20/09/2025
वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक नया राष्ट्राध्यक्ष बंद (proclamation) जारी किया है जिसमें H-1B वीज़ा धारकों को लेकर कंपनियों पर एक वर्ष का $100,000 वार्षिक शुल्क लगाने का प्रावधान है। इस आदेश के बाद कंपनियों को हर ऐसे कर्मचारी के लिए $100,000 का अतिरिक्त भुगतान करना होगा जिसकी वीजा H-1B श्रेणी में है।
आदेश का उद्देश्य एवं तर्क:
इस कदम का मकसद है कि कंपनियाँ विदेशी श्रमिकों को सिर्फ इसलिए काम पर न लें क्योंकि उनकी लागत कम है। ट्रम्प प्रशासन का तर्क है कि H-1B वीज़ा प्रणाली का कुछ हिस्से में दुष्प्रयोग हो रहा है, जहाँ कम-भुगतान वाले विदेशी कर्मियों को भर्ती कर अमेरिकी कामगारों का प्रतिस्पर्धा में नुकसान किया जा रहा है।
यह नीति विशेष रूप से STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रण, गणित) क्षेत्रों में लागू की जा रही है, जहाँ विदेशी प्रतिभाएँ बहुतायत में हैं।
नए नियम की झलकियाँ:
वीज़ा आवेदन (petition) तभी स्वीकृत होगा जब नियोक्ता कंपनी $100,000 का भुगतान कर चुकी हो।
यह शुल्क नए वीज़ा आवेदनों पर लागू होगा, और उन मामलों में भी जब वीज़ा नवीनीकरण (renewal) किया जाए या कर्मचारी वर्तमान में अमेरिका के बाहर हो।
नीति प्रारंभिक रूप से एक साल के लिए चलेगी, जिसके बाद समीक्षा या विस्तार हो सकता है।
भारतीय कर्मचारियों व भारत पर प्रभाव:
प्रमुख आधार: भारत पिछले कुछ वर्षों से H-1B वीज़ा कार्यक्रम से सबसे अधिक लाभ उठा रहा है; अनुमानों के अनुसार पिछले वर्ष H-1B वीज़ा धारकों में लगभग 71% भारतीय नागरिक थे, चीन दूसरे नंबर पर।
तीव्र लागत बढ़ोतरी: $100,000 प्रति वर्ष शुल्क का बोझ उन कंपनियों पर बहुत भारी होगा जो भारतीय इंजीनियरों, डेवलपर्स और अन्य तकनीकी कर्मचारियों को काम पर लाती हैं। खासकर मध्यम आकार की या स्टार्टअप कंपनियों के लिए यह लागत अव्यवहारिक हो सकती है।
वीज़ा आवेदन प्रक्रिया पर असर: भारतीयों के लिए H-1B वीज़ा प्राप्त करना और अधिक जटिल तथा महंगा हो जाएगा। वीज़ा आवेदन, नवीनीकरण एवं यात्रा आदि मामलों में खर्च बढ़ेगा।
प्रतिस्पर्धा घटेगी: भारतीय तकनीकी पेशेवरों की प्रतिस्पर्धा और अवसर सीमित हो सकते हैं, क्योंकि कंपनियाँ लागत कम रखने की योग्यता वाले वर्करों को चुनने से परहेज़ कर सकती हैं—और वे विदेशी कर्मचारियों की संख्या को कम कर सकती हैं।
प्रतिभा पलायन (Brain Drain) या विकल्पों की खोज: संभावित है कि भारतीय प्रतिभाएँ या तो अन्य देशों की ओर रुख करें जहाँ वीज़ा-नियम कम कठोर हों, या भारतीय कंपनियों में काम करना पसंद करें, या अमेरिका में नहीं आने का निर्णय लें।
विदेशी कंपनियों की रणनीति बदल सकती है: कई टेक्नॉलॉजी कंपनियाँ या स्टार्ट-अप्स शायद अमेरिका में कर्मचारी भेजने की बजाए remote काम, आउटसोर्सिंग या अन्य देशों के विकल्पों को बढ़ावा दें।
चुनौतियाँ और संभावित प्रतिक्रियाएँ:
कई उद्योग विशेषज्ञ और तकनीकी कम्पनियाँ इस नीति को अमेरिका की नवप्रवर्तन (innovation) क्षमता के लिए ख़तरा मान रहे हैं।
विधिक चुनौतियाँ भी हो सकती हैं। कुछ अध्यापनकर्ता कह रहे हैं कि कांग्रेस को ही ऐसी फीस निर्धारित करने का अधिकार है, न कि कार्यकारी आदेश द्वारा।
साथ ही, नीति में अपवादों की व्यवस्था हो सकती है — उदाहरण के लिए, उन मामलों में जहाँ यह देशहित में हो या जहाँ “exception” की स्थिति हो।
ट्रम्प प्रशासन का यह नया आदेश H-1B वीज़ा प्रणाली में एक बड़ी मुड़-घुमाव है। भारत के लिए, जहाँ H-1B धारक बड़ी संख्या में हैं, इसका असर गहरा होगा—वीज़ा की लागत, कंपनियों की भर्ती नीतियाँ, और काम के अवसरों में बदलाव की संभावना है। यदि यह नीति लागू होती है, तो भारतीय पेशेवरों तथा उनकी कंपनियों को अमेरिका जाने या वहाँ काम करने के रणनीतिक विकल्पों पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा