07/09/2022
वहम ओ ख़िरद के मारे हैं शायद सब लोग
देख रहा हूँ शीशे के घर चारों ओर…
युवराज सिंह का एक काफ़ी पुराना ऐड याद आता है. जिसमें उन्होंने कहा था, ‘जब तक बल्ला चल रहा है ठाट चल रहा है, जब नहीं चलेगा तो फिर…’, इस ‘फिर’ के बाद युवराज के चेहरे पर एक गहरी शांति थी और यही शांति इस समाज का सबसे बड़ा दुःख है.
इस शांति में मेंटल हेल्थ से जुड़ी तमाम कहानियाँ हैं, इस शांति में बुरे दौर में लोगों का मज़ाक़ उड़ाना छिपा है, इसमें छिपा है कि कैसे लोग खड़े होकर इंतज़ार कर रहे होते हैं कि सामने वाला कब ज़मीन पर धड़ाम होगा.
ऐसे लोग कुछ दिन पहले भी दिखे थे, जिनको जल्दी थी कि कहीं इमारत गिरने का वीडियो हमसे पहले कोई और ना बना ले और अपलोड कर दे. तालियाँ बज रही थीं. इस पर मैंने पहले भी कहा था कि दूसरे की बर्बादी देखने में रस है, ऐसा रस जो अपने सुख में नहीं मिलता.
रविवार को भारत-पाकिस्तान के मैच ने टीम इंडिया के प्रशंसकों को बेहद मायूस किया. वजह थी टीम इंडिया का पूरी ताक़त के बाद भी मैच हार जाना. सोशल मीडिया पर मैच के बाद तमाम पोस्ट दौड़ पड़े… जो अपनी भाषा में जितना अव्वल कह सका उसने कहा. किसी ने किसी की राष्ट्रीयता पर सवाल उठा दिए तो कोई किसी खिलाड़ी को दम भर कोसता दिखा. इससे पहले जिस पंड्या ने कमाल किया था और तमाम सराहनाएँ पा रहा था वो अब गाली खा रहा था.
गाली देने वाले ये वो लोग हैं जो दरअसल क्रिकेट प्रेमी नहीं हैं. ये अपनी टीम से सिर्फ़ जीत की मांग रखते हैं. जो पूरी ताक़त से स्टेडियम में दबाव बनाते हैं कि तुम्हें जीतना ही होगा. यक़ीन मानिए ऐसे लोगों को खेल में कोई दिलचस्पी नहीं होती.
यहां पर बात क्रिकेट की नहीं है, बात जीवन की है… जीवन के सूत्रों की है. कि हम व्यक्ति के साथी हैं या सिर्फ़ उसके अच्छे के साथी हैं. अगर हम खेल का आनंद लेंगे तो आनंद में रहेंगे, लेकिन हम ऐसा नहीं करते अपितु हम जीत का दबाव बनाते हैं. हार के बाद गालियाँ देते हैं.
मेंटल हेल्थ को लेकर तमाम क़िस्से भी इन्हीं बातों से जुड़े हैं कि हम किसी की उपलब्धि में उसके साथी हैं, लेकिन उसी के बुरे दौर में हम उसे जितना कोस सकें कोसते हैं. इसके उलट जब हम ख़ुद किसी बुरे दौर में होते हैं तो चाहते हैं कि लोग हमें सुन लें, हमें समझें… ग़लती किससे नहीं होती, कौन ऐसा है जो कहीं न कहीं फ़ेल नहीं हुआ?
ग़लती करना बुरा नहीं है, फ़ेल होना बुरा नहीं है, हार जाना भी बुरा नहीं है… बल्कि बुरा है उसे स्वीकार ना करना. हारे हुए के साथ खड़े नहीं होना, उसके लिए बहरा हो जाना. दरअसल, हम सभी अच्छे के साथी हैं, और चाहते हैं बुरे वक़्त में लोग हमारा साथ दें.
शायद इसी किसी दौर से गुज़र कर किसी ने ‘मैं ठीक हूँ’ जैसे सबसे बड़े झूट का आविष्कार किया होगा. एक ऐसा झूट जिसे जितना ज़ियादा कहा गया उससे ज़ियादा उस पर विश्वास किया गया.
कई बार मुझे लगता है कि हमें कोई बीमारी, कोई क़यामत ख़त्म नहीं कर सकेगी. हमारे लिए तो हम ही काफ़ी हैं. ख़ैर, इन सब बातों से हमें क्या. हमें तो ध्यान रखना है कि जीवन में बल्ला चलता रहना चाहिए बस, वरना…
via Rahul Sheoran