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06/09/2017

#यूरोप_की_विवशता_हमारी_मूर्खता_बन_गयी😑😔😕

अभी हाल ही में सरकार ने सभी कारों , दुपहिया वाहनों पर हेड लाइट को ऑन कर दिया है , यूरोपियन देशों में 9 माह मौसम साफ नहीं होता लेकिन हमारे देश में हमेशा साफ मौसम के बाद भी यह मूर्खता पूर्ण लाइट ऑन रखने का निर्णय थोपा गया ।

आठ महीने ठण्ड पड़ने के कारण कोट - पेंट पहनना उनकी विवशता है , और शादी बाले दिन भरी गर्मीं में कोट - पेंट डाल कर बरात लेकर जाना हमारी मुर्खता है ।

काले कपड़े ऊष्मा के अच्छे सुचालक होते हैं इसलिए यूरोपियन देशों में वकील काले कोट पहनते हैं यह उनकी विवशता है , लेकिन भारत में प्रचंड गर्मी में काला कोट पहनना हमारी मूर्खता है ।

ताजा भोजन उपलब्ध ना होने के कारण यूरोप सड़े हुए आटे से पिज्जा, बर्गर, नूडल्स आदि खाना युरोप की विवशता है, और हम लोग 56 भोग छोड 400/- की सढी रोटी (पिज्जा ) खाना हमारी मुर्खता है ।

ताज़ा भोजन की कमी के कारण फ्रीज़ का इस्तेमाल करना यूरोप की विवशता है , और रोज दो समय ताजी सब्जी बाजार में मिलनें पर भी हफ्ते भर की सब्जी मंडी से लेकर फ्रीज में ठूंस - ठूंसकर सड़ा - सड़ा कर उसे खाते हैं यह हमारी मुर्खता है !

जड़ी बूटियों का ज्ञान ना होने के कारण... जीव जंतुओं के हाड़ - मॉस से दवाये बनाना उनकी विवशता है , और आयुर्वेद जैसा महान चिकित्सा ग्रंथ होनें के बाउजूद उन हाड़ - मांस की दवाईयां उपयोग करना हमारी महांमुर्खता है ।

पर्याप्त अनाज ना होने के कारण जानवरों को खाना उनकी विवशता और 1600 किस्मों की फसलें होनें के बाबजुद जीभ के स्वाद के लिऐ किसी निरिह प्राणी को मारकर उसे खाना हमारी मुर्खता है ।

लस्सी, दूध, जूस आदि ना होने के कारण कोल्ड ड्रिंक को पीना उनकी विवशता है और 36 तरह के पेय पदार्थ होते हुऐ भी इस कोल्ड ड्रिंक नामक जहर को पीकर खुद को आधुनिक समझ कर इतराना हमारी महां मुर्खता है !

पेड़ -पौधे , वनस्पतियों की अपेक्षा रासायनिक प्रक्रिया द्वारा टूथ पेस्ट बनाना , ठंड से त्वचा के लिए क्रीम लगाना उनकी विवशता है लेकिन पर्याप्त वनस्पतियों के बाउजूद कृतिम साधनों को अपनाना हमारी मूर्खता है ।

घुटने ना मुड़ने के कारण कंबोर्ड सीट पर बैठना उनकी विवशता है , लेकिन जमीन पर बैठकर भोजन ना करना , उकड़ू बैठकर शौच ना करना हमारी मूर्खता है ।

मजदूरों की कमी के कारण मशीनों के द्वारा फैक्ट्री चलना उनकी विवशता है और मजदूरों की भरमार होते हुऐ भी मशीनें लगाना , देश में बेरोजगारी का स्तर बढाना हमारी मुर्खता है !

मुँह की असमर्थता के कारण संस्कृत ना बोल पाना और जोड़ तोड़ वाली अंग्रेजी से काम चलना उनकी विवशता लेकिन महान संस्कृति भाषा को छोड़ना हमारी मूर्खता है ।

गुड़, खांड ना बना पाने के कारण चीनी का इस्तेमाल करना उनकी विवशता है , लेकिन हम अपने जलवायु के विपरीत चीनी , रिफाइंड , खाकर रोगी हो रहे हैं यह हमारी मूर्खता है ।

असभ्य, लालची , संस्कार विहीन व स्वार्थी स्वभाव के कारण माँ बाप से अलग रहना उनके साथ दुर्व्यवहार करना।
क्या हम भारतियों को ये सब करने की जरुरत है ???

मेरा भारत महान था महान है किंतु महान तब रहेगा जब इस देश के वासी ऐसी मूर्खताओं को त्याग कर अपने देश की महानता को समझेंगे

Happy world press day...
03/05/2017

Happy world press day...

Sach agar inme se kisi ne i am...... ka istamaal kiya hota to aaj bhi ham.. gulam hote.... i ek aisa word h jisme ego h ...
28/05/2016

Sach agar inme se kisi ne i am...... ka istamaal kiya hota to aaj bhi ham.. gulam hote.... i ek aisa word h jisme ego h jo ekta ko tod k rakh deta h....so forget the word i and use the word we...

लाठी नहीं बंदूकों से डरकर भागे हैं भारत से अंग्रेज! आजाद हिन्द फ़ौज ने कराया था भारत को आजाद अंग्रेज एक बात अच्छी तरह से ...
24/05/2016

लाठी नहीं बंदूकों से डरकर भागे हैं भारत से अंग्रेज! आजाद हिन्द फ़ौज ने कराया था भारत को आजाद



अंग्रेज एक बात अच्छी तरह से जानते थे कि महात्मा गाँधी आजादी के लिए कोई भी हिंसक कदम नहीं उठाने वाले हैं.

वहीं गाँधी जी को तो अंग्रेजों से कोई समस्या भी नहीं हो रही थी. 1947 से पहले गांधी जी ने जो आन्दोलन किये थे, उनका कोई बड़ा असर अंग्रेजों पर हुआ भी नहीं था.

किन्तु फिर अचानक से ही गांधी जी आजादी के हीरो बन जाते हैं और अंग्रेज जाते-जाते शर्त रखते हैं कि एक तो विभाजन होगा और दूसरा कि सुभाष चंद्र बोस मिलते हैं तो उनको इंग्लैंड को सौपना होगा.

तब आखिर ऐसा क्या था कि सुभाषचंद्र बोस से अंग्रेज इतना जल रहे थे और अपना गुस्सा सरेआम जाहिर भी कर रहे थे.


असल में अंग्रेजों की नाक में सबसे ज्यादा दम भरने वाले व्यक्ति का यही नाम है. हकीकत यह है कि अगर सुभाषचंद्र बोस नहीं होते तो देश को आजादी नहीं मिल सकती थी.

आइये थोड़ा विस्तार से समझ लीजिये

सन 1933 से 1936 तक नेताजी यूरोप में रहे थे. तब अगर आप इतिहास पढ़ते हैं तो पायेंगे कि यूरोप में यह दौर हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद का चल रहा था. नाजीवाद और फासीवाद का निशाना इंग्लैंड था. जिसने पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर एक तरफा समझौते थोपे थे. वे उसका बदला इंग्लैंड से लेना चाहते थे. अब देखिये कि नेताजी मदद लेने दुश्मन के दुश्मन के पास गये थे. क्योकि दुश्मन का दुश्मन, हमारा दोस्त होता है. नेता जी मानते थे कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए भारत को सेना की आवश्यकता जरुर पड़ेगी.

सन 1943 में सुभाष जी जर्मनी से जापान पहुंचे थे.

अभी जर्मनी ने भारत की मदद के लिए हाँ कर दी थी. इस बात से अंग्रेजों की हवा खराब हो चुकी थी. जापान से नेताजी सिंगापुर पहुँचते हैं यहाँ पर जो होता है वह तो अंग्रेजों की जड़े ही हिला देता है. नेताजी जी आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान अपने हाथों में ले लेते हैं. अब देश के अन्दर संघर्ष शुरू हो चुका था.

अंग्रेज समझने लगे थे कि एक तरफ हमको विश्वयुद्ध लड़ना है और दूसरी तरफ भारत से भी लड़ना पड़ेगा.

1947 में ही अंग्रेजों ने भारत क्यों छोड़ा

देश के अंदर महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का भी गठन किया गया था. इसकी कप्तान लक्ष्मी सहगल बनी थीं. अपने आगामी लेख में हम रानी झांसी रेजिमेंट का उल्लेख करेंगे.

सन 1947 में ही भारत को क्यों आजाद किया था?

जब यह सवाल एक अंग्रेज अधिकारी से किया गया था तो क्लेमेंट ने जवाब दिया था कि जब भारत की सेना ने विद्रोह कर दिया था तो हमें भारत छोड़ना पड़ा था. तो यह भारतीय सेना कौन-सी थी? यह आजाद हिन्द फ़ौज ही थी. आजाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों को गिरफ्तार किया जा रहा था लेकिन सभी अंग्रेज समझ गये थे कि लबे वक़्त तक आजाद हिन्द फ़ौज के सामने टिकना और स्थिति को संभालना मुश्किल है.

तो ऐसा नहीं है कि गांधी जी उस समय शांत बैठे थे लेकिन वह समझ गये थे कि अब देश को आजादी मिलने वाली है और नेताजी जो कर रहे हैं सही कर रहे हैं. इसलिए गांधी जी ने नेताजी का मार्ग रोकने की कोशिश नहीं की थी.

वैसे इस थ्योरी पर आपको काफी शक होंगे तो ऐसे में आप सबसे पहले तो अनुज धर की सुभाषचंद्र बोस के ऊपर लिखी सभी पुस्तकें पढ़ लीजिये. तब उसके बाद क्लेमेंट के लेख पढ़ लीजिये. अनुज धर ने सुभाषचंद्र बोस के ऊपर लिखी पुस्तक “व्हाट हैपेंड टू नेताजी ?” में हिन्द फ़ौज का सफरनामा लिखा है.

इस तरह से अचानक से ही सन 47 में भारत को आजादी दे दी जाती है लेकिन हम आजाद हिन्द फ़ौज के असली नायकों को आज तक उनका सही अधिकार भी नहीं दे पाए हैं. देश का यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है?

ये है एक ऐसा मंदिर, जहां बारिश होने से पहले ही मिल जाते हैं उसके संकेतहमारे देश में कई मंदिर हैं और सबका अलग-अलग महत्व ह...
21/05/2016

ये है एक ऐसा मंदिर, जहां बारिश होने से पहले ही मिल जाते हैं उसके संकेत

हमारे देश में कई मंदिर हैं और सबका अलग-अलग महत्व है. लोगों की आस्था के कारण मंदिर का महत्व बरकरार रहता है. कुछेक मंदिरों में अजीब-अजीब चमत्कार देखने को मिले हैं, कहीं से कोई निरोगी होकर आ रहा है, तो कहीं से अन्य बीमारियां ठीक हो रही हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश में एक मंदिर ऐसा है, जहां बारिश होने से पहले बारिश के संकेत मिल जाते हैं.

कहां है मंदिर?
ये मंदिर उत्तर प्रदेश के कानपुर में है. यहां भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना होती है. इस मंदिर की छत पर बारिश होने से 15 दिन पहले ही बूंदें टपकने लगती हैं. गांव के लोग इनको ठाकुर बाबाजी के नाम से पुकारते हैं. गांव वालों की ये मान्यता है कि उनके भगवान उन्हें बारिश आने से पहले ये एक संकेत देते हैं ताकि उनकी फसलें बर्बाद ना हों.

रहस्य आज भीबना हुआ है
इस मंदिर में पुरातत्वविदों ने इस रहस्य का पता लगाने की तमाम कोशिशें की, लेकिन वो कोशिशें मात्र कोशिशें ही रह गईं. इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ के साथ-साथ सूर्य भगवान और पद्मनाभन भगवान की भी मूर्ति स्थापित है. इसकी दीवारें 14 फीट मोटी हैं. आज ये मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है.
यहां भी निकलती है रथ यात्रा
इस मंदिर में भी पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तरह ही रथ यात्रा निकलती है. भीतरगांव विकासखंड से तीन किलोमीटर दूर पर बेंहटा में ये मंदिर स्थित है.

कैसे होता है चमत्कार?
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस मंदिर के ऊपर चमत्कारी मानसून पत्थर लगे हैं. कहा जाता है कि इसी की बदौलत मानसून आने से पहले इसकी छत से बूंदे टपकने लगती हैं. ये बूंदें बिलकुल बारिश की बूदों की तरह होती हैं. जिस दिन यहां बारिश होनी शुरू होती है, उसी दिन यहां ये बूंदें टपकनी बंद हो जाती हैं. इसी संदेश के साथ ही स्थानीय लोगों को ये पता चल जाता है कि बारिश शुरू होने वाली है.

कब हुआ था इसका निर्माण?
आख़िर ये मंदिर बना कब था? फ़िलहाल इस सवाल के जवाब को लेकर कई मत बने हुए हैं. पुरातत्व विभाग और आईआईटी के वैज्ञानिक यहां कई बार आये, उन्होंने शोध भी किया. कुछेक वैज्ञानिकों का कहना है कि चूंकि मंदिर का आकार बौद्ध समय के दौरान बने स्मारकों की तरह है, इसीलिए इसे अशोक के काल का माना जाता है. वहीं दीवार पर बने एक मोर के निशान ने वैज्ञानिकों को एक और कयास लगाने की ओर मोड़ दिया है. अब ये भी कहा जाता है कि ये मंदिर चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन के काल का बना था.
ना जाने सच क्या है? लेकिन ये ज़रूर सच है कि मंदिर में बारिश होने से पहले ही बूंदें टपकने लगती हैं.

अनसुलझे रहस्य........
06/05/2016

अनसुलझे रहस्य........

30/11/2015
happy birthdey......
17/09/2015

happy birthdey......

मैंने गाँधी को क्यों मारा " ? नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान{इसे सुनकर अदालत में उपस्तित सभी लोगो की आँखे गीली हो गई थी और ...
03/09/2015

मैंने गाँधी को क्यों मारा " ? नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान

{इसे सुनकर अदालत में उपस्तित सभी लोगो की आँखे गीली हो गई थी और कई तो रोने लगे थे एक जज महोदय ने अपनी टिपणी में लिखा था की यदि उस समय अदालत में उपस्तित लोगो को जूरी बना जाता और उनसे फेसला देने को कहा जाता तो निसंदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्देश देते }

नाथूराम जी ने कोर्ट में कहा --सम्मान ,कर्तव्य और अपने देश वासियों के प्रति प्यार कभी कभी हमे अहिंसा के सिधांत से हटने के लिए बाध्य कर देता है .में कभी यह नहीं मान सकता की किसी आक्रामक का शसस्त्र प्रतिरोध करना कभी गलत या अन्याय पूर्ण भी हो सकता है .प्रतिरोध करने और यदि संभव हो तो एअसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करना , में एक धार्मिक और नेतिक कर्तव्य मानता हु .मुसलमान अपनी मनमानी कर रहे थे .या तो कांग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसर्पण कर दे और उनकी सनक ,मनमानी और आदिम रवैये के स्वर में स्वर मिलाये अथवा उनके बिना काम चलाये .वे अकेले ही प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति के निर्णायक थे .महात्मा गाँधी अपने लिए जूरी और जज दोनों थे .गाँधी ने मुस्लिमो को खुश करने के लिए हिंदी भाषा के सोंदर्य और सुन्दरता के साथ बलात्कार किया .गाँधी के सारे प्रयोग केवल और केवल हिन्दुओ की कीमत पर किये जाते थे जो कांग्रेस अपनी देश भक्ति और समाज वाद का दंभ भरा करती थी .उसीने गुप्त रूप से बन्दुक की नोक पर पकिस्तान को स्वीकार कर लिया और जिन्ना के सामने नीचता से आत्मसमर्पण कर दिया .मुस्लिम तुस्टीकरण की निति के कारन भारत माता के टुकड़े कर दिए गय और 15 अगस्त 1947 के बाद देशका एक तिहाई भाग हमारे लिए ही विदेशी भूमि बन गई .नहरू तथा उनकी भीड़ की स्विकरती के साथ ही एक धर्म के आधार पर राज्य बना दिया गया .इसी को वे बलिदानों द्वारा जीती गई सवंत्रता कहते है किसका बलिदान ? जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओ ने गाँधी के सहमती से इस देश को काट डाला ,जिसे हम पूजा की वस्तु मानते है तो मेरा मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर गया .में साहस पूर्वक कहता हु की गाँधी अपने कर्तव्य में असफल हो गय उन्होंने स्वय को पकिस्तान का पिता होना सिद्ध किया .
में कहता हु की मेरी गोलिया एक ऐसे व्यक्ति पर चलाई गई थी ,जिसकी नित्तियो और कार्यो से करोडो हिन्दुओ को केवल बर्बादी और विनाश ही मिला ऐसे कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं थी जिसके द्वारा उस अपराधी को सजा दिलाई जा सके इस्सलिये मेने इस घातक रस्ते का अनुसरण किया ......में अपने लिए माफ़ी की गुजारिश नहीं करूँगा ,जो मेने किया उस पर मुझे गर्व है . मुझे कोई संदेह नहीं है की इतिहास के इमानदार लेखक मेरे कार्य का वजन तोल कर भविष्य में किसी दिन इसका सही मूल्याकन करेंगे

जब तक सिन्धु नदी भारत के ध्वज के नीछे से ना बहे तब तक मेरी अस्थियो का विश्लन मत करना

JESA AAP SOCHATE HO VWESA HI AAP PATE HO OR WESE HI BAN JATE HO TO ACHA SOCHO ACHA BANO.....HAPPY INDEPENDENCE DEY
14/08/2015

JESA AAP SOCHATE HO VWESA HI AAP PATE HO OR WESE HI BAN JATE HO
TO ACHA SOCHO ACHA BANO.....HAPPY INDEPENDENCE DEY

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