12/07/2026
वही बाइक, जो कभी 1 लीटर पेट्रोल में 60 किलोमीटर तक मेरा साथ निभाती थी, आज 35 किमी/लीटर की भीख मांग रही है।
सुबह का मंजर याद करके अभी भी हाथ कांप रहे हैं। रोज की तरह अपनी Honda SP125 की चाबी घुमाई, इस उम्मीद में ऑफिस के लिए निकला कि आज का दिन अच्छा जाएगा। खैर, जेब कट रही थी, हम मिडिल क्लास वाले हैं... सहने की आदत है, सो चुप रहे।
लेकिन कल नियति को कुछ और ही मंजूर था। घर से महज एक किलोमीटर दूर... बीच चौराहे पर बाइक ने ऐसा दम तोड़ा कि दोबारा सांस ही नहीं ली। बीच सड़क पर धूप में खड़े होकर आधे घंटे तक किक मारता रहा, पीछे से गाड़ियों के हॉर्न का शोर और माथे से टपकता पसीना। हार मानकर, उस भारी-भरकम गाड़ी को धक्का मारते हुए जब वापस घर लाया, तो लगा जैसे अपनी ही लाचारी को ढो रहा हूँ। ऑफिस छूटने का डर था, तो मजबूरी में रैपिडो बुक की— जेब पर एक और तमाचा!
मैकेनिक का वो एक जुमला... और भीतर तक टूट गया मैं!
शाम को जब बाइक को घसीटते हुए मैकेनिक के पास ले गया, तो जो सच सामने आया, उसने भीतर तक झकझोर दिया। टैंक खोला गया तो नीचे 1 लीटर पेट्रोल के साथ लगभग 1.5 लीटर पानी जैसा एक गाढ़ा, बदबूदार लिक्विड जमा था।
मैकेनिक ने मेरी तरफ देखा, उसकी आंखों में हमदर्दी कम और लाचारी ज्यादा थी। बोला— "साहब, ये पानी किसी ने डाला नहीं है। यह सरकारी एथेनॉल है, जो हवा की नमी सोखकर आपके इंजन को अंदर से दीमक की तरह चाट रहा है। आजकल हर तीसरी गाड़ी का यही जनाजा निकल रहा है।"
देशहित का यह कैसा चश्मा है, जिसमें सिर्फ आम आदमी ही अंधा बनाया जाता है?
हमें राष्ट्रवाद और देशहित का पाठ पढ़ाया जाता है कि एथेनॉल से देश का पैसा बच रहा है, किसानों की तरक्की हो रही है। हुजूर, हम भी इसी मिट्टी के हैं, हमें भी देश की तरक्की पर नाज है। लेकिन मेरा कुछ सीधा और तीखा सवाल है:
यह कैसा घाटे का सौदा है? अगर एथेनॉल मिलाने से सरकार का पैसा बच रहा है, तो हमारी जेब से पूरे 100+ रुपये क्यों वसूले जा रहे हैं? माइलेज आधा हो गया, यानी हमारी जेब दोगुनी कटी। फायदा किसका हुआ?
हमारे इस नुकसान का जिम्मेदार कौन? हमारी गाड़ियां इस 'केमिकल कॉकटेल' के लिए नहीं बनी थीं। जब इनके इंजन वक्त से पहले कबाड़ हो जाएंगे, तो क्या सरकार नई गाड़ी देगी?
स्वाभिमान की कीमत क्या है? बीच सड़क पर जब एक नौकरीपेशा आदमी गाड़ी धक्का मारता है और ऑफिस में लेट होने पर बॉस की गालियां सुनता है, तो उसके आत्मसम्मान की भरपाई कौन सा फंड करेगा?
हमें हुक्म नहीं, हक चाहिए... हमें विकल्प चाहिए!
लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है— 'चुनने की आजादी'।
अगर किसी को अपनी गाड़ी की लंबी उम्र चाहिए, तो उसे शुद्ध (Pure) पेट्रोल का विकल्प मिलना ही चाहिए! भले इसके लिए दो-चार रुपये ज्यादा देने पड़ें।
जिसे एथेनॉल वाला ईंधन चाहिए, वह उसे चुने।
बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना पुरानी गाड़ियों की तकनीकी क्षमता को परखे, इस तरह का घातक ईंधन हर नागरिक पर थोप देना कहाँ का न्याय है? तरक्की के नाम पर आम जनता को इस तरह प्रताड़ित करना कतई बर्दाश्त के बाहर है।
आज मेरी बाइक मैकेनिक के गैरेज में एक लाश की तरह खुली पड़ी है और मैं अपने ही देश में ठगा सा खड़ा हूँ। क्या यह खौफनाक तजुर्बा सिर्फ मेरे हिस्से आया है, या आपकी गाड़ी के टैंक में भी यही 'धीमा जहर' घोला जा रहा है?
कमेंट में अपनी आवाज उठाइए, क्योंकि अगर आज हम चुप रहे, तो कल धक्का मारने की बारी आपकी होगी!