Arti singh

Arti singh bhajan aur lok geet

अदालत में दस्तावेज़ पर आख़िरी दस्तख़त होते ही वकील ने मुस्कुराकर कहा—“लीजिए मैडम, अब आपका तलाक हो गया।कोर्ट ने आपको 30 ल...
24/12/2025

अदालत में दस्तावेज़ पर आख़िरी दस्तख़त होते ही वकील ने मुस्कुराकर कहा—
“लीजिए मैडम, अब आपका तलाक हो गया।
कोर्ट ने आपको 30 लाख रुपये मुआवज़े में दिलवा भी दिए,
और हर महीने 20,000 रुपये खर्च के तौर पर भी मिलते रहेंगे।
अब तो खुश हैं ना?”

वह हल्की-सी मुस्कान बनाकर बोली—
“हाँ, खुश हूँ…..अब मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए।”

वकील संतुष्ट होकर बाकी कागज़ समेटने लगे।
और वह लड़की… कविता, अपने माता–पिता के साथ बाहर निकल गई।

पीछे अदालत के कोने में खड़ा निर्वाण, उसका पति, सब देख रहा था।
कविता एक नज़र भी उसकी तरफ़ नहीं उठाती।
गाड़ी का दरवाज़ा बंद हो गया… और रिश्ता भी।

---

पहला महीना—
मायके में सब प्यार से पेश आते रहे।
कविता को लगा, “यही तो आज़ादी थी… यही तो सुकून था।”

दूसरा महीना—घर वालो का सुर बदलने लगा।
कभी भाई तेज़ लहज़े में बोल देता,
कभी भाभी चुभे हुए शब्द सुना जाती—
“इतनी बड़ी हो गई हो, थोड़ी जिम्मेदारी ले लिया करो…”
भतीजे भी कभी-कभी कह देते—
“बुआ, आप कब तक रहोगी यहाँ?”

तीसरा महीना—
घर के माहौल में बदली सी पड़ने लगी।
जहाँ पहले प्यार था, अब बोझ-सा एहसास।
कविता चुप हो जाती, पर दिल में दर्द पलता रहता।

चौथा महीना—
अब उसकी हर हरकत पर नज़रें उठने लगीं।
बाहर जाते ही पड़ोस की खुसर–फुसर सुनाई देने लगी—
“तलाक हो गया है… अब मायके में ही रहेगी!!?

कविता के भीतर कुछ टूट रहा था।
उसे पहली बार महसूस हुआ—

ससुराल में रिश्ते कठिन थे, पर वहाँ उसका अपना घर था।
यहाँ मायके में—वह मेहमान भी नहीं, बोझ जैसी लगने लगी थी।

एक रात, वह छत पर अकेली बैठी सोचती रही—
पैसे मिल गए… आज़ादी मिल गई…
पर क्या इज्जत, अपनापन, और घर मिल पाया?

उसने धीरे से खुद से कहा—
“गलती की है मैंने…
फैसला लेते समय मैंने सिर्फ दर्द देखा...
सीख नहीं देखी।”

उसे समझ आ गया—
एक लड़की जब टूटे रिश्ते के बाद मायके लौटती है,
तो उसे सबसे ज़्यादा सहारे की जरूरत होती है,
लेकिन समाज उसे सबसे पहले जज करता है।

और घर…
जिसे वो “अपना” समझती है—
वहीं उसे धीरे-धीरे महसूस होने लगता है
कि “मायका है पर अधिकार कुछ नहीं।
मैं अपना घर छोड़ आई जहां मेरा अधिकार था जहां मेरा अपना परिवार था अपने अहम् की वजह से मैंने छोड़ा है घर ...

उसकी आँखों में नमी आ गई—
अब उसे अपने फैसले की कीमत समझ आ चुकी थी।

#मायके में चार महीने बिताने के बाद कविता को हर दिन वही एहसास सताने लगा—
“मैंने क्या खो दिया…?
क्या सिर्फ ग़ुस्से और तानों में बहकर इतना बड़ा फैसला कर लिया?”

वह छत पर बैठकर देर तक आसमान देखती रहती।
यादें पीछे-पीछे भागतीं—निर्वाण की बातें, उसकी आदतें, वो छोटी-छोटी बहसें…
और सबसे ज़्यादा—उसका साथ, जो अब बहुत दूर लगता था।

एक रात, मन बिल्कुल टूट गया।
आँसू रोकते-रोकते उसने फोन उठाया और नंबर मिलाया।

कॉल उठते ही निर्वाण की आवाज़ आई—
“हेलो?”

कविता ने धीमी, कांपती आवाज़ में कहा—
“निर्वाण… क्या हम… क्या हम अपने रिश्ते को एक मौका दे सकते हैं?
मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है।
मैं… तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ।”

कुछ पल दोनों तरफ़ खामोशी रही।
फिर निर्वाण ने गहरी सांस लेकर कहा—

“मैं भी तुम्हारे बिना नहीं रह पा रहा…
फैसले में दोनों की गलती थी, पर सुधारने के लिए दोनों को साथ चलना होगा।
मैं तुम्हें वापस लाना चाहता हूँ…
लेकिन कुछ समझौते हम दोनों को करने होंगे।
अगर तुम्हारी ‘हाँ’ है…
तो मैं अभी निकलता हूँ।”

किया की आँखों से आँसू गिर पड़े।
उसने धीमे से कहा—
“हाँ… मैं तैयार हूँ।”

उसे समय रात के 12:00 बज रहे थे
निर्वाण ने अपनी कार उठाई।
ठंड थी, रास्ते सुनसान, लेकिन उसका दिल सिर्फ एक ही बात कह रहा था—
“उसे घर वापस लाना है।”

लगातार 5 घंटे ड्राइव करता रहा।
ना रुका, ना थका।

सुबह के 5 बजे,
वह कविता के मायके के दरवाज़े पर खड़ा था।

अंदर से कविता बाहर आई—
हल्की-सी घबराहट, आँखों में शर्म भी, और राहत भी।

माँ-बाप ने दरवाज़ा खोला।
निर्वाण ने सम्मान से सिर झुकाकर प्रणाम किया।
कविता ने अपना छोटा सा बैग उठाया—
और बिना शब्दों के दोनों समझ गए कि यह फैसला दिल से आया है।

कुछ देर बाद कार चल पड़ी…
और कविता अपने “घर”—अपने वास्तविक घर—की ओर लौट रही थी।
दोस्तों

रिश्ते टूटते नहीं,
बस कभी-कभी दोनों के बीच बना धुआँ साफ करने की जरूरत होती है।
सही समय पर झुका हुआ कदम—
पूरी ज़िंदगी बचा सकता है।

आरती गहरवार ✍🏼
धन्यवाद 🙏🏼

💞 “बाबा… वर नहीं, एक इंसान ढूँढो ना...  #बाबा…एक ऐसा वर ढूँढो ना, जिसे गिनती भले न आती हो,पर तेरी बेटी के आँसू गिनने का ...
18/11/2025

💞 “बाबा… वर नहीं, एक इंसान ढूँढो ना...

#बाबा…
एक ऐसा वर ढूँढो ना, जिसे गिनती भले न आती हो,
पर तेरी बेटी के आँसू गिनने का हुनर आता हो।

जिसे जोड़ना हो तो दिल जोड़े,
काटना हो तो दूरी काट दे…
पर रिश्ता कभी न काटे।

जो पैसे न गिन पाए,
पर तेरी बेटी की थकान की लकीरें पढ़ ले।

जो शब्दों में इज़हार न कर पाए,
पर खामोशी में भी सब कह दे—
“मैं हूँ न…”

बाबा, ऐसा वर मत ढूँढना
जो शादी के दिन राजा बने,
और उसके बाद तेरी बेटी को दासी समझ ले।

ढूँढना तो वो ढूँढना—
जिसकी दुनिया तेरी बेटी के आने से शुरू हो
और उसके मुस्कुराने से खत्म।

जिसे खाना बनाना न आता हो,
पर जली रोटी देखकर कह दे—
“स्वाद तो तेरे हाथों का है…”

जो दहेज की सूची न खोले,
बस उसके हाथ थामकर कहे—
“चलो, अपने घर चलते हैं।”

जो रिश्ते निभाने में मास्टर हो,
भले पढ़ाई में कमजोर हो।

जिसे डिग्री नहीं,
दिल की गर्माहट समझ आती हो।

जिसे पता न हो कि महीने का खर्च कितना है,
पर ये पता हो कि तेरी बेटी की खुशी कितनी कीमती है।

जो शादी को समझौता नहीं,
सहारा समझे।
जिसकी जेब छोटी हो,
पर दिल इतना बड़ा हो
कि तेरी बेटी की सारी चिंताएँ उसमें समा जाएँ।

जो गुस्से में कमज़ोर हो,
पर मनाने में सबसे ताकतवर।

जिसे जीतना न आता हो,
पर तेरी बेटी को हारने न दे—
न हालात से, न लोगों से, न खुद से।

जो मायके को तिरछी नज़र से न देखे,
बल्कि तुझे देखकर कहे—
“बाबा, आपकी बेटी का घर हमेशा आपके कदमों के लिए खुला रहेगा।”

जो खुद रो ले,
पर तेरी बेटी को आँसू न आने दे।
जो उसके सपने बोझ नहीं,
अपनी जिम्मेदारी समझे।
वर नहीं बाबा…
एक ऐसी रूह ढूँढना,
जो बेटी की परछाई बनकर हर कदम साथ चले।
गिनती में कमजोर चलेगा,
बस इंसानियत में महारथी होना चाहिए।

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कल पिता जी फिर अपने फोन के साथ जद्दोजहद कर रहे थे।“देखो बेटा, इस ‘सम्पर्क पोर्टल’ ऐप में लॉगिन ही नहीं हो रहा,” उन्होंने...
30/10/2025

कल पिता जी फिर अपने फोन के साथ जद्दोजहद कर रहे थे।
“देखो बेटा, इस ‘सम्पर्क पोर्टल’ ऐप में लॉगिन ही नहीं हो रहा,” उन्होंने कहा।

मैं हँसते हुए बोला —
“अरे पापा, ये पुराने फोन का झंझट है! एक आईफ़ोन ले लीजिए… देखिए मेरा — लाख का है, एक सेकंड में खुल जाता है।”

पापा ने बस मुस्कराकर कहा,
“ठीक है, काम हो गया,” और चुपचाप अपने कमरे में चले गए।

थोड़ी देर बाद वापस आए — चेहरे पर वही शांत भाव।
बोले,
“बेटा, जब तेरा फोन इतना तेज़ है, तो ये काम भी तू ही कर दे — कल मेरी मीटिंग है, प्रेजेंटेशन तैयार करनी है।”

मैंने कहा, “पापा, वो तो दफ़्तर का काम है, मैं क्यों करूँ?”
वो बोले,
“बेटा, अब तू डिजिटल जमाने का है ना, तेरा राजयोग एक्टिव है — थोड़ी सेवा हो जाए।”

मैंने रात भर बैठकर स्लाइडें बनाईं, डेटा कॉपी किया, ग्राफ बनाए।
सुबह 5 बजे आँख खुली तो देखा — पापा बाहर बैठे थे,
मेरे लिए चाय बना चुके थे।

उन्होंने मुस्कराकर कहा —
“बेटा, जब तू सोया रहता है तो मैं रात को जागकर प्रेजेंटेशन तैयार करता हूं ताकि तू 1 लाख का मोबाइल ले सके और महंगी बाइक पर चल सके!!
आज मैंने तुझे बस थोड़ी-सी रात जगाई… ताकि तू जान सके,
राजयोग तभी चमकता है, जब कर्मयोग उसके साथ चलता है।”

मैं चुप था, पर अंदर कुछ गहराई से हिल गया।
अब जब भी कोई मेरे फोन की कीमत पूछता है —
मैं बस मुस्कराकर कहता हूं
“कीमत तो पापा ने पहले ही चुका दी थी —
अपनी नींद, मेहनत और प्यार से।”

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30/10/2025

Celebrating my 5th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉

 #जिस दिन मेरे बेटे विवान का जन्म हुआ, उस दिन मैं फूट-फूटकर रोया था। नेहा को सिजेरियन के बाद अस्पताल के बिस्तर पर पीला प...
14/10/2025

#जिस दिन मेरे बेटे विवान का जन्म हुआ, उस दिन मैं फूट-फूटकर रोया था। नेहा को सिजेरियन के बाद अस्पताल के बिस्तर पर पीला पड़ा देखा तो दिल में एक ही ख्याल आया —
“अब ये दोनों मेरी पूरी दुनिया हैं। मैं इन्हें कभी तकलीफ़ नहीं होने दूँगा।”

शुरुआती दिन सुंदर थे।
मैंने डायपर बदलना, दूध बनाना, और हल्की खिचड़ी पकाना सीखा।
रात को जब विवान मेरे सीने पर सिर रखकर सोता, तो लगता जैसे पूरा ब्रह्मांड थम गया हो।

पर फिर काम ने मुझे बाँध लिया। मैं पुणे में एक आर्किटेक्ट के तौर पर एक बड़े प्रोजेक्ट में फँस गया था।
नेहा का शरीर अभी कमजोर था, इसलिए मैंने माँ से कहा कि वे कुछ दिन हमारे पास आ जाएँ।

माँ, सविता, एक सच्ची पारंपरिक मराठी महिला थीं — सीधी, लेकिन अपने तरीक़ों की पक्की।
पहले दिन से ही उन्होंने घर में "सुधार" शुरू कर दिए:

उन्होंने कहा, “खिड़कियाँ खुली रहनी चाहिए ताकि हवा में बुरी नज़र न टिके।”

एयर कंडीशनर बंद कर दिया — “ठंडी हवा बहू के जोड़ों को बिगाड़ देगी।”

और साफ पानी की जगह तुलसी का काढ़ा पिलाने लगीं — “शुद्धता बनी रहती है।”

मुझे लगा, बस थोड़े दिन की बात है। लेकिन नेहा के लिए ये सब उसकी निजता में घुसपैठ था।
वो डॉक्टर थी — विज्ञान पर भरोसा करती थी, अंधविश्वास पर नहीं।

धीरे-धीरे माहौल बिगड़ने लगा।
माँ ने नेहा को कहा कि वो दस दिन तक न नहाए, अंगारों पर बैठे, और बच्चे को कंबल में कसकर लपेटे — जबकि अप्रैल की झुलसाने वाली गर्मी थी।

नेहा ने धीरे से कहा,
“माँजी, ये बच्चे के लिए ख़तरनाक है… गर्मी से रैशेज़ हो सकते हैं…”

पर माँ ने पलटकर कहा,
“हमारे ज़माने में सब ऐसे ही करते थे, कोई नहीं मरता था!”

मैं बीच में था — दो औरतें, दोनों अपनी जगह सही।
एक परंपरा थी, दूसरी तर्क।
और मैं — एक डरपोक मध्यस्थ।

#वो_सुबह

उस दिन मैं जल्दी दफ़्तर के लिए निकला था।
आधे रास्ते में याद आया — फ़ोन तो घर पर ही रह गया है।
मैं गाड़ी मोड़कर वापस आया। पर जो कुछ घर में देखा — उसने मेरी रूह तक हिला दी।

#दरवाज़े के पास पहुँचा तो भीतर से बर्तन गिरने की खनकती आवाज़ आई।
फिर माँ की आवाज़ — गुस्से में काँपती हुई —
“तू मुझे सिखाएगी कैसे बच्चा पालते हैं?”

फिर नेहा की धीमी, लेकिन टूटी हुई आवाज़ —
“कृपया माँजी, उसे सांस नहीं आ रही… कंबल खोलिए…”

मेरा दिल सीने में धड़कना बंद कर गया।
मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा —

बिस्तर पर विवान नीला पड़ चुका था।
माँ उसे कसकर कंबल में लपेटे, माथे पर ताबीज़ रख रही थीं, और नेहा उसे छीनने की कोशिश कर रही थी।

मैं दौड़कर पहुँचा, कंबल हटाया, और विवान को गोद में लिया —
वो हिल नहीं रहा था।

नेहा ने CPR शुरू किया, और कुछ ही मिनटों में उसकी हल्की साँसें लौट आईं।
माँ एक कोने में बैठी थीं, काँपते होंठों से बस एक ही बात दोहरा रही थीं —
“मैंने तो बस अच्छे के लिए किया था

विवान बच गया — लेकिन उस दिन के बाद कुछ टूट गया।
नेहा माँ के सामने नहीं जाती थी, और माँ चुपचाप गाँव लौट गईं।

अब जब भी मैं अपने बेटे को सोते देखता हूँ,
मैं सोचता हूँ — कभी-कभी प्यार भी ज़्यादा हो जाए तो वह विनाश बन जाता है।

क्योंकि उस दिन जब मैं दरवाज़े में दाखिल हुआ था,
वो सिर्फ़ घर नहीं था —
वो तीन पीढ़ियों की सोच का टकराव था।

विवान अब बड़ा हो चुका है और इस विषय पर विवान की क्या सोच है इस कहानी के अंत अवश्य पढ़े।

मैं हूं विवान,
वो बच्चा, जिसकी ज़िंदगी किसी चमत्कार से उस दिन बची थी।

मां ने मुझे कभी ज़्यादा कुछ नहीं बताया,
बस इतना कि “तू उस दिन दोबारा जन्मा था।”
लेकिन जब मैं बड़ा हुआ,
तो पापा ने एक रात सबकुछ बता दिया —
कैसे मेरे रोने से पहले घर में सन्नाटा छा गया था,
कैसे दादी के प्यार और मां के तर्क में मेरा दम घुटने लगा था।

पहले तो मैं सोच में पड़ गया,
कि क्या दादी ने सच में गलती की थी?
या बस वो अपने समय की मां थीं,
जो प्यार को परंपरा के खोल में बांधना जानती थीं।

जब मैं कॉलेज गया, दादी मिलने आईं।
वो बूढ़ी हो चुकी थीं — आवाज़ कांपती थी, आंखों में अब तेज़ नहीं था।
उन्होंने मुझे देखा, और कहा,
“मैं तेरे लिए डर गई थी, इसलिए कसकर लपेट दिया था...
पता नहीं कब वो डर ही तेरी सांसें छीन लेता।”

मैंने बस उनका हाथ पकड़ लिया।
क्योंकि अब मुझे समझ आया —
हर पीढ़ी अपने हिसाब से प्यार करती है।
कोई विज्ञान से,
कोई आस्था से,
और दोनों में ही एक जैसी ममता छुपी होती है।

उस दिन मैंने मां और दादी की पुरानी तस्वीर दीवार पर टांगी।
नीचे लिखा —
“प्यार की अपनी भाषा होती है,
कभी ज़्यादा कसकर बांध लेती है,
कभी दूर से देखती रहती है —
लेकिन वो हमेशा बचा लेती है।”

आरती गहरवार ✍🏼
धन्यवाद 🙏🏼

14/10/2025

Amitabh bacchan ji ko cake kaatna pasand nahi hai🎂🎉🎉

29/09/2025

06/07/2025

Bhai bhai bhai 😂😂

(कमला देवी अपने पलंग पर बैठी थीं। उनकी बड़ी बहू सीमा किचन में काम कर रही थी। सुबह से लेकर अब तक वह घर के सारे काम कर चुक...
03/04/2025

(कमला देवी अपने पलंग पर बैठी थीं। उनकी बड़ी बहू सीमा किचन में काम कर रही थी। सुबह से लेकर अब तक वह घर के सारे काम कर चुकी थी, लेकिन फिर भी सास की शिकायतें खत्म नहीं होती थीं।)

कमला देवी (गुस्से से): अरे सीमा! कितना धीरे-धीरे काम करती हो? चाय बनाने में भी इतनी देर? कोई समय पर काम करने की आदत ही नहीं है! जब देखो, बस आराम करती रहती हो!

सीमा (संकोच से): मां जी, मैं तो सुबह से काम कर रही हू। नाश्ता बनाया ,खाना बनाया, सफाई की, कपड़े धोए, फिर भी आप कह रही हैं कि मैं कुछ नहीं करती?

कमला देवी (ताना मारते हुए): हां, हां! बड़ा काम करती हो तुम! अगर सच में इतना काम कर रही होती, तो घर इतना बिखरा हुआ क्यों दिखता? अच्छा होता कि तुम भी अपनी छोटी बहू स्नेहा से कुछ सीखती। कम से कम वो बाहर जाकर कमाती तो है!

(सीमा चुप रह गई। हर दिन की तरह आज भी उसने सास की बातों को अनसुना कर दिया। तभी दरवाजे की घंटी बजी। छोटी बहू स्नेहा ऑफिस से लौटी थी।)
(कमला देवी दोनों बहू को बराबर ताने देती थी)

कमला देवी (चीखते हुए): देखो, महारानी जी आ गईं! अब आने का समय मिला? बाहर ऑफिस के बहाने मटर गश्ती कर रही थी क्या? घर की कोई फिक्र है या नहीं?

स्नेहा (गहरी सांस लेते हुए): मां जी, मैं मटर गश्ती नहीं कर रही थी। ऑफिस में काम कर रही थी, जिससे इस घर की आर्थिक स्थिति ठीक बनी रहे।

कमला देवी (गुस्से में): अरे वाह! घर की हालत सुधारने के लिए बाहर जाती हो, लेकिन घर की हालत देखने का कोई समय नहीं! तुम्हें कभी घर की चिंता होती है क्या?

(स्नेहा ने पहली बार पलटकर जवाब देने का फैसला किया।)

स्नेहा (गंभीर स्वर में): मां जी, मैं बाहर जाकर काम करती हूं ताकि यह घर अच्छे से चल सके, और सीमा भाभी घर संभालती हैं ताकि सबका ध्यान रखा जा सके।
मुझे तो आप जो कहती हैं सो कहती है लेकिन आप दिन भर भाभी को ताने मारती रहती है
क्या आपको कभी लगा कि वह भी दिनभर बिना रुके काम करती हैं? आप उन्हें हमेशा ताने देती हैं, कभी उनकी मेहनत की सराहना क्यों नहीं करतीं ???

(सीमा ने स्नेहा की बात सुनी तो उसकी आंखों में आंसू आ गए। वह पहली बार हिम्मत करके बोली।)

सीमा (धीमे स्वर में): मां जी, जब स्नेहा बाहर होती है, तब घर की सारी जिम्मेदारी मुझ पर होती है। मैं भी आराम से बैठना चाहती हूं, लेकिन घर के काम कभी खत्म ही नहीं होते। फिर भी आप मुझे हमेशा धीमी और लापरवाह कहती हैं। क्या मेरा काम किसी काम का नहीं, क्या मुझे थकान नहीं होती है, या कभी मेरी तबीयत खराब नहीं हो सकती है?

दिन रात इस घर में काम करने और आपकी सेवा करने का सिर्फ एक ही इनाम मिलता है #कामचोर , #लापरवाह , #बेवकूफ

(कमला देवी थोड़ी असहज हो गईं, लेकिन अभी भी गुस्से में थीं।)

कमला देवी: तो अब तुम दोनों मुझे सिखाओगी कि मैं क्या कहूं और क्या न कहूं? बहुएं अब सास को जवाब देने लगी हैं?

स्नेहा (शांत स्वर में): मां जी, हम आपको जबाब नहीं दे रहे, बस अपना पक्ष रख रहे हैं.... आप चाहती हैं कि हम आपकी इज्ज़त करें.... तो आपको भी हमारी मेहनत की कद्र करनी चाहिए.....हम दोनों अलग-अलग तरीकों से इस घर के लिए काम कर रहे हैं.... आप हमें ताने देकर नहीं.... बल्कि प्यार से समझा सकती हैं।

(कमला देवी पहली बार सोच में पड़ गईं। उन्होंने देखा कि उनकी दोनों बहुएं सही कह रही थीं। उन्होंने चुपचाप चाय का कप पकड़ लिया और सीमा की ओर देखा।)

कमला देवी (धीमे स्वर में): .... तुम दोनों ठीक कह रही हो। मैंने कभी इस नज़रिए से सोचा ही नहीं।

(उस दिन के बाद से घर में बदलाव आने लगा। कमला देवी ने अपनी बहुओं को समझना शुरू कर दिया। सीमा अब बिना किसी डर के अपनी बात कहने लगी और स्नेहा ऑफिस से लौटने के बाद भी पहले जैसा तनाव महसूस नहीं करती थी। घर में पहली बार एक नया रिश्ता पनपने लगा—इज्ज़त और समझदारी का रिश्ता।)

21/02/2025

03/01/2025

#खोए #खोए #रहते #हो

जय श्री राम 🙏
24/12/2024

जय श्री राम 🙏

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