31/05/2026
अक्स खो दूँगा तो ईजाद करूँगा तुझ को।
ख़ुद को भूलूँगा तो फिर याद करूँगा तुझ को।
तू मेरे ख़्वाब की दहलीज़ पे दस्तक तो लगा,
अपनी पलकों पे मैं आबाद करूँगा तुझ को।
ये जो ख़ामोश से लफ़्ज़ों का समंदर है मेरा,
इक न इक रोज़ मैं फ़रियाद करूँगा तुझ को।
अब तिरी याद से रिश्ता भी रगों जैसा है,
कैसे मुमकिन है कि बर्बाद करूँगा तुझ को।
लोग रखते हैं तुझे अपनी ज़रूरत की तरह,
मैं तिरे इश्क़ को आज़ाद करूँगा तुझ को।
तू मेरे शे’र की, ग़ज़लों की ज़रूरत है मियाँ,
अपनी हर नज़्म में ईजाद करूँगा तुझ को।
~ Azhar Sabri ~