03/03/2026
यह सिर्फ एक फिल्म नहीं…
यह आज की उस सोच की कहानी है —
जहाँ रेप पीड़िता से पूछा जाता है
“वो वहाँ गई ही क्यों थी?”
जहाँ नई पीढ़ी ( कक्षा 9 के एक छात्र ने स्कूल के व्हाट्सएप ग्रुप पर मैसेज भेजा कि रात में कोई मुझे क्यों नहीं बुलाता। )का एक हिस्सा
रेप को अपराध नहीं, “सेक्स का एक रूप” समझने की खतरनाक भूल कर बैठता है।
जहाँ पैसों की ताकत रखने वाले लोग मान लेते हैं
कि सिस्टम उनकी जेब में है।
और सबसे चिंताजनक बात —
कुछ लोग यह मानने लगे हैं कि
कोर्ट से न्याय नहीं मिलेगा,
सीधा आरोपी का मर्डर कर दो… वही असली इंसाफ है।
आज की युवा मानसिकता में “Eye for an Eye” को सही ठहराया जा रहा है।
लेकिन अगर हर कोई खुद ही फैसला सुनाने लगे,
तो अदालतों और संविधान का अस्तित्व ही क्यों रहेगा?
⚖️ मेरा स्पष्ट मत —
जैसे कहा जाता है “भगवान के यहाँ देर है, अंधेर नहीं”
वैसे ही न्याय में देरी हो सकती है,
पर अन्याय नहीं होना चाहिए।
हमें अदालत पर उतना ही विश्वास रखना होगा
जितना हम अपने ईश्वर पर रखते हैं।
क्योंकि न्याय बदले से नहीं,
कानून से मिलता है।