22/08/2026
22 अगस्त 1924.
मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के जमानी गाँव में एक बच्चा पैदा हुआ, जो आगे चलकर हिंदी व्यंग्य की ऐसी आवाज़ बना, जिसकी धार आज भी कुंद नहीं हुई।
नाम था हरिशंकर परसाई।
परसाई जी ने हिंदी व्यंग्य को सिर्फ़ हँसाने वाली विधा नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे समाज को आईना दिखाने का ज़रिया बनाया। पाखंड हो, भ्रष्टाचार हो, धार्मिक आडंबर हो या हमारी अपनी सुविधानुसार बदलती नैतिकताएँ... उनकी कलम किसी को बख्शती नहीं थी।
वे हँसाते थे।
लेकिन उनकी हँसी के पीछे एक सवाल छिपा होता था।
और कई बार, वही सवाल हमारी हँसी रोक देता था।
जबलपुर से उन्होंने वसुधा जैसी पत्रिका निकाली और अपनी लेखनी के ज़रिए हिंदी साहित्य में व्यंग्य को एक अलग पहचान दी। 1982 में विकलांग श्रद्धा का दौर के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
लेकिन सच कहें तो परसाई जी की सबसे बड़ी पहचान कोई पुरस्कार नहीं है।
उनकी सबसे बड़ी पहचान उनके पाठक हैं।
क्योंकि उन्हें पढ़ते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि यह बात उन्होंने आज के लिए लिखी है।
और शायद यही परसाई की सबसे बड़ी ताक़त थी।
उन्होंने अपने समय की विसंगतियों पर लिखा था, लेकिन उन विसंगतियों में से बहुत-सी आज भी हमारे आसपास मौजूद हैं।
इसलिए परसाई को पढ़ना सिर्फ़ साहित्य पढ़ना नहीं है।
कभी-कभी यह अपने समय को पहचानना है।
और कभी-कभी... ख़ुद को भी।
आज उनकी जयंती पर, उन्हीं की कुछ पंक्तियाँ पढ़िए।
और फिर ज़रा ठहरकर सोचिए...कुछ सचमुच बदला है?
आपको हरिशंकर परसाई जी की कौन-सी रचना सबसे ज़्यादा पसंद है?
कमेंट में बताइए। ❤️
#हरिशंकरपरसाई