Pandey Pradeep

Pandey Pradeep खुशमिजाजी मशहूर हैं हमारी,सदगी भी कमाल हैं,
हम शरारती भी इंतेहा के हैं और तन्हा भी बेमिसाल हैं....!.

10/06/2026

अगर नेहरू जी के जमाने में लालू, मुलायम, मायावती, ममता, शरद पवार जैसी बड़ी ताकतें रही होती और उनके विरुद्ध खड़ी होती ...

तो बतौर प्रधानमंत्री नेहरू जी का कार्यकाल भी राहुल जी के कार्यकाल जितना ही लंबा होता।

क्विक फास्ट आंसर दीजिए
10/06/2026

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गणित के जानकार लोग जवाब देवे
26/05/2026

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26/05/2026

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रात के सन्नाटे में वह रहस्य में आवाज किसकी थी?...एक रात, जब मैं अपनी लघुशंका के निवारण के लिए उठा, तभी अचानक घर के पास ख...
09/01/2026

रात के सन्नाटे में वह रहस्य में आवाज किसकी थी?...

एक रात, जब मैं अपनी लघुशंका के निवारण के लिए उठा, तभी अचानक घर के पास खड़े एक विशाल आम के पेड़ की ऊँचाइयों से एक आवाज़ गूँजी— 'टुक...'।

सन्नाटे को चीरती वह आवाज़ ऐसी थी जैसे पानी से भरे किसी गहरे बर्तन में एक-एक बूंद पानी टपक रहा हो। उस गूँज में एक अजीब सा खालीपन था। कुछ देर का मौन, और फिर वही— 'टुक...'। सच कहूँ तो, रात के उस पहर में उस वीराने माहौल में ऐसी आवाज़ सुनकर कोई भी साधारण व्यक्ति डर के मारे सहम जाता।
कोई और होता तो सोचता कि इस अंधेरे में पेड़ के ऊपर पानी का बर्तन कहाँ से आया? माहौल वाकई थोड़ा भयानक और रहस्यमयी हो गया था।

लेकिन डरना मेरी फितरत में नहीं है। मेरी जिज्ञासा जाग उठी।
मैंने गौर किया कि यह आवाज़ तो बिल्कुल वैसी ही है जैसे हमारे पुराने सैमसंग मोबाइल का 'टच साउंड' हुआ करता था
वही 'वॉटर ड्रॉप' वाली डिजिटल लय, जैसे किसी बर्तन में पानी एक-एक बूंद करके गिर रहा हो, कुछ क्षणों के अंतराल पर tip tip,...। मुझे लगा, क्या इस अंधेरे में कोई मोबाइल लेकर छिपा है? या यह कोई और ही रहस्य है?

कई रातों तक मैंने इस आवाज़ का पीछा किया, उसे नोटिस किया और अंततः अपनी रिसर्च से इस राज़ को खोल ही दिया।
वह कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या गिरता हुआ पानी नहीं था, बल्कि प्रकृति का एक छोटा सा जादूगर था— 'इंडियन स्कॉप्स आउल' (Indian Scops Owl)।

यह छोटा सा उल्लू अपने रंग-रूप के कारण पेड़ की छाल में ऐसा विलीन हो जाता है कि आप उसे कभी देख न पाएँ, बस उसकी यह 'पानी की बूंद' जैसी जादुई आवाज़ ही सन्नाटे में गूँजती रहती है। इस समय ने मुझे सिखाया कि जब हम डर को पीछे छोड़कर जिज्ञासा का हाथ थामते हैं, तभी हम प्रकृति के ऐसे अद्भुत रहस्यों से रूबरू हो पाते हैं।"

मैं कर्मफल में विश्वास करता हूँ, भाग्य में भीऔर शायद इसी निरंतरता में पुनर्जन्म की अवधारणा भी मुझे स्वाभाविक लगती है।भले...
01/01/2026

मैं कर्मफल में विश्वास करता हूँ, भाग्य में भी
और शायद इसी निरंतरता में पुनर्जन्म की अवधारणा भी मुझे स्वाभाविक लगती है।
भले ही ये सब बातें दर्शन की परिधि में आती हों,
जिनके पक्ष में कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण न हो,
पर जीवन स्वयं कई बार अपना प्रमाण बनकर सामने खड़ा हो जाता है।

जब मैं लोगों के जीवन को ध्यान से देखता हूं,और अपने जीवन अनुभवों को तौलता हूं, तो यह एहसास और गहन होता है कि कुछ घटनाएँ केवल संयोग नहीं होतीं।
मानो कुछ ऋण, कुछ हिसाब-किताब
इस जन्म से पहले ही तय हो चुके हों,
जिन्हें एक निश्चित समय तक
चुपचाप चुकाना ही पड़ता है।

कभी हम पूरी ताक़त लगा देते हैं,
फिर भी वही परिस्थितियाँ लौट-लौटकर सामने आती हैं
जैसे जीवन किसी अदृश्य चक्र में
हमें तब तक घुमाता रहता है
जब तक वह अधूरा कर्मभोग पूरा न हो जाए।
उस दौर में इंसान चाहकर भी
उस लूप से बाहर नहीं निकल पाता।

लेकिन कर्म का सिद्धांत
केवल भोग और पीड़ा की बात नहीं करता,
वह चेतना और चयन की भी बात करता है।
यदि अतीत के कर्म वर्तमान को आकार देते हैं,
तो वर्तमान के कर्म भविष्य की दिशा तय करते हैं।
यही वह बिंदु है
जहाँ मनुष्य की भूमिका प्रारंभ होती है
सचेत होने की,
जिम्मेदार बनने की,
और बेहतर चुनने की।

नया वर्ष इस बोध के साथ शुरू हो
कि जो भी हमें मिला है, वह केवल भोगने के लिए नहीं,
समझने के लिए भी है।
शायद कुछ रास्ते इसलिए दुष्कर होते हैं,
क्योंकि वे किसी पुराने अधूरे अध्याय को
पूरा करना चाहते हैं।
और जब हम उस कठिनाई को स्वीकार करना सीख लेते हैं, तो वही पीड़ा
धीरे-धीरे मुक्ति का रास्ता बन जाती है।

~प्रदीप

Happy 2026 ✨
किरिस का गाना सुनने के बाद उपजा ज्ञान ।

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