01/01/2026
मैं कर्मफल में विश्वास करता हूँ, भाग्य में भी
और शायद इसी निरंतरता में पुनर्जन्म की अवधारणा भी मुझे स्वाभाविक लगती है।
भले ही ये सब बातें दर्शन की परिधि में आती हों,
जिनके पक्ष में कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण न हो,
पर जीवन स्वयं कई बार अपना प्रमाण बनकर सामने खड़ा हो जाता है।
जब मैं लोगों के जीवन को ध्यान से देखता हूं,और अपने जीवन अनुभवों को तौलता हूं, तो यह एहसास और गहन होता है कि कुछ घटनाएँ केवल संयोग नहीं होतीं।
मानो कुछ ऋण, कुछ हिसाब-किताब
इस जन्म से पहले ही तय हो चुके हों,
जिन्हें एक निश्चित समय तक
चुपचाप चुकाना ही पड़ता है।
कभी हम पूरी ताक़त लगा देते हैं,
फिर भी वही परिस्थितियाँ लौट-लौटकर सामने आती हैं
जैसे जीवन किसी अदृश्य चक्र में
हमें तब तक घुमाता रहता है
जब तक वह अधूरा कर्मभोग पूरा न हो जाए।
उस दौर में इंसान चाहकर भी
उस लूप से बाहर नहीं निकल पाता।
लेकिन कर्म का सिद्धांत
केवल भोग और पीड़ा की बात नहीं करता,
वह चेतना और चयन की भी बात करता है।
यदि अतीत के कर्म वर्तमान को आकार देते हैं,
तो वर्तमान के कर्म भविष्य की दिशा तय करते हैं।
यही वह बिंदु है
जहाँ मनुष्य की भूमिका प्रारंभ होती है
सचेत होने की,
जिम्मेदार बनने की,
और बेहतर चुनने की।
नया वर्ष इस बोध के साथ शुरू हो
कि जो भी हमें मिला है, वह केवल भोगने के लिए नहीं,
समझने के लिए भी है।
शायद कुछ रास्ते इसलिए दुष्कर होते हैं,
क्योंकि वे किसी पुराने अधूरे अध्याय को
पूरा करना चाहते हैं।
और जब हम उस कठिनाई को स्वीकार करना सीख लेते हैं, तो वही पीड़ा
धीरे-धीरे मुक्ति का रास्ता बन जाती है।
~प्रदीप
Happy 2026 ✨
किरिस का गाना सुनने के बाद उपजा ज्ञान ।