Writer Deepti chauhan

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दीप्ति की कलम से - बचपन की यादें अक्सर आती हैं जब मां स्वेटर बनाती थी और मैं सलाई मांगती थी। मां के पास समय नहीं होता था...
04/06/2026

दीप्ति की कलम से - बचपन की यादें अक्सर आती हैं जब मां स्वेटर बनाती थी और मैं सलाई मांगती थी। मां के पास समय नहीं होता था, तो मैंने झाड़ू की सीकों से सलाई बनाकर स्वेटर बुनना सीख लिया। मां ने मेरी कोशिश को देखा और मुझे प्यार दिया। अब जब याद करता हूं तो लगता है कि बचपन के दिनों में सीखी गई बातें और स्वाभिमान आज भी मेरे साथ हैं। समय बीत गया, लेकिन बचपन की यादें अभी भी ताजा हैं।

24/05/2026

@ #,उन घरों में अदब खांसता था--
दरारों से होकर कब गुजर गए,,
बे मने घर अब अच्छे नहीं लगते,,
इन्हे फिर से बुलालो,,
बे आत्मा समाज अच्छा नहीं लगता,,
भटक रहा है इधर से उधर,,
आओ इसे फिर से,,
बुला लो,,
अभी दोनों इतनी दूर नही पहुंचे होगे,,
कि आवाज न पहुंचे आओ,,
मिलकर उन्हीं रिश्तो के हवाले से आवाज लगा कर बुलालो,,
लाख रंग भरने से दीवारे खुश नहीं हैं,,
इनके आशुओं की नमी सूखकर झड़ने लगी है,,
सुबह साम इकट्ठा करने में अब झाड़ू भी कराहने लगी है,,
प्यासी और सूखी घरों की आंखें,,
रेतीली हो गई है,,
इनकी आंखों में हंसती हुई वही पुरानी,,
नमी बुला लो,,
ऊंची ऊंची इमारतों में चीखते सन्नाटे बहुत घुटन देते हैं,,
हर एक कमरों की फिर से रोनके वही रौनकें बुला लो,,
बचे कुचे तन्हा दरख्तों की,
तन्हा छांव जलाने लगी है,,
इन लकड़हारों के हाथों से,,
कुल्हाड़ी छीन कर फिर से घनेरी सीतल छांव उगा लो,,
तपती छतों की मुंडेरों पर,,
अब परिंदे नहीं बैठते हैं,,
इनके जलते पांव की छांव,,
और आंगन में उतरने के लिए,,
नीम के दरख्त लगा लो,,
न भोर हंसती है न साम मग्न मय है,,
फिर से खुले आंगन बाले,,
वही पुराने घरौंदे बना लो,,
भोर में दादी दही मथकर,,
सबको बांटती थी,,
और मां माथे पर आंचल रखकर,,
मुस्करा कर सबके माथे पर हाथ,,
फिराकर दुलार कर उठाती थी,,
उसके हंसते हुए चेहरे बाली,,
वही भोर बुला लो,,
ये घरों की वापसी समाज को साथ ले आएगी,,
इतनी दूर भी नही निकले हैं,,
कि लौटने तक आवाज नहीं जाएगी,,
आवाज देकर इन्हे रिश्तों के हवाले से,,
फिर से बुला लो,,
परिवर्तन के रंग बड़े बेढंगे लगते हैं,,
प्रकृति की हया पर बे मौसम,,
आकर ठहरे पतझड़ को हटाकर,,
मां मय सीतल आंचल,,
आओ मिल कर पहना लो,,
दौलतों के शोर ने चेन और अमन खरीद लिया,,
आओ मिल दोनों को वापस बुला लो,,
बस्तियों की फिर वही है पुरानी,,
रौनक लोटा लो,,
आओ खेतों में स्वस्थ खुशहाली बोकर,,
निवालों को धीमे जहर से बचा लो,,
जो अपनों के हाथ से भूंख को परोसते हैं हम,,
फिर वही मन से दुआओं बाले हाथ,,
हाथों से पकते निवाले,,
भूख की तृप्ति बुला लो,,
इन पत्थरों की बस्तियों में,,
सोधी मिट्टी का अब स्पर्श नहीं होता है,,
दफन है पत्थरों में जन्म भूमि की रज,,
आओ चीर कर बाधाएं पांवों को,,
जलने से बचालो,,
उन कच्चे घरों में अदब खांसता था,,
बातें बातों से बात करतीं थीं,,
दिलों को ठेस नहीं लगती थी,,
खूब गिरते और उठते थे,,
उन कच्चे घरौंदों में,,
चोट नहीं लगती थी,,
लहू निकल कर भी,,
लहू तक सफर करता था,,
गहरे घाव भी मां की फूंक से ओंढ़ जाते थे,,
चोट भी मां से अदव से पेस आती थी,,
घर से निकल कर मंदिरों में,,
क्या पूजते हो यारो,,
जिंदा श्रद्धा छोड़कर मां बाप में,,
पत्थर को पूजते हो यारो,,
बो गांवों के बचपन बहुत याद आए,,
जमाने ने जब हमको ये दिन दिखाए,,
चंद कदमों में झुलसे वदन पांव अपने,,
बो नीम और पीपल बहुत याद आए,,
लेखिका,पत्रकार,दीप्ति चौहान‌।✍️

04/05/2026

@ #, दीप्ति की कलम से--
इंसान हैं हम तो इंसान का परिचय दो--
अब समझ जाना चाहिए कि जीने के लिए न शिक्षा न पैसा न ओहदा न जाति न धर्म जीने के लिए सिर्फ सुकून और अपनों का साथ चाहिये जहां एक को चोट लगे तो दूसरे की आह निकल जाए--
और सुकून पैसों और डिग्रियों ओहदों से नहीं खरीदा जा सकता है दिल का काम दिमाग नहीं कर सकता है और दिमाग का दिल मगर दोनों में संतुलन बना कर हर समस्या का समाधान संभव है जज हो या आम इंसान घर की अदालत बहुत अलग होती है इससे तब तक हारते रहेंगे हम जब तक हम दिल और दिमाग का संतुलन बनाकर नहीं चलेंगे हाय माया हमारे सिर चढ़कर नाच रही है और हल्के फुल्के भय रहित कानून ने समाज को बे आत्मा कर के छोड़ा है अकेले इंटेलिजेंस बेटा ही नहीं मर रहे हैं बेटियां भी मर रही है रक्षा दोनों की अति आवश्यक है वरना न अकेले बेटे कुछ कर सकते हैं न बेटियां इंसान हैं हम तो अपना परिचय दे आज समाज के नाम पर सिर्फ भीड़ नजर आती है यहां हम इस भरे संसार मे जीवन और मृत्यु की फीलिंग में जी रहे हैं यानी सफर की थकान बन कर रह गया है मानव जीवन हासिल कुछ नहीं हुआ जब कि जीते जी तो सब कुछ मानव के लिए उपलब्ध है इस संसार में
ये कैसा परिवर्तन है,,
बस्तियां ठंडी हैं,,
और श्मशान में गरिमा है,,

@ #,लोग गांठें लगी रस्सियां फेंक कर,,मुझमें सुलझन तलाशते हैं,,काश उन्होंने मेरी घिसी हुईं,,उंगलियां देखी होती,,अक्सर गहर...
03/05/2026

@ #,लोग गांठें लगी रस्सियां फेंक कर,,
मुझमें सुलझन तलाशते हैं,,

काश उन्होंने मेरी घिसी हुईं,,
उंगलियां देखी होती,,

अक्सर गहरे जख्मों पर मेहगी,,
पट्टियों की टाइट गांठें,,

खोलते खोलते घिसी जख्मी पोरों की,,
उंगलियां देखी होती,,

कभी माईने नहीं मिले मेरे,,
कभी सुकून का दरख्त देखा,,

काश अंदर की सजी हुई,,
तबाही देखी होती,,

रंगीन प्यास ने जिगर का खून पीकर,,

होठों पर खेलती जिद्दी,,
मुस्कान देखी होती,,

बो लड़की हंसते हुए क्या दिख गई,,

जमाने ने तबायफ की परवरिश,,

काश राख की ढेरियों पर उगी,,
दीप्ति मिसाल देखी होती,,

@ #,हम तो तबाही में भी उग बैठेंगे--मगर साथ साथ चलते तो--बात ही कुछ और होती--बड़ी सीधी-सादी बात है कि महिला ही महिला को आ...
19/04/2026

@ #,हम तो तबाही में भी उग बैठेंगे--
मगर साथ साथ चलते तो--
बात ही कुछ और होती--
बड़ी सीधी-सादी बात है कि महिला ही महिला को आगे बढ़ता नहीं देख सकती है और इस महिला बिल पर यह बिल्कुल साफ आईने की तरह हो गया फिर बो पक्ष-विपक्ष में क्यों न बैठी हो उसे सिर्फ अपना पद प्रतिष्ठा और भविष्य ही सुरक्षित चाहिए उसे अपनी पीढ़ी में मां बहन फ्रेंड से कोई मतलब नहीं और यह सोच सदियों से जैसे महिलाओं पर अत्याचार होते आए हैं उनमें भी एक महिला का पूरा किरदार होता था और हो रहा है यह सोच आज भी खत्म होने की बजाय और प्रवल हो रही है जबकि समय की मांग थी महिला को उभारने और खुद को उभरने के लिए ये बात उन महिलाओं पर लागू होती है जो परिवार या किसी तरह से मुकाम तक पहुंच गई है यह बक्त महिलाओं को एक दूसरे के लिए समर्पित होने का था खैर बो बक्त दूर नहीं है कि महिला एसी सोच से घरों से सुबह में जरूर निकलेगी लेकिन साम को मकान में घुसेगी क्यों कि उसको भी दिन के काम करते करते ऑफिस में थकान होनी संभव है और यह थकान हमें भेदभाव बाली सौगात में जो दी गई है--पुरुषो को होती है लेकिन इस भेदभाव की सोच से महिलाओं को भी थकान होना निश्चित है अबतक महिला उस शक्ति मय त्याग और बलिदान देकर घर परिवार और बाहर सब कुछ संभालती रही एक उम्मीद में कि कभी न कभी पुरुष परिवार को उसके इन त्यागों का एहसास होगा बो चाहती भी क्या है और किसी के पास इतना है ही क्या जो उसके कर्म और त्याग का मूल्य चुका सके लेकिन बो इतनी दयालू है और सस्ती हो जाती है चंद शब्दों के प्रेम में कि उसकी कोई जान भी लेले उफ तक नहीं करती और जब इसमें भी उसे नीचा दिखाने की साजिशें जब होने लगे तो धिक्कार है ऐसी कायरता की जिंदगी जीने से बेहतर है कि खुद की खुद्दारी में जिएं क्यों बो पुरुष से कहीं पीछे नहीं है और यह खुद्दारी क्यों न जागे उसके अंदर सोई हुई धेर्य और त्याग जब उसी का हक उसे भीख की तरह मांगना पड़े--
साथ साथ चलते तो--
बात ही कुछ और होती--
मगर हमें तो तबाही मे भी खिलना आता है--
हम तबाह नहीं होंगे--
जब उगने पर आएंगे तो--
महंक फिजाओं और सरहदों तक--
महंक जाएंगे--
लेकिन अब यह चिंगारी बुझनी तो नहीं है और जिन्होंने जो किया है हम उनके भविष्य को आज बता सकते हैं कि उन्होंने अपनी हार का जश्न मना लिया जहां मां और महिला का हाथ जिसके सिर पर नहीं होता है बो घर समाज और देश राजनीति जिंदगी में कभी सफल नहीं हो सकता है।
लेखिका,पत्रकार,दीप्ति,चौहान।

@ #,घर को घर बनाने में--स्त्री एक उम्र लगा देती है--मगर घर को गिरने नहीं देती है--घर की दरारों में खुद के अरमान-- नौंच न...
11/04/2026

@ #,घर को घर बनाने में--
स्त्री एक उम्र लगा देती है--

मगर घर को गिरने नहीं देती है--

घर की दरारों में खुद के अरमान--
नौंच नौंच कर भर देती है--

मगर घर को गिरने नहीं देती है--

खुली खिड़कियों में आधे आंचल के पर्दे--
आधा आबरू पर पहन कर--
जमाने का नजरिया रोक देती--

मगर घर को आबरू गिरने नहीं देती है--

बो सूने घर की किलकारियों मे--
जिस्म और जान का रक्त पिलाकर--
फूल महका और खिला देती है--

मगर घर को गिरने नहीं देती है--

थोड़ा थोड़ा सा खर्चने भर से--
जाने कब पूरा खर्च जाती है--

मगर महसूस नहीं होने देती--

जिस्म जब हल्का हल्का सा लगता है--
तब घुसती है मन के मरघट में--

मगर तबाही का शोर नहीं होने देती हैं--

यौवन के अरमानों की राख पर--
लिखा त्याग पढ़कर--
संतोष के धेर्य में सिमट जाती है--

मगर घर को गिरने नहीं देती--

न धूप न दीप घर महक रहा है--
बो नफरतों की आहुतियां देकर--
घर को मंदिर बना देती है--
मगर घर को गिरने नहीं देती--

चंद प्रेम के शब्दों में--
बेमोल बिक जाती है--
मगर खुद को बिखरने नहीं देती है--

घर को घर बनाने में--
स्त्री एक उम्र लगा देती है--
मगर घर को गिरने नहीं देती है--

एक उम्र दो घरों में जीकर--
लौट जाती है--

अनसुलझी पहेली की तरह--
खुद को थोड़ी सी मिट्टी में संसार--
उगा कर बेघर लौट जाती है--

मगर घर को गिरने नहीं देती है--
दीप्ति,

06/04/2026

@ #,इसमें कोई दो राय नहीं कि एक पिता के लिए उसकी पुत्री उस का दिल का टुकड़ा होती है तब उस की परवरिश भी बहुत केयर फुल होनी भी चाहिए उसे समाज और हर बुरी नजर से बचाने की हर बक्त चिंता रहती है--
पर यह भी कड़वा सत्य है कि बिना समाज के बेटियां अकेले कभी नहीं पाली जा सकती हैं-
(कहानी एक पिता और पुत्री की--)
पिता के दो पुत्र एक पुत्री थी बो तीनों संतान को बेहद प्रेम करता था हर सुविधा से संतान की परवरिश और पुत्री को बेहद प्रेम करता था अधिक प्रेम सुरक्षा का चिंतन एसा हावी हुआ कि दोनों पुत्र तो शिक्षा के लिए बाहर जाते थे पर पुत्री को उसने सुरक्षा की दृष्टि से शिक्षा के लिए बाहर नहीं जाने बात बो भी नहीं थी कि आर्थिक तंगी हो लेकिन सिर्फ उनके परिवर्तन का भय और पुराने वही रीति रिवाज उसके दिलो दिमाग पर छाया हुआ था कि बाहर निकलेगी तो पुत्री के साथ कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है-- और घर में पुत्री को किसी प्रकार की कोई भी परेशानी नहीं होने दी उसकी परवरिश में राजा महाराजा जैसी सुख सुविधाओं के संसाधन-- से उसे बड़े नाजों से पाला देखते ही देखते पुत्री शादी के योग्य हो जाती है माता पिता को उसकी शादी करने की चिंता के साथ साथ वर ढूंढने शुरू हो जाते हैं जहां भी जाता पिता नोकर पेशा पढ़ा लिखा वर और संपन्न परिवार देखता और लड़का वाले भी सबसे पहले पुत्री की शिक्षा को पूछते जब पिता बताता तो लड़का परिवार मना कर देता यह सिलसिला सालों चलता रहा पुत्री के लिए चाहत योग्य वर नहीं मिला बदलते परिवेश में शिक्षा का महत्व अब सबसे पहले--खैर वर ढूंढते ढूंढते अब बहुत समय जाया हो रहा था और पुत्री समाज की नजरों में बड़ी होने लगी थी समाज में पिता का दबदबा था कोई सामने बोलने की हिम्मत नहीं-- लेकिन कहते हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं बात कही न कही से आ ही जाती थी-- पुत्री की मां पढ़ी लिखी सभ्य और योग्य महिला थी बो भी पति को चिंतित देखकर बड़ी सादगी भरे लहजों मे कह देती थी कि आप चिंता सिर्फ उसकी शादी को लेकर करते हैं कभी आपने यह भी सोचा होता कि वर पुत्री के योग्य क्यों नहीं मिल रहा है पिता ने सवाल किया क्यों आप बताएं तो पत्नी ने कहा कि आपकी पुत्री कितनी शिक्षित हैं जो आप उसके लिए शिक्षित वर की तलाश में समय जाया करते जा रहे हैं यह बात सुनकर पति पत्नी पर नाराज़ होता है और कहता है कि आप चुप रहो हम पैसे और प्रतिष्ठित लोग हैं हमारी पुत्री को एक से बढ़कर एक वर खुद तलाशने चले आएंगे जब हम पुत्री के बजन के बराबर उसे पैसे से---इस अहम भरे व्यवहार से पत्नी चुप हो जाती है इधर पुत्री भी अरमानों के साथ अच्छे साजन के ख्वाबों में आईना देखकर सजने संवरने और मन ही मन अकेले में मुस्कराती है लेकिन मां अपनी शिक्षा की द्रष्टि से उसे यह सब करते देख चिंतित हो रही है पर अब बो पति से कुछ नहीं कहती है जो पुत्री सुरक्षा की दृष्टि कभी बाहर नहीं निकलने दी बो अपनी उम्र और अब ख्वाबों से अंदर ही अंदर अकेले लड़ने लगी एक दिन उसके मन में आया कि सब कहते हैं कि क्वारी लड़कियां अगर भोले बाबा का व्रत और पूजा अर्चना करें तो मनवांछित वर की प्राप्ति होती है और उसने सोलह सोमवार के ब्रत रखना शुरू कर दिया और बो घर से थोड़ी दूरी पर एक शिव का मंदिर था वहां पूजा अर्चना करने जाने लगी कुछ एक सोमवार ही निकले थे कि एक दिन लड़की पर कुछ लड़कों की नजर पड़ी और आपस में सब कहने लगे यार यह किसकी लड़की है इसे पहली बार देखकर--और लड़के उसके साथ कुछ शरारत--- बो घर पर जाकर अपनी मां से कहती हैं और मां अपने पति से पिता मंदिर जाने से भी मना कर दिया और पुत्री को बहुत डांटा मैंने तुम्हें घर से बाहर निकलने को मना किया था इसी लिए कि जमाना बहुत खराब है लड़कियों के लिए मां से फिर नहीं रहा गया और एकांत में मौका देखकर उसने पति से कहा आपसे एक बात पूछनी थी, पति बोला पूछिए क्या आप है किसी की बेटी को कभी बुरी नजर से नहीं देखना चाहिए तभी पति ने तबाक से क्रोधित लहजे से कहा क्या बोलती चली जा रही आपको पता है कि आप क्या बोल रही हो पत्नी ने कहा मैं अच्छी तरह जानती हूं कि क्या बोल रही हूं अगर मैं गलत हूं तो आपसे जबाव दीजिएगा कि कल्पना आपकी कौन और किस रिश्ते में है पति के तेवर बेसक ढीले थे पर मर्दानगी की भाषा नहीं उसने कहा कौन कल्पना मैं किसी कल्पना को नहीं जानता पत्नी ने फिर सादगी भरे लहजे में मुस्कराते हुए कहा मैं सब जानती हूं पर मैं यह नहीं भूली कि मैं स्त्री हूं श्रजन और संसार हूं जो अंदर से टूट टूट कर बिखरती और उगती रही हूं धेर्य और शांति त्याग ने हमें स्त्री इसी लिए बनाया कि ये संसार श्रजन संस्कृति समाज की रीति रिवाजें जो हमारे सिर पर समाज ने उगाईं है बो हमारे इस त्याग से सुरक्षित बनी रहे, आप खुद को एक धनवान पिता कह सकते हैं पर शुभचिंतक नहीं आपने पुत्री के कैरियर और भविष्य को अंधकारमय डालकर आप समझते हैं अच्छा किया है आपने कभी सोचा दो पुत्रों के साथ एक पुत्री क्यों नहीं शिक्षा के लिए बाहर जा सकती थी आज पैसा और पुत्री का भार लिए वर्षों से वर तलाश रहे हैं तराजू हाथ में लेकर फिर भी हमें अपने पैसे के बराबर कोई वर नहीं मिला क्योंकि शिक्षा पुरुष ही नहीं स्त्री का भी गहना है आपने अपनी अनपढ़ पुत्री के लिए वर तो पढ़ा-लिखा देखने की कोशिश की पर कभी सोचा कि एक अच्छा वर जो शिक्षा का महत्व रखता है बो पैसे से नहीं उसे पढ़ी लिखी संस्कार वान पत्नी की जरूरत होती आज भी बेटियां बड़े से बड़े घर की अनपढ़ मिल जाएगी मगर बेटा किसी गरीब का भी अनपढ़ बहुत कम मिलेगा और एक बात आपसे बोलनी बहुत जरूरी है बो है कि समाज के बिना जीना सिर्फ कल्पनाओं तक सीमित रह सकता है हकीकत में नहीं क्योंकि घर से समाज और समाज से निकल हर भविष्य को बुना जा सकता है घर सिर्फ संस्कार दे सकता घर में बैठकर भविष्य कभी नहीं-- जब एक पिता दूसरों की बेटियों की इज्जत सम्मान करता है तो उसकी बेटी को समाज भी वही देता है आपने कभी सोचा कि मैं एक पढ़े-लिखे पैसे बाले परिवार से आपके घर में बहू बनी और आपने हमारे साथ क्या किया है आप इग्नोर करते रहे लेकिन मैं सब जानते हुए भी अपने माता-पिता की इज्जत आबरू को ढके रही अपने त्याग धेर्य और शांति के कारण आपका भ्रम था कि आप अपनी पुत्री को बहुत प्रेम करते हैं यह प्रेम नहीं था उसके भविष्य के साथ पुरूषार्थ का सौतेला पन था जो आज हम अनपढ़ पुरुष को पुत्री देने के लिए विवस--और मंदिर न जाते हुए उसने पूरे सोलह सोमवार की पूजा अर्चना भी नहीं कर पाई अब तो आपको हमारी बात पर कुछ एहसास हुआ होगा, कि जैसी करनी वैसी भरनी इंसान को भोगनी पड़ती है बेटियां एक अकेला घर कभी नहीं पाल सकता है हां एक कैदी जीवन जरूर अपनी बेटी को दे सकता है।
लेखिका,पत्रकार,दीप्ति,चौहान।

@ #,साथी हाथ बढ़ाना--एक अकेला तक जाएगा--मिलकर कर्म बटाना--साथी हाथ बढ़ाना--अगर हम दोनों ही अपने अपने स्वाभिमान सम्मान और...
30/03/2026

@ #,साथी हाथ बढ़ाना--
एक अकेला तक जाएगा--
मिलकर कर्म बटाना--
साथी हाथ बढ़ाना--
अगर हम दोनों ही अपने अपने स्वाभिमान सम्मान और कर्म में जिएं तो अच्छे बुरे दोनों युगों का आंकलन और परिवर्तन हम मानव स्वयं कर सकते हैं‌--
क्यों कि हमसे होकर ही हर पथ निकला है--
दोनों मिलकर मंजिलों तक क्यों नहीं जा सकते हैं--
पुरुष को अपने पुरूषार्थ का चेहरा देखना है तो पुरूषोत्तम श्री राम, और जैन धर्म के पुरूषार्थ का आईना देखना बेहद जरूरी है--
बात पुरूषार्थ की करें तो जैन गुरूओ की बात हम सबसे पहले करेंगे हम संस्कारों की खोखली रीति पर आज कुछ कहना जरूरी इस लिये भी उचित मानते हैं कि हम स्त्री के छोटे बड़े कपड़ों को देखकर सिर्फ संस्कारों को मुख्य धारा से जोड़ देते हैं कभी सोचा है कि चेहरे पर एक आंख नहीं दो होती है जैन धर्म में जब गुरु निर्वस्त्र कर्म पथ पर चलते और बैठकर ईश्वर में मग्न होते हैं तो वस्त्रों की कोई अहमियत और आवश्यकता नहीं रहती है सबसे बड़े वस्त्र नजर और नजरिया बन जाते हैं जहां स्त्रियां संस्कारों की ओढ़नी में गुरू के इर्द-गिर्द जमाबड़ा लगाकर खुद को स्वतंत्र और सीधे ईश्वर से जुड़ जाती है न कोई पुरुष और पुरूषार्थ का भय न खुद के करेक्टर की रखवाली ईश्वर और भक्ति मय बाउंड्री उसके अंदर सिर्फ पवित्रता और पार्दर्शिता की दीवार होती है न छोटे कपड़े न कपड़ों और भय की कोई मानसिकता होती है जहां स्त्री खुद को पिता तुल्य बचपने में बेखौफ ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाती है न कोई वस्त्रों की अहमियत न करेक्टर की लूट का भय बस यही पुरूषार्थ की पहचान है जहां स्त्रियां खुद को भय मुक्त सुरक्षित महसूस कर भक्त मय दर्शन को साक्षात कर लेती है-
इसी तरह हमारे पूजनीय श्री पुरूषोत्तम राम का पुरूषार्थ जिन्होंने मां सीता के शिवाय पर स्त्री को नजर भर कर नहीं देखा स्त्री स्वयं नजर और नजरिए पर पलकों का पर्दा पहन लेती है--
कटु बात स्त्री और पुरुष दोनों ही संसार के मुख्य---और आधे आधे के मालिक भी खुशी हो या गम दोनों गाड़ी के दो पहिए हैं पर हमारे कल्चर ने एक पहिए की मेहनत को सर्वोपरि रखा दूसरा बोझ तानाशाही से कोलू के बैल की तरह मेहनत को आंखों पर पट्टी बांध कर जीवन भर महत्व बे वजूद रखा स्त्री की तपश्या और मुख्य भूमिका सदियों से पुरूषार्थ की दबंग सोच तले मसलती रही उसके त्याग धेर्य और शांति का हमेशा उपहास हुआ स्त्री अपनी थकान भर किसी से शेयर नहीं कर सकी बात होती है उसके अधिकारों और संस्कारों की जहां सिर्फ उसके तन का स्तेमाल मुख्य रूप से स्त्री को माना गया कि वस्त्र छोटे हैं और बदचलन है क्या कभी पुरुषार्थ ने सोचा है कि असली चीरहरण तो उस पुरूषार्थ का होता है जहां स्त्री मात्र खड़े होने से उसके पास बदनाम हो जाती है क्या उसने कभी अपनी पुरुषार्थी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश की है कि पुरुष अपनी भय मुक्त एसी बाउंड्री बना कर रखता समाज में जहां कभी किसी को कोई स्त्री करेक्टर लेस और छोटे बड़े वस्त्रों, और उसके चीर हरण जैसे दुशासन मानुषी समाज में पनाह न ले पाते पुरुष का कृत्य सदियों से दोषी होकर भी निर्दोष रहा और स्त्री निर्दोष होकर भी दोषी ठहराई जाती रही आज मै इस बात का खंडन खुलेआम करतीं हूं कि मैं सिर्फ स्त्री पीढ़ी को समर्पित भाव ही नहीं रखती हूं--
एसा कदापि नहीं है मैं सिर्फ दबे-कुचले असहाय का पक्ष रखती हूं जिसे आधे का अधिकार होते हुए भी उसी जमीन पर उसे स्वतंत्र होकर नहीं चलने दिया पीड़ाएं दवाने का भी बक्त और धेर्य होता है शिक्षा सिर्फ एक कैरियर के लिए डिग्री उपलब्ध करने का मात्र जरिया नहीं है ये जागरूक और खुद को जानने का भी मुख्य साधन है आज स्त्री शिक्षित होकर अपने जीवन से मिलने लगी है अपने अधिकार और शक्ति की छमता से मिलने लगी बो क्या है खुद को पहचानने लगी है कैसे चबा लें खुद को जानकर कि हम दोषी नहीं है हर तरह से जीवन से लुटे हुए हैं हमारे वजूद की लूट हो रही है शिक्षा इंसान को इंसान का महत्व समझाती है वरना इंसान क्या है बो पूरा जीवन जी कर संसार से विदा हो जाता है पर खुद को नहीं पहचान पाता है समय कभी रूकता नहीं है और समय पर अगर हम बक्त की आवाज सुनकर अपने अंदर और आसपास को सुरक्षित कर लें तो मानव समाज में प्राकृतिक आपदाएं हो या मानव विसंगतियों से उगते अशोभनीय अपराध जो हम मानव को शर्मशार करते हैं आज स्त्री अपने जीवन लक्ष्य से भटकती जा रही जो पुरुषों के सम कक्ष कर्म से नहीं अपराधों से--अपने ही अंकुर खाने लगी है वहां स्त्री का कोई महत्व नहीं रह जाता है सिर्फ उसकी देह से पहचान रह जाती है पर उसके अंदर की स्त्री आत्मा पलायन कर जाती है विषय सर्वप्रथम सोचनीय है दोषी कौन है जैसे एक विद्वान अपने ज्ञान से अपना भविष्य और आसपास को सुधारने का प्रयास करता है वहीं आदमी अपनी ताकत का स्तेमाल करता है जो राक्षसी प्रवत्ति का--- स्त्री और पुरुष अपने अस्तित्व को खोने से पहले खुद को खोजने का प्रयास करें इंसान बुरा नहीं होता है उसके अंदर बैठी सोच लक्ष्य से भटक जाती है बो बुरी होती है इसका मतलब यह भी नहीं कि हम सब बुरे की तरफ चले जाएं बक्त रहते लौटने बालों को लौटना होगा आवाज देने बालो आवाज देनी होगी समय की आवाज समय से सुननी होगी मानव धर्म और कर्म सर्वोपरि है मानव हो तो परिचय भी देना होगा ऐसे परस्थिति में न कोई कानून वनसायड होना चाहिए न बात बात पर मुकदमा जो सालों साल तक पीड़ा को आत्म शांति नहीं दे पाते हैं अपराध हो या इंसान आर्थिक सोच में जीने लगा है इसे इसी से तोड़ना चाहिए जो पुरुष जरा सी खरोंच में पुरुष कानून की मांग करने लगे उन्हे अपने पुरूषार्थ में झांकना होगा कि स्त्री सिर्फ सहने और भोगने की वस्तु नही है बो आपका वजूद और आधे का अधिकार रखती है और सदियों से उसने सिर्फ सहा है चीख तो अब आकर निकली है उसके स्वाभिमान सम्मान को जिंदा रखना लक्ष्य से भटकने को रोकना आपका फर्ज बनता है न दादागिरी से न न वनसाइड सोच से--उसकी सुरक्षा करें बो यदा-कदा के भटकाव में निकलने लगी बो स्वयं लौट आएगी इतनी दूर भी नहीं निकली है कि आपकी आवाज न पहुंचे यह भूमिका बेटी परिवार की मुख्य धारा से होकर निकलनी चाहिए अपनी बेटी को संस्कार दीजिए दौलत तो अपराधी भी दे दता है--
उस पर हुए अत्याचारों को ठीक से याद करोगे तो पुरूषार्थ आपका कांपने लगेगा कि उसने आपके द्वारा कितना सहा जो आपने उसे दिया है बो पुरूषार्थ की भोग वस्तु नहीं थी जिसे समझा गया कहते हैं कर्म की मार बो होती है जो खुद से नहीं तो रिश्तों से वसूलती है अच्छे हों या बुरे वैसे अच्छा बुरा तो शिक्षित और अशिक्षित सभी जानते हैं पर समय पर जानना बेहद जरूरी आ बना है क्योंकि गुजरा हुआ बक्त लौटकर कभी नहीं आता है लौटता तो सिर्फ और सिर्फ पश्चाताप है अगर हम दोनों ही अपने अपने स्वाभिमान सम्मान और कर्म में जिएं तो अच्छे बुरे युग परिवर्तन हम मिलकर कर सकते हैं‌।
लेखिका,पत्रकार,दीप्ति,चौहान।
✍️

@ #,घुटने लगा जब दम गुरूर का--हमारे अंदर--तो बाहर श्मशान की सैर तक निकले--कौन कहता है कि तन्हाइयों से हम-- बे आबरू होकर ...
29/03/2026

@ #,घुटने लगा जब दम गुरूर का--
हमारे अंदर--
तो बाहर श्मशान की सैर तक निकले--
कौन कहता है कि तन्हाइयों से हम--
बे आबरू होकर निकले--
*****"
संसार में इंसान को ईश्वर अपने लक्ष्य तय करके ही भेजता है बो जैसा उसे बनाना चाहता बो बनाकर ही रहता है हम चाहे कुछ भी क्यों न कर ले हां हमारे कर्म अगर अच्छे हैं तो ईश्वर हमारा साथ अवश्य देता है कुछ ऐतिहासिक घटनाएं हमारे जीवन में अवश्य होती है जिन्हें हम बड़ी देर में समझ पाते हैं और तब हमारी समझ में यह भी आने लगता है कि हम किस लिए इस संसार में आए हैं हमारे खुद के कर्म हमें संकेत देने लगते हैं कि हम क्यों है ओरों से अलग जिसे लोग हास्य में भी लेते हैं इग्नोर भी करते हैं उसे यह कहकर भी कमजोर करते हैं कि तुमने कभी बुरे कर्म किए होंगे तभी ईश्वर आपके जीवन में इतने कष्ट दे रहा है लेकिन इंसान की पहचान ज्यों ज्यों होती है निखरती जाती है जितने कष्ट उस पर पड़ते हैं कुछ टूट कर बिखर जाते हैं कुछ अड़ियल होकर अपने लक्ष्य की ओर चल पड़ते हैं और यह सब एक पुरुष के लिए आसान हो सकता है पर एक स्त्री के लिए उतना ही कठिन होता है इस समाज में किसी 18,20,साल की क्वारी या विधवा लड़की का टूटकर बिखरना और खुद के हौसलों से खुद को समेटना बहुत मुश्किल होता है बड़ा निष्ठुर समाज है यह बिना स्वार्थ के किसी का साथ और सहयोग नहीं करता है उस पर स्त्री के लिए यहां देवियों को कष्ट देने में यह समाज और पुरूषार्थ जब पीछे नहीं हटा तो भला एक आम लड़की की क्या---
समाज सिर्फ उसके रहन सहन से उसके करेक्टर और किरदार का आंकलन करता है उसके अंदर के हुनर हौसले और सत्यता को कभी नहीं देख पाता बो किसी पुरुष के आसपास भी खड़े होकर क्यों न बेसक सभ्यता के दायरे में बात करे फिर भी बो करेक्टर लेस हो जाती है पर गंदी सोच का यह सामाज और रिश्ते उसे खुदकी गंदी सोच से ही उसका आंकलन करते हैं उसकी चंद गलतियों से पूरे त्याग के किरदार को गंदा कर देते हैं सर्मनाक जब कि बो खुद उस गंदगी में डूबे होते हैं--
एक बार भी कभी पुरूषार्थ ने यह सर्म महसूस नहीं की कि आखिर हम इतने बदनाम क्यों है कि हमारे आसपास कोई स्त्री मात्र खड़ी भी हो जाए तो बदनाम और कलंकित हो जाती है अपने व्यक्तित्व में पवित्रता लाने की बजाए इतनी गंदगी क्यों और छूत अछूत जैसे सोच पढ़-लिखकर भी क्यों नहीं स्वयं की पवित्रता का विस्तार कर सकी क्योंकि स्त्री पुरुष की सोच में भोग की वस्तु होकर रह गई पुरुष उस सोच और उस गिरे हुए चलन को शिक्षा के द्वारा भी खत्म नहीं कर सका और एक अशिक्षित स्त्री पुरुष को पढ़ने का हुनर सोच विकसित होते ही--
एसी स्थिति में कमजोर स्त्री का व्यक्तित्व टूटना संभव हो जाता है लेकिन इसी को ईश्वर देखता और भांपता भी है कि सत्यता को किस तरह का मार्ग देना चाहिए और देते भी हैं-- हमने कलम में उतारा भी है कहीं कि जख्मों पर हम महंगी पट्टियां बांधते हैं तो हम भुक्त भोगी है कहीं न कहीं उन दर्द और पीड़ाओं से जो संसार ने उसे दिये हैं ईश्वर से ज्यादा हां हमने वही किया जिससे हमें समाज और रिश्तों ने यह कह कर तोड़ा कि रिवाजों में हम जैसा खिलाएंगे, और पहनाएंगे, चलाएंगे, हमें वैसा ही चलना, पड़ेगा--
हमने उस रूल को नकारा है आखिर अकेले स्त्री ही क्यों इस लिए जब स्त्री पुरुष एक दूसरे से पूरक हैं एक दुसरे के बिना अधूरे हैं तो सिर्फ सारी रीति रिवाजें अकेले स्त्री ही क्यों पुरुष क्यों नहीं आखिर उसे दिया ही क्या इस समाज और रीति रिवाजों ने विधवा हुई तो समाज के लिए अपशगुनी हो गई रंग छीनकर सफेद वस्त्र देकर उसे अग्नि परीक्षा के लिए सबसे दूर कर दिया बदरंग बनाकर उसे हर पल उसके जख्मों को नस्तर से कुरेदा गया हर पल उसकी तकदीर से उसे नफरत कराने के प्रयास किये गये-- और पुरुष हर रीति रिवाज और चाल चलन त्याग से स्वतंत्र कर दिया गया एसा नहीं था कि स्त्री की ही तकदीर सामिल होती हर बुरे के लिए पति की मृत्यु के लिए उसके माता-पिता रिश्ते सबकी जुड़ी होती है और सबसे सच बात तो यह है कि हर इंसान अपनी तय उम्र लेकर आता है ये दोषारोपण इंसान ने ही बनाए हैं ईश्वर ने नहीं अफसोस कितना कमजोर है पुरूषार्थ है जब किसी स्त्री को उसके किरदार से नहीं गिरा पाता है तो उसके कलेक्टर पर बार करता है क्या उस स्त्री के हृदय का बो देवता बन कर रह सकता है उसने अपना महत्व उसी दिन उसके हृदय से हटाकर घृणा भर दी थी जिस दिन उसने उसके करेक्टर पर बार करना शुरू किया--विस्वास की दीवार जब टूट जाती है और झूंठ ने बो तमाशा किया कि उसकी बीस साल के तप और तपस्या त्याग पर शारिरिक भोग की भूंख के त्याग पर कीचड़ परोसा कुछ सत्य एसे भी अंदर छिपे होते हैं जिन्हें बताने से आज का परिवर्तन हास्य में ले जाएगा पर सच नहीं मानेगा उसे यह भी पता नहीं कि उसने ऐसा करके कितने जन्म खराब और नर्क में ढकेल दिये हम क्या बोलेंगे एसे लोगो के लिए जिनका हमें पूर्ण विश्वास के साथ पता है कि ईश्वर उन्हें हमारे ऊपर किए गए हर अत्याचार का बदला अपने ढंग से लेगा क्यों कि उसे और ईश्वर को उसके द्वारा किए गए कर्मों पर पूर्ण भरोसा है और तब ईश्वर के द्वारा पकाया गया मानव व्यक्तित्व मूर्ति आकार के लिए उसने तैयार किया था और हथोड़ा आदमी मार बैठा हमें पता है कि हम क्या और हमने किस हाल में सफर तय किए हैं यहां तक आने में ये शोर और तमाशे की चीजें नहीं होती लेकिन आदमी ढोंग की भाषा ज्यादा जल्दी समझ लेता है लोस हमारा बिल्कुल नहीं हुआ शोर चीखा और सत्य बेहरा हो गया उस गंदगी को सुनने--और जिस मार्ग की गति शांति और धीमी थी बो दुश्मनों की भीड़ ने आकर तेज और कर दी कुछ अधूरे काम थे जो डिसीजन लेने में कमजोर पड़ जाते थे बो लेने में हम सक्षम हो गये सबसे बड़ी परीक्षा एक ग्रहस्थ जीवन में होती है मोह के बंधन से मुक्त होना हमने उस पर काम किया है इस दर्द में और हम 80, प्रतिशत सफल भी हुए हैं हमें न मंदिर की आवश्यकता है न बेस भूषा की हमें मन पर क्या पहनना है बो हम ठाट से पहनते हैं और पहनेंगे लोगों ने हमारा परिचय गरीब कर्जदार, चापलूसों, और करेक्टर हीनता का दिया, उन्हें यही पता नहीं था कि हम जो भी करते हैं खुलेआम डंके की चोट पर करते हैं छुपाकर नहीं लोग अपनी जुबाने दूषित करते रहे पर सुबूत आज तक नहीं दे पाए हमारे कर्मों का न दे पाएंगे भले ही सिक्के फैंककर क्यों न हमारे किरदार को---और हमने भी अपने दुश्मन तभी तक गिने जब तक कि गिनती उंगलियों तक रही फिर खुद पर गर्व करने लगे भीड़ को देख कर पीछे नहीं देखा कभी ऊपर देखा तो कभी नीचे देखा,
न जमीन से जड़े उखड़ने दीं--
न सूर्य की तपिश ठंडी होने दी--

घुटने लगा जब दम गुरूर का--
हमारे अंदर--
तो बाहर श्मशान की सैर तक निकले--
कौन कहता है कि तन्हाइयों से ऊब कर हम--
रौनकों से बे आबरू होकर निकले--
जीवन का मर्म पढ़ रहे हैं हम--
जन्म और मृत्यु का सत्य--
हाथों में हाथ मोह और स्पर्श से--
खाली हाथ जब निकले--
लेखिका,पत्रकार,दीप्ति,चौहान।

@ #,ए मेरे रब ये कैसी उधारी थी-- जो तिल-तिल सांसों से चुकाई गई--कि मौत ने निवाले बदल दिए--और दौलत खाने लगी--(कहानी हरीश ...
25/03/2026

@ #,ए मेरे रब ये कैसी उधारी थी--
जो तिल-तिल सांसों से चुकाई गई--
कि मौत ने निवाले बदल दिए--
और दौलत खाने लगी--

(कहानी हरीश राणा के) -----जीवन की----
दौलत ने सांसों का भी व्यापार कर रखा है
चोट ने हरीश राणा की जिंदगी को कैसे ऐतिहासिक बनाया किस तरह मौत ने उनकी जिंदगी में पनाह ली तेरह साल तक मुंह में भरे रही,
(न पूरी तरह चबाया न उगला)
ये नशीवो के खेल नहीं हैं तो क्या हैं इतिहास तो बना गये राणा पर देखिए न किस तरह का
जन्म दाइनी मां और बाप कहानी के मुख्य किरदार रहे और जमाने को शायद यह भी दिखा गये कि दर्द और मुसीबत में माता पिता के शिवाय दूसरा कोई नहीं है,
कि तेरह साल से मौत के मुंह से ममता को छीनते रहे और अंत में बक्त से हार गए क्योंकि सांसें खरीदना महंगा हो गया संतान के लिए पैसों ने साथ छोड़ा तो ममता के लिए अदालतों तक मौत की अनुमति लेने को मजबूर कर दिया दौलत और मौत ने ये कैसा दर्द था माता पिता के जीवन में जो दर्द ने सारी हदें पार कर दी कि ममता के लिए अदालतों तक मौत मांगने को मजबूर कर दिया दौलत ने ये कैसा खेल खेला कि खुद की अहमियत बताने के लिए ममता की मौत मांगने पर--काश ये अंतिम रश्म इतना दिखाए बगैर अलविदा कह जाती तो माता पिता की ये एतिहासिक मजबूरी अदालतों के बाहर रह जाती लेकिन विश्वपटल पर प्रख्यात कर गई-ये कैसी परीक्षा थी इन दो मालियों की जो अपूर्ण रही न फूल खिला न पूरी तरह मुर्झाया--
चोट संतान को लगी और दर्द माता पिता के दामन में आ गिरा हरीश राणा 13,साल तक
बिस्तर पर बेखबर रहे उन्हें कहां खबर थी कि माता पिता की तड़प बेवसी और तबाही और मजबूरी ने उन्हे किस हद तक तोड़ा है न दर्द का एहसास था न माता पिता की बेवसी का--
ए मेरे रब ये कैसी उधारी थी,,
जो तिल तिल सांसों से चुकाई गई,,
मौत ने निवाले बदल दिए--
और दौलत खाने लगी--
लेखिका-पत्रकार-दीप्ति-चौहान।

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Etah
207001

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