01/03/2026
रोहन अपनी चमचमाती कार से उतरा। हाथ में शहर के सबसे महंगे होटल का 'फूड पैकेट' था। वह फेसबुक पर 'Humanity First' नाम का पेज चलाता था और आज उसे एक 'वायरल पोस्ट' की सख्त ज़रूरत थी।
सड़क किनारे, धूल और पसीने से लथपथ, एक बूढ़े बाबा बैठे थे। उनकी हड्डियाँ साफ़ दिख रही थीं और आँखें धंस चुकी थीं। वे भूख से इतने बेहाल थे कि ठीक से बैठ भी नहीं पा रहे थे।
रोहन ने अपना महंगा स्मार्टफोन निकाला, कैमरा ऑन किया और बाबा के पास जाकर खड़ा हो गया।
"बाबा, मुस्कुराओ! ज़रा पैकेट की तरफ देखो, हाँ, ऐसे ही!" रोहन ने निर्देश देते हुए कहा।
बाबा ने कांपते हाथों से पैकेट पकड़ा। उनकी उंगलियाँ थरथरा रही थीं। वे उसे खोलने ही वाले थे कि रोहन ने उन्हें टोक दिया।
"अरे बाबा, रुको! अभी फोटो साफ़ नहीं आई। ज़रा कैमरे की तरफ देखकर अच्छी सी मुस्कान दो, ताकि लोगों को लगे कि तुम खुश हो।" रोहन ने झुंझलाते हुए कहा।
रोहन अलग-अलग एंगल से फोटो ले रहा था। कभी ऊपर से, कभी नीचे से। वह बाबा को बार-बार 'पोज़' बदलने को कह रहा था। लोग गुज़र रहे थे, कुछ रुककर देख रहे थे, पर कोई कुछ नहीं कह रहा था।
करीब 10 मिनट तक यह 'तमाशा' चलता रहा।
आखिरकार, बाबा ने अपनी सूखी, फटी हुई आवाज़ में, बेहद शांत स्वर में कहा—
"बेटा, अगर फोटो खिंच गई हो और तुम्हारा 'काम' हो गया हो... तो क्या अब मैं ये खाना खा सकता हूँ? मुझे तीन दिन से भूख लगी है, अब सहा नहीं जा रहा।"
बाबा की वो खामोश, दर्द भरी आवाज़ रोहन के कानों में किसी हथौड़े की तरह लगी।
रोहन सन्न रह गया। उसका बढ़ा हुआ हाथ रुक गया। उसने देखा कि बाबा की आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सा 'अकेलापन' और 'भूख की इंतहा' थी।
उसे एहसास हुआ कि जिस 'मुस्कान' को वह कैमरे में कैद करना चाहता था, वह भूख से तड़पते इंसान के लिए एक 'क्रूर मज़ाक' था। वह 'मदद' नहीं कर रहा था, बल्कि एक 'नुमाइश' कर रहा था। वह उस बूढ़े की लाचारी को अपने 'लाइक्स' के लिए इस्तेमाल कर रहा था।
रोहन ने चुपचाप अपना फोन जेब में रख लिया। उसका सिर शर्म से झुक गया। उसने बाबा के कांपते हाथों पर अपना हाथ रखा और धीरे से कहा, "माफ़ कर दीजिये, बाबा।"
बाबा ने कुछ नहीं कहा, बस पैकेट खोलकर सूखी रोटी का पहला निवाला मुंह में डाल लिया। उनकी आँखों से अब आंसू बहने लगे थे। वह आंसू ख़ुशी के नहीं, बल्कि भूख मिटने के सुकून के थे।
रोहन वहां से चला गया, पर उस दिन उसने एक बड़ा पाठ पढ़ा। सच्ची सेवा कैमरे के शोर में नहीं, बल्कि उस खामोशी में होती है जब किसी का पेट भरता है और दुआएँ दिल से निकलती हैं।