23/04/2026
Unnecessary झूठ — एक छोटा सा शब्द, लेकिन बड़ा असर
झूठ बोलना आसान लगता है…
बस कुछ सेकंड लगते हैं एक बात छुपाने में या सच को मोड़ देने में।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस एक झूठ का बोझ कितना भारी होता है?
मुझे झूठ से बहुत नफरत है।
ऐसा नहीं है कि मैं कभी झूठ नहीं बोलती…
जीवन की परिस्थितियाँ कई बार हमें झूठ बोलने पर मजबूर कर देती हैं।
लेकिन सवाल ये है — अनावश्यक झूठ क्यों?
मेरा मानना है कि जब तक बहुत जरूरी न हो, झूठ नहीं बोलना चाहिए।
क्योंकि जब कभी मुझे झूठ बोलना पड़ता है,
तो मेरी धड़कन तेज हो जाती है, पूरा शरीर सिहर जाता है…
और तब कहीं जाकर गले से एक झूठ निकल पाता है।
लेकिन मैंने अपने आसपास, यहाँ तक कि घर-परिवार में भी देखा है—
जहाँ जरूरत नहीं होती, वहाँ भी लोग बड़ी आसानी से झूठ बोल देते हैं।
क्यों भाई? जरूरत ही क्या है?
और सबसे अजीब बात ये है कि लोग सामने वाले को बेवकूफ समझ लेते हैं,
कि वो उनका झूठ पकड़ नहीं पाएगा।
पता नहीं ये पावर मुझमें ही है या सबमें, लेकिन मुझे तो 90% बार तुरंत एहसास हो जाता है
कि सामने वाला झूठ बोल रहा है।
सच कड़वा जरूर होता है,
लेकिन उसमें एक सुकून होता है — एक आज़ादी।
जहाँ झूठ आपको बार-बार डराता है कि “कहीं सच सामने न आ जाए”,
वहीं सच आपको निडर बनाता है।
झूठ रिश्तों को धीरे-धीरे खत्म करता है,
विश्वास को तोड़ देता है।
और एक बार विश्वास टूट जाए, तो उसे दोबारा बनाना आसान नहीं होता।
👉 सोचिए…
क्या हम बिना वजह झूठ बोलकर अपने रिश्तों को कमजोर कर रहे हैं?
क्योंकि सच्चाई भले मुश्किल हो,
लेकिन वही आपको अंदर से मजबूत बनाती है। 💫