17/03/2026
पिता का दर्द: "मैं उसे बचा न सका"
वह दरवाजे से सटकर खड़ा था। 63 साल की उम्र में आज वह सबसे बड़ा धोखा खा रहा था—अपने ही बेटे को खोने का। उसने अपना तीन मंज़िला घर बेच दिया था, अपनी जवानी इस उम्मीद में लुटा दी थी कि एक दिन बेटा ठीक हो जाएगा। 13 साल तक हर सुबह उठकर सोचा—शायद आज बेटा आँख खोले। पर वो सुबह कभी नहीं आई।
उसकी आँखें सूखी थीं। पर सूखी आँखों का मतलब यह नहीं कि दर्द नहीं है। कभी-कभी आँसू भीतर ही भीतर इतना जलाते हैं कि बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पाते। उसने बेटे के सिर पर हाथ रखा तो हाथ काँप रहे थे। वही हाथ जिसने कभी बेटे को साइकिल चलाना सिखाया था, वही हाथ जो उसे पहली बार स्कूल ले गया था, आज उसी बेटे को आखिरी विदाई दे रहे थे।
उसने कहा—"हर माँ-बाप की यही दुआ होती है कि उनके बच्चे उन्हें मौत न दें। पर हमने अपने बेटे को मौत दी। ये हमारे सीने में हमेशा एक सवाल बनकर रहेगा—सही किया या गलत?"
एंबुलेंस जाते वक्त वह दरवाजे पर ही खड़ा रहा। वह आगे नहीं बढ़ सका। शायद इसलिए कि अगर वह एक कदम भी आगे बढ़ता, तो टूट जाता। और एक पिता को अपने बेटे के सामने टूटना नहीं चाहिए, भले ही बेटा देख नहीं सकता। वह देर तक खड़ा रहा। खाली हाथ। खाली सीना। बस एक सवाल—"बेटा, मैं तेरा बाप हूँ या तेरा कातिल?"