24/10/2025
बारह साल की उम्र में उसकी शादी हो गई थी और उसका पति 21 साल का था...
उसे अभी तक पीरियड्स, यानी ग्रामीण भाषा में माहवारी, नहीं आई थी.. लेकिन उसके ससुर ने शादी के लिए बहुत जल्दी की…
वैसे उसका पति, यानी कुबेर, उसकी बुआ का ही बेटा था और बुआ बचपन में ही गुजर गई थीं।
कुबेर स्वभाव से थोड़ा अक्खड़, गुस्सैल और चिड़चिड़ा था.. वह स्वभाव से आक्रामक था.. जब उसे गुस्सा आता तो वह काबू में नहीं रहता था... फिर हाथ में जो भी आता, वह सामने वाले पर फेंक देता.. सब कुछ तहस-नहस कर देता। फिर चाहे वह चीज कितनी भी लाख की क्यों न हो, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था... गाँव में उसे 'उल्टी खोपड़ी का... बिना दिमाग का भैंसा' ही कहते थे…
बचपन से उसे सगी माँ का प्यार और संस्कार नहीं मिले थे, इसलिए वह वैसा हो गया था... ऊपर से उसकी सौतेली माँ भी थी और उस सौतेली माँ का एक बेटा और एक बेटी थी.. वह कुबेर की तरफ ध्यान नहीं देती थी।
इसीलिए वह इतना असंस्कारी हो गया था... हमेशा सौतेलेपन की भावना उसके मन में रहती थी और वह चिड़चिड़ा हो गया था…
और शादी के बाद शायद वह सुधर जाए, यह सोचकर उसके पिता ने उसकी शादी करवाने का फैसला किया... लेकिन ऐसे लड़के को कौन अपनी बेटी देता...
और कुसुम की माँ ने अपनी ननद के बेटे.. यानी उनकी इकलौती आखिरी निशानी कुबेर के साथ कुसुम की शादी करने का फैसला किया..
क्योंकि उसके पिता बड़े हक से कुसुम का हाथ माँगने आए थे... वे उसकी माँ से बोले थे कि अगर तुम भी बेटी नहीं दोगी तो वह बर्बाद हो जाएगा…
इसलिए कुसुम की माँ मजबूर हो गई थीं...
लहंगा-चोली पहनकर खेलने की उम्र थी उसकी.. उस उम्र में एक दोपहर उसे मेहमान देखने आए थे..
तब वह बच्चों के साथ कंचे का खेल बिछाकर बैठी थी... मेहमान उसके दरवाजे पर थे और इसकी गोद में जीते हुए कंचों का ढेर था..
धोती.. टोपी पहने.. पैरों में चमड़े की चप्पलें पहने.. उसकी बुआ के पति यानी कुबेर के पिता और उसके चाचा उसे देखकर उसकी माँ से बोले.. "लड़की को अभी से साड़ी पहनाना शुरू करो ताकि वह बड़ी दिखे..."
सिर्फ बारह साल की कुसुम घबरा गई थी... उसे अभी ठीक से छाती भी नहीं आई थी और शादी तय हो गई…
और शादी की खरीदारी करते समय उसे बहुत खुशी हुई थी.. नए कपड़े.. साड़ियाँ... चप्पलें... वह लाल रंग की चुनरी... हाथ भर चूड़ियाँ.. मेहंदी, नेलपॉलिश, यह सब देखकर वह बहुत खुश थी... ये सारी चीजें उसे बहुत अच्छी लगती थीं, पर कभी भरपूर मात्रा में नहीं मिलती थीं... अब मिल रही थीं, इसलिए वह खुश थी…
शादी के लिए हाँ या ना, उसकी इजाजत किसी ने पूछी ही नहीं थी..
. क्योंकि वह जमाना ही ऐसा था, माँ-बाप जहाँ कहें, वहाँ चुपचाप शादी कर लो और चाहे जैसी भी तकलीफ हो, सह लो, पर पति का घर मत छोड़ो…
फिर सारी रस्में होने लगीं... कुबेर भी अपने पिता की तरह लंबा-चौड़ा और मजबूत शरीर का था.. पर उसका रंग अपनी माँ की तरह गोरा था..
नन्ही सी कुसुम को देखकर वह खो गया था। उसके साथ हर रस्म करते समय उसका ध्यान सिर्फ उसी पर था और कुसुम का सारा ध्यान अपनी भारी-भरकम साड़ी संभालने पर था... उस छह गज की साड़ी में उसके जैसी तीन छोटी-छोटी कुसुम समा जातीं।
और उस जमाने में सबसे बड़ा आश्चर्य होता था फोटो... फोटो ज्यादा खिंचवाने को नहीं मिलते थे.. इसलिए वह फोटो खिंचवाने में मगन रहती थी।
पति मतलब सिर्फ सिर पर मौर बाँधकर बगल में खड़ा होने वाला और उसकी सेवा करनी है.. जैसे माँ-बाप की करती है, बस... इतना ही उसे पता था।
अब पंडित जी बोले, "दूल्हा-दुल्हन को मंडप में हाजिर करो।"
तब तो वह मौर बाँधकर बेर खा रही थी.. लालची की तरह आँचल में बेर भर लिए थे उसने.. क्योंकि उसके ससुराल के गाँव में बेर के बहुत सारे पेड़ थे... और उसके साथ वाले भाई-बहन और बच्चे उसके सामने बेर ले आए थे…
फिर उसने उनके हाथ से बेर छीन लिए और खाने बैठ गई...
फिर उसकी माँ आई.. उन्होंने वे बेर फेंक दिए और उसकी गोद भरी…
फिर उसके माथे को पूरा ढक देने वाला, पुराने जमाने का बड़ा सा बाशिंग उसके सिर पर बाँधा गया और वह मंडप में खड़ी हो गई....
ऊँचे कुबेर के सामने वह सिर्फ उसकी कमर से थोड़ी ऊपर और छाती से थोड़ी नीचे आ रही थी और माला पहनाते समय कुबेर को बहुत झुकना पड़ा था...
शादी हो गई.. बारात विदा हुई... उसकी माँ रो-रोकर घर वापस जाने लगीं..
तो वह भी उनके पीछे वह भारी साड़ी संभालते हुए रोते-रोते चल दी..
बुआ का घर होने के बावजूद अब वहाँ उसकी सौतेली सास थी और कुसुम बहुत छोटी थी.. और वह कभी इस गाँव आई भी नहीं थी... क्योंकि सगी बुआ तो थीं नहीं, तो आकर भी क्या करती…
फिर उसकी मौसी पूजा होने तक उसके साथ रुकने वाली थीं और पूजा के बाद वह अपनी माँ के घर हमेशा के लिए, यानी माहवारी आने तक, रहने वाली थी…
पर कुसुम अब वहाँ रहने को तैयार नहीं थी.. वह रोकर अपनी माँ के पीछे लग गई…
शादी जैसे गुड्डे-गुड़िया का खेल था और अब वह खेल तोड़कर माँ के पीछे जा रही थी, उसे ऐसा ही लग रहा था..
पर माँ ने उसे समझाया और वहीं रहने के लिए कहा.... पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था... उसकी वह उम्र ही नहीं थी समझने की…
कुबेर के चचेरे भाई... उसके दोस्त उससे कहने लगे, "तेरी शादी होकर भी कोई फायदा नहीं.."
कुबेर बोला, "क्यों, क्या हुआ?"
दोस्त बोले, "...अब इसे माहवारी आने तक तुझे बहुत इंतजार करना पड़ेगा... यह कैरी अभी कच्ची है.. इससे अच्छा कोई पकी हुई कैरी क्यों नहीं तोड़ी... जब तक शादी नहीं होती, तब तक सब्र करना ठीक है.. पर एक बार शादी हो जाए तो फिर सब्र करना मुश्किल होता है... कुल मिलाकर, पकने तक दम निकलता है, पर ठंडा होने तक दम नहीं निकलता..."
और अब यह सुनकर कुबेर हैरान रह गया... कि वह अभी छोटी है, यह उसे पता ही नहीं था... वह तो पूजा होते ही सुहागरात के सपने देख रहा था…
और अब कुबेर को पता नहीं कितना सब्र करना पड़ेगा... छह महीने.. एक साल.. डेढ़ साल या दो साल, कौन जाने... क्योंकि प्रकृति के नियम के अनुसार जब उसे माहवारी आनी होगी, तभी आएगी... अपने कहने से थोड़ी आएगी…
कुबेर अब बेचैन हो गया.. यहाँ एक दिन इंतजार करना मुश्किल था... और इस तरह उसकी परीक्षा ली जाने वाली थी... और कब तक ली जाएगी, यह भी पता नहीं था... और उसकी घुटन शुरू हो गई…
उसने अपने पिता से गुस्से में पूछा.. कि मेरी शादी ऐसी नाबालिग लड़की से क्यों की।
पिता बोले, "...तो क्या करता.. तेरे गुस्सैल स्वभाव की वजह से.. कोई भी लड़की देने को तैयार नहीं था.. मामा की लड़की है, इसलिए कम से कम हक से तेरे लिए एक पत्नी तो मिल गई।"
अब वह चुप हो गया.... उसे हर पल पत्नी की चाहत हो रही थी.. क्योंकि वह शारीरिक संबंध के लिए पूरी तरह तैयार था... पर वह तैयार नहीं थी…
अब उसे शारीरिक संबंध के लिए तैयार होने तक सिर्फ उसे देखकर मुँह का पानी निगलना था…
वह मुंबई में नौकरी करता था और वहाँ का माहौल.. वहाँ की औरतें देखकर उसे भी पत्नी चाहिए, ऐसा लगता था...
रोज रात को वह तड़पता था और फिर मैगज़ीन में गंदी, नग्न औरतों की तस्वीरें देखने लगा.. ब्लू फिल्में देखने लगा... मुंबई में होने की वजह से उसे यह सब आसानी से मिल जाता था।
और वह उन तस्वीरों में बड़ी, भारी छाती वाली.. मांसल जांघों... लाल होंठों वाली नग्न औरतों को देखकर लगातार उत्तेजित हो जाता था, उसकी कामवासना जागृत हो जाती थी।
और दोस्तों की बातों... चिढ़ाने की वजह से.... उसे भी अब वह चाहिए थी, वह भी इस कच्ची उम्र में ही…
अभी पूजा नहीं हुई थी... वह ससुराल में ही थी... जब वह नहाने जाती... तो वह छिपकर देखता था…
पर वह उसे कुछ भी देखने नहीं देती थी... उसका पूरा शरीर बहुत दुबला-पतला था.... कोई भी अंग अभी ठीक से विकसित नहीं हुआ था.... उसमें ऐसा कुछ भी नहीं था जो मन को भा जाए।
अब पूजा हो गई...
और किसी से कुछ भी पूछे बिना वह सीधे जाकर अपनी माँ के साथ बस में बैठ गई... किसी का मान-सम्मान रखना... सास-ससुर से इजाजत लेना.. और पति के प्रति थोड़ी भावनात्मक भावनाएं रखना... वगैरह, ये सब उसके ध्यान में भी नहीं था…
पर कुबेर को बहुत लगता था कि वह उसे पति की नजर से देखे.. पर बुआ का बेटा होने के नाते उसे उसका स्वभाव पता था.... कई बार उनकी लड़ाई भी हुई थी और इसलिए वह पहले से ही उससे थोड़ा-थोड़ा गुस्सा करती थी...
वह मायके आई और आते ही अपना थैला कोने में फेंककर बच्चों के साथ कंचे खेलने चली गई…
और उन छोटे बच्चों से बोली, "पिछली बार का खेल अधूरा रह गया था.. वह अब सबको पूरा करना होगा..."
और यह तय हुआ था कि उसे माहवारी आने तक मायके में ही रखना है..
कुबेर भी काम के लिए मुंबई चला गया…
लेकिन फिर से उसके विरह में व्याकुल होकर वह रोज उत्तेजित होता और ऊपर से उसके दोस्त उसे और चिढ़ाकर परेशान कर देते थे।
फिर उसने तय किया कि जब तक उसे माहवारी नहीं आती, वह ससुराल नहीं आएगी... तो वह खुद ही उसके मायके आने लगा…
अब वह उसके मामा का ही गाँव था... इसलिए वह बेधड़क आ गया…
और आते समय उसने बहुत सारी खाने की चीजें लाईं... चप्पलें... कपड़े... चूड़ियाँ, वह उसके लिए लाता था... उसे खुश करने के लिए... पर वह भी सब कुछ ले लेती थी.. खुश हो जाती थी... उसे वह सब सामान नया-नया लगता था... और उसकी दूसरी सहेलियों के पास नहीं होता था और उसके पास होता था... इसलिए उसे और भी ज्यादा खुशी होती थी…
पर वह किस इरादे से उसके लिए यह सब ला रहा है, यह उसे समझ नहीं आता था…
वह उसका लाया हुआ खाती थी... पर उसे पानी तक नहीं देती थी... पति के रूप में उसकी कोई खैर-खबर नहीं पूछती थी... या कभी भी अकेले में उसके पास नहीं आती थी... हमेशा भाई-बहनों के बीच ही रहती थी…
उसे हमेशा लगता था कि कब वह अकेले में मिलेगी…
पर उसके मामा का घर छोटा था.. दस बाई दस का कमरा और उसमें छह लोग रहते थे और उसमें वह भी सातवें सदस्य के रूप में आ जाता था…
फिर एक दोपहर वह खेलकर आई और बहुत सारे कंचे जीतकर लहंगे के आँचल में लेकर आई...
वह भी घर पर आया हुआ था…
माँ-बाप काम पर गए थे... छोटी बहन और एक भाई स्कूल गए थे... इसे स्कूल का शौक नहीं था, इसलिए उसने तीसरी कक्षा में ही स्कूल छोड़ दिया था…
और कुबेर घर में मैगज़ीन की गंदी, नग्न औरतों की तस्वीरें देख रहा था... और वह अकेले-अकेले उत्तेजित हो गया था.. उसका पौरुष जाग उठा था…
और धूप में खेलकर आई वह.. प्यासी थी... पानी का लोटा लेकर गटागट पानी पीने लगी..
और उसकी नजर उस पर गई... उसने उससे कहा... "मुझे पानी दोगी क्या...?"
वह उसके लिए पानी लेकर आई...
उसने उससे कहा... "यहाँ बैठो..."
वह बोली, "क्यों? नहीं, मुझे गायों को पानी पिलाने जाना है।"
फिर भी उसने उसका हाथ पकड़कर जबरदस्ती पास बिठा लिया..
उसके कोमल स्पर्श से वह और भी उत्तेजित हो गया और उसने उसे वे सारी गंदी तस्वीरें दिखाईं.... और उसे अपना पौरुष दिखाते हुए उस पर उसका हाथ फेरा…
और उसे बहुत घिन आई और उसने अपना हाथ पीछे खींच लिया... और वह चुपचाप जाने लगी..
इतने में उसके मिलन के लिए बेताब कुबेर ने उसे कसकर अपनी बाहों में पकड़ लिया... और उसे मसलने लगा…
उसे यह सब बिल्कुल पसंद नहीं आया.. अब उसने उसकी छाती पर हाथ लगाया... पर वह उसके हाथ में नहीं आई.... और वह अपनी रिहाई के लिए चीखने-चिल्लाने लगी... उसे वह आदमी असहनीय लगने लगा…
उसकी चीख-पुकार सुनकर बाकी बच्चे दरवाजे पर आ गए.. और उसने मजबूरन उसे छोड़ दिया…
और वह उससे नफरत करती हुई वहाँ से चली गई...
उसे धीरे-धीरे प्यार से खिलाने से पहले ही उस कोमल कली को तोड़ने की उसने कोशिश की थी…
और उस दिन से कुसुम उससे दूर-दूर भागने लगी..
शाम को माँ घर आने पर उसने माँ को सब कुछ बता दिया... और बोली कि उसे यहाँ से जाने को कहो, वह बहुत गंदा है…
और उसकी माँ उससे बोलीं... "चुप रहो... हंगामा मत करो.. वह तुम्हारा पति है... घर में छोटे भाई-बहन हैं.. उन तक यह बात नहीं जानी चाहिए..."
फिर माँ ने कुबेर को भी समझाया.. "वह अभी छोटी है.. कोमल है... तुम ऐसा मत करो और अब तुम उसे माहवारी आने तक यहाँ मत आना।"
और कुबेर मुँह पर तमाचा खाए हुए... एक घायल, पागल बाघ की तरह.. फिर से मुंबई चला गया…
और उसे बहुत अच्छा लगा कि वह चला गया…
लेकिन वहाँ जाने पर उसके दोस्तों ने उसे फिर से चिढ़ाना शुरू कर दिया। "कुबेर, इस बार तो प्रसाद खाकर आया है या भूखा ही लौट आया... तेरी किस्मत ही खराब है..." वगैरह-वगैरह बोलकर वे उसे ताने मारने लगे…
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