Dr Jagmohan Dwivedi

Dr Jagmohan Dwivedi Jagmohan sir is an Educationist, Public Policy Analyst, Political Analyst, and Columnist.

With a deep understanding of educational systems, governance, and political affairs,

श्रीनिवास रामानुजन : प्रतिभा, संघर्ष और गणित की अमर विरासत.................................................................
23/12/2025

श्रीनिवास रामानुजन : प्रतिभा, संघर्ष और गणित की अमर विरासत..........................................................................
भारतीय गणित के इतिहास में श्रीनिवास रामानुजन का नाम अद्वितीय प्रतिभा, मौलिक सोच और असाधारण संघर्ष का प्रतीक है। 22 दिसम्बर 1887 को तमिलनाडु के ईरोड नगर में जन्मे रामानुजन ने सीमित साधनों और औपचारिक शिक्षा की कमी के बावजूद विश्व-गणित को ऐसी अमूल्य धरोहर दी, जिसने उन्हें अमर बना दिया।
रामानुजन की प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु के ही विभिन्न कस्बों और शहरों में हुई। सामान्य विषयों में वे विशेष सफलता प्राप्त नहीं कर सके और आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनकी कॉलेज-शिक्षा अधूरी रह गई। किंतु गणित उनके लिए केवल एक विषय नहीं, बल्कि स्वाभाविक अभिव्यक्ति का माध्यम था। वे जो भी गणित की पुस्तक पढ़ते, उसे शीघ्र आत्मसात कर लेते और फिर अपनी कॉपियों में नए-नए सूत्र, समीकरण और संबंध स्वयं गढ़ने लगते। किशोरावस्था में प्राप्त एक विस्तृत गणित-संकलन पुस्तक ने उनकी रुचि को और गहन बना दिया, जिसके बाद उन्होंने बिना किसी औपचारिक मार्गदर्शन के उच्च स्तरीय गणितीय समस्याओं पर कार्य आरंभ कर दिया।
डिग्री के अभाव और आर्थिक सीमाओं के कारण रामानुजन को छोटे-मोटे दफ़्तरी कार्य करने पड़े, किंतु गणित के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ। वे अपने खाली समय का उपयोग निरंतर नोटबुकें भरने में करते रहे। उनके कार्य को देखकर तमिलनाडु के कुछ स्थानीय गणितज्ञों और शिक्षकों ने यह अनुभव किया कि यह साधारण विद्यार्थी का कार्य नहीं है। उन्हीं की प्रेरणा से रामानुजन ने अपने चुने हुए गणितीय परिणामों के साथ यूरोप के प्रसिद्ध गणितज्ञों को पत्र भेजने शुरू किए। अनेक पत्रों का कोई उत्तर नहीं मिला, किंतु कैंब्रिज विश्वविद्यालय के महान गणितज्ञ जी. एच. हार्डी तक पहुँचा एक पत्र उनके जीवन की दिशा बदलने वाला सिद्ध हुआ। हार्डी ने उन सूत्रों को देखकर तुरंत समझ लिया कि यह असाधारण प्रतिभा का कार्य है और उन्होंने रामानुजन को कैंब्रिज बुलाने की व्यवस्था की।
कैंब्रिज पहुँचकर रामानुजन को ऐसा शैक्षणिक वातावरण मिला जहाँ उनके विचारों को व्यवस्थित रूप से समझा, प्रमाणित किया और प्रकाशित किया गया। यहाँ उन्होंने संख्याओं के भीतर छिपे पैटर्न को खोजने का अपना स्वाभाविक ढंग बनाए रखा। उन्होंने यह अध्ययन किया कि किसी संख्या को छोटे-छोटे भागों के योग के रूप में लिखने के कितने तरीके हो सकते हैं, बड़ी संख्याओं के पीछे कौन-से सामान्य नियम कार्य करते हैं और कुछ विशेष संख्याएँ बार-बार किन रूपों में प्रकट होती हैं। इसी दिशा में उनके कार्य ने “पार्टिशन सिद्धांत” को नई ऊँचाई दी। उन्होंने π (पाई) के मान को अत्यधिक सटीकता तक ज्ञात करने के लिए ऐसी श्रेणियाँ दीं, जिनसे कम चरणों में अधिक दशमलव स्थानों तक मान निकालना संभव हुआ। अनंत श्रेणियों और विशेष प्रकार की संख्याओं पर उनके विचार आज भी गणितीय अनुसंधान का विषय हैं।
अल्प समय में ही रामानुजन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हो गई। वे लंदन मैथमेटिकल सोसायटी के सदस्य बने, ब्रिटेन की प्रतिष्ठित रॉयल सोसायटी के फेलो चुने गए और ट्रिनिटी कॉलेज, कैंब्रिज के पहले भारतीय फेलो बने—यह सब उस व्यक्ति के लिए असाधारण उपलब्धि थी जिसकी अपनी विश्वविद्यालय-डिग्री भी पूर्ण नहीं हुई थी। किंतु दूसरी ओर, इंग्लैंड की जलवायु, भोजन और स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया। 1919 में वे भारत लौट आए और 26 अप्रैल 1920 को मात्र 32 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
रामानुजन के निधन के बाद उनकी नोटबुकों और पांडुलिपियों का महत्व और अधिक स्पष्ट हुआ। बाद के दशकों में अनेक गणितज्ञों ने उनके कार्यों पर शोध किया; कई सूत्र सिद्ध हुए और अनेक आज भी अध्ययन का विषय बने हुए हैं। समय के साथ यह स्वीकार किया गया कि उनके अनेक विचार अपने युग से बहुत आगे थे और आधुनिक गणित की कई अवधारणाओं के लिए प्रेरणा बने।
उनकी स्मृति को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2011 में यह घोषणा की कि 22 दिसम्बर को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में गणित के प्रति रुचि और रचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करना है। श्रीनिवास रामानुजन का जीवन यह सिद्ध करता है कि सच्ची प्रतिभा औपचारिक सीमाओं की मोहताज नहीं होती और समर्पण के साथ किया गया सृजन कालजयी बन जाता है।

12/12/2025

🔥 शेयर कीजिए मित्रो… ताकि हर हिन्दुस्तानी उस अमर दीपक को पहचान सके,
जिसने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वतंत्रता की ज्योति प्रज्वलित की।
जय माँ भारती! 🇮🇳

🌺 आज महान क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी जी के पावन जन्मदिवस पर
अपने हृदय की गहराइयों से शत-शत नमन… 🙏
(10 दिसंबर 1888 – 1 मई 1908)

कभी-कभी इतिहास ऐसी आत्माएँ जन्म देता है,
जो कम उम्र में ही इतने विराट कार्य कर जाती हैं
कि युगों-युगों तक उनका नाम तिरंगे की शान के साथ गूँजता है।
प्रफुल्ल चाकी ऐसी ही एक अमर आत्मा थे।

🌿 संघर्षों में से जन्मा एक अदम्य ज्वालामुखी

उत्तर बंगाल के एक छोटे से गाँव में जन्मा वह बालक,
जिसने दो वर्ष की उम्र में ही पिता को खो दिया,
परंतु माँ की कठिनाइयों ने उसके भीतर
न झुकने का साहस और न टूटने का जज़्बा पैदा कर दिया।

शायद स्वयं माँ भारती उसकी आत्मा को
क्रांति के मार्ग के लिए तैयार कर रही थीं।

🔥 विवेकानंद के विचारों से प्रफुल्ल का हृदय प्रज्वलित हुआ

विद्यार्थी जीवन में जब प्रफुल्ल ने
स्वामी विवेकानंद को पढ़ा,
तो उनके भीतर की सोई हुई क्रांति की चिंगारी
अग्नि की लपटों में बदल गई।

उन्होंने सीखा—
“विजयी वही होता है, जो निर्भय होता है।”

और प्रफुल्ल चाकी निर्भय ही नहीं—
अदम्य थे।

✊ बंग-भंग आंदोलन बना उनकी युवावस्था का रणक्षेत्र

महज़ 9वीं कक्षा का छात्र…
लेकिन हृदय वज्र जितना दृढ़।
उन्होंने बंगाल विभाजन के विरुद्ध आंदोलन में हिस्सा लिया
और परिणामस्वरूप स्कूल से निकाल दिए गए।

लेकिन क्या प्रफुल्ल जैसे योद्धा स्कूलों से बंधे रहते हैं?
नहीं… उनका हृदय ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देने के लिए धड़क रहा था।

🕊 युगांतर पार्टी—जहाँ से शुरू हुआ अमर बलिदान का अध्याय

युगांतर पार्टी से जुड़कर
प्रफुल्ल चाकी ने वह मार्ग पकड़ा
जहाँ हर कदम पर मौत खड़ी रहती थी,
परंतु वे मुस्कुराते हुए आगे बढ़ते रहे।

उनका लक्ष्य स्पष्ट था—
मातृभूमि की बेड़ियाँ काटनी हैं, चाहे जान चली जाए।

💥 किंग्सफर्ड को दंड देने के मिशन में प्रफुल्ल का सिंह-सा साहस

मुजफ्फरपुर का अत्याचारी जज किंग्सफर्ड,
जो देशभक्तों को निर्दयता से सताने के लिए कुख्यात था,
उसके दमन के विरुद्ध प्रफुल्ल और
केवल 18 वर्षीय खुदीराम बोस आगे आए।

दो बच्चों जैसी उम्र के ये दो साहसी युवक
अंग्रेज़ी शासन के सीने पर दहाड़ते हुए निकले।

🩸 बलिदान का वह क्षण—जिसने अंग्रेजों की आत्मा तक हिला दी

जब अंग्रेज उन्हें पकड़ने के लिए पूरी ताकत से पीछे पड़े,
तो प्रफुल्ल चाकी ने वह निर्णय लिया
जो केवल अमर वीर ही ले सकते हैं।

उन्होंने कहा था—

> "मैं अंग्रेज़ों के हाथ जिंदा नहीं पड़ूँगा…
मेरी लाश भी मातृभूमि के लिए संदेश बनेगी।"

और 1 मई 1908 को
उन्होंने स्वयं को गोली मारकर
अपना जीवन भारत को समर्पित कर दिया।

इतना अद्भुत, इतना भव्य बलिदान…
जिसके आगे शब्द भी प्रणाम में झुक जाते हैं।

🇮🇳 **प्रफुल्ल चाकी—एक नाम नहीं,

एक ज्वाला है, एक प्रेरणा है, एक क्रांतिकारी धर्म है** जिन्होंने माँ भारती की रक्षा के लिए
अपनी साँसों को भी हथियार बना दिया।

उनका बलिदान हमें याद दिलाता है—
स्वतंत्रता का हर क्षण उन अमर बलिदानियों का उपहार है,
जिन्हें हमने कभी देखा तो नहीं,
पर जिनका ऋण हमारी पीढ़ियाँ कभी नहीं उतार पाएँगी।

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🔥 जय हिंद!
जय माँ भारती! 🇮🇳
🙏🇮🇳

व्यक्ति विशेष: हम न्यूटन को जानते हैं, स्वामी ज्येष्ठदेव को नहीं... आप न्यूटन को जानते हैं, बचपन से पढ़ते आ रहे हैं... ले...
26/11/2025

व्यक्ति विशेष:
हम न्यूटन को जानते हैं, स्वामी ज्येष्ठदेव को नहीं...

आप न्यूटन को जानते हैं, बचपन से पढ़ते आ रहे हैं...

लेकिन क्या आप स्वामी माधवन या ज्येष्ठदेव को जानते हैं? नहीं जानते होंगे...

इन सभी वैज्ञानिकों से कई वर्षों पूर्व पंद्रहवीं सदी में दक्षिण भारत के स्वामी ज्येष्ठदेव ने ताड़पत्रों पर गणित के ये तमाम सूत्र लिख रखे हैं।

इनमें से कुछ सूत्र ऐसे भी हैं, जो उन्होंने अपने गुरुओं से सीखे थे। यानी गणित का यह ज्ञान उनसे भी पहले का है, परन्तु लिखित स्वरूप में नहीं था।

“मैथेमेटिक्स इन इण्डिया” पुस्तक के लेखक किम प्लोफ्कर लिखते हैं कि, “तथ्य यही हैं सन 1660 तक यूरोप में गणित या कैलकुलस कोई नहीं जानता था। जेम्स ग्रेगरी सबसे पहले गणितीय सूत्र लेकर आए थे।

जबकि सुदूर दक्षिण भारत के छोटे से गाँव में स्वामी ज्येष्ठदेव ने ताड़पत्रों पर कैलकुलस, त्रिकोणमिति के ऐसे ऐसे सूत्र और कठिनतम गणितीय व्याख्याएँ तथा संभावित हल लिखकर रखे थे, कि पढ़कर हैरानी होती है”।

इसी प्रकार चार्ल्स व्हिश नामक गणितज्ञ लिखते हैं कि...

“मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि शून्य और अनंत की गणितीय श्रृंखला का उदगम स्थल केरल का मालाबार क्षेत्र है”।

स्वामी ज्येष्ठदेव द्वारा लिखे गए इस ग्रन्थ का नाम है “युक्तिभाष्य”, जो जिसके पंद्रह अध्याय और सैकड़ों पृष्ठ हैं।

यह पूरा ग्रन्थ वास्तव में चौदहवीं शताब्दी में भारत के गणितीय ज्ञान का एक संकलन है, जिसे संगमग्राम के तत्कालीन प्रसिद्ध गणितज्ञ स्वामी माधवन की टीम ने तैयार किया है।

स्वामी माधवन का यह कार्य समय की धूल में दब ही जाता, यदि स्वामी ज्येष्ठदेव जैसे शिष्यों ने उसे ताड़पत्रों पर उस समय की द्रविड़ भाषा (जो अब मलयालम है) में न लिख लिया होता।

इसके बाद लगभग 200 वर्षों तक गणित के ये सूत्र “श्रुति स्मृति” के आधार पर शिष्यों की पीढी से एक दुसरे को हस्तांतरित होते चले गए।

भारत में श्रुति स्मृति (गुरु के मुंह से सुनकर उसे स्मरण रखना) परंपरा बहुत प्राचीन है।

इसलिए सम्पूर्ण लेखन करने (रिकॉर्ड रखने अथवा दस्तावेजीकरण) में प्राचीन लोग विश्वास नहीं रखते थे।

जिसका नतीजा हमें आज भुगतना पड़ रहा है, कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में संस्कृत भाषा के छिपे हुए कई रहस्य आज हमें पश्चिम का आविष्कार कह कर परोसे जा रहे हैं।

जॉर्जटाउन विवि के प्रोफ़ेसर होमर व्हाईट लिखते हैं कि संभवतः पंद्रहवीं सदी का गणित का यह ज्ञान धीरे धीरे इसलिए खो गया, क्योंकि कठिन गणितीय गणनाओं का अधिकाँश उपयोग खगोल विज्ञान एवं नक्षत्रों की गति इत्यादि के लिए होता था। सामान्य जनता के लिए यह अधिक उपयोगी नहीं था।

इसके अलावा जब भारत के उन ऋषियों ने दशमलव के बाद ग्यारह अंकों तक की गणना एकदम सटीक निकाल ली थी, तो गणितज्ञों के करने के लिए कुछ बचा नहीं था।

ज्येष्ठदेव लिखित इस ज्ञान के “लगभग” लुप्तप्राय होने के सौ वर्षों के बाद पश्चिमी विद्वानों ने इसका अभ्यास 1700 से 1830 के बीच किया।

चार्ल्स व्हिश ने “युक्तिभाष्य” से सम्बंधित अपना एक पेपर “रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड” की पत्रिका में छपवाया।

चार्ल्स व्हिश ईस्ट इण्डिया कंपनी के मालाबार क्षेत्र में काम करते थे, जो आगे चलकर जज भी बने।

लेकिन साथ ही समय मिलने पर चार्ल्स व्हिश ने भारतीय ग्रंथों का वाचन और मनन जारी रखा।

व्हिश ने ही सबसे पहले यूरोप को सबूतों सहित “युक्तिभाष्य” के बारे में बताया था।

वरना इससे पहले यूरोप के विद्वान भारत की किसी भी उपलब्धि अथवा ज्ञान को नकारते रहते थे और भारत को साँपों, उल्लुओं और घने जंगलों वाला खतरनाक देश मानते थे।

ईस्ट इण्डिया कंपनी के एक और वरिष्ठ कर्मचारी जॉन वारेन ने एक जगह लिखा है कि “हिन्दुओं का ज्यामितीय और खगोलीय ज्ञान अदभुत था। यहाँ तक कि ठेठ ग्रामीण इलाकों के अनपढ़ व्यक्ति को मैंने कई कठिन गणनाएँ मुँहज़बानी करते देखा है”।

20/11/2025

राष्ट्रपति के 14-सवाल वाले रिफरेन्स पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: एक संवैधानिक विश्लेषण"

भारत का संविधान संघीय ढांचे का ऐसा संतुलित मॉडल प्रस्तुत करता है जिसमें केंद्रीय कार्यपालिका, राज्य कार्यपालिका और विधायिका—तीनों के अधिकार स्पष्ट भी हैं और लचीले भी। राष्ट्रपति द्वारा प्रस्तुत इस रिफरेन्स पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भारतीय संघवाद, विधायी प्रक्रिया और संवैधानिक विवेक की अवधारणा को एक नए ढंग से परिभाषित करता है।

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1. संवैधानिक विवेक (Constitutional Discretion) की अवधारणा का पुनःस्पष्टीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

राज्यपाल और राष्ट्रपति का विवेक पूर्णत: राजनीतिक नहीं, संवैधानिक है।

इसका उद्देश्य व्यक्ति की इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि संविधान के संतुलित संचालन को सुनिश्चित करना है।

यह निर्णय इस बात की पुष्टि करता है कि भारतीय संघवाद में कुछ क्षेत्रों में राज्यपाल/राष्ट्रपति को स्वतंत्रता इसलिए दी गई है ताकि वे राजनीतिक विवादों से ऊपर उठकर संविधानहित निर्णय ले सकें।

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2. अनुच्छेद 200 और 201 की “लोच” (Elasticity): संघवाद की सुरक्षा-दीवार

सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि
विधेयक पर निर्णय की पूर्व-निर्धारित समयसीमा न होना कोई त्रुटि नहीं, बल्कि जानबूझकर जोड़ा गया लचीलापन है।

कारण:

राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक एवं विधायी परिस्थितियाँ होती हैं।

केंद्र–राज्य संबंधों में कई बार संवेदनशील राजनीतिक संतुलन आवश्यक होता है।

इस प्रकार, कठोर समयसीमा संघवाद की आत्मा को प्रभावित कर सकती थी।
अदालत ने इसे संविधान की "स्ट्रक्चरल विज़डम" कहा है।

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3. न्यायपालिका की सीमाएँ: Separation of Powers का आदर्श

निर्णय में बार-बार इस सिद्धांत को बल दिया गया कि:

न्यायपालिका राजनीतिक/विधायी विवेक के merits की जांच नहीं कर सकती।

राज्यपाल/राष्ट्रपति के निर्णयों की केवल प्रक्रियात्मक वैधता (Procedural Validity) जांची जा सकती है, न कि उनका उचित/अनुचित होना।

इससे भारत में न्यायपालिका के दायरे और कार्यपालिका के विवेक दोनों के बीच संतुलन स्पष्ट होता है।

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4. Deemed Assent का पूर्णत: खंडन — संवैधानिक पदों की स्वायत्तता की रक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कहा कि:

कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत भी

राज्यपाल की सहमति को "मान ली गई सहमति" घोषित नहीं कर सकता,

और न ही राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका को निरस्त कर सकता है।

यह निर्णय संवैधानिक पदों की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करता है।

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5. राज्यपाल की भूमिका: “Rubber Stamp” या “Political Arbiter”?

निर्णय में महत्वपूर्ण सिद्धांत उजागर होता है:

राज्यपाल सिर्फ औपचारिक हस्ताक्षरकर्ता (rubber stamp) नहीं है।

लेकिन दलीय राजनीति का साधन भी नहीं है।

राज्यपाल का विवेक
→ सीमित,
→ संवैधानिक,
→ और सार्वजनिक उत्तरदायित्व वाले पद का विवेक है।

न्यायालय का यह मध्य-मार्ग भारतीय संघवाद में राज्यपाल की भूमिका को परिभाषित करने में दीर्घकालिक प्रभाव डालेगा।

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6. न्यायिक समीक्षा की सीमा: राजप्रमुख की व्यक्तिगत उन्मुक्तता बनाम संवैधानिक नियंत्रक

सुप्रीम कोर्ट ने दोहरे सिद्धांत को मान्यता दी:

1. राज्यपाल/राष्ट्रपति व्यक्तिगत रूप से कोर्ट के सामने उत्तरदायी नहीं।

2. लेकिन उनका पद न्यायिक जांच से परे नहीं है।

यह Legal Immunity vs Constitutional Accountability का संतुलित मॉडल है।

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7. विधेयक की पूर्व-न्यायिक समीक्षा का निषेध: Legislative Sovereignty का सम्मान

अदालत ने माना कि किसी विधेयक की

मंशा,

विवाद,

या संभावित संवैधानिक संकट

को आधार बनाकर उसे पूर्व में चुनौती देना असंवैधानिक है।

क्योंकि
→ न्यायपालिका “संभावित कानून” पर निर्णय नहीं दे सकती,
→ केवल “विद्यमान कानून” पर ही दे सकती है।

इससे विधानमंडल की संप्रभुता और प्रक्रिया की स्वायत्तता सुरक्षित रहती है।

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8. अनुच्छेद 143: राष्ट्रपति की परामर्श-प्रक्रिया का अधिकार, दायित्व नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
राष्ट्रपति का सुप्रीम कोर्ट से राय मांगना
→ विशेषाधिकार (Privilege) है,
→ कर्तव्य (Obligation) नहीं।

इससे राष्ट्रपति को संवैधानिक स्वतंत्रता मिलती है, जबकि न्यायपालिका को अनावश्यक रूप से राजनीतिक प्रश्नों में खींचने से बचाया जाता है।

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9. निर्णय का व्यापक महत्व

(क) संघीय संतुलन की मजबूती

केंद्र, राज्य और संवैधानिक पदों के बीच दायरों की स्पष्टता बढ़ी।

(ख) विधायी प्रक्रिया की सुरक्षा

कोई भी अदालत या कार्यपालिका विधायी विधि को शॉर्टकट तरीके से प्रभावित नहीं कर सकती।

(ग) संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा

राष्ट्रपति और राज्यपाल की भूमिका को संवैधानिक गहराई में पुनर्परिभाषित किया गया।

(घ) न्यायपालिका की संस्थागत विनम्रता (Judicial Restraint)

“न्यायाधीश सरकार नहीं होते”—यह सिद्धांत फिर पुष्ट हुआ।

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निष्कर्ष

यह निर्णय भारतीय संविधान की उस मूल भावना को पुनःस्थापित करता है कि
संवैधानिक संस्थाएँ स्वतंत्र होते हुए भी एक दूसरे के पूरक हैं।

राज्यपाल और राष्ट्रपति के विवेक का संरक्षण,
न्यायालय की सीमाओं की स्वीकृति,
और विधायिका की सर्वोच्चता—
ये तीनों मिलकर भारतीय लोकतंत्र को संतुलित रूप देते हैं।

यह फैसला आगे आने वाले दशकों तक
केंद्र–राज्य संबंधों, संवैधानिक विवेक, और विधायी प्रक्रिया से जुड़े मामलों में मार्गदर्शक सिद्ध होगा।

( डा जगमोहन द्विवेदी)

           #स्वदेश
14/11/2025

#स्वदेश

ग्वालियर चंबल अंचल के जन मानस विशेषकर युवाओं को समसामयिक विषयों की समझ विकसित हो साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में युवाओं की स...
06/11/2025

ग्वालियर चंबल अंचल के जन मानस विशेषकर युवाओं को समसामयिक विषयों की समझ विकसित हो साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में युवाओं की सफलता सुनिश्चित हो ऐसा ध्येय लेकर स्वदेश का यह प्रयोग प्रत्येक गुरुवार को विगत 33सप्ताह से अनवरत जारी है।

#स्वदेश

02/11/2025

भारतीय संस्कृति को सनातन संस्कृति कहां जाता है वास्तव में जो भारत में सनातनी परंपरा है जिसका आधार श्रेष्ठ जीवन मूल्य है इन श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को हमारी संस्कृति का सार तत्व कहा जाता है भले ही कुछ लोग इन्हें संस्कार कहते हैं कुछ इन्हें जीवन मूल्य कहते हैं कुछ आदर्श कहते हैं परंतु एक तत्व यहां बड़ा महत्वपूर्ण और विचारणीय है कि वे ऐसे कौन से कारण हैं जिनसे भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के जीवन मूल्य आज भी अपने मूल रूप में विद्यमान हैं ना तो भारतीय संस्कृति का क्षय हुआ और ना ही सनातन धर्म का क्षय हुआ
इसका विश्लेषण हम ऐतिहासिक संदर्भ में कर सकते हैं जब भी भारतीय धर्म और समाज में नकारात्मकता उत्पन्न हुई हमने सुधारात्मक दृष्टि को आत्मसात किया जैसे प्राचीन भारत में समाज और धर्म में नकारात्मकता उत्पन्न हुई तो भारत में महावीर स्वामी और गौतमबुद्ध जैसे महापुरुषों का जन्म होता है जो समाज में पुनः जीवन मूल्यों को स्थापित करते हैं फिर इसी प्रकार से शंकराचार्य जी कबीर सूर तुलसी रैदास जैसे संतों ने मध्यकाल में पुनः सुधारात्मक दृष्टिकोण के साथ भारत के जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठित किया इतना ही नहीं आगे चलकर स्वामी दयानंद सरस्वती विवेकानंद की परंपरा भारतीय समाज संस्कृति धर्म की गौरवशाली परंपरा के ही अग्रदूत हैं कदाचित इसी कारण से भारतीय संस्कृति सनातनी परंपरा और जीवन मूल्य आज भी अक्षुण्य है
(Dr Jagmohan Dwivedi)

02/11/2025

DrJagmohan Dwivedi
#आत्मबोध

30/10/2025
28/10/2025

Industry, Industrialists, and Nation-Building: Indian Mindset, Economic Reality, and the Challenges of Self-Reliance
(Dr. Jagmohan Dwivedi)

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The progress of a nation

The progress of a nation does not depend solely on government policies or natural resources; its true strength lies in its industries and entrepreneurial class. The economic stability, technological capability, and global prestige of any country originate from its industrialists.

However, in Indian society, the perception of industrialists is often filled with suspicion, jealousy, and negativity. This mindset has become a major obstacle to India’s self-reliance and industrial innovation.

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1. Importance of Industries in Nation-Building

Industrialization is the backbone of any nation’s economy.
It —

Creates employment opportunities,

Generates revenue,

Promotes innovation and technological development, and

Enables global competitiveness.

History stands witness: the Industrial Revolution made Britain a global empire; American industrialists made the U.S. a world leader; and China’s industrial expansion turned it into an economic superpower.

Thus, industries and industrialists are not merely symbols of private wealth — they are the carriers of national prosperity and strength.

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2. Britain and the U.S.: Respect for Industrialists

When the Prime Minister of Britain visited India, around 125 industrialists accompanied him — a clear sign that governments there consider industrialists as partners in diplomatic and national missions.

In the United States too, industrialists play a highly influential role in policy-making. No political party speaks openly against entrepreneurs, as economic strength is seen as the foundation of political stability.

Companies like Microsoft, Apple, Google, Tesla, and Amazon are not just business entities — they symbolize America’s global power and prestige.

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3. Global Perspective: “Deep State” and the Reality of Economic Dominance

Today, the term “Deep State” is often used in world politics. It refers to those powerful corporate groups — such as Rothschild, Rockefeller, BlackRock, Fidelity, Goldman Sachs, etc. — that control global policy, finance, and technology.

These groups influence national policies directly or indirectly, proving that the real source of political power is economic power.
America’s global dominance rests not merely on its military might, but on the economic control of its industrialists.

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4. The Indian Context: Social Envy and Narrow Mindset

In India, the perception of industrialists still suffers from a colonial-era mentality. Economic success is often linked with suspicion, criticism, or exploitation.

Jealousy and the glorification of mediocrity in the name of equality have become deep-rooted tendencies of Indian society.

Despite their limited economic means, ordinary Indians often envy the wealthy.
Industrialists like Tata, Birla, Ambani, and Adani play vital roles in India’s economic growth, yet social discourse frequently labels them as “capitalist exploiters.”

As a result, Indian entrepreneurs hesitate to take risks or innovate — fearing that success might invite social criticism, political targeting, or media trials.

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5. Colonial Mindset: Fascination with Foreign Products and Inferiority Complex

One of India’s major challenges is the colonial mindset — a form of mental slavery that draws us toward foreign products, ideas, and individuals.

We judge the quality of a product not by its technical standards but by whether it is “foreign-made.”
This psychological bo***ge is the biggest obstacle for Indian industries.

Until consumers take pride in Indian-made goods, “Make in India” will remain just a slogan.

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6. Example: ZOHO and the Neglect of Indigenous Innovation

ZOHO, an Indian software company, is a living example of self-reliant India.
It has achieved global success without foreign investment.

Yet, a section of Indian society and media focuses more on the founder’s political beliefs than on the quality of the product.

This shows our inability to separate the product from the person.
We prioritize “who made it” over “what is made”, which weakens both innovation and self-confidence in indigenous enterprise.

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7. The True Meaning of Self-Reliance

“Atmanirbhar Bharat (Self-Reliant India)” is not merely a government policy — it is a mental revolution.
It means —

Having faith in Indian products,

Respecting Indian entrepreneurs, and

Taking pride in economic independence.

As long as Indian citizens view their industrialists with jealousy or distrust, self-reliance will remain an unfulfilled dream.

Nations like the U.S., China, Japan, and South Korea treat their entrepreneurs as national assets — which is why they lead the global economy today.

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8. The Need for Policy and Social Reforms

Indian society must introspect and move in the following directions —

1. Creating a positive entrepreneurial culture – Encouraging entrepreneurship in schools and universities.

2. Balanced media and public discourse – Adopting an unbiased and objective view of industrialists.

3. Government support – Ensuring policy stability, transparency, and regulatory simplicity for industries.

4. Public awareness – Inspiring consumers to trust and take pride in Indian products.

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Conclusion

India’s true progress lies in the empowerment of its industries and industrialists.
Both politics and society must recognize that industrialists are not anti-national, but pillars of nation-building.

Self-reliance is not just an economic slogan — it is an expression of national self-confidence.

If India wishes to become a global power, it must abandon jealousy, mistrust, and the colonial mindset toward its entrepreneurs.

Ultimately,

> “The nation that respects its industrialists becomes prosperous;
the society that envies its entrepreneurs remains dependent forever.”

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Summary Points

Industries are the backbone of a nation’s economy.

Developed nations view industrialists as sources of national strength.

Envy, distrust, and colonial mentality hinder India’s development.

A truly self-reliant India is possible only when society respects and supports its entrepreneurs.

28/10/2025

उद्योग, उद्योगपति और राष्ट्रनिर्माण : भारतीय मानसिकता, आर्थिक यथार्थ और आत्मनिर्भरता की चुनौतियां "

राष्ट्र की प्रगति केवल शासन की नीतियों या प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसकी वास्तविक शक्ति उसके उद्योगों और उद्यमशील वर्ग में निहित होती है। किसी भी देश की आर्थिक सुदृढ़ता, तकनीकी क्षमता और वैश्विक प्रतिष्ठा का मूल स्रोत उसके उद्योगपति होते हैं।
फिर भी, भारतीय समाज में उद्योगपतियों के प्रति दृष्टिकोण प्रायः संदेह, ईर्ष्या और नकारात्मकता से भरा हुआ है। यही मानसिक प्रवृत्ति भारत की आत्मनिर्भरता और औद्योगिक नवाचार के मार्ग में बाधक बन गई है।

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1. उद्योगों का राष्ट्रनिर्माण में महत्व

औद्योगिकरण किसी भी देश के आर्थिक ढाँचे की रीढ़ होता है।

यह रोजगार सृजन करता है,

राजस्व उत्पन्न करता है,

नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास को गति देता है,

तथा देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनाता है।

इतिहास साक्षी है कि ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति ने उसे विश्व साम्राज्य बनाया, अमेरिका के उद्योगपतियों ने उसे वैश्विक नेता के रूप में स्थापित किया, और चीन के औद्योगिक विस्तार ने उसे आर्थिक महासत्ता बना दिया।
इस प्रकार, उद्योग और उद्योगपति केवल निजी पूँजी के प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्र की समृद्धि और शक्ति के वाहक हैं।

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2. ब्रिटेन और अमेरिका का दृष्टिकोण : उद्योगपतियों के प्रति सम्मान

जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भारत यात्रा पर आए, तो उनके साथ लगभग 125 उद्योगपति आए थे। यह दृश्य इंगित करता है कि वहाँ की सरकारें उद्योगपतियों को राजनैतिक कूटनीति के सहयोगी मानती हैं।

अमेरिका में भी उद्योगपतियों की भूमिका राष्ट्रीय नीति निर्माण में अत्यंत प्रभावशाली है। वहाँ कोई भी राजनीतिक दल उद्यमियों के विरोध में खुलकर नहीं बोलता, क्योंकि यह माना जाता है कि आर्थिक शक्ति ही राजनीतिक स्थिरता का आधार है।
Microsoft, Apple, Google, Tesla, Amazon जैसी कंपनियाँ अमेरिकी सामर्थ्य के प्रतीक हैं, और उनकी सफलता से देश की वैश्विक स्थिति मजबूत होती है।

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3. वैश्विक परिप्रेक्ष्य : “डीप स्टेट” और आर्थिक प्रभुत्व की वास्तविकता

आज “Deep State” शब्द का उपयोग विश्व राजनीति में बार-बार होता है। इसका आशय उन प्रभावशाली कॉरपोरेट समूहों से है जो अंतरराष्ट्रीय नीति, वित्त और तकनीक को नियंत्रित करते हैं — जैसे Rothschild, Rockefeller, BlackRock, Fidelity, Goldman Sachs, आदि।

ये समूह किसी भी देश की नीतियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। वास्तव में यह स्थिति इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि राजनीतिक शक्ति का वास्तविक स्रोत आर्थिक शक्ति होती है।
अमेरिका की विश्व पर प्रभुता उसकी सैन्य शक्ति से अधिक उसके उद्योगपतियों की आर्थिक पकड़ के कारण है।

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4. भारतीय परिदृश्य : सामाजिक ईर्ष्या और संकीर्ण दृष्टिकोण

भारत में उद्योगपतियों के प्रति दृष्टिकोण अब भी औपनिवेशिक युग की मानसिकता से ग्रस्त है।
यहाँ आर्थिक सफलता को प्रायः शंका, आलोचना या शोषण से जोड़ा जाता है।
“जलन” और “समानता के नाम पर असफलता का महिमामंडन” भारतीय समाज की प्रमुख प्रवृत्तियाँ बन गई हैं।

आम भारतीय नागरिक अपनी सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद अमीरों से ईर्ष्या करता है।
टाटा, बिड़ला, अंबानी या अडानी जैसे उद्योगपति देश की आर्थिक वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, फिर भी सामाजिक विमर्श में उन्हें “पूँजीवादी शोषक” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

इस मानसिकता के कारण भारत में उद्योगपति नवाचार या जोखिम लेने से बचते हैं।
उन्हें भय रहता है कि सफलता के साथ ही सामाजिक निंदा, राजनीतिक आरोप और मीडिया ट्रायल शुरू हो जाएगा।

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5. औपनिवेशिक मानसिकता : विदेशी उत्पादों का मोह और आत्महीनता

भारत की एक बड़ी समस्या है – Colonial Mindset, अर्थात मानसिक दासता।
यह प्रवृत्ति हमें विदेशी वस्तुओं, विदेशी विचारों और विदेशी व्यक्तियों के प्रति अधिक आकर्षित करती है।

किसी उत्पाद की गुणवत्ता का मूल्यांकन हम उसके तकनीकी मानकों से नहीं, बल्कि इस बात से करते हैं कि वह “विदेशी” है या नहीं।
यह मानसिक गुलामी भारतीय उद्योगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
जब तक उपभोक्ता अपने देश के उत्पादों पर गर्व नहीं करेंगे, तब तक “मेक इन इंडिया” केवल नारा बनकर रह जाएगा।

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6. उदाहरण : ZOHO और स्वदेशी नवाचार की अनदेखी

ZOHO, एक भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनी, आत्मनिर्भर भारत का जीवंत उदाहरण है।
यह कंपनी बिना विदेशी निवेश के वैश्विक स्तर पर सफल हो रही है।
परंतु भारतीय समाज और मीडिया का एक वर्ग इसके उत्पाद की गुणवत्ता पर चर्चा करने के बजाय इसके संस्थापक की राजनैतिक विचारधारा खोजने में व्यस्त है।

यह उदाहरण बताता है कि हम उत्पाद को व्यक्ति से अलग नहीं देख पाते।
हमारी प्राथमिकता “कौन बना रहा है” पर केंद्रित होती है, “क्या बना रहा है” पर नहीं।
यह दृष्टिकोण नवाचार और स्वदेशी आत्मविश्वास, दोनों को क्षति पहुँचाता है।

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7. आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ

“आत्मनिर्भर भारत” केवल सरकारी नीति या आर्थिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक क्रांति है।
इसका अर्थ है —

स्वदेशी उत्पादों पर विश्वास,

भारतीय उद्यमियों के प्रति सम्मान,

और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रति गर्व।

जब तक भारतीय नागरिक अपने उद्योगपतियों को संदेह या ईर्ष्या की दृष्टि से देखेंगे, आत्मनिर्भरता एक अधूरा स्वप्न ही बनी रहेगी।
अमेरिका, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपने उद्योगपतियों को “राष्ट्रीय संपत्ति” के रूप में देखा — यही कारण है कि वे आज विश्व अर्थव्यवस्था के अग्रणी देश हैं।

8. नीतिगत और सामाजिक सुधार की आवश्यकता

भारतीय समाज को निम्नलिखित दिशा में आत्ममंथन करना होगा —

1. सकारात्मक उद्यमिता संस्कृति का निर्माण: स्कूलों और विश्वविद्यालयों में उद्यमिता को प्रोत्साहन देना।

2. मीडिया और जनविचार में संतुलन: उद्योगपतियों के प्रति बिना पूर्वाग्रह के वस्तुपरक दृष्टिकोण अपनाना।

3. सरकारी सहयोग: उद्योगों के लिए नीतिगत स्थिरता, पारदर्शिता और नियामकीय सरलता प्रदान करना।

4. नागरिक चेतना का विकास: उपभोक्ताओं में स्वदेशी उत्पादों के प्रति विश्वास और गर्व उत्पन्न करना।

निष्कर्ष

भारत की वास्तविक प्रगति उसके उद्योगों और उद्योगपतियों के सशक्तीकरण में निहित है।
राजनीति और समाज, दोनों को यह स्वीकार करना होगा कि उद्योगपति राष्ट्रविरोधी नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण के प्रमुख स्तंभ हैं।

आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नारा नहीं, बल्कि यह आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति है।
यदि भारत को वैश्विक शक्ति बनना है, तो उसे अपने उद्यमियों के प्रति ईर्ष्या, अविश्वास और मानसिक गुलामी का परित्याग करना होगा।

अंततः,

“जो राष्ट्र अपने उद्योगपतियों का सम्मान करता है, वही समृद्ध होता है;
और जो समाज अपने उद्यमियों से ईर्ष्या करता है, वह सदैव पराधीन रहता है।”

सारांश बिंदु

उद्योग राष्ट्र की आर्थिक रीढ़ हैं।

विकसित देशों ने अपने उद्योगपतियों को राष्ट्रीय शक्ति का स्रोत माना है।

भारत में ईर्ष्या, संदेह और औपनिवेशिक मानसिकता विकास में बाधक हैं।

आत्मनिर्भर भारत का मार्ग तभी संभव है जब समाज अपने उद्यमियों को सम्मान और सहयोग देगा।
( डा जगमोहन द्विवेदी)

28/10/2025

13 जुलाई का सच — तथाकथित शहीद दिवस

1. मोदी सरकार ने आखिरकार झूठ का अंत कर दिया.
दशकों तक, 13 जुलाई को कश्मीर में शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता रहा — माना जाता है कि यह दिन 1931 में महाराजा हरि सिंह की पुलिस द्वारा गोली मारे गए "स्वतंत्रता सेनानियों" की याद में मनाया जाता था। मोदी सरकार ने आखिरकार इस तमाशे का अंत कर दिया। लेकिन ये "शहीद" कौन थे?

2. ये "शहीद" कौन थे?
वे क्रांतिकारी नहीं थे। वे उस भीड़ का हिस्सा थे जिसने श्रीनगर की एक अदालत पर धावा बोलने की कोशिश की थी। उन पर 22 हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार और जज की हत्या की कोशिश का आरोप था। अदालत पर हमला करते समय उन्हें गोली मार दी गई - और यह सही भी था।

3. एक ब्रिटिश-इस्लामी षडयंत्र
1930 के दशक में, अंग्रेज़ कश्मीर में महाराजा हरि सिंह के शासन को ख़त्म करना चाहते थे—एक हिंदू राजा जो मुस्लिम बहुल क्षेत्र पर शासन कर रहे थे। उन्होंने पेशावर के एक अहमदिया मुसलमान, अब्दुल कादिर को रसोइये के वेश में श्रीनगर में तैनात कर दिया।

4. कट्टरपंथ की शुरुआत
जल्द ही, शेख मोहम्मद अब्दुल्ला — एक कट्टर इस्लामवादी और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर — को कश्मीर भेजा गया। शाह हमदान मैदान में एक रैली आयोजित की गई। अब्दुल कादिर ने महाराजा हरि सिंह के खिलाफ जिहाद का आह्वान किया।

5. हिंसा का खुला आह्वान
अब्दुल कादिर ने खुलेआम घोषणा की कि एक काफिर मुसलमानों पर शासन नहीं कर सकता। उसने हिंदुओं को भड़काने के लिए मुसलमानों को गौहत्या के लिए उकसाया। नतीजा? पूरी घाटी में दंगे भड़क उठे। अंग्रेज़ चुपचाप देखते रहे।

6. कश्मीर जल रहा है
80 से ज़्यादा हिंदू बहुल गाँवों पर हमले हुए। संपत्तियाँ लूट ली गईं। दुकानें और घर जला दिए गए। 32 मंदिर और 23 गुरुद्वारे नष्ट कर दिए गए। 600 से ज़्यादा जबरन धर्मांतरण के मामले दर्ज किए गए। यहाँ तक कि गुरु ग्रंथ साहिब भी जला दिए गए।

7. हमले का दिन - 13 जुलाई 1931
एक जेल परिसर में मुकदमा चल रहा था। अब्दुल कादिर के नेतृत्व में एक मुस्लिम भीड़ ने उस पर हमला कर दिया—जज के कक्ष में घुसने की कोशिश में। पुलिस ने न्यायपालिका की रक्षा के लिए गोलियाँ चलाईं। मारे गए दंगाई न तो निर्दोष थे और न ही नेक।

8. शेख अब्दुल्ला की रक्तरंजित विरासत
फारूक अब्दुल्ला के पिता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला, मुख्य भड़काने वाले थे। उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था - बाद में उन्होंने महाराजा हरि सिंह को माफ़ीनामा लिखा और क्षमादान की भीख माँगी। उन्हें 1932 में रिहा किया गया - और उन्होंने ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन किया।

9. कांग्रेस ने सब कुछ लीपापोती कर दिया
आज़ादी के बाद, ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का नाम बदलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस कर दिया गया। और एक चौंकाने वाले विश्वासघात में, नेहरू की कांग्रेस ने 13 जुलाई को शहीद दिवस घोषित कर दिया - उन लोगों के सम्मान में जिन्होंने लूटपाट की, बलात्कार किया, हत्या की और आगजनी की।

10. दस्तावेज़ झूठ नहीं बोलते
ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड पुष्टि करते हैं:
– 32 मंदिर नष्ट किए गए
– 23 गुरुद्वारे जलाए गए
– 600 से ज़्यादा जबरन धर्मांतरण
– 80 से ज़्यादा गाँवों पर हमले
और फिर भी कांग्रेस शासन ने इन अपराधियों का महिमामंडन किया—उन्हें "शहीद" कहा और उनके सम्मान में आधिकारिक समारोह आयोजित किए।

11. मोदी सरकार ने ढोंग का अंत किया
इस तमाशे को आधिकारिक रूप से समाप्त होने में 2019 तक का समय लगा। मोदी सरकार ने 13 जुलाई को शहीद दिवस मनाने पर रोक लगा दी। राष्ट्रीय न्याय का एक लंबे समय से प्रतीक्षित कार्य - कांग्रेस द्वारा दशकों से प्रचारित सबसे काले झूठों में से एक को मिटाना।

12. अंतिम शब्द
सामूहिक बलात्कारियों और दंगाइयों को "शहीद" कहना न केवल ऐतिहासिक विकृति है - यह सत्य के विरुद्ध अपराध है और वास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान है।

जान लीजिए:
13 जुलाई 1931 कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं था।
यह एक खूनी, सांप्रदायिक, हिंदू-विरोधी नरसंहार था - जिसे कांग्रेस ने सफेदपोश किया, अंग्रेजों ने मदद की, और इस्लामी घृणा ने हवा दी।

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