Azhar Sabri

Azhar Sabri Educating minds by profession, but my heart lives between the lines. Proud author of 3 books. Living life one chapter at a time.
(1)

31/05/2026

अक्स खो दूँगा तो ईजाद करूँगा तुझ को।
ख़ुद को भूलूँगा तो फिर याद करूँगा तुझ को।

तू मेरे ख़्वाब की दहलीज़ पे दस्तक तो लगा,
अपनी पलकों पे मैं आबाद करूँगा तुझ को।

ये जो ख़ामोश से लफ़्ज़ों का समंदर है मेरा,
इक न इक रोज़ मैं फ़रियाद करूँगा तुझ को।

अब तिरी याद से रिश्ता भी रगों जैसा है,
कैसे मुमकिन है कि बर्बाद करूँगा तुझ को।

लोग रखते हैं तुझे अपनी ज़रूरत की तरह,
मैं तिरे इश्क़ को आज़ाद करूँगा तुझ को।

तू मेरे शे’र की, ग़ज़लों की ज़रूरत है मियाँ,
अपनी हर नज़्म में ईजाद करूँगा तुझ को।

~ Azhar Sabri ~

31/05/2026

दिल में जो उतर आए वो दिलबर नहीं गिरता।
सजदे में जो झुक जाए वो पैकर नहीं गिरता।

मंज़िल की तमन्ना हो अगर दिल में मुसलसल,
ठोकर से कभी राह का रहबर नहीं गिरता।

अंदाज़-ए-नज़र जिसका ज़माने से जुदा है,
वो अहल-ए-वफ़ा टूट के दर-दर नहीं गिरता।

पहचान है ये ज़र्फ़ की और ऊँचे शजर की,
फल आए तो वो झुकता है, मर कर नहीं गिरता।

काँटों से गुज़रने का हुनर जिसको मिला हो,
ठोकर से कोई साहिब-ए-जौहर नहीं गिरता।

जो माँ की दुआओं का पहन लेता है साया,
आफ़त के किसी धूप में वो सर नहीं गिरता।

नेकी की कमाई पे जिसे नाज़ है अपने,
वो शाहों के दरबार में झुक कर नहीं गिरता।

सूरज की तरह जिसका है हर रोज़ का उठना,
कुछ देर के अंधेरो से अंबर नहीं गिरता।

किरदार की अज़्मत को जो खोने नहीं देता,
दौलत के तराज़ू में वो जौहर नहीं गिरता।

बातिल की हवाओं ने जिसे घेर लिया हो,
हक़ पर जो अड़ा हो वो कलंदर नहीं गिरता।

महफ़िल में जो औरों के लिए रौशनी बाँटे,
वो शख़्स किसी दिल से उतर कर नहीं गिरता।

~ Azhar Sabri ~

30/05/2026

एक क़तरा हूँ, समंदर में मिला दो मुझ को।
मेरी हस्ती का कोई और पता दो मुझ को।

ज़िंदगी बीत रही है किसी मलबे की तरह,
ढह गया हूँ तो ज़रा फिर से उठा दो मुझ को।

मैं वो बुझता हुआ शोला हूँ जो बे-दम है अभी,
आख़िरी बार ज़रा और हवा दो मुझ को।

थक गया हूँ मैं ज़माने की जफ़ाएं सह कर,
अपनी ज़ल्फ़ों के साए में सुला दो मुझ को।

अब तो साया भी मेरे साथ नहीं चलता है,
मेरे होने का कोई और पता दो मुझ को।

बात करने को तरसता हूँ तुम्हारी अक्सर,
बस कभी नाम मेरा लेके बुला दो मुझ को।

अब तो ख़ुद से भी मुलाक़ात नहीं होती है,
मैं कहाँ खो गया हूँ, आके बता दो मुझ को।

तुम जो चाहो तो भुला सकते हो पल भर में मुझे,
हो सके तो यही हुनर भी सिखा दो मुझ को।

आईना बन के रहा उम्र भर औरों के लिए,
अब किसी आँख का मंज़र ही बना दो मुझ को।

~ Azhar Sabri ~

30/05/2026

ज़ख़्म दुनिया को दिखाने से कहाँ भूलेगा।
दिल तुझे ख़ुद से मिटाने से कहाँ भूलेगा।

ज़ख़्म पर वक़्त की चादर भी अगर डालोगे,
दर्द फिर भी तो छुपाने से कहाँ भूलेगा।

लाख कोशिश हो ज़माने की मिटा देने की,
तेरा नक़्शा भी मिटाने से कहाँ भूलेगा।

ख़त जलाओ तो भला ख़ुशबू कहाँ जलती है,
वो असर फिर भी जलाने से कहाँ भूलेगा।

कोई दिल को तेरी यादों से जुदा कब कर दे,
दिल तुझे दिल से भुलाने से कहाँ भूलेगा।

आग सीने में दबी हो तो बुझाई कैसे,
दिल ये शोला भी दबाने से कहाँ भूलेगा।

एक शख़्स ऐसा जो रूहों में समाया है ‘अज़हर’,
ज़िंदगी! उसको मिलाने से कहाँ भूलेगा।

~ Azhar Sabri ~

29/05/2026

किसी ने अपनी कमी की तरफ़ नहीं देखा।
किसी ने दिल की नमी की तरफ़ नहीं देखा।

अजीब दौर है ख़ुद्दारियों की बस्ती का,
कि जिसने देखा, ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा।

शिकस्त-ए-दिल की कभी बेबसी नहीं देखी,
कटी है उम्र, किसी की तरफ़ नहीं देखा।

सभी ने प्यास के चेहरों को ग़ौर से देखा,
किसी ने बहती नदी की तरफ़ नहीं देखा।

नज़र उठाई तो बस बेरुखी का आलम था,
पलट के फिर वो गली की तरफ़ नहीं देखा।

हर एक शख़्स था आईना हाथ में लेकर,
किसी ने अपनी बदी की तरफ़ नहीं देखा।

वो एक शख़्स जो मंज़िल था मेरी राहों की
उसी ने मेरी गली की तरफ़ नहीं देखा

जो बह रहे थे मेरी आँख से जुदाई में
उन आँसुओं की लड़ी की तरफ़ नहीं देखा

तड़प के रह गई ख़ामोशियाँ अंधेरों में,
किसी ने दिल की लगी की तरफ़ नहीं देखा।

~ Azhar Sabri ~

29/05/2026

ज़ुल्मत ने हर चराग़ को बेज़ार कर दिया,
एक लौ ने पूरी रात को लाचार कर दिया।

टूटी हुई थी नाव तो दरिया भी हँस पड़ा,
इक हौसले ने मौज को पतवार कर दिया।

वो आंधियां भी हार गईं हार मान कर,
झोंकों ने जब चराग़ को तलवार कर दिया।

हमको डरा सकी न कभी गर्दिश-ए-जहाँ,
हर एक चोट ने हमें ख़ुद्दार कर दिया।

सूरज समझ रहा था कि हम डूब जायेंगे,
जुगनू के एक अज़्म ने इंकार कर दिया।

ख़ामोशियों ने छीन लिया लफ़्ज़ का गुरूर,
आँखों ने दर्द को भी नमूदार कर दिया।

जलते रहे चराग़ तो मौसम बदल गया,
थोड़ी-सी रौशनी ने अँधेरों को डर दिया।

तिनके थे हाथ में तो हवाएँ थीं ख़ुश बहुत,
मुट्ठी बनी तो वक़्त ने तलवार कर दिया।

~ Azhar Sabri ~

28/05/2026

ज़ुल्मों के सामने जो वफ़ादार हो गए।
ख़ुद अपनी ही नज़र में गुनहगार हो गए।

मझधार के सितम से जो बेज़ार हो गए,
हिम्मत ने हाथ थाम लिया, पार हो गए।

आईना बन के जो भी ज़माने में आए थे,
वो टूट कर ज़माने के औज़ार हो गए।"

तिनके थे हाथ में तो हवाएँ थीं ख़ुश बहुत,
मुट्ठी बनी तो तिनके भी तलवार हो गए।

जुगनू थे कल तलक जो अंधेरों के ख़ौफ़ में,
हिम्मत मिली तो रात के सरदार हो गए।

सच की तलाश में जो अकेले चले थे लोग,
रस्ता मिला तो काफ़िले तैयार हो गए।

माशूक़ की गली में जो बनते थे पारसा,
आई बहार-ए-हुस्न तो बीमार हो गए।

ख़ामोशियों ने जब भी चुनी बुज़दिली की राह,
ज़ालिम के हाथ और भी ख़ूँख़ार हो गए।

~ Azhar Sabri ~

28/05/2026

बशीर बद्र साहब (1935-2026) नहीं रहे।
इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैही राजिऊन 🙏🏼

28/05/2026

लिक्खा हुआ हूँ वक़्त के किरदार की तरह।
ठहरा हुआ हूँ रूह में दीवार की तरह।

आए थे मेरे पास दिलासा लिए हुए,
तन्हा खड़े हैं आज गुनहगार की तरह।

महफ़िल में मेरे लफ़्ज़ सजाए गए बहुत,
बिकता हूँ मैं यहाँ किसी शहकार की तरह।

राहों में बिखरी धूप ने आँचल जला दिया,
मैं भी उतर गया किसी अख़बार की तरह।

लम्हों को जोड़ता हूँ मैं साए की शक्ल में,
रुकता हूँ मैं ज़मीं पे तो दीवार की तरह।

बीता हुआ वो दौर हमें याद है बहुत,
दिल में सजे हैं ज़ख़्म भी दस्तार की तरह।

ज़िंदा हूँ आज तक किसी आवाज़ के बग़ैर,
अज़हर! खड़ा हूँ शहर में दीवार की तरह।

~ Azhar Sabri ~

27/05/2026

बात बढ़ती तो ज़माने को बताते जाते,
ख़ामुशी ओढ़ के हम राज़ छुपाते जाते।

दास्ताँ अपनी अगर सबको सुनाते जाते,
शहर के लोग भी अश्कों में नहाते जाते।

तुमने आवाज़ न दी, वरना हम ऐ दोस्त मेरे,
एक आवाज़ पे दुनिया को भुलाते जाते।

रोक लेता जो कोई हमको मोहब्बत से यहाँ,
हम भी इस शहर में एक घर तो बनाते जाते।

वक़्त ने छीन ली हँसने की अदा भी हमसे,
वरना हर मोड़ पे हम फूल खिलाते जाते।

बात इतनी है कि तुम भूल गए हो हमको,
वर्ना हम आज भी यादों को सजाते जाते।

ख़ाक होना ही मुक़द्दर था सो हम ख़ाक हुए,
वर्ना मलबे से भी इक क़स्र बनाते जाते।

रहा महफ़ूज़ कहाँ दर्द से दिल 'अज़हर' का,
हम तो हर ज़ख़्म को अशआर बनाते जाते।

~ Azhar Sabri ~

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