23/12/2025
श्रीनिवास रामानुजन : प्रतिभा, संघर्ष और गणित की अमर विरासत..........................................................................
भारतीय गणित के इतिहास में श्रीनिवास रामानुजन का नाम अद्वितीय प्रतिभा, मौलिक सोच और असाधारण संघर्ष का प्रतीक है। 22 दिसम्बर 1887 को तमिलनाडु के ईरोड नगर में जन्मे रामानुजन ने सीमित साधनों और औपचारिक शिक्षा की कमी के बावजूद विश्व-गणित को ऐसी अमूल्य धरोहर दी, जिसने उन्हें अमर बना दिया।
रामानुजन की प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु के ही विभिन्न कस्बों और शहरों में हुई। सामान्य विषयों में वे विशेष सफलता प्राप्त नहीं कर सके और आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनकी कॉलेज-शिक्षा अधूरी रह गई। किंतु गणित उनके लिए केवल एक विषय नहीं, बल्कि स्वाभाविक अभिव्यक्ति का माध्यम था। वे जो भी गणित की पुस्तक पढ़ते, उसे शीघ्र आत्मसात कर लेते और फिर अपनी कॉपियों में नए-नए सूत्र, समीकरण और संबंध स्वयं गढ़ने लगते। किशोरावस्था में प्राप्त एक विस्तृत गणित-संकलन पुस्तक ने उनकी रुचि को और गहन बना दिया, जिसके बाद उन्होंने बिना किसी औपचारिक मार्गदर्शन के उच्च स्तरीय गणितीय समस्याओं पर कार्य आरंभ कर दिया।
डिग्री के अभाव और आर्थिक सीमाओं के कारण रामानुजन को छोटे-मोटे दफ़्तरी कार्य करने पड़े, किंतु गणित के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ। वे अपने खाली समय का उपयोग निरंतर नोटबुकें भरने में करते रहे। उनके कार्य को देखकर तमिलनाडु के कुछ स्थानीय गणितज्ञों और शिक्षकों ने यह अनुभव किया कि यह साधारण विद्यार्थी का कार्य नहीं है। उन्हीं की प्रेरणा से रामानुजन ने अपने चुने हुए गणितीय परिणामों के साथ यूरोप के प्रसिद्ध गणितज्ञों को पत्र भेजने शुरू किए। अनेक पत्रों का कोई उत्तर नहीं मिला, किंतु कैंब्रिज विश्वविद्यालय के महान गणितज्ञ जी. एच. हार्डी तक पहुँचा एक पत्र उनके जीवन की दिशा बदलने वाला सिद्ध हुआ। हार्डी ने उन सूत्रों को देखकर तुरंत समझ लिया कि यह असाधारण प्रतिभा का कार्य है और उन्होंने रामानुजन को कैंब्रिज बुलाने की व्यवस्था की।
कैंब्रिज पहुँचकर रामानुजन को ऐसा शैक्षणिक वातावरण मिला जहाँ उनके विचारों को व्यवस्थित रूप से समझा, प्रमाणित किया और प्रकाशित किया गया। यहाँ उन्होंने संख्याओं के भीतर छिपे पैटर्न को खोजने का अपना स्वाभाविक ढंग बनाए रखा। उन्होंने यह अध्ययन किया कि किसी संख्या को छोटे-छोटे भागों के योग के रूप में लिखने के कितने तरीके हो सकते हैं, बड़ी संख्याओं के पीछे कौन-से सामान्य नियम कार्य करते हैं और कुछ विशेष संख्याएँ बार-बार किन रूपों में प्रकट होती हैं। इसी दिशा में उनके कार्य ने “पार्टिशन सिद्धांत” को नई ऊँचाई दी। उन्होंने π (पाई) के मान को अत्यधिक सटीकता तक ज्ञात करने के लिए ऐसी श्रेणियाँ दीं, जिनसे कम चरणों में अधिक दशमलव स्थानों तक मान निकालना संभव हुआ। अनंत श्रेणियों और विशेष प्रकार की संख्याओं पर उनके विचार आज भी गणितीय अनुसंधान का विषय हैं।
अल्प समय में ही रामानुजन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हो गई। वे लंदन मैथमेटिकल सोसायटी के सदस्य बने, ब्रिटेन की प्रतिष्ठित रॉयल सोसायटी के फेलो चुने गए और ट्रिनिटी कॉलेज, कैंब्रिज के पहले भारतीय फेलो बने—यह सब उस व्यक्ति के लिए असाधारण उपलब्धि थी जिसकी अपनी विश्वविद्यालय-डिग्री भी पूर्ण नहीं हुई थी। किंतु दूसरी ओर, इंग्लैंड की जलवायु, भोजन और स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया। 1919 में वे भारत लौट आए और 26 अप्रैल 1920 को मात्र 32 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
रामानुजन के निधन के बाद उनकी नोटबुकों और पांडुलिपियों का महत्व और अधिक स्पष्ट हुआ। बाद के दशकों में अनेक गणितज्ञों ने उनके कार्यों पर शोध किया; कई सूत्र सिद्ध हुए और अनेक आज भी अध्ययन का विषय बने हुए हैं। समय के साथ यह स्वीकार किया गया कि उनके अनेक विचार अपने युग से बहुत आगे थे और आधुनिक गणित की कई अवधारणाओं के लिए प्रेरणा बने।
उनकी स्मृति को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2011 में यह घोषणा की कि 22 दिसम्बर को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में गणित के प्रति रुचि और रचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करना है। श्रीनिवास रामानुजन का जीवन यह सिद्ध करता है कि सच्ची प्रतिभा औपचारिक सीमाओं की मोहताज नहीं होती और समर्पण के साथ किया गया सृजन कालजयी बन जाता है।