08/06/2026
लॉकर में 2 करोड़ और तनख्वाह 80 हजार!
भारत में दो तरह के लोग होते हैं।
पहले वो,
जो महीने की 25 तारीख आते-आते
गूगल पर खोजते हैं —
"कम बजट में एक हफ्ता कैसे निकालें?"
और दूसरे वो,
जो बैंक लॉकर खोलते हैं
तो कैशियर पूछ बैठता है —
"सर, बैंक में पैसा जमा करने आए हैं या बैंक खरीदने?"
बैकुंठ नाथ बेहरा भी शायद दूसरे वाले वर्ग से थे।
सरकारी नौकरी।
जनजातीय विकास विभाग।
शुरुआत ₹6,000 की तनख्वाह से।
लेकिन गणित ऐसा कि
कोचिंग वाले भी फेल हो जाएं।
सैलरी बढ़कर ₹80,000 हुई,
मगर संपत्ति करोड़ों में पहुंच गई।
चार मंज़िला इमारत।
कई प्लॉट।
अलग-अलग मकान।
और लॉकर में ₹2 करोड़ नकद।
साधारण आदमी अगर ₹20,000 बचा ले
तो पूरे मोहल्ले को बता देता है।
यहां ₹2 करोड़ लॉकर में ऐसे रखे थे
जैसे हम पुराने कपड़े रख देते हैं —
"कभी काम आ जाएंगे।"
सबसे मज़ेदार बात यह है कि
ऐसे लोग पकड़े जाने तक खुद को भ्रष्ट नहीं,
"स्मार्ट फाइनेंशियल प्लानर" समझते हैं।
शायद यही वजह है कि
कुछ सरकारी योजनाएं फाइलों में पूरी हो जाती हैं,
लेकिन गांवों तक पहुंचते-पहुंचते उनका दम निकल जाता है।
किसी आदिवासी बच्चे की किताब,
किसी गरीब की सड़क,
किसी गांव का पानी,
किसी मरीज की दवा...
सब धीरे-धीरे नोटों में बदलकर
किसी लॉकर की अंधेरी कोठरी में पहुंच जाते हैं।
फिर हम पूछते हैं —
देश पीछे क्यों है?
देश पीछे नहीं है साहब,
देश तो आगे बढ़ना चाहता है।
बस कुछ लोग उसके पैरों में
नोटों की बोरियां बांध देते हैं।
और हां,
ईमानदार लोग आज भी मौजूद हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि
उनके घरों में लॉकर छोटे होते हैं,
लेकिन नींद बहुत गहरी होती है। #रिश्वत #उड़ीसा #बैकुंठनाथबेहरा