18/06/2026
खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झाँसी वाली रानी थी...
सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐसी वीरांगना उभरी, जिसने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। उनका नाम था ।
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। बचपन में उनका नाम मणिकर्णिका था, जिन्हें प्यार से "मनु" कहा जाता था। बचपन से ही उन्हें घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्धकला का शौक था।
झाँसी के राजा से विवाह के बाद वे झाँसी की रानी बनीं। राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने "लैप्स की नीति" के तहत झाँसी को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया। तब रानी ने दृढ़ता से कहा— "मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।"
1857 के विद्रोह के दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा संभाला। उन्होंने पुरुष योद्धाओं की तरह युद्ध किया, तलवार हाथ में लेकर घोड़े पर सवार होकर सेना का नेतृत्व किया। अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बाँधकर युद्धभूमि में उतरने का उनका साहस आज भी लोगों को प्रेरित करता है।
18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में अंग्रेजों से लड़ते हुए रानी वीरगति को प्राप्त हुईं। लेकिन उनकी वीरता और बलिदान अमर हो गया।
कवयित्री ने उनकी वीरता का वर्णन करते हुए लिखा—
"बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झाँसी वाली रानी थी।"
यह कहानी हमें सिखाती है कि साहस, आत्मसम्मान और देशभक्ति के बल पर कोई भी व्यक्ति इतिहास में अमर हो सकता है। 🇮🇳✨