24/12/2025
अदालत में दस्तावेज़ पर आख़िरी दस्तख़त होते ही वकील ने मुस्कुराकर कहा—
“लीजिए मैडम, अब आपका तलाक हो गया।
कोर्ट ने आपको 30 लाख रुपये मुआवज़े में दिलवा भी दिए,
और हर महीने 20,000 रुपये खर्च के तौर पर भी मिलते रहेंगे।
अब तो खुश हैं ना?”
वह हल्की-सी मुस्कान बनाकर बोली—
“हाँ, खुश हूँ…..अब मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए।”
वकील संतुष्ट होकर बाकी कागज़ समेटने लगे।
और वह लड़की… कविता, अपने माता–पिता के साथ बाहर निकल गई।
पीछे अदालत के कोने में खड़ा निर्वाण, उसका पति, सब देख रहा था।
कविता एक नज़र भी उसकी तरफ़ नहीं उठाती।
गाड़ी का दरवाज़ा बंद हो गया… और रिश्ता भी।
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पहला महीना—
मायके में सब प्यार से पेश आते रहे।
कविता को लगा, “यही तो आज़ादी थी… यही तो सुकून था।”
दूसरा महीना—घर वालो का सुर बदलने लगा।
कभी भाई तेज़ लहज़े में बोल देता,
कभी भाभी चुभे हुए शब्द सुना जाती—
“इतनी बड़ी हो गई हो, थोड़ी जिम्मेदारी ले लिया करो…”
भतीजे भी कभी-कभी कह देते—
“बुआ, आप कब तक रहोगी यहाँ?”
तीसरा महीना—
घर के माहौल में बदली सी पड़ने लगी।
जहाँ पहले प्यार था, अब बोझ-सा एहसास।
कविता चुप हो जाती, पर दिल में दर्द पलता रहता।
चौथा महीना—
अब उसकी हर हरकत पर नज़रें उठने लगीं।
बाहर जाते ही पड़ोस की खुसर–फुसर सुनाई देने लगी—
“तलाक हो गया है… अब मायके में ही रहेगी!!?
कविता के भीतर कुछ टूट रहा था।
उसे पहली बार महसूस हुआ—
ससुराल में रिश्ते कठिन थे, पर वहाँ उसका अपना घर था।
यहाँ मायके में—वह मेहमान भी नहीं, बोझ जैसी लगने लगी थी।
एक रात, वह छत पर अकेली बैठी सोचती रही—
पैसे मिल गए… आज़ादी मिल गई…
पर क्या इज्जत, अपनापन, और घर मिल पाया?
उसने धीरे से खुद से कहा—
“गलती की है मैंने…
फैसला लेते समय मैंने सिर्फ दर्द देखा...
सीख नहीं देखी।”
उसे समझ आ गया—
एक लड़की जब टूटे रिश्ते के बाद मायके लौटती है,
तो उसे सबसे ज़्यादा सहारे की जरूरत होती है,
लेकिन समाज उसे सबसे पहले जज करता है।
और घर…
जिसे वो “अपना” समझती है—
वहीं उसे धीरे-धीरे महसूस होने लगता है
कि “मायका है पर अधिकार कुछ नहीं।
मैं अपना घर छोड़ आई जहां मेरा अधिकार था जहां मेरा अपना परिवार था अपने अहम् की वजह से मैंने छोड़ा है घर ...
उसकी आँखों में नमी आ गई—
अब उसे अपने फैसले की कीमत समझ आ चुकी थी।
#मायके में चार महीने बिताने के बाद कविता को हर दिन वही एहसास सताने लगा—
“मैंने क्या खो दिया…?
क्या सिर्फ ग़ुस्से और तानों में बहकर इतना बड़ा फैसला कर लिया?”
वह छत पर बैठकर देर तक आसमान देखती रहती।
यादें पीछे-पीछे भागतीं—निर्वाण की बातें, उसकी आदतें, वो छोटी-छोटी बहसें…
और सबसे ज़्यादा—उसका साथ, जो अब बहुत दूर लगता था।
एक रात, मन बिल्कुल टूट गया।
आँसू रोकते-रोकते उसने फोन उठाया और नंबर मिलाया।
कॉल उठते ही निर्वाण की आवाज़ आई—
“हेलो?”
कविता ने धीमी, कांपती आवाज़ में कहा—
“निर्वाण… क्या हम… क्या हम अपने रिश्ते को एक मौका दे सकते हैं?
मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है।
मैं… तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ।”
कुछ पल दोनों तरफ़ खामोशी रही।
फिर निर्वाण ने गहरी सांस लेकर कहा—
“मैं भी तुम्हारे बिना नहीं रह पा रहा…
फैसले में दोनों की गलती थी, पर सुधारने के लिए दोनों को साथ चलना होगा।
मैं तुम्हें वापस लाना चाहता हूँ…
लेकिन कुछ समझौते हम दोनों को करने होंगे।
अगर तुम्हारी ‘हाँ’ है…
तो मैं अभी निकलता हूँ।”
किया की आँखों से आँसू गिर पड़े।
उसने धीमे से कहा—
“हाँ… मैं तैयार हूँ।”
उसे समय रात के 12:00 बज रहे थे
निर्वाण ने अपनी कार उठाई।
ठंड थी, रास्ते सुनसान, लेकिन उसका दिल सिर्फ एक ही बात कह रहा था—
“उसे घर वापस लाना है।”
लगातार 5 घंटे ड्राइव करता रहा।
ना रुका, ना थका।
सुबह के 5 बजे,
वह कविता के मायके के दरवाज़े पर खड़ा था।
अंदर से कविता बाहर आई—
हल्की-सी घबराहट, आँखों में शर्म भी, और राहत भी।
माँ-बाप ने दरवाज़ा खोला।
निर्वाण ने सम्मान से सिर झुकाकर प्रणाम किया।
कविता ने अपना छोटा सा बैग उठाया—
और बिना शब्दों के दोनों समझ गए कि यह फैसला दिल से आया है।
कुछ देर बाद कार चल पड़ी…
और कविता अपने “घर”—अपने वास्तविक घर—की ओर लौट रही थी।
दोस्तों
रिश्ते टूटते नहीं,
बस कभी-कभी दोनों के बीच बना धुआँ साफ करने की जरूरत होती है।
सही समय पर झुका हुआ कदम—
पूरी ज़िंदगी बचा सकता है।
आरती गहरवार ✍🏼
धन्यवाद 🙏🏼