NEKI KI DAWAT

NEKI KI DAWAT नेकी की दावत देता हूँ,
बुराई से बचने की बात करता हूँ �
शायद मेरी एक बात,
किसी की ज़िंदगी बदल दे…”

24/05/2026

अल्लाह की रजा के लिए मोमिन इस शदीद गर्मी मे अराफात के मैदान मे खड़े होंगे अपने ईमान के साथ ❤

हज के दौरान अराफात के मैदान 🕋🕋

- - ) और वहां ठहरने (वुकूफ़)
का इस्लाम में सबसे बड़ा दर्जा है।

इस मौके पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अराफात के मैदान में दिए गए अपने ऐतिहासिक 'विदाई हज' के खुत्बे (Al-Wida Khutba) में कई अहम बातें फरमाईं:दुआओं की क़बूलियत:

आप ﷺ ने फरमाया कि अराफात के दिन अल्लाह की रहमत बहुत करीब होती है। इस दिन की गई दुआ सबसे बेहतरीन दुआ होती है।गुनाहों की माफी: अराफात का दिन मगफिरत (माफी) का है

। हदीस में आता है कि इस दिन अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को माफ करते हैं और जहन्नुम से लोगों की सबसे ज्यादा आजादी इसी दिन होती है।

इंसानी हुकूक और बराबरी: आपने फरमाया कि किसी अरबी को अजमी पर और किसी अजमी को अरबी पर कोई फजीलत (बड़प्पन) हासिल नहीं है, और न ही किसी गोरे को काले पर या काले को गोरे पर। सब आदम (अलै.) की औलाद हैं

औरतों के हुकूक: आप ﷺ ने फरमाया कि औरतों के मामले में अल्लाह से डरो, उनके साथ भलाई और नरमी से पेश आओ

24/05/2026
21/05/2026

20/05/2026

19/05/2026

18/05/2026

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16/05/2026

14/05/2026

14/05/2026

*❓ सवाल नंबर 1 :*

*(1) अगर किसी व्यक्ति ने पिछले पाँच साल तक क़ुर्बानी नहीं की, जबकि उस पर क़ुर्बानी वाजिब थी, तो अब हर साल की क़ुर्बानी के बदले एक बकरे की कीमत सदक़ा करे या वैसे जानवर जिन के हिस्सों (7 हिस्सों में से 1 हिस्सा) के हिसाब से 5 हिस्सों की रकम दे ? जबकि उसने उस समय जानवर या हिस्सा नहीं खरीदा था।*
*सवाल नंबर 2*
*(2) जिस तरह ज़कात की रकम शरई हिला करके मदरसे की तामीर (Construction) में लगाई जा सकती है, क्या उसी तरह पिछली क़ुर्बानियों की जो रकम अदा करना ज़रूरी है, उसे भी हिला के ज़रिए मदरसे की तामीर में लगा सकते हैं?*

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*✅ जवाब:*

*(1) अगर किसी ने बिना किसी उज़्र (मजबूरी) के पाँच साल तक क़ुर्बानी नहीं की, तो वह वाजिब को छोड़ने की वजह से गुनाहगार हुआ। अब उस पर ज़रूरी है कि तौबा भी करे और हर साल की क़ुर्बानी के बदले एक बकरे की कीमत ही सदक़ा करे।*

* *ऐसे जानवर जिनके सात हिस्से होते हैं उनके हिस्सों की कीमत के हिसाब से सदक़ा करना जायज़ नहीं है, क्योंकि फ़िक़्ह की किताबों में इस सूरत का यही हुक्म बयान किया गया है।*

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*(2) जी हाँ, पिछली क़ुर्बानियों की रकम को शरई हिला के ज़रिए मदरसे की तामीर वगैरह में लगाया जा सकता है, क्योंकि यह सदक़ा वाजिब है।*

*और सदक़ात-ए-वाजिबा (जैसे ज़कात, सदक़ा-ए-फ़ित्र आदि) का यही हुक्म है कि उन्हें शरई तरीके से हिला करके तामीरी कामों में भी लगाया जा सकता है*।

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*📚 हवाला ):*
*مختصر فتاویٰ اہلِ سنت، صفحہ 123*

*पोस्ट जारी रहेगा.... ✍️*

13/05/2026

13/05/2026

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