03/05/2026
प्रेम को जिसने जाना, उसे फिर कुछ और जानने की आवश्यकता भी नहीं है; क्योंकि प्रेम ही अपनी ऊंचाइयों में प्रार्थना बन जाता है। और प्रार्थना ही अंततः परमात्मा का रूप ले लेती है। प्रेम सीढ़ी का पहला पायदान है; प्रार्थना मध्य है; परमात्मा अंत।
जिन्होंने प्रेम को परमात्मा से भिन्न समझा है, वे चूक ही गए रास्ते से, भटक ही गए रास्ते से। जिन्होंने प्रेम के बिना प्रार्थना की है, उनकी प्रार्थना दो कौड़ी की है, क्योंकि उनकी प्रार्थना में कोई रसधार नहीं है। उनकी प्रार्थना में उनके हृदय का कोई संग-साथ नहीं है। उनकी प्रार्थना गणित है, हिसाब है। उनकी प्रार्थना तर्क है। और तर्क, हिसाब से, गणित से कोई कभी परमात्मा तक पहुंचा है? वहां तो चाहिए हृदय की मस्ती। वहां तो बेहोश होने की क्षमता चाहिए!
आइए, हाथ उठाएं हम भी
हम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहीं
अच्छा ही है कि रस्मे-दुआ याद नहीं है। जिन्हें प्रार्थना की तरकीब पता है, तरकीब के कारण ही प्रार्थना मर जाती है। प्रार्थना कोई तकनीक नहीं है, कोई तरकीब नहीं है। प्रार्थना का कोई शास्त्र नहीं है। प्रार्थना की कोई विधि नहीं है। प्रार्थना तो एक पागलपन है--प्रेम से भरा पागलपन--प्रेम और दीवानगी। प्रार्थना तो एक नशा है। परमात्मा के नशे से मदमस्त आंखों का नाम प्रार्थना है। परमात्मा के आनंद में, अहोभाव में झूमता हुआ आदमी प्रार्थना है।
आइए, हाथ उठाएं हम भी
हम जिन्हें रस्मे-दुआ याद नहीं
हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं...अड़चन कहां हो गई है? मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, सब भक्तों से भरे हैं और भगवान की कहीं झलक मिलती नहीं। इतने लोग प्रार्थनाएं कर रहे हैं और प्रेम की वर्षा कहीं होती नहीं। इतने लोग नमाजों में झुके हैं और अहंकार उनके अकड़े ही खड़े हैं। शरीर झुक जाते हैं, अहंकार अकड़े के अकड़े रह जाते हैं। औपचारिक है सब। और औपचारिक से कोई रहस्य के द्वार न खुलेंगे।
परमात्मा के साथ कोई शिष्टाचार नहीं निभाना है। और जिसने शिष्टाचार निभाया, उसने दूरी कायम रखी। प्रेम में इतनी दूरी न चलेगी। प्रेम दूरी मानता नहीं। प्रेम आलिंगन है--अस्तित्व से आलिंगन। इसका कोई विधि-विधान नहीं होता।
लेकिन हर बच्चे को हम प्रार्थना सिखा देते हैं--और इस तरह प्रार्थना से वंचित कर देते हैं। हम उसे शब्द सिखा देते हैं थोथे, जो उसके हृदय में उभरे नहीं, हमने ऊपर से थोप दिए हैं। अब इन्हीं शब्दों को दोहराता रहेगा जीवन भर। और सोचता रहेगा कि कहां कोई भूल हो गई है? शब्द तो रोज दोहरा लेता हूं, परमात्मा को रोज पुकार लेता हूं, लेकिन मेरी पुकार सुनी क्यों नहीं जाती? प्रार्थना उसके कानों तक पहुंचती क्यों नहीं?
कबीर ने किसी को जोर से खुदा को पुकारते देख कर कहा था: इतने जोर से क्यों? क्या तेरा खुदा बहरा है? इतने जोर से क्यों?
सच तो यह है कि ओंठ भी नहीं हिलते और प्रार्थना पूरी हो जाती है। ओंठ तक भी नहीं आती, वहीं गहन अंतस्तल में पूरी हो जाती है। शब्द भी नहीं बनती, निःशब्द में ही पूरी हो जाती है।.....Birhani Mandir Diyana Baar___Osho___Naya Manushya