24/05/2026
@ #,उन घरों में अदब खांसता था--
दरारों से होकर कब गुजर गए,,
बे मने घर अब अच्छे नहीं लगते,,
इन्हे फिर से बुलालो,,
बे आत्मा समाज अच्छा नहीं लगता,,
भटक रहा है इधर से उधर,,
आओ इसे फिर से,,
बुला लो,,
अभी दोनों इतनी दूर नही पहुंचे होगे,,
कि आवाज न पहुंचे आओ,,
मिलकर उन्हीं रिश्तो के हवाले से आवाज लगा कर बुलालो,,
लाख रंग भरने से दीवारे खुश नहीं हैं,,
इनके आशुओं की नमी सूखकर झड़ने लगी है,,
सुबह साम इकट्ठा करने में अब झाड़ू भी कराहने लगी है,,
प्यासी और सूखी घरों की आंखें,,
रेतीली हो गई है,,
इनकी आंखों में हंसती हुई वही पुरानी,,
नमी बुला लो,,
ऊंची ऊंची इमारतों में चीखते सन्नाटे बहुत घुटन देते हैं,,
हर एक कमरों की फिर से रोनके वही रौनकें बुला लो,,
बचे कुचे तन्हा दरख्तों की,
तन्हा छांव जलाने लगी है,,
इन लकड़हारों के हाथों से,,
कुल्हाड़ी छीन कर फिर से घनेरी सीतल छांव उगा लो,,
तपती छतों की मुंडेरों पर,,
अब परिंदे नहीं बैठते हैं,,
इनके जलते पांव की छांव,,
और आंगन में उतरने के लिए,,
नीम के दरख्त लगा लो,,
न भोर हंसती है न साम मग्न मय है,,
फिर से खुले आंगन बाले,,
वही पुराने घरौंदे बना लो,,
भोर में दादी दही मथकर,,
सबको बांटती थी,,
और मां माथे पर आंचल रखकर,,
मुस्करा कर सबके माथे पर हाथ,,
फिराकर दुलार कर उठाती थी,,
उसके हंसते हुए चेहरे बाली,,
वही भोर बुला लो,,
ये घरों की वापसी समाज को साथ ले आएगी,,
इतनी दूर भी नही निकले हैं,,
कि लौटने तक आवाज नहीं जाएगी,,
आवाज देकर इन्हे रिश्तों के हवाले से,,
फिर से बुला लो,,
परिवर्तन के रंग बड़े बेढंगे लगते हैं,,
प्रकृति की हया पर बे मौसम,,
आकर ठहरे पतझड़ को हटाकर,,
मां मय सीतल आंचल,,
आओ मिल कर पहना लो,,
दौलतों के शोर ने चेन और अमन खरीद लिया,,
आओ मिल दोनों को वापस बुला लो,,
बस्तियों की फिर वही है पुरानी,,
रौनक लोटा लो,,
आओ खेतों में स्वस्थ खुशहाली बोकर,,
निवालों को धीमे जहर से बचा लो,,
जो अपनों के हाथ से भूंख को परोसते हैं हम,,
फिर वही मन से दुआओं बाले हाथ,,
हाथों से पकते निवाले,,
भूख की तृप्ति बुला लो,,
इन पत्थरों की बस्तियों में,,
सोधी मिट्टी का अब स्पर्श नहीं होता है,,
दफन है पत्थरों में जन्म भूमि की रज,,
आओ चीर कर बाधाएं पांवों को,,
जलने से बचालो,,
उन कच्चे घरों में अदब खांसता था,,
बातें बातों से बात करतीं थीं,,
दिलों को ठेस नहीं लगती थी,,
खूब गिरते और उठते थे,,
उन कच्चे घरौंदों में,,
चोट नहीं लगती थी,,
लहू निकल कर भी,,
लहू तक सफर करता था,,
गहरे घाव भी मां की फूंक से ओंढ़ जाते थे,,
चोट भी मां से अदव से पेस आती थी,,
घर से निकल कर मंदिरों में,,
क्या पूजते हो यारो,,
जिंदा श्रद्धा छोड़कर मां बाप में,,
पत्थर को पूजते हो यारो,,
बो गांवों के बचपन बहुत याद आए,,
जमाने ने जब हमको ये दिन दिखाए,,
चंद कदमों में झुलसे वदन पांव अपने,,
बो नीम और पीपल बहुत याद आए,,
लेखिका,पत्रकार,दीप्ति चौहान।✍️