One Step 4new Thought

One Step 4new Thought INFORMATION TO THINK ABOUT ALL THOES THINGS, WHICH IS ONLY HAPPENS IN VERBALY, WRITINGS, PLANINGS, ETC. BUT, NOT IN REALY.

SO, WE WANT TO DRAW YOUR ATTENTION ON THAT PARTICULAR THING WHICH IS WRONG.

- EITHER IT IS NOT IN GOOD WAY OR SOMTHING WRONG.

20/02/2026

#एकलव्य

एकलव्य महाभारत के एक पात्र है। जो अर्जुन और करण के समान ही धनुर्धर थे। एकलव्य के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है।
तो आइये एकलव्य को थोड़ा याद करे।

पहली बात तो ये कि हरिवंश पुराण के अनुसार एकलव्य यदुवंशी राजपुत्र थे, निषाद नहीं। वर्णित है कि महाराज शूरसेन के ५ पुत्र और ५ पुत्रियां थी। सबसे ज्येष्ठ पुत्र थे श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव। दूसरे पुत्र का नाम था देवभाग जिनके पुत्र थे उद्धव। शूरसेन के तीसरे पुत्र देवश्रवा थे जिनके पुत्र थे शत्रुघ्न जिन्हे इनके कार्यों के कारण त्याग दिया गया था। कही कही उसका नाम अभिद्युम्न भी बताया गया है। अपने लक्ष्य की ओर एकनिष्ठ होने कारण ही इनका नाम एकलव्य पड़ा। गुरु द्रोण शत्रुघ्न के जन्म का रहस्य और उसके पूर्व में किये क्रूर कर्मों के विषय में जानते थे इसिलिए उन्होंने उसे शिक्षा नहीं दी।

हरिवंश पुराण और ब्रह्मपुराण के अनुसार एकलव्य वास्तव में श्रीकृष्ण का ही चचेरा भाई था। एकलव्य का वास्तविक नाम शत्रुघ्न था और वो यदुवंशी देवश्रवा, जिनका एक नाम श्रुतदेव भी था, उनका पुत्र था।

उसे अकल्याणकारी कार्यों और कंस का समर्थन करने के कारण देश से निकाल दिया गया था। बाद में निषादराज हिरण्यधनु ने उसे अपने दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार किया।

एकलव्य के पिता का नाम हिरण्यधनु था जो निषादों के सम्राट थे। एकलव्य धनुर्विद्या सीखना चाहता था इसीलिए वो गुरु द्रोण के पास विद्या अध्ययन के लिए गया किन्तु उन्होंने एकलव्य को शिक्षा देने से मना कर दिया। इससे एकलव्य निराश नहीं हुए और वे गुरु द्रोण की मूर्ति बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगे और श्रेष्ठ धनुर्धर बन गए।

एक बार गुरु द्रोण अपने शिष्यों के साथ वन में भ्रमण कर रहे थे। उनके साथ उनका श्वान (कुत्ता) भी था। वही पास में एकलव्य अभ्यास कर रहा था जहाँ पर वो श्वान जाकर भौंकने लगा। इससे एकलव्य के अभ्यास में व्यवधान पड़ने लगा। उसे चुप करने के लिए एकलव्य ने उसके मुँह में सात बाण इस प्रकार मारे कि उसका मुख बंद हो गया किन्तु उस श्वान को कोई हानि नहीं हुई। जब पांडवों और कौरवों ने ऐसा दृश्य देखा तो दंग रह गए।

अर्जुन ने गुरु द्रोण से कहा कि ये विद्या तो मैं भी नहीं जानता। तब द्रोण एकलव्य से मिले और उस विद्या का रहस्य पूछा। तब उसने गुरु द्रोण की प्रतिमा दिखाते हुए कहा कि उसने उन्हें ही अपना गुरु माना है। इस पर आचार्य द्रोण ने गुरु दक्षिणा में उससे उसके दाएं हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने बिना कुछ सोचे अपना अंगूठा काट कर गुरु द्रोण को अर्पित किया। इस प्रकार वह कभी उतना श्रेष्ठ धनुर्धर नहीं बन पाया जितना बन सकता था।

महाभारत के आदिपर्व में ये वर्णित है कि एकलव्य ने अद्भुत गुरु भक्ति दिखाते हुए उन्हें अपना अंगूठा दे दिया। तब उसकी गुरुदक्षिणा से प्रसन्न होकर द्रोण ने उसे इशारे से बताया कि कैसे तर्जनी और मध्यमा अंगुली का प्रयोग कर प्रत्यंचा खींची जा सकती है। तब एकलव्य ने उसी विद्या का अभ्यास किया और बिना अंगूठे के बाण चलाने में महारत हासिल कर ली।

आज आधुनिक युग में बाण के चलने के लिए कोई भी अंगूठे का प्रयोग नहीं होता बल्कि तर्जनी और मध्यमा अंगुली का ही प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार हम मान सकते हैं कि आधुनिक तीरदांजी के जनक भी द्रोण ही थे और एकलव्य ऐसे पहले योद्धा से जिन्होंने इसका प्रयोग किया।

जब द्रोण ने एकलव्य का अंगूठा मांग लिया तब वे वापस अपने राज्य लौट आये। अपने पिता हिरण्यधनु की मृत्यु के बाद वे राजा बने और सुनीता नामक स्त्री से उनका विवाह हुआ।

एकलव्य जरासंध की सेना का एक नायक था।

श्रीकृष्ण द्वारा कंस के वध के बाद जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया और उनको पराजित किया और उनमें एकलव्य ने भी उसका साथ दिया। अंतिम युद्ध में भगवन श्रीकृष्ण ने जरासंध को पराजित किया।

उस युद्ध के बारे में हरिवंश पुराण में लिखा गया है कि एकलव्य को केवल दो अँगुलियों से इतनी निपुणता से बाण चलाते देख कर श्रीकृष्ण आश्चर्यचकित रह गए। वे समझ गए कि एकलव्य भी धर्म की स्थापना में रोड़ा बन सकता है इसीलिए उन्होंने उसके वध का निश्चय किया। उस युद्ध में एकलव्य ने कई यादव वीरों को परास्त किया और फिर उसने श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न पर आक्रमण किया। तब श्रीकृष्ण ने उसे ललकारा और एक भारी शिला से उसका वध कर दिया।

एकलव्य का एक पुत्र था जिसका नाम केतुमान था। एकलव्य की मृत्यु के बाद उसका पुत्र केतुमान सिंहासन पर बैठा और उसने युद्ध में कौरवों का साथ देने का निश्चय किया। महाभारत के युद्ध में वह भीम के हाथ से मारा गया।

कैलाश बिष्ट
अल्मोड़ा

11/02/2026

#अपना दिल छुपके से दोगी क्या

मुझसे इश्क़ करोगी क्या , थोड़ा तकल्लुफ करोगी क्या।
मै भी मैरिड - तुम भी मैरिड, थोड़ा सा वक़्त निकलोगी क्या।।
तुम चीज हो मै पैरी - पैरी , मुझे अपने पे स्प्रिकल करोगी क्या।
मुझे तुमसे वैसा प्यार नहीं चाहिये , मगर थोड़ा अहसास तो दोगी क्या।।
हमारे बीच में कनेक्शन है , इतना इकरार करोगी क्या।
मैंने तो अपने प्यार का इजहार कर दिया , तुम अपना दिल छुपके से दोगी क्या।।

कैलाश बिष्ट
अल्मोड़ा

02/02/2026

#स्कूल डेज!

आजादी के बाद तो अधिकतर सभी सक्षम परिवार के बच्चे स्कूल गए ही है। आजादी जितनी पुरानी होती जा रही है हमारे देश में शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन बढ़ाता ही जा रहा है। शिक्षा व्यक्ति, समाज और देश को उच्च कोटि प्रदान करती है। मैं स्वयं शिक्षा प्रदान करने वाले सभी अध्यापक-जन का सामान करता हु चाहे वो किसी भी विषय के हो।

मुझे हाल में ही किसी ने इस बात का बोध करवाया के बगैर गुरु के ज्ञान नहीं मिलता। उनका इतना कहना था की अगर किताब पढ़ कर हर कोई - सब समझ जाए अर्थात उसे पूरा ज्ञान मिल जाये , तो गुरु की जरुरत क्यों होती।

हमारे स्कूल में गुरु तो उच्च कोटि के थे ही मगर मैं उन छात्रों की चर्चा करूँगा जो प्रचंड कोटि के थे “स्कूल डेज” में।

'एक' - तो ऐसा था जो हमेश अपने कंधे पर बैग टांग के रखता और पहले पीरियड से सभी को कहता "घर चले क्या'?

'दूसरा' - हफ्ते में दो बार अपनी “सेटिंग” के साथ बंक मारता और बैग हमें दे जाता।

'तीसरा' - क्लास में सोता रहता और जब किताब खोलता तो जहा से खुलती वही से पड़ने लगता पता नहीं “इंटेलिजेंट था या आलसी”।

'चौथा'- हर वक़्त छोटे बच्चो को “पढ़ाने वाली मैडम” को देखता रहता। हमें बताता आज साड़ी पहन के आयी है! आज लाल लिपस्टिक लगायी है !, ओह! आज नहीं आयी।

'पांचवा'- तो “सिंगर” था, हर वक़्त गाता रहता था। उसे तो गुलशन कुमार जी अपने स्टूडियो भी बुला रहे थे। मगर अफ़सोस उसकी अपॉइंटमेंट से पहले ही किसी ने गुलशन कुमार की हत्या कर दी। लेकिन भाई का पैशन अभी भी वैसा ही है आज कल वो अपने गाने अपनी बीवी को सुनाता है।

दो लोग लम्बे थे तो हम एक को चाचा और दूसरे को ताऊ कहते थे ।

उन दिनों सभी बड़े सिंपल थे। आज सभी अपने अपने स्थान पर कुशल मंगल के साथ है।

कैलाश बिष्ट
अल्मोड़ा

23/01/2026

# राहु मंदिर पैठाणी उत्तराखंड

यह अनोखा मंदिर दिल्ली से लगभग 340 किलोमीटर दूर उत्तराखंड, पौड़ी ज़िले के थलीसैंण ब्लॉक की कंडारस्यूं पट्टी में स्थित पैठाणी नामक गाँव में बसा है। यह मंदिर दो नदियों — स्योलीगाड़ (रथवाहिनी) और नवालिका (पश्चिमी नयार) के संगम पर स्थित है।

यहां भगवान शिव और राहु की पूजा की जाती है। कालांतर में जब यह मंदिर खंडित हुआ तो शंकराचार्य जी ने इसका पुनरुद्धार करवाया।

यह मंदिर केदारनाथ शैली में बना हुआ है, जो इसे और भी अधिक आध्यात्मिक और ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान करता है।

जब राहु ने छल से अमृत पिया, तो श्रीहरि विष्णु ने उसका सिर काट दिया। कहा जाता है कि राहु का कटा सिर पैठाणी में गिरा और यहीं दब गया। यही कारण है कि यहाँ राहु का सिर-रहित रूप पूजित है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस क्षेत्र का नाम राठपुर था। राष्ट्रकूट पर्वत के नाम पर इसे राठ कहा गया। राहु के गोत्र “पैठिनसि” के आधार पर इस गांव का नाम पैठाणी पड़ा।

यह विडिओ हमें श्री मनवर सिंह राणा के द्वारा प्राप्त हुआ है इसके लिए में उनका तहे-दिल से शुक्रिया करता हु।

धन्यवाद

कैलाश बिष्ट
अल्मोड़ा

03/01/2026

#मेले आज भी लोकप्रिय है
सर्दियों का मौसम है और इस मौसम का तो क्या कहना - सुनना।
आपने ये गाना तो सुना ही होगा दिल्ली की सर्दी ____।

आज कल दिल्ली NCR में बहुत से मेले इत्यादि लगते है मई उन लोगो का शुक्रिया करूँगा जो लोग ये मेले करवाते है जो पार्टिसिपेट करते है और उन लोगो का भी जो यहाँ आते है।

इनसे हमें अपनी संस्कृति, खान - पान, पहनावे, रीती - रिवाज़ और बहुत सी चीजों की जानकारी भी मिलती है।

जानकारी इस तरह की - मै इनदिनों हो रहे एक मेले - उत्तराखंड महाकौथिग, नॉएडा में गया था। मैंने वहा देखा की एक महिला सफ़ेद राजमा की दाल को लोभिया की दाल कह रही थी।

कैलाश बिष्ट
अल्मोड़ा

08/12/2025

#फीलिंग

आज की कहानी का शीर्षक है "फीलिंग" ये अंग्रेजी का शब्द है। मगर मेरी कहानी हिंदी में है और थोड़ा गुर्जर भाषा में। मै और मेरा दोस्त आफ्टर ऑफिस कुछ तूफानी करने के मूड में थे। मेरा ये दोस्त लगभग २-३ साल से मुझसे नहीं मिला था। एक दिन मैंने मोबाइल पर उसका स्टेटस देखा और उसको ग्रीन हार्ट भेज दिया तो बातो का सिलसिला शुरू हो गया और मिलने का भी डिसाइड हो गया। मेरा दोस्त एन० सी० आर० का एक गुर्जर, जिसका नाम "कसाना" है । जो निहायती सुन्दर, सभ्य, पढ़ा लिखा, भला इंसान है ।

हम दोनों ही तूफानी मूड में बड़ रहे थे। मैंने वा सु पूछी कहा रह रहो इतने दिना सु ना फ़ोन कर रौ ना कोई मैसेज - कदी केदार याद भी कर लिया कर। उसने कहा - तुम घना याद कर रहे। मैंने उससे कहा - साडे "कसाना" तुम लोगो की फाड़ो, किसे ने काए दिन फाड़ी तुम्हारी। उसने तुरंत अपना गिलास, मुँह से लगाया झट से खली किया एक टिक्का खाया और टिस्सू पेपर से मुँह साफ़ किया। उसने कहा - हा भाई एक दिन एक बन्दे ने मेरी फाड़ दी। मैंने पुछा क्या हुआ था।

भाई तुम्हे तो पता ही है जैसे तुम्हारी गैल बैठु हु, ऐसे ही एक ऍम० आर० दोस्त है उसके साथ भी कदी - कदार बैठु। एक दिन वा ने अपने घर बुला लियो। मैंने उस-सु कही यार घर में ठीक ना रहतौ, बहार ही ठीक है। उसने कहा - घर पर कोई नहीं है, जब तक बीवी - बच्चे आएंगे हम अपना काम ख़तम कर चुके होंगे। मैंने उससे कहा - तब तो कोई दिक्कत ना है। हम उसके घर पहुंचे, एक - एक पैग पिया ही था। की वो भाई साहब अचानक अपने कमरे की ओर भागे और अपनी बीवी की चुन्नी ओड कर आ गए वो भी लाल रंग की। मेरे सामने बैठ कर दूसरा पैग बनाने लगे। मै ये देख कर थोड़ा सुन्न सा हो गया। फिर भाई साहब ने अपना चुन्नी वाला रुख किचन की ओर किया और खीरा काटने लगे। खीरा काट कर उसमे चाट मसाला और निम्बू मिला कर मेरे सामने रख कर कहा, लो खाओ और अपना गिलास उठा कर फिर किचन की ओर चले गए। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था और भाई साहब लाल चुन्नी में मुझे मुन्नी बदनाम हुई वाली - मलाइका लग रहे थे। अब शायद वो सेब काटने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपना गिलास मुँह से लगाया और मुझे भी पिने का इशारा करने लगे । सेब में टूथ पिक लगा कर फिर प्लेट मेरे सामने रख दिया और फिर कहा, लो खाओ। भाई साहब ने अपना गिलास मेरे गिलास से टकरा कर कहा , जल्दी से इसे ख़तम करो तो दूसरा बनाए। मैंने तुरंत ही पी लिया। भाई साहब ने तीसरा पैग बनाया और फिर अपना गिलास ले के किचन में चले गए। अब वो पापड़ भून रहे थे। भाई साहब ने किचन से मुझसे पुछा क्या हु एन्जॉय नहीं कर रहे क्या ? मेरी फटी पड़ी थी! लेकिन मैंने डरते - डरते पूछ ही लिया। भाई साहब जब सु तुमने यु लाल रंग की चुन्नी ओडी, मेरो रंग सफ़ेद हो गयो। भाई साहब ने थोड़ा घूँघट निचे किया और बोला क्यू डर लग रहा है क्या ? और पापड़ ले कर फिर मेरे पास आ गए और सामने बैठ गए। अब मेरी थोड़ी और फट गई और मै उठने लगा। भाई साहब ने पुछा टॉयलेट जाना है क्या ? मैंने कहा नहीं घर जा रहा हु। भाई साहब खड़े उठे उन्होंने लाल चुन्नी उतारी और सोफे में फेकते हुए बोले इससे डर गए क्या ? मेरे मुँह से आवाज ना निकली। भाई साहब ने कहा बैठो बताता हु ये चुन्नी तुम्हारे लिए नहीं किसी और के लिए ओडी थी।

मैंने पुछा क्या मतलब, उन्होंने कहा कोई आशिक है जो मेरे किचन की खिड़की पर सामने की बिल्डिंग से लेजर लाइट मारता है - यही कोई सात बजे के करीब। ये सिलसिला लगभग २ महीने से चल रहा है। मैंने पुछा भाई साहब ये शुरू कैसे हुआ , उन्होंने कहा एक दिन में खाना बना रहा था तब मुझ पर लाइट पड़ी, तभी से मैंने नोटिस किया। अगले दिन भी यही सिलसिला शुरू हुआ तो मैंने उस लाइट मारने वाले को सम्मान देने के लिए तुम्हारी भाभी की चुनी ओढ़ना शुरू कर दि - ताकि उसे थोड़ा अच्छी फीलिंग आये। मैंने थोड़ा गुस्ताखी करते हुए पुछा, भाई साहब माफ़ करना कही वो आशिक भाभी का तो नहीं। उन्होंने कहा, तेरी भाभी से जायदा तो मै किचन में रहता हु वो तो लेट आती है। जैसे आज तुम इस चुन्नी से डर गए वैसे ही एक दिन तुम्हारी भाभी भी डर गयी थी। मैंने पुछा कैसे - उन्होंने कहा एक दिन मै सूप पिने में और किताब पड़ने में इतना मशगूल हो गया था की चुन्नी उतारना ही भूल गया था। जब तुम्हारी भाभी आयी तो उसने मुझे इस हालत में देखा, तो रोता हुआ चेहरा बना कर पुछा ये क्या ? मैंने उसे भी यही बताया की उस लाइट वाले को अच्छी फीलिंग के लिए चुन्नी पहनी है। तब से वो मेरे लिए कोई ना कोई चुन्नी बैड पर निकल कर जाया करती है।

मेरा और कसाना का तूफ़ान भी थम गया था। मैंने उस-सु कही चल बहुत बढ़िया लगा तुझसु मिल कर।

कैलाश बिष्ट
अल्मोड़ा

02/12/2025

मेरा तन लेलो मन लेलो, चाहो तो सारा धन लेलो
सब कुछ लेलो, मुझे बंजर बना दो।।
एक बलिदानी था, जो दुसरो के लिए सूली चढ़ा
मै भी अभिमानी हु, जो कलम से खेत जोतूँगा।।
मुझे आसमानी बारिश की जरुरत नहीं
मेरे बाद मेरे अपने, अश्रु से इसे सीचेंगे।।
जो भी इस उपज को पायेगा
वो अचल-अडिग-अमर, कैलाश हो जायेगा।।

कैलाश बिष्ट
अल्मोड़ा

26/11/2025

#दन्त कथा

मेरा एक दोस्त दो दिन हो गए , मेरा फ़ोन नहीं उठा रहा था। मै उससे मिलने उसके घर ही चला गया। मैंने देखा उसे बोलने में तकलीफ हो रही है मैंने पुछा क्या इसी लिए मेरा फ़ोन नहीं उठा रहा था उसने इशारे से कहा "हां" । तो मैंने कहा अभे मैसेज तो कर सकता था। उसने पुछा चाय पियेगा। मैंने कहा पागल है क्या हमने रात को कभी चाय पी है।

अच्छा बता क्या हुआ कैसे हुआ। उसने कहा संडे था मेरी छुट्टी थी तेरी भाभी का मूड भी बहुत अच्छा था। तो वो आज खाना नोरमल से हट-कर थोड़ा स्पेशल बना रही थी। शायद कुछ मिक्सी में पीसा होगा तो उसका कोई नट खाने में आ गया। उसके बाद मेरी थाली में फिर मेरे मुँह में। मैंने चबाया तो मेरा दांत टूट गया। तब से बोल नहीं पा रहा और ऑफिस भी नहीं गया। तू पहला पर्सन है जिसे मैंने अपने दांत का हाल बताया है।

इतने में भाभी "चाय - पकोड़े - चटनी" ले कर आ गई। मैंने चाय तो पी ली मगर डर के मारे चटनी और पकोड़े नहीं खाये।

कैलाश बिष्ट
अल्मोड़ा

11/11/2025

#वो खास दिन



आज की कहानी ऐसे नायक की है जो दिल्ली में रहता है। और जो दिल्ली को भली - भांति जनता भी है - क्योंकि उसकी पैदाइश, स्कूलिंग, और उसका नौकरी - पेशा भी दिल्ली में ही है। दिल्ली की भौगोलिक इस्थिति से तो आप वाकिफ ही होंगे।



नायक जिसका ऑफिस जमुना पार "मैहरोली" के निकट है और उसका घर जमुना वार है। सुबह वो अपने दुपहिया वाहन में ऑफिस के लिए निकल जाया करता है और शाम को समय पर घर को लौट आया करता है - चाहे गर्मी हो, बरसात हो, या ठण्ड। रास्ते में अगर उसे कोई जरुरत मंद दिखाई देता, तो नायक उसकी परेशानी को पूछ लिया करता। जरुरत मंद से मेरा मतलब अगर किसी का वाहन ख़राब है जैसे पंचर, तेल ख़तम, इत्यादि।



एक शाम जब नायक घर लौट रहा था, उस रोज बरसात थी। नायक अपने दुपहिया वाहन से निज़ामुद्दीन जमुना का पुल पार कर धीरे - धीरे अक्षरधाम की और बड़ा लूप पुल पर चढ़ा ही था की उसने देखा कोई जरुरत मंद अपने दुपहिया वाहन को धकेल रहा है वो भी चढाई में। नायक ने उसके पास अपना वाहन रोखा और पुछा कोई मदद की जरुरत तो नहीं। जरुरत मंद ने जवाब में मना कर दिया। नायक भी आगे बढ़ चला। ज्यो ही नायक आगे बड़ा उसे रियलाइज हुआ वो जरुरत मंद जिसने पैंट - शर्ट पहनी है, वाहन - यामाहा अन्टाईसर है, वो लड़की है।



नायक ने अपनी बाइक वही पर रोख दी और उस लड़की को अपनी ओर आने तक रुखा गया । जैसे ही लड़की करीब आई, नायक ने उससे पुछा कि मै लड़का हु कही मुझसे डर तो नहीं रही। लड़की ने ना जाने क्या सोचते हुए "नहीं" में जवाब दिया ।



नायक ने उससे पुछा क्या हुआ ? उसने कहा चलते चलते बंद हो गयी जबकि तेल है , हवा है और स्टार्ट भी होने में कोई दिक्कत नहीं है। नायक ने कहा कोई इशू (दिक्कत) नहीं। आप इसमें बैठो में अपने पाँव से धकेलता हु हलाकि नायक ऐसा खुद पहली बार कर रहा था। कुछ परेशानी तो हुई क्योंकि बाइक यामाहा अन्टाईसर थी उसका साइलेंसर थोड़ा छोटा होता है। बाइक को धकलते हुए वो अहलकोन इंटरनेशनल स्कूल (मयूर विहार फेज - १ ) के पास पहुंचे और मकैनिक को ढूंढ़ने लगे। दुर्भाग्य था की उस दिन सोमवार था और लगभग मकैनिक सोमवार को ऑफ़ रखते है। एक मकैनिक देवदूत के रूप में प्रकट हुआ जिसने हमारी समस्या को बहुत जल्द समझा और उसका निवारण भी किया। हुआ ये था की बाइक की चैन लूज़ (ढीली) हो गई थी जो उतर जा रही थी। मकैनिक ने समझाया की इसे 'पहले' या 'दूसरे' गियर पर ही चलना चैन नहीं उतरेगी और आप अपने घर तक पहुंच जाओगे। यह सुन कर थोड़ा परेशानी दूर हुई। नायक ने उस लड़की से कहा अगर आप चाहो तो मेरी बाइक ले जाओ में आपकी ले जाता हु कल देख लेंगे। लड़की ने कहा की वो पास ही रहती है मैनेज हो जायेगा। लड़की ने अपना नाम बताया नायक का नाम पुछा और दोनों का मोबाइल नंबर एक्सचेंज हो गया फिर वो अपने - अपने घर को चले गए।



नायक ने अगले दिन मैसेज में उससे बात की, जाना की वो बैंक में काम करती है, ऑफिस आई० टी० ओ० पर है, रहती मयूर विहार फेज - १ के पास ही है।



नायक और उस लड़की की आगे की मुलाकाते भी कुछ इस तरह की थी के अगर इसे फिल्माया जाये तो फिल्म "सुपर - डूपर" हिट हो जाये और डायरेक्टर को फिल्मफेयर अवार्ड भी मिल जाये।



वो इत्तफाकन घर जाते हुए डियूरिंग दा राइड ही मिलते थे। ना जाने कैसे एक दूसरे को दिल्ली की भीड़ - भाड़ वाले टैफिक मे भी पहचान लेते थे। जब भी मिलते एक दूसरे को हाथ हिलाते और निकल जाते। लड़की की तो सिर्फ वो जाने, की वो नायक को कैसे पहचान लेती। मगर नायक को उसको पहचाना आसान था क्योंकि शायद ही कोई और लड़की यामाहा अन्टाईसर चलाती हो। इसी दौरान एक दिन नायक ने उसे फेसबुक पर फ्रेंड रिक़ुएस्ट भेजी और लड़की ने एक्सेप्ट भी कर ली।



काफी समय हो गया नायक को वो अब कभी नहीं दिखी। अब वो दिल्ली में नहीं रहती, शायद मुंबई। एक दिन नायक ने उसका पोस्ट देखा, वो ग्रेट अभिनायक अमिताभ बचन के साथ खड़ी थी।



कैलाश बिष्ट

अल्मोड़ा

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