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गांधीजी ने इस यात्रा के लिए केवल 78 सत्याग्रहियों का चयन किया. यह संख्या संयोग नहीं थी. प्रतिभागियों का चयन उनके चरित्र,...
02/10/2026

गांधीजी ने इस यात्रा के लिए केवल 78 सत्याग्रहियों का चयन किया. यह संख्या संयोग नहीं थी. प्रतिभागियों का चयन उनके चरित्र, अनुशासन, शारीरिक क्षमता और सत्याग्रह के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर किया गया. इनमें किसान, बुनकर, शिक्षक, आश्रमवासी और विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग शामिल थे. अधिकांश प्रतिभागी साबरमती आश्रम के अनुशासित जीवन से परिचित थे. उन्हें लंबी पदयात्रा, सादा भोजन और कठिन परिस्थितियों में रहने का अनुभव था.

12 मार्च 1930 की सुबह साबरमती आश्रम के बाहर बड़ी संख्या में लोग एकत्र थे. महात्मा गांधी ने अपने हाथ में लाठी ली और 78 सत्य.....

पिछले कुछ दशकों में यह त्योहार उत्तर भारत में भी तेज़ी से लोकप्रिय हुआ. ऐसे ही, करवा चौथ के बारे में भी हम लोगों को काफ़...
01/10/2026

पिछले कुछ दशकों में यह त्योहार उत्तर भारत में भी तेज़ी से लोकप्रिय हुआ. ऐसे ही, करवा चौथ के बारे में भी हम लोगों को काफ़ी बाद में पता चला. ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘बीवी नंबर-1’, ‘कभी ख़ुशी- कभी ग़म’ और ‘बागबान’ जैसी फ़िल्मों ने इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में पहचान दिलाई. आज अगर कोई कहे कि उसे करवा चौथ के बारे में नहीं पता, तो लोग यक़ीन नहीं करेंगे. उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ों तक भी इसकी पहुंच दिखाई देती है.

पिछले कुछ दशकों में यह त्योहार उत्तर भारत में भी तेज़ी से लोकप्रिय हुआ. ऐसे ही, करवा चौथ के बारे में भी Ganpati Pooja Karva Chauth Uttarakha...

01/10/2026

मिलते हैं 2 से 4 अक्टूबर रंगों के इस मेले में.

पिथौरागढ़ का श्री हरि सिंह थापा स्पोर्ट्स कॉलेज मुक्केबाज़ी, एथलेटिक्स और फुटबॉल के उभरते खिलाड़ियों के लिए एक प्रमुख प्...
27/09/2026

पिथौरागढ़ का श्री हरि सिंह थापा स्पोर्ट्स कॉलेज मुक्केबाज़ी, एथलेटिक्स और फुटबॉल के उभरते खिलाड़ियों के लिए एक प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र है और इस ज़िले का सेना के लिए खिलाड़ी तैयार करने का समृद्ध इतिहास रहा है. यह दिखाता है कि प्रतिभा की कोई कमी नहीं. कमी केवल अवसर, सुविधाओं और सतत प्रशिक्षण ढांचे की है. अगर सरकार यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेल अकादमियां बनाए – एथलेटिक्स,फुटबॉल, मुक्केबाज़ी, पर्वतारोहण, स्कीइंग, बैडमिंटन आदि की, तो यह ज़िला केवल फौजी अफसर नहीं, ओलंपिक खिलाड़ी भी बड़ी संख्या में पैदा कर सकता है.

पिथौरागढ़ के युवाओं के लिए करियर का एकमात्र भरोसेमंद रास्ता आज भी रक्षा सेवाएं हैं. पहले फौज Pithoragarh article Sunder Chand Thakur

देखिए इस साल के अल्मोड़ा के नंदा देवी मेले की ताज़ा तस्वीरेंhttps://kafaltree.com/almora-nanda-devi-mela-photos-2026/
23/09/2026

देखिए इस साल के अल्मोड़ा के नंदा देवी मेले की ताज़ा तस्वीरें

https://kafaltree.com/almora-nanda-devi-mela-photos-2026/

अल्मोड़ा का ऐतिहासिक नंदा देवी का मेला आज भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा के साल के प्रमुख Almora Nanda Devi Mela Phot...

पुराने नंदादेवी मेले का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका सामाजिक स्वरूप था. मेले में दूर-दूर के गांवों के लोग आते थे. रिश्तेदारों...
23/09/2026

पुराने नंदादेवी मेले का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका सामाजिक स्वरूप था. मेले में दूर-दूर के गांवों के लोग आते थे. रिश्तेदारों से मुलाकात होती, पुराने परिचित मिलते और नए संबंध बनते. जिन लोगों से वर्ष भर मिलना संभव नहीं होता था, उनसे मिलने का अवसर मेले में मिलता. कई परिवार मेले को सामाजिक मिलन के वार्षिक अवसर की तरह देखते थे. पहाड़ के कठिन जीवन में ऐसे आयोजन लोगों को एक-दूसरे के निकट लाते थे. इसलिए मेले की भीड़ केवल भीड़ नहीं थी; उसमें रिश्तों की गर्माहट और सामुदायिक जीवन की ऊर्जा शामिल थी.

पहले लोकगायक, बांसुरी, हुड़का, चांचरी, झोड़ा और छोलिया नृत्य मेले की आत्मा जैसे होते थे. आज भी इन परम्पराओं को Nanda Devi Kautik...

दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, श्रीलंका, इंडोनेशिया से लेकर आस्ट्रेलिया तक की मूल निवासी कामिनी को सबसे पहले वैज्ञानिक नज़र से...
20/09/2026

दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, श्रीलंका, इंडोनेशिया से लेकर आस्ट्रेलिया तक की मूल निवासी कामिनी को सबसे पहले वैज्ञानिक नज़र से सोलहवीं सदी के उत्तरार्ध में एक जर्मन वनस्पति विज्ञानी जार्ज एबरहार्ड रम्फियस ने इंडोनेशिया के पूर्वी भाग में देखा था. वह इलाका तब डच ईस्ट इंडीज कहलाता था. वे ईस्ट इंडिया के लिए काम कर रहे थे. रम्फियस ने इस पौधे के चित्र बनाए और इसका वर्णन किया. चित्र और वर्णन उनके निधन के बाद 1747में छपा. तब तक पेड़-पौधों का वैज्ञानिक नाम रखने की कोई मुकम्मल पद्धति नहीं थी.

कामिनी के फूल गुच्छे में निकलते हैं तो लैटिन भाषा का शब्द लेकर इस पौधे की जाति का नाम रख दिया- पनीकुलेटा. murraya paniculata hindi

राज्य के लिए आवश्यक राजस्व के नाम पर सरकारी संरक्षण में शराब का बढ़ता धंधा और समाज में बढ़ती नशे की लत की मार सबसे अधिक ...
19/09/2026

राज्य के लिए आवश्यक राजस्व के नाम पर सरकारी संरक्षण में शराब का बढ़ता धंधा और समाज में बढ़ती नशे की लत की मार सबसे अधिक महिलाओं पर ही पड़ती है. ‘शराब’ खण्ड में गिरिजा पाण्डे, बसंती पाठक और प्रीति थपलियाल के लेख इस व्यवसाय के जन विरोधी इतिहास, सरकार की आबकारी नीति की विसंगतियों, शराब के विरोध में उत्तराखण्ड में हुए आंदोलनों और अब भी जारी प्रतिकार से सम्बंधित हैं. सैनिक भर्ती के लिए प्रख्यात उत्तराखण्ड में नशे की लत का परिणाम यह है कि “टी बी और सिरोसिस की बीमारी के कारण नवयुवकों की सेना में भर्ती दर घट रही है.” दूसरी तरफ, जब राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को सुनकिया, धारी की महिलाओं ने घेरा तो उन्होंने कहा- “देखिए, आप लोगों के विकास के लिए राजस्व की जरूरत होती है. पैसा कहां से आएगा? इस पर एक ग्रामीण महिला देवकी देवी ने कहा- ‘आप हम लोगों से हर महीने पांच-पांच प्रति महिला रुपया इकट्ठा कर लो. गांव में शराब मत परोसो या हम सब पर मिट्टी का तेल छिड़को, पूरे क्षेत्र को तबाह कर दो.”

1970 के दशक के प्रख्यात ‘चिपको आंदोलन’ की जमीनी फौजें वास्तव में महिलाएं ही थीं. उनकी जागरूकता एवं सक्रियता Uttarakhand main Mahilay...

स्वामी मन्मथन सामाजिक सुधार आंदोलन के सूत्रधार रहे. उन्होंने महिला संगठन बनाए व गाँव – गांव नैतिक मूल्यों व सांस्कृतिक प...
19/09/2026

स्वामी मन्मथन सामाजिक सुधार आंदोलन के सूत्रधार रहे. उन्होंने महिला संगठन बनाए व गाँव – गांव नैतिक मूल्यों व सांस्कृतिक परिवर्तनों के अनवरत सिलसिले को स्थापित करते चले. समाज के सुधार व गांव वालों की गाँव व इलाके की संवृद्धि की आकांक्षा से चेतना उत्पन्न करना उनका इष्ट बना. इसी समय सुन्दरलाल बहुगुणा पदयात्रा करते हुए राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ के पर्यावरण के मुद्दों को उठा रहे थे. वह विकास की पश्चिमी विचारधारा का विरोध करते हुए नैतिकता व गांधीवादी दर्शन से प्रभावित थे.

स्वामी मन्मथन की हत्या हुई पर उनका सपना नहीं मरा.वह आज भी गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रांगणों, भुवनेश्वरी swami manmathan Uttarakhan...

लदोली घाट में दो गाड़-गधेरे झरने की तरह नीचे की ओर प्रवाहित हैं। उनका शोर, जोर और जोश पूरे यौवन पर है। इतना कि हम आपस मे...
19/09/2026

लदोली घाट में दो गाड़-गधेरे झरने की तरह नीचे की ओर प्रवाहित हैं। उनका शोर, जोर और जोश पूरे यौवन पर है। इतना कि हम आपस में एक दूसरे की बात को भी स्पष्ट नहीं सुन पा रहे हैं। राजेसिंह बताते हैं कि ‘‘श्रृंग ऋषि आश्रम से सिंगोड़ा गाड़ में कई छोटे-छोटे रौले (जलधारायें) यथा- भाबरपानी रौला, कोदियाबगड़ रौला, पत्थरखाणी, कोठा रौला, खीर गाड़, रमक्वाली झरना, फुलवाड़ी रौला, मुश्कोर रौला आदि मिलते हैं। लदोली घाट में हमारे बायें ओर से सिंगोड़ा गाड़ और दायें ओर से उडियार गाड का संगम हो रहा है। सिंगोड़ा गाड़ और उडियार गाड़ के संगम स्थल लदोली घाट से आगे इसे पूर्वी नयार कहा जाता है।’’

मरोड़ा गांव से लदोली घाट तक का रास्ता उतार-चढ़ाव का न होकर सीधा-सादा है। खतरा यह है कि शाम को nayar river uttarakhand

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