26/01/2026
आख़िर कब तक...?
आख़िर कब तक यूँ ही घुट-घुट कर जीते रहेंगे?
हर सुबह सूरज संग उठते हैं, मगर उम्मीदें अब ढलने लगी हैं।साँसें तो चल रही हैं, पर ज़िंदगी जैसे कहीं थम सी गई है।अब तो लगता है शायद इस जन्म में चाय मजदूरों के ‘अच्छे दिन’सिर्फ़ नारों में ही रह जाएंगे…हक़ की बात करना भी जैसे एक जुर्म बन गया है।😔💔