439/1992 में 26 जुलाई 1996 में 19 पृष्ठों के विस्तृत निर्णय में राजस्थान और केंद्र सरकार को विस्थापितों को सिंचित भूमि आवंटन के न केवल आदेश दिए अपितु राजस्थान सरकार को 25 हज़ार की कास्ट लगाते हुए उन्हें आवास सड़क पानी विजली हस्पताल और स्कूल सहित सुरक्षा उपलव्ध करबाने के लिए भी आदेश दिए । परन्तु यह न केवल हैरान ही नहीं परेशान करने वाली वात है कि उच्चतम न्यायलय के निर्णय का भी आज तक पालन नहीं हुआ है ।
मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह भी लगा चुके हैं यह आरोप
29 नवंबर 2014 को मुख्यमंत्री स्वयं यह आरोप दोहरा चुके हैं। उन्होंने कहा था कि 17 हाई पावर कमेटी मीटिंग होने के बाद भी विस्थापितों के मामले नहीं सुलझे हैं और राजस्थान सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी पालन नहीं कर रही है..
1975 में पानी भरने पर बनी 42 किलोमीटर लंबी और 2 किलोमीटर चौड़ी 75 हज़ार एकड़ पर बनी झील के बनने से 339 गाँव उजड़े । 20722 परिवार विस्थापित हुए । जिसमे 16352 परिवार ही राजस्थान में भूमि आवंटन के योग्य पाए गए । इनमें 4370 भूमिहीन पूर्णतः वर्वाद हो गए । इनको न कोई मुआवजा मिला न जमीन। हिमाचल भू अधिग्रहण के अनुसार उस समय दो फसली जमीन का मुआबजा 140 रु प्रति कनाल और बरानी का 40 से कम था ।जिसे बाद में ज़िलाधीश काँगड़ा ने 650 रु और बरानी का 250 रु किया ।इस समझौते का यह भी एक अमानवीय पहलू है कि इन सरकारों ने यह मान लिया की 31 मार्च 1961 से लेकर 1972 -73 तक जब भूमि आवंटित हुई और 1975 तक बाँध में पानी छोड़ा गया न कोई पैदा होगा न नए परिवार बनेंगे। योग्य परिबारों में से भी राजस्थान सरकार ने 2608 परिबारों के मुरब्बे अपनी ही ओर से धारा 6 ए बना कर रद्द कर दिए। सरकार के 2010 के अपुष्ट आंकड़ों के अनुसार 2635 विस्थापितों को अभी आवंटन होना शेष है । अन्य 1228 परिवार मिसिंग हैं ।ये वे परिवार माने जाते हैं जिनको कम जमीन होने के कारण इतना मुआबजा भी नहीं मिला कि राजस्थान जाने का किराया भी पूरा हो पाता । इस तरह सात हज़ार परिवार खानाबदोश होकर रह गए ।सही आंकड़े न राजस्थान सरकार के पास हैं न हिमाचल के पास ।माना जाता है कि लगभग 5000 लोगों ने अपने मुरब्बे बेच दिए हैं। परन्तु जानकारों का कहना है कि इनमें से अधिकतर मुरब्बे विके नहीं फर्ज़ी तरीके से हड़प लिए गए हैं । क्योंकि कई लोगों इतना कम मुआबजा मिला की सर छुपाने के लिए जमीन खरीद कर आशियाना बनाना असम्भव था तो मुरब्बों की पैरोकारी कौन करता ।रिकॉर्ड पर 1188 पर अवैध कब्जे हैं। जो रिकॉर्ड पर नहीं हैं वे इससे भी अधिक हैं । सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाबजूद राजस्थान इन्हें खाली नहीं करवा रही है । इस तरह सरकारी आंकड़ों पर ही विश्वास किया जाये तो 20722 में से 10841तो मुरब्बा पाने से वंचित कर दिए गए । अगर कथित तौर पर विके 5000 मुरब्बे भी कम कर दिए जाएं तो मात्र 4900 लोगों को ही मुरब्बे मिले
कब्जा काश्त आपकी मौके पर राजस्थानियों की
पौंग बांध विस्थापितों को मिले हज़ारों मिले मुरब्बों में से सैंकड़े ही उनके पास है । अधिकतर ठेके या देख रेख के लिए रखे गए और हथिया लिए गए। ठगी का हर तरीका अपनाया गया ।झूठे मालिक खड़ा करके बेच और खरीद लिए गए हैं।डरा धमका कर या मार पीट कई मामलों में कथित रूप से जान से भी मारकर मुरब्बे हड़प लिए गए है । इसके बाबजूद भी अगर विस्थापित के नाम मुरब्बा कागजों में चल रहा है और कब्ज़ा काश्त उनके नाम पर भी है तो अधिकतर पर उनका कब्ज़ा नहीं है ।राजस्थानी उसको घुसने नहीं देते ।
एक एक मुरब्बा करोड़ों का
वर्तमान में मुरब्बे की कीमत दो से चार करोड़ से पचास करोड़ तक भी हो सकती है । हाल ही के वर्षों में ग्वार 35 से 40 हज़ार प्रति क्विंटल विका । इस तरह एक फसल ही 35 से 50 लाख तक विकी।गेहूं चना सरसों से ही 5 से 10 लाख प्रति फसल तक आय हो सकती है
क्यों नहीं मिलता इंसाफ
राजस्थान में विस्थापितों को- इंसाफ न मिलने का कारण इतना सॉलिड है कि कोई व्यवस्था चाह कर भी इंसाफ नहीं दिलवा सकती....पानी के कारण सोना उगलने वाली जमीन के गोरख धंधे में सत्ता से विपक्ष के छोटे से बड़े दलों के राजनीतिज्ञ पुलिस प्रशासन के नौकरशाह कारिंदे शामिल हैं या उनके अपने शामिल हैं..कई मामलों में इन लोगों के पास एक या दो नहीं 125 तक मुरब्बे हैं।जो अन्य लोग शामिल है वे इतने समर्थवान और वोट बैंक के मालिक हैं कि किसी को खरीदने से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं *।विस्थापित पुलिस प्रशासन या न्ययालय भी जाए कोई मदद नहीं मिलती क्योंकि पूरी की पूरी व्यवस्था ही इस खेल में शामिल है ।श्रीगंगानगर ज़िले में विस्थापितों के लिए चिन्हित जमीन पर अधिकतर राजस्थानियों ने कब्जा कर रखा है।इसलिए अब समझौते के विपरीत विस्थापितों को मोहनगढ़ और रामगढ़ जैसे अतिदुर्गम ज़िलों में जमींन दी जा रही है।इसमें सबसे अधिक हैरान करने वाली वात यह है कि इसके लिए हिमाचल सरकार के अधिकारी ही विस्थापितों को गुमराह कर रहे हैं।*
इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यह जाल कितना मज़बूत और बड़ा है जो राजस्थान तो क्या हिमाचल के सरकारी तंत्र में भी इतना प्रभावी है।
पंचपक्षीय समझौते में एक पक्षीय ही अमल क्यों?
यह अत्यंत अचरज की बात है कि पांच सरकारों के मध्य हुए समझौते को सिर्फ हिमाचल ही निभा रहा है ।राजस्थान मुख्य रूप से हित और लाभ ले रहा है परंतु वह समझौते की शर्तों पर अमल करना तो दूर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी नहीं मान रहा.. यह राज्य गलत या सही हर तरह से अपने राज्य के लोगों के साथ दे रहा है...ऐसे में विस्थापित कई वार आवाज़ उठा चुके हैं कि हिमाचल सरकार को भी अपने लोगों के साथ खड़ी हो..हिमाचल सरकार को भी समझौते से पीछे हटते हुए राजस्थान का पानी बन्द कर देना चाहिए*
पगड़ी का खेल
जब भी हिमाचल में पौंग बांध विस्थापित हल्ला मचाते हैं। सरकार में हरकत होती है ।प्रतिनिधि मंडल वार्ता के लिए जाता है । उसके पहुंचने से पहले ही पगड़ी के खेल की तैयारी शुरू हो जाती है ।प्रतिनिधि मंडल को पगड़ी पहना कर सम्मानित किया जाता है ।पगड़ी पहनते ही यह अमला विस्थापितों के लिए न्याय मांगना भूल कर वापिस आ जाता है । इसको वहां मुरब्बों के खेल में शामिल लोग पहनाते हैं ।जानकारों के अनुसार यह पगड़ी अमले की हैसियत के अनुसार करोड़ों तक हो सकती है ।पगड़ी के खेल में विस्थापितों की ओर से खेलने गए ये खिलाडी अपनी गोल पोस्ट में गोल करके लौट आते है और विस्थापित हमेशा की तरह हार जाते हैं।