22/09/2026
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट कहती है—
लोकतंत्र की मौत अचानक नहीं हुई।
उसे धीरे-धीरे मारा गया।
पहले उसके वोट खरीदे गए,
फिर उसके प्रतिनिधि।
पहले उसके सवाल मारे गए,
फिर उसकी आवाज़।
लेकिन -
उसकी साँस तब भी चल रही थी
जब वोट पैसों से मिल रहे थे।
उसकी नब्ज़ तब भी मिल रही थी
जब विधायक पार्टी बदल रहे थे।
मौत तब हुई—
जब जनता की उँगली पर लगी स्याही से ज़्यादा
एक बंद कमरे की सौदेबाज़ी की कीमत हो गई।
अजीब बात है।
कल तक जो भ्रष्टाचारी थे,
आज सत्ता का श्रृंगार हो गए हैं।
कल तक जो व्यवस्था के लिए बीमारी थे,
आज नैतिकता का अवतार हो गए हैं ।
ना काशी ना बनारस
ना पटना हरिद्वारों में है
लगता है असल गंगा तो बहती
सत्ता के गलियारों में है
उसमें डुबकी लगाते ही
सब आरोप साफ़ हो जाते हैं,
चोरी, डकैती छोड़ो
क़त्ल भी माफ़ हो जाते हैं।
पर सवाल ये है कि
क्या अभियुक्त सचमुच बदल गए हैं,
या सिर्फ़ झंडा बदला हैं
और उनके इल्ज़ाम धुल गए हैं?
भविष्य में जब भी लोकतंत्र के इस शव
की फाइल को जब भी उठाया जाएगा,
मौत का कारण सिर्फ एक शब्द बताया जाएगा - नीलामी
अज्ञात