08/06/2026
कुरुक्षेत्र। अस्पताल—एक ऐसी जगह जहां इंसान अपनी सबसे लाचार स्थिति में, जिंदगी और सेहत की उम्मीद लेकर आता है। जहां सफेद कोट पहने डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता है। लेकिन कुरुक्षेत्र के लोकनायक जयप्रकाश (LNJP) सिविल अस्पताल की उन बंद दीवारों के पीछे जो कुछ हुआ, उसने न सिर्फ इंसानियत को शर्मसार किया, बल्कि पूरे सिस्टम की रीढ़ को तोड़कर रख दिया।
एक 15 साल की मासूम बच्ची, जो अपनी सुरक्षा के सबसे बड़े भरोसे (अपने पिता) के साथ अस्पताल आई थी। पिता बीमार थे, और बच्ची के पेट में दर्द था। वह नहीं जानती थी कि जिस 'भगवान' के पास वह ठीक होने आई है, वह सफेद कोट के पीछे एक भेड़िया छिपाए बैठा है।
वह खौफनाक 20 मिनट और सिस्टम की गहरी नींद
तारीख: 29 मई। कंसलटेंट फिजिशियन डॉ. शैलेंद्र कुमार शैली ने बच्ची को फीमेल वार्ड में भर्ती किया। लेकिन उसकी नीयत में खोट आ चुका था। जब ओपीडी (OPD) के उस विशेष कमरे में बच्ची को ले जाया गया, तो कायदे से वहां किसी महिला नर्सिंग स्टाफ का होना अनिवार्य था। नियमों की किताबें कहती हैं कि किसी भी नाबालिग लड़की की जांच बिना महिला स्टाफ की मौजूदगी के नहीं हो सकती।
लेकिन उस दिन नियम, कायदे और इंसानियत... सब सोए हुए थे। ओपीडी में तीन-तीन नर्सों की ड्यूटी थी, लेकिन उस कमरे के बाहर सन्नाटा था।
इस कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा यह है कि इस खौफनाक वारदात से ठीक 20 मिनट पहले, बच्ची को खतरे का अहसास हो गया था। डॉक्टर की गलत हरकतों (बैड टच) को भांपकर उसने वार्ड में भर्ती एक दूसरी महिला मरीज को अपनी घबराहट बताई थी। उस महिला मरीज ने तुरंत ड्यूटी पर मौजूद नर्सिंग स्टाफ को आगाह भी किया। लेकिन अफ़सोस! स्टाफ ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। नतीजा? अगले 20 मिनट के भीतर उस दरिंदे ने बच्ची की रूह को तार-तार कर दिया।
जब रूह कांपी, तो फूटा महिला आयोग का गुस्सा
जब अत्यधिक रक्तस्राव (ब्लडिंग) के कारण बच्ची की हालत बिगड़ी, तब जाकर इस खौफनाक राज से पर्दा उठा। आरोपी डॉक्टर फरार हो चुका था, लेकिन गुनाह के निशान पीछे छूट गए थे।
रविवार को जब राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन रेणु भाटिया इस मामले की जांच के लिए अस्पताल पहुंचीं, तो वहां का माहौल बेहद तनावपूर्ण था। अस्पताल प्रशासन अपनी कमियों को छिपाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन चेयरपर्सन के तीखे तीरों ने उनके दावों के परखच्चे उड़ा दिए।
रेणु भाटिया ने वहां मौजूद एक ड्यूटी नर्स की आंखों में आंखें डालकर पूछा:
"क्या आपकी अपनी बेटी है?"
नर्स ने सहमते हुए कहा— "जी, हां।"
चेयरपर्सन का गुस्सा फूट पड़ा— "तो क्या आप अपनी बेटी को किसी गैर मर्द या डॉक्टर के पास 15 मिनट के लिए भी अकेला छोड़ सकती हैं? फिर इस मासूम बच्ची को उस कमरे में अकेला कैसे छोड़ दिया गया? कहां मर गई थी तुम्हारी संवेदनशीलता?"
इस सवाल के बाद पूरे कमरे में सन्नाटा पसर गया। अस्पताल के बड़े-बड़े अधिकारी नजरें चुराने लगे।
₹100 का लालच और सिफारिशों का खेल
जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, इस कहानी में कई और चौंकाने वाले और संदिग्ध पहलू सामने आए। पता चला कि आरोपी डॉक्टर ने वारदात से पहले बच्ची को ₹100 का नोट दिया था और उसके माता-पिता के बारे में पूछताछ की थी।
चेयरपर्सन ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. सुखबीर सिंह को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा, "₹100 देने का क्या मतलब था? क्या वह उस गरीब बच्ची को लालच देकर उसका मुंह बंद रखना चाहता था?"
इससे भी बड़ा सवाल यह था कि यह विवादित डॉक्टर इस अस्पताल तक पहुंचा कैसे? अधिकारियों ने जो खुलासा किया, उसने यह साफ कर दिया कि सिस्टम में रसूखदारों की सिफारिशें कैसे काम करती हैं। सीएमओ ने माना कि साल 2021-22 में कैथल के एक उच्चाधिकारी (PMO) की लिखित सिफारिश पर इस डॉक्टर को दोबारा अस्पताल में रखा गया था, यह कहकर कि 'अस्पताल को इसकी जरूरत है'।
'अस्पताल पिकनिक स्पॉट नहीं है'
1 जून को पुलिस ने आरोपी डॉ. शैलेंद्र कुमार शैली को गिरफ्तार कर लिया। सलाखों के पीछे पहुंचते ही उसकी हेकड़ी निकल गई और उसने हाथ जोड़कर कहा, "मुझसे गलती हो गई।" लेकिन क्या इस 'गलती' की कोई माफी हो सकती है? स्वास्थ्य विभाग ने भले ही उसकी सेवाएं समाप्त कर दी हों, लेकिन अस्पताल के माथे पर लगा यह कलंक इतनी जल्दी नहीं धुलेगा।
निरीक्षण के बाद भरे गले और गुस्से से तमतमाए चेहरे के साथ रेणु भाटिया ने मीडिया से कहा:
"अस्पताल कोई पिकनिक स्पॉट नहीं होता। लोग वहां बेहद लाचारी और दर्द में आते हैं। अगर हमारी बेटियां अस्पतालों में भी सुरक्षित नहीं हैं, तो हम किस सुरक्षित समाज की बात कर रहे हैं?"
महिला आयोग ने अब इस मामले में प्रिंसिपल मेडिकल ऑफिसर (PMO) की सीधी जवाबदेही तय की है और डीजी हेल्थ (DG Health) व एसीएस हेल्थ को कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई के लिए पत्र लिखा है। आरोपी सलाखों के पीछे है, अस्पताल प्रशासन जांच के दायरे में है, लेकिन इन सबके बीच LNJP अस्पताल की वो दीवारें आज भी चीख-चीख कर पूछ रही हैं— क्या अगली बार कोई बेटी इलाज के लिए किसी डॉक्टर पर भरोसा कर पाएगी?