Pinch of Panch

Pinch of Panch being

15/08/2026
15/08/2026




15/08/2026

कोई है सरकार के संग में,
कोई हुआ विरोधी का।
चरणोदक कोई राहुल का ले,
कोई लेता मोदी का।
मतलब की इक बात नहीं है,
बडबड बातें हैं सबकी।
बना फेसबुक अड्डा लगता,
इन सब की बकचोदी का।।

15/08/2026





15/08/2026





1920 के आसपास ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरम पर था. उस समय लगभग 3.5 करोड़ किमी क्षेत्र और दुनिया की 50 करोड़ आबादी पर शासन स...
14/08/2026

1920 के आसपास ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरम पर था. उस समय लगभग 3.5 करोड़ किमी क्षेत्र और दुनिया की 50 करोड़ आबादी पर शासन स्थापित था.

50 करोड़ में भारत की आबादी 25 करोड़ के करीब थी.

35-40 अलग अलग छोटे बड़े कॉलोनी को नियंत्रण में रखने के लिए 1,00,000 ब्रिटिश सैनिक थे. यानी 1 ब्रिटिश सैनिक के अधीन 5000 औपनिवेशिक आबादी.

इतनी बड़ी आबादी को ब्रिटिश कंट्रोल कैसे करते थे ? ब्रिटिश राज के उदाहरण से समझते हैं.

वाइसराय : 1
गवर्नर : 8
न्यायपालिका के जज
म्युनिसिपल कमिश्नर
पुलिस कमिश्नर
डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट
पुलिस सुपरिटेंडेंट
वाईस चांसलर
और 65,390 ब्रिटिश सैनिक

65,390+8000 के करीब मिलकर भारत के पर शासन करते थे. आजाद भारत में अंग्रेजों की जगह तीन चार जातियों ने ले रखी है.

देश की आजादी के लिए सबसे ज्यादा फांसी और जेल ब्राह्मणों को हुई और बदले में उनको मिला आरक्षण और एक्ट्रोसिटी एक्ट।थू

अब ऐसा करो मेरिट में अच्छे नंबर लाओ ओर अगले कुछ सालो में सबकी जगह ले ले। हो पाएगा

14/08/2026

जातीय उन्माद में बदले की भावना को जायज़ मत ठहराइए। बदला कभी खत्म नहीं होता आज एक परिवार बदला लेगा,कल दूसरा परिवार,और फिर यह सिलसिला पीढ़ियों तक चलता रहेगा।
दो परिवार आपस में लड़ते रहेंगे और कुछ लोग जाति की रोटी सेंक कर फेसबुक पर लाइक-कमेंट बटोरते रहेंगे। लेकिन उस आग में जलेंगे वही परिवार,जिनके घर उजड़ेंगे और बच्चे अपना भविष्य खो देंगे।
इसलिए भावनाओं को भड़काने के बजाय धैर्य रखिए,कानून पर भरोसा रखिए...

14/08/2026

जातिवाद चरम पर है।

14/08/2026


🇲🇲

काशी विद्वत परिषद ने ऐतिहासिक निर्णय लिया है। विगत 10 वर्षों में मनुस्मृति में अंग्रेजों के समय की गई मिलावट के संदर्भ म...
14/08/2026

काशी विद्वत परिषद ने ऐतिहासिक निर्णय लिया है। विगत 10 वर्षों में मनुस्मृति में अंग्रेजों के समय की गई मिलावट के संदर्भ में अनेक अध्येता प्रश्न उठाते रहे हैं। मैंने भी इस मुद्दे पर शोधपरक गंभीर सामग्री विद्वतजनों को उपलब्ध कराई।
हाल ही में आदरणीय श्री हेमंत शर्मा Hemant Sharma जी ने इस पर गंभीर विवेचना प्रस्तुत की है।

कुछ ही दिन पूर्व जब मैंने वॉरेन हेस्टिंग्स के बाद वॉयसरॉय पद पर नियुक्त हुए लॉर्ड टिगेनमाउथ उपाख्य सर जॉन शोर के द्वारा संकलित और लंदन से 1807 में प्रकाशित विलियम जोन्स के मूल पत्र संकलन के कुछ हिस्से उद्धृत कर आलेख लिखा तो प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने अनेक वरिष्ठ विद्वानों से परामर्श कर उन पत्रों को अवलोकन के लिए मुझसे मांग लिया।

मैंने मूल प्रति पीडीएफ उन्हें प्रेषित कर दी। विद्वानों ने इस खुलासे को बहुत गंभीरता से लिया, और प्रसन्नता की बात है कि उन्होंने वर्तमान मनुस्मृति के अनेक अध्यायों के श्लोकों को क्षेपक मान लिया है। मौजूदा मनु स्मृति को जबतक इसकी शुद्धि नहीं होती, तब तक इसे उद्धृत किए जाने पर स्वतः ही विराम लग गया है।

मुझे प्रसन्नता है कि काशी विद्वत परिषद ने 11 विद्वान पंडितों की शोध समिति गठित करने का फैसला किया है। इसमें अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, अखिल भारतीय संत समिति, गंगा महासभा आदि अनेक प्रतिष्ठित संत-संन्यासी संगठन जुड़ गए हैं। समिति अनेक प्रकाशनों, मूल पाण्डुलिपियों और व्याकरण आचार्यों की सहायता से क्षेपक श्लोकों का पता लगाएगी।
इसके बाद प्रक्षिप्त श्लोकों को हटाकर पुन: शुद्ध मनु संहिता का प्रकाशन होगा।

यह अंतरराष्ट्रीय महत्व का समाचार है। स्वामी दयानंद सरस्वती के संगठित प्रयत्न के बाद पहली बार काशी के विद्वान इस विषय पर परीक्षण प्रारंभ कर रहे हैं।

इसमें संयोग है कि विलियम जोन्स ने वॉयसरॉय वॉरेन हेस्टिंग्स के निर्देश पर जिन 11 पंडितों की कमेटी मनु स्मृति के संकलन, संपादन और प्रथम प्रकाशन के लिए गठित की थी, उस समिति में काशी का कोई विद्वान ब्राह्मण सम्मिलित नहीं था।

अब जिस समिति में काशी के विद्वान ब्राह्मण नहीं है, उस समिति की कोई बात सनातन धर्म में स्वीकृत नहीं मानी जा सकती।

संयोग है कि मनु स्मृति के प्रथम प्रकाशन के पूर्व जिस षड्यंत्रपूर्ण मिलावट के लिए विलियम जोन्स ने 11 पंडितों की कमेटी बनाई थी, उसका शुद्धिकरण करने के लिए भी 11 पंडित मोर्चा संभालने जा रहे हैं।

विशेष उल्लेखनीय है कि इसमें काशी की विद्वत परंपरा के पंडित शामिल हो रहे हैं। यह समिति दूध का दूध पानी का पानी करके रहेगी।

और चलते चलते बता दूं कि काशी विद्वत परिषत का महत्व क्या है। शिवाजीराजे के राजतिलक के समय जब मध्य भारत, दक्षिण के तमाम राजे-रजवाड़े दिल्ली की मुगल बादशाही, निजामशाही के सम्मुख झुक गए थे, और उन्होंने अपने अपने ब्राह्मणों, पंडितों को शिवाजी के राज्याभिषेक से दूरी बनाने का निर्देश दिल्ली के संकेत पर भेज दिया था, तब शिवाजी राजे के राजतिलक के लिए काशी के ब्राह्मणों ने मोर्चा संभाला था।

काशी विद्वत परिषद तब से चर्चित है। उसी के पंडित गागा भट्ट 500 ब्राह्णणों के साथ रायगढ़ पहुंच गए और उन्होंने शिवाजी राजे का राजतिलक करने का ऐतिहासिक कार्य संपन्न किया।

काशी विद्वत परिषद का अस्तित्व तो वेदकाल से है। संप्रति अंग्रेजी राज में सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट आने के बाद विगत 140 साल से यह पंजीकृत परिषद के रूप में काम कर रही है।

इसका 125 साल का लिखित अविच्छिन्न इतिहास रिकॉर्ड पर है। आवश्यकता पड़ने पर यह परिषद शंकराचार्य पद के लिए योग्य विद्वान का चयन तक करने की अधिकारी है। इसी परिषद ने अनेक पीठों की खंडित आचार्य परंपरा को पुनर्जीवित किया है।

भारत को अपनी राख से पुनर्जीवित कर देने का मंत्र इसी परिषद के पास है। यह परिषद शिवाजी राजे के राजतिलक के बाद मनु स्मृति के प्रश्न पर पहली बार सामने आई है।

यह ऐतिहासिक समाचार है। अंतर्राष्ट्रीय महत्व का समाचार है। बहुतों के पेट मे मरोड़,पेचिश उठना तय है।

मैं काशी विद्वत परिषद के महासचिव प्रो. आचार्य पंडित रामनारायण द्विवेदी और काशी के महान विद्वानों से भरी परिषद को दण्डवत प्रणाम करते हुए इस ऐतिहासिक कार्य के शुभारंभ के लिए शुभकामनाएं प्रेषित कर रहा हूं।


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