20/02/2026
#एकलव्य
एकलव्य महाभारत के एक पात्र है। जो अर्जुन और करण के समान ही धनुर्धर थे। एकलव्य के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है।
तो आइये एकलव्य को थोड़ा याद करे।
पहली बात तो ये कि हरिवंश पुराण के अनुसार एकलव्य यदुवंशी राजपुत्र थे, निषाद नहीं। वर्णित है कि महाराज शूरसेन के ५ पुत्र और ५ पुत्रियां थी। सबसे ज्येष्ठ पुत्र थे श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव। दूसरे पुत्र का नाम था देवभाग जिनके पुत्र थे उद्धव। शूरसेन के तीसरे पुत्र देवश्रवा थे जिनके पुत्र थे शत्रुघ्न जिन्हे इनके कार्यों के कारण त्याग दिया गया था। कही कही उसका नाम अभिद्युम्न भी बताया गया है। अपने लक्ष्य की ओर एकनिष्ठ होने कारण ही इनका नाम एकलव्य पड़ा। गुरु द्रोण शत्रुघ्न के जन्म का रहस्य और उसके पूर्व में किये क्रूर कर्मों के विषय में जानते थे इसिलिए उन्होंने उसे शिक्षा नहीं दी।
हरिवंश पुराण और ब्रह्मपुराण के अनुसार एकलव्य वास्तव में श्रीकृष्ण का ही चचेरा भाई था। एकलव्य का वास्तविक नाम शत्रुघ्न था और वो यदुवंशी देवश्रवा, जिनका एक नाम श्रुतदेव भी था, उनका पुत्र था।
उसे अकल्याणकारी कार्यों और कंस का समर्थन करने के कारण देश से निकाल दिया गया था। बाद में निषादराज हिरण्यधनु ने उसे अपने दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार किया।
एकलव्य के पिता का नाम हिरण्यधनु था जो निषादों के सम्राट थे। एकलव्य धनुर्विद्या सीखना चाहता था इसीलिए वो गुरु द्रोण के पास विद्या अध्ययन के लिए गया किन्तु उन्होंने एकलव्य को शिक्षा देने से मना कर दिया। इससे एकलव्य निराश नहीं हुए और वे गुरु द्रोण की मूर्ति बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगे और श्रेष्ठ धनुर्धर बन गए।
एक बार गुरु द्रोण अपने शिष्यों के साथ वन में भ्रमण कर रहे थे। उनके साथ उनका श्वान (कुत्ता) भी था। वही पास में एकलव्य अभ्यास कर रहा था जहाँ पर वो श्वान जाकर भौंकने लगा। इससे एकलव्य के अभ्यास में व्यवधान पड़ने लगा। उसे चुप करने के लिए एकलव्य ने उसके मुँह में सात बाण इस प्रकार मारे कि उसका मुख बंद हो गया किन्तु उस श्वान को कोई हानि नहीं हुई। जब पांडवों और कौरवों ने ऐसा दृश्य देखा तो दंग रह गए।
अर्जुन ने गुरु द्रोण से कहा कि ये विद्या तो मैं भी नहीं जानता। तब द्रोण एकलव्य से मिले और उस विद्या का रहस्य पूछा। तब उसने गुरु द्रोण की प्रतिमा दिखाते हुए कहा कि उसने उन्हें ही अपना गुरु माना है। इस पर आचार्य द्रोण ने गुरु दक्षिणा में उससे उसके दाएं हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने बिना कुछ सोचे अपना अंगूठा काट कर गुरु द्रोण को अर्पित किया। इस प्रकार वह कभी उतना श्रेष्ठ धनुर्धर नहीं बन पाया जितना बन सकता था।
महाभारत के आदिपर्व में ये वर्णित है कि एकलव्य ने अद्भुत गुरु भक्ति दिखाते हुए उन्हें अपना अंगूठा दे दिया। तब उसकी गुरुदक्षिणा से प्रसन्न होकर द्रोण ने उसे इशारे से बताया कि कैसे तर्जनी और मध्यमा अंगुली का प्रयोग कर प्रत्यंचा खींची जा सकती है। तब एकलव्य ने उसी विद्या का अभ्यास किया और बिना अंगूठे के बाण चलाने में महारत हासिल कर ली।
आज आधुनिक युग में बाण के चलने के लिए कोई भी अंगूठे का प्रयोग नहीं होता बल्कि तर्जनी और मध्यमा अंगुली का ही प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार हम मान सकते हैं कि आधुनिक तीरदांजी के जनक भी द्रोण ही थे और एकलव्य ऐसे पहले योद्धा से जिन्होंने इसका प्रयोग किया।
जब द्रोण ने एकलव्य का अंगूठा मांग लिया तब वे वापस अपने राज्य लौट आये। अपने पिता हिरण्यधनु की मृत्यु के बाद वे राजा बने और सुनीता नामक स्त्री से उनका विवाह हुआ।
एकलव्य जरासंध की सेना का एक नायक था।
श्रीकृष्ण द्वारा कंस के वध के बाद जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया और उनको पराजित किया और उनमें एकलव्य ने भी उसका साथ दिया। अंतिम युद्ध में भगवन श्रीकृष्ण ने जरासंध को पराजित किया।
उस युद्ध के बारे में हरिवंश पुराण में लिखा गया है कि एकलव्य को केवल दो अँगुलियों से इतनी निपुणता से बाण चलाते देख कर श्रीकृष्ण आश्चर्यचकित रह गए। वे समझ गए कि एकलव्य भी धर्म की स्थापना में रोड़ा बन सकता है इसीलिए उन्होंने उसके वध का निश्चय किया। उस युद्ध में एकलव्य ने कई यादव वीरों को परास्त किया और फिर उसने श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न पर आक्रमण किया। तब श्रीकृष्ण ने उसे ललकारा और एक भारी शिला से उसका वध कर दिया।
एकलव्य का एक पुत्र था जिसका नाम केतुमान था। एकलव्य की मृत्यु के बाद उसका पुत्र केतुमान सिंहासन पर बैठा और उसने युद्ध में कौरवों का साथ देने का निश्चय किया। महाभारत के युद्ध में वह भीम के हाथ से मारा गया।
कैलाश बिष्ट
अल्मोड़ा