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Devbhoomi Online उत्तराखंड की कला,संस्कृति और परम्परा से जोड़े रखना।
प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन स्थलों के दर्शन

देवभूमि का परिचय ÷ हमारा प्रयास आपको देवभूमि से जोड़े रखना है, इसलिये जितना हो सके उतना इस पेज को शेअर और लाइक करे अपने मित्रों को भी आमंत्रित करें। तथा इसमें लिखा ये ब्लॉग जरुर पढ़े।
प्यारे साथियों देव भूमि से लगाव रखने वाले पाठकों को काफ़ी उत्सुकता रहती हैं, कि वो देव भूमि के बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त कर सके। इसलिये जब भी पूरे भारत में कही भी देव भूमि की बात हो तो दिमाग में खुद ही उत्त

राखण्ड का नाम आजाता है। यहां तक की पूरे विश्व में भी कई प्रांत ऐसे हैं जो देव भूमि उत्तराखण्ड की कला,संस्कृति,लोकपर्व,परंपराओं,रीति-रिवाजों,धार्मिक स्थलों, पर्यटन स्थलों व प्राकर्तिक सौंदर्य से इसप्रकार लगाव रखते हैं, कि मानो वो रहते भले कही भी हो लेकिन उनका दिल देव भूमि मे ही बसता है।

देवभूमि में प्रवेश ÷ भारत के 27वें राज्य बनने के पूर्व देव भूमि उत्तराखण्ड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। इसलिये देव भूमि में प्रवेश के लिए यहाँ के दो मैदानी जिले हैं। हरिद्वार और उधमसिंह नगर हैं।

लेकिन वर्तमान में देव भूमि दो मंडलों कुमाऊँ मंडल और गढ़वाल मांडल में विभाजित होने की वझह से यहां का प्रवेश द्वार कोटद्वार और काठगोदाम को माना जाता है।

देवभूमि रहन-सहन ÷ देव भूमि उत्तराखण्ड अपने आप में एक पृकृति की गोद में बसा हुआ राज्य हैं , जो उत्तर भारत में स्तिथ हैं ।

देव भूमि एक पहाड़ी प्रदेश हैं, यहाँ के बड़े-बड़े पहाड़ और नदियों की ठंडी जलधाराएं होने की वझह से यहां ठंड बहुत ज्यादा पड़ती हैं। यही कारण है कि यंहा लोगों के मकान पत्थरो और मिट्टी के बने होते हैं। परंतु अब समय के बदलाव के चलते और दिखावे के चलन के चलते गावँ में भी लोगो ने पक्के मकान ईट और सीमेंट वाले बना लिये हैं। लेकिन जो पूराने समय में हमारे बुजुर्ग लोंगो ने मकानों की बनावट रखी थी उनसे ही हमारे पहाड़ी होने और रहन-सहन का परिचय होता था। उन मकानों की बनावट ऐसी होती थी की वो दिखने में बहुत ही सुन्दर होने के साथ यहाँ की जलवायु के हिसाब से रहने में भी बहुत आराम दायक होते थे। मिट्टी और पत्थरों के दो मंजिलें मकानों को इसप्रकार बनाया गया था कि एक ही मकान में हमारे साथ हमारे पालतू जानवरों के लिए भी रहने की व्यवस्था होती थी।

देव भूमि में खाने-पीने के लिए भी विषेश तरीके हैं। यहां रात्री भोजन में सिर्फ रोटी और सब्जी को ही प्राथमिकता दी जाती है। जबकि दोपहर को चावल और घरेलू दाल बनायी जाती हैं। देव भूमि मे पहले कई तरह के घरेलू आनाज का ही उपयोग किया जाता था जो अब धीरे-धीरे समाप्ती की ओर हैं। दुर्भाग्य से पलायन ने देव भूमि उत्तराखण्ड की कई प्रकार के खान पान के तरीकों को बदल दिया है। अब देव भूमि मे कही मडूवा,मक्का,जौ,झुंगर, की पैदावार लगभग समाप्त हो गयी है, पूर्व में इन आनाजों की इतनी पैदावार होती थी की यहाँ के लोगों का प्रतिदिन का भोजन यहीं होता था और पूरे वर्षभर के लिए पर्याप्त हो जाता था। और इस प्रकार के धरेलू आनाज को खाने से ही पहाड़ के लोग बहुत कठोर और परिश्रमी एवं कर्मठ होते थे। प्रतेक घर में जानवर जैसे- गाय,भैस, बकरी इत्यादि। का पालन कर दुध और अन्य दुग्ध उत्पाद घर में ही होता था। अपनी जरुरत पूरी होने के साथ-साथ पास पड़ोस में भी बाटते थे। अब खान-पान से जानवर पालने तक का विवरण एक काल्पनिक मात्र रह गया है।

वेश-भूषा÷ पारम्परिक रूप से देव भूमि में महिलायें घाघरा, पिछौड़ा, आंगड़ी और पुरुष चुड़ी दार पजामा और कुर्ता पहनते थे। अब इन सबका स्थान आधुनिक चलन के कपड़ो ने ले लिया है। परंतु सुभ कार्यो और विवाह समारोहों में अभी भी पारम्परिक पहनावे की झलक अभी भी देखने को मिलती है।

लोक कलाएँ,लोक पर्व,मेले एवं संस्कृति ÷ इन सब छेत्रो में देव भूमि अभी भी बहुत समृद्ध है, यहाँ के लोगों की घर के सजावट में ही लोक कला की सजावट दिखने को मिल जाती हैं। हर छोटे-बड़े पर्व हो या विवाह इत्यादि सुभ कार्य हो घरों व घरों की दिवारों की सजावट मंदिर और घर में प्रवेश द्वार की सजावट खुद ही घर में माताओं और बहिनों द्वारा की जाती हैं। जैसे- एपण (अल्पना), मंदिर और प्रवेश द्वार में सुन्दर चित्र फूल, कलश इत्यादि बनाकर की जाती हैं । इन सब के लिये गेरू और चावल भिगोकर और उसको पीसकर उपयोग किया जाता हैं।

लेकिन अब बाजारों में इस प्रकार के रंग और पहले से तैयार चित्र भी मिलने लग गये हैं, जो हमारी लोक कला के विलुप्त होने के कारण बन रहे हैं।

लोकपर्व और मेले ÷ देव भूमि में कई तरह के लोक पर्व मनाये जाते हैं अगर हम स्पष्ट रुप से बात करे तो यहाँ प्रतेक माह में एक लोक पर्व और मेला होता है। जो होली, दीपावली और दशहरे के अतिरिक्त होते हैं।

देव भूमि में मनाएँ जाने वाले कुछ प्रमुख लोक पर्व और मेले

उतरायणी, बसंत पंचमी, फूलदेई ,हरेला,घी त्यार गंगा दशहरा, देवीधूरा मेला,पूर्णागिरी मेला,नन्दादेवी मेला,गौचर मेला,बैशाखी मेला, माघ मेला,उतरायणी मेला और भी अन्य प्रकार के लोक पर्व और मेले है।

संस्कृति ÷ देव भूमि की संस्कृति पूरे विश्व भर में अपने आप में एक अलग ही और आदर्शवादी संस्कृति हैं। यहाँ के लोग अपने से छोटे व बड़ो को पूरा सम्मान देते हैं। देव भूमि में अपने से बड़ो के पैरों को छू कर सम्मान दिया जाता हैं। जिसे स्थानिय बोल-चाल की भाषा में पैलाग बोलते हैं। और विध्यालयों में गुरुजनों और बड़े लोगों को हाथ जोड़कर नमस्कार करके अभिवादन किया जाता है।

देव भूमि उत्तराखण्ड में पारिवारिक रिस्ते ÷ देव भूमि उतराखण्ड के संस्कृति के हिसाब से ही अन्दाजा लगाया जा सकता है की यहाँ के पारिवारिक रिस्ते बहुत ही पवित्र होते है। और परिवार व रिस्तेदारि में सबको इस प्रकार संबोधित किया जाता है।-

दादा जी को बूबू, बड़बोजू

दादी जी को आमा।

पिताजी को बाबू ।

माता जी को ईजा ।

बड़ी बहन को दीदी।

छोटी बहन को भूली।

बड़े भाई को दादी।

छोटे भाई को भूला।

ताऊजी को ठूल बा।

ताई जी को ठूल ईज।

चाचा को काका ।

चाची को काखी।

मौसी को कैजा।

इस तरह से देव भूमि उत्तराखण्ड पूरे विश्व भर में अपनी अलग पहचान बनाता है।

कैसा लगा जरुर बताएं अभी बहुत कुछ हैं देव भूमि के बारे में बताने को अगर आपको पसंद आयेगा जल्दी ही और भी रोचक जानकारी आपको बताऊंगा।


धन्यवाद।

मुकेश कुमार जोशी।

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