Mahuri-Mayank

Mahuri-Mayank Mahuri Mayank is the oldest magzine of mahuri vaishya pub in 1914 by Babu Prabhudayal Gupt Editor Babu Gopi Chand Badgaway Bihar

16/02/2020

#सिस्टम_का_खोखलापन
सिस्टम का खोखलापन
बहुत कचोटता है मुझे,
आज़ादी के सत्तर साल बाद भी
जब शौच और शौचालय के लिए
व्यापक कैम्पेन चलाई जाती है!
दोषी कौन है सरकार या लोग ?
क्या सड़कें इसलिए बनाई जाती हैं
कि सुबह और शाम उनके किनारे
शौच करके गंदा कर दिया जाय?
बहुत कचोटता है मुझे,
जब दशकों से देखता हूँ
कि बोर्ड की परीक्षा में नकल कराने
अविभावकों का हुजूम सेंटर पर
सिस्टम को तोड़ते हैं और कहते हुए
नहीं होते शर्मिंदा कि सिस्टम खराब है।
बहुत कचोटता है मुझे,
जब अविभावकों को देखता हूँ
कि बचपन में तहज़ीब की रौशनी नहीं देते
और जब बड़े होकर लड़के बिगड़ जाते हैं,
तो कहते नहीं लजाते कि सिस्टम खराब है।
बहुत कचोटता है मुझे,
जब वोटों के खातिर,जातियों में बांटते हैं .....
हिन्दू-मुसलमान में बांटते हैं लोगों को
और जब झगड़े -फसाद होने लगते हैं
तो कहते हैं कि सिस्टम खराब है।
अरे भाई! इस सिस्टम में हैं कौन????
आप और हम !!!!!!!
#निराला_मनोज
16/02/2020

28/02/2019

अभिनन्दन
"""""""""""""""
बेचैन मन
बेताब अभिनंदन
कैसा क्रंदन।।

भीतर चले
समर का भँवर
मन कंपन।।

दीखने लगा
कुछ पल रौशन
अभिनंदन।।

रणभेरी का
शंख गुंजयमान
कहाँ अमन।।

ना'पाक' यहां
विष घोले जहाँ
सुनो चमन।।

आतंकवाद
मिटे अभिशाप जो
होगा अमन।।
© #मनोज निराला

30/09/2018

#भींगे-अक्षर
•••••••••••••••••••
आँसुओं से सराबोर अक्षर
एकबार फिर धधक उठेगा....
मौसम के बदलने से
धुंधले शब्द भी खिल जाएंगे.
उन यादों की चिट्ठियों से
बादलों ने कुछ रंग चुराया है....
बस इंतजार है इक सूरज का
जो बारिश के फुहारों में
नील गगन के कैनवास पर
सतरंगी इंद्रधनुष उकेरेगा
मैं फिर पुरानी धूल जमी
किताब के पन्ने पलटूंगा.
और.. कुछ भींगे अक्षर.....
चांद के सीने पर टांक दूँगा.
फिर देखना अपनी छत से
चांद पर कुछ सुनहरे शब्द
अवश्य दमक रहें होंगे.......
©निराला मनोज

...एक दीया जला दें***************मिट्टी को माथे पर लगाता हूं अक्सरयह मुझे मेरी औक़ात बताता है......नदियों से सीखा है जीने...
17/10/2017

...एक दीया जला दें
***************
मिट्टी को माथे पर लगाता हूं अक्सर
यह मुझे मेरी औक़ात बताता है......
नदियों से सीखा है जीने का सलीका
मौजों से लड़ना,मौज में रहना अक्सर
किनारों को तोड़ने में मर्यादा रखता हूं
पर किनारों में टूटने की मर्यादा कहां?
अरमां रखता हूं जहां को बदलने की
पर वक़्त ने वक़्त को वक़्त दिया कहां?
डायमंड की घड़ीवालों को भी देखा है
वक़्त उनको भी वक़्त नहीं देता है।
और बिना घड़ीवालों को भी देखा है
वक़्त ही फर्श से अर्श तक पहुँचाया है
ईश्वर से हर वक़्त दगा करते हैं हम
अपना स्वार्थ साधने के लिए पर......
पर ईश्वर का भय दिखता है क्षणभर
महज मंदिरों में दिखावा के लिये.....
जब पैसे से भगवान नहीं खरीद सकते
तब मूर्तियों में भगवान ढूंढते हैं क्यों?
सचमुच मूर्तियों में भगवान बसते हैं?
तो चलें आज गरीब की झोपड़ी में हम
लक्ष्मी-मूर्ति के साथ एक दीया जला दें।
#निराला मनोज

30/09/2017

#रावण_दहन
**********
देखो!
पचास-पचास फीट के रावण को
पांच-पांच फीट का मानव दहन कर रहा है।
मानो!
पांच-पांच मन के वजन को
पांच-पांच किलो का तन वहन कर रहा है।
मानो!
पचास-पचास गुंडों को
एक फिल्मी हीरो दमन कर रहा है।
मानो!
बाली सहित तीन-तीन लोकों को
पांच-पांच अंगुल का वामन भस्म कर रहा है।
©निराला मनोज

14/09/2017

ताश है क्या
**********
सुकून इक तलाश है, क्या ?
दर्द इसका लिबास है क्या ?

देखो हवा ज़हर पी के आई
सारा आलम उदास है, क्या?

एक झूठ के हजार हैं चेहरे,
अपने-अपने क़यास हैं क्या?

अपनी ही गोटी है लाल करना
उनकी जमीं भी ख़ास है, क्या ?

मठ-ओ-मंदिर की हिफ़ाजत में,
वह आदमी! बदहवास है, क्या ?

सुधर तो सकती है फ़िज़ा-ए-महफ़िल
पर घिसे-पिटे लोगों का ताश है, क्या ?

घुट रहा है इनसे जमाना जाने कब से,
आम नहीं कुछ खास की आस है,क्या ?

#निराला मनोज

03/09/2017

#जल्लाद
^^^^^^^^^^^^
मैं हूँ जल्लाद
सरकारी जल्लाद
मेरा धंधा है फांसी देना
मृत्युदंड पाए मुल्ज़िम को.
मुझे देख रूह काँपती है उनकी
सैकड़ों को फंदे पर लटकाया हूँ.
पर मेरा दिल हमेशा काबू में रहा
कि कुछ खूंखार अपराधी घट गए.
कभी आपने सोचा सीने में मेरा भी
एक नाज़ुक दिल है धड़कता हुआ.
कोमल भावनायें हैं, प्यार है,खुशी है
और गम रूपी सागर की लहरें है उनमें.
कई बार मेरा मन विद्रोह कर देता है
जब एकदिन तीन लोगों को लटकता हूं.
मैं पंद्रह की उम्र में पिता से सीखा था-
यह कर्म स्वैछिक रूप से अपनाया है.
इसे करने को कोई दूसरा नहीं आता.
मैं मानता हूं जल्लाद का कर्म नीचकर्म है
मैं हनुमान और काली का उपासक हूं.
सूली लटकाने के पूर्व क्षमा माँगता हूं.
पैशाचिक दृश्य पूर्व आंखें मूंद लेता हूं.
क्योंकि मृत्यु का जीवंत बोध है मुझे
मैं भी किसी का भाई ,किसी का पति,
और और...........किसी का पिता हूँ।
©निराला मनोज

03/09/2017

#जल्लाद
^^^^^^^^^^^^
मैं हूँ जल्लाद
सरकारी जल्लाद
मेरा धंधा है फांसी देना
मृत्युदंड पाए मुल्ज़िम को.
मुझे देख रूह काँपती है उनकी
सैकड़ों को फंदे पर लटकाया हूँ.
पर मेरा दिल हमेशा काबू में रहा
कि कुछ खूंखार अपराधी घट गए.
कभी आपने सोचा सीने में मेरा भी
एक नाज़ुक दिल है धड़कता हुआ.
कोमल भावनायें हैं, प्यार है,खुशी है
और गम रूपी सागर की लहरें है उनमें.
कई बार मेरा मन विद्रोह कर देता है
जब एकदिन तीन लोगों को लटकता हूं.
मैं पंद्रह की उम्र में पिता से सीखा था-
यह कर्म स्वैछिक रूप से अपनाया है.
इसे करने को कोई दूसरा नहीं आता.
मैं मानता हूं जल्लाद का कर्म नीचकर्म है
मैं हनुमान और काली का उपासक हूं.
सूली लटकाने के पूर्व क्षमा माँगता हूं.
पैशाचिक दृश्य पूर्व आंखें मूंद लेता हूं.
मैं भी किसी का भाई ,किसी का पति,
और और...........किसी का पिता हूँ।
©निराला मनोज

18/06/2017

#उत्थान
"""""""""""
प्रकृति की गोद से
सुकून के कुछ पल चुराया हूँ।
अन्यथा समय का तिलस्मी जंजीर ने
मुझे आज़ाद कब किया था?
मैं क्या करूँ,क्यों करूँ,
किसके लिए करूँ,कहाँ करूँ
इन यक्ष प्रश्नों नेआहत किया है।
सर्वत्र अहम और वहम का
कु-चक्र पर कतरने को तैयार है।
कोई कहता है- रुक जाओ.......
मैं कहता हूँ-चला ही कब था?
जो रुक जाऊं,पैरों में जंजीरें थी।
रास्ते दुर्गम और पथरीली थी,
उन्हें सुगम और सपाट बनानी थी
जिस पर आम औ खास आदमी भी
सरपट दौड़ कर चल सके।
और अपना उत्थान कर सके।
©निराला मनोज

15/06/2017

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
~ अदम गोंडवी

07/06/2017

क्यों है?
★★■★★
आज बेमौसम बरसात क्यों है?
दिल में सुलगता ये आग क्यों है?

क्यों तिल तिल जलाता मेरे मन को
'जो'राख हुई यादें आज राग क्यों है?

आदमी कम क्यों तौलता आदमी को
आदमी मेंआदमी का ऐसा विराग क्यों है?

अहम का पहाड़ बढ़ता ही जा रहा है
रोकने का नहीं कोई सुराग क्यों है?

जो स्वच्छन्द सरिता को बहने से रोक दे
उनका आवाम में इतना अनुराग क्यों है?
©निराला मनोज

21/05/2017

तुलसी/नागफनी
**************
कोने में खड़ी तुलसी
फैले हुए नागफनी से
एक सबाल पूछती है-
न जाने अब आंगन
क्यों सूना लगता है?
पहले यहां गूंजती थी
किलकारियां बच्चों की
अब पालतु पिल्ले
यहां भौकतें हैं भों-भों
रिश्तेदार भी हो गए दूर
लड़के पढ़ने गये विदेश
आदमी हो गया मगरुर
पाँव के नीचे जमीन
आज सरक रही है.....
और आदमी जश्न में
हो रहे कितने मशहूर?
नागफनी ने उत्तर दिया-
क्यों हो रही हो उदास
आदमी आदमी नहीं रह गया
वह बन गया है अब मशीन
डालते रहता है अपने अंदर
ईंधन के नाम पर कचरा
सोचता है इक्कीसवीं सदी है
विज्ञान-कंप्यूटर की सदी है,,,,,
बिजली तो बन ही जाएगी।
©मनोज निराला

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