14/06/2026
मैनपुरी से दिल्ली तक... एक अधूरी यात्रा की कहानी....
रात के लगभग 11 बजे थे। मैनपुरी शहर की अधिकांश सड़कें शांत हो चुकी थीं, लेकिन मैं घर से निकल रहा था। वजह वही थी जो हर दिन हजारों लोगों को मजबूर करती है—दिल्ली जाना।
कहने को तो मैनपुरी से दिल्ली की दूरी बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन जो व्यक्ति इस मार्ग पर नियमित यात्रा करता है, वह जानता है कि असली दूरी किलोमीटरों में नहीं, बल्कि परेशानियों में मापी जाती है।
मेरे सामने दो ही विकल्प थे। पहला, किसी दूसरे स्टेशन तक पहुंचकर ट्रेन पकड़ो। दूसरा, रात में चलने वाली निजी स्लीपर बसों का सहारा लो।
मैं बस अड्डे की तरफ बढ़ा। वहां पहले से दर्जनों यात्री खड़े थे। कोई नौकरी के इंटरव्यू के लिए जा रहा था, कोई अस्पताल में भर्ती परिजन के पास, कोई प्रतियोगी परीक्षा देने और कोई अपने व्यापार के सिलसिले में।
तभी एक बस आई। बस पर कुछ और लिखा था, लेकिन यात्रियों को कुछ और बताया जा रहा था। सीट कुछ और दिखाई गई थी, लेकिन मौके पर कुछ और निकली। कई यात्रियों को बीच रास्ते दूसरी बस में बैठा दिया गया। किसी का सामान गायब होने का डर, किसी को टिकट के बावजूद सीट न मिलने की चिंता।
यही वह डग्गामारी व्यवस्था है जिसके भरोसे मैनपुरी का यात्री वर्षों से दिल्ली पहुंचने को मजबूर है।
रात भर बस कभी किसी ढाबे पर रुकती है, कभी किसी अज्ञात स्थान पर। समय का कोई भरोसा नहीं। सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। महिलाओं, बुजुर्गों और मरीजों के लिए यह यात्रा और भी कठिन हो जाती है।
एक बुजुर्ग यात्री ने मुझसे कहा—
"बेटा, मजबूरी न हो तो कोई इन बसों में सफर ही न करे।"
उनकी बात सुनकर मैं सोच में पड़ गया।
आखिर एक ऐसे जनपद के लोग, जिसकी आबादी लाखों में है, आज भी सुरक्षित और सीधी रेल सुविधा के लिए क्यों तरस रहे हैं?
अगली सुबह जब मैं दिल्ली पहुंचा तो देखा कि मेरे जैसे हजारों लोग अलग-अलग बसों से उतरे थे। सभी की कहानी लगभग एक जैसी थी—थकान, असुविधा और मजबूरी।
वापसी में ट्रेन से आने की कोशिश की तो पता चला कि पहले दूसरे स्टेशन तक पहुंचो, फिर वहां से ट्रेन पकड़ो। तभी मेरे मन में सवाल उठा कि आखिर मैनपुरी के लोगों का समय इतना सस्ता क्यों समझा जाता है?
यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात एक छात्र से हुई। उसने बताया कि कई बार प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उसे पूरी रात बसों में काटनी पड़ती है। एक व्यापारी बोला कि उसका आधा समय केवल यात्रा की अव्यवस्था में निकल जाता है। एक महिला यात्री ने कहा कि रात की बसों में सफर करना हमेशा चिंता का विषय बना रहता है।
तब मुझे एहसास हुआ कि यह केवल मेरी समस्या नहीं है।
यह उस छात्र की समस्या है जो अपना भविष्य बनाने दिल्ली जाता है।
यह उस मरीज की समस्या है जिसे समय पर बड़े अस्पताल पहुंचना होता है।
यह उस व्यापारी की समस्या है जो अपने कारोबार के लिए रोज़ संघर्ष करता है।
और यह उस आम नागरिक की समस्या है जो सम्मानजनक और सुरक्षित यात्रा का हकदार है।
यही कारण है कि मैनपुरी से दिल्ली के लिए सीधी एक्सप्रेस ट्रेन और गाजियाबाद–टूंडला मेमू का मैनपुरी तक विस्तार केवल एक मांग नहीं, बल्कि आवश्यकता है।
जिस दिन मैनपुरी से दिल्ली के लिए नियमित और सीधी रेल सेवा शुरू होगी, उस दिन केवल एक ट्रेन नहीं चलेगी—उस दिन हजारों यात्रियों की मजबूरी कम होगी, डग्गामारी बसों पर निर्भरता घटेगी, छात्रों को राहत मिलेगी, व्यापार को गति मिलेगी और मैनपुरी विकास की नई पटरी पर आगे बढ़ेगा।
सवाल सिर्फ इतना है—
क्या मैनपुरी के लोगों को आगे भी रात की असुविधाजनक बसों, डग्गामारी और बदलती सवारियों के भरोसे दिल्ली जाना पड़ेगा?
या फिर एक दिन मैनपुरी जंक्शन से सीधे दिल्ली जाने वाली ट्रेन की सीटी इस जिले के नए भविष्य का ऐलान करेगी?
🚆 मैनपुरी – दिल्ली इंटरसिटी एक्सप्रेस
मैनपुरी प्रस्थान: सुबह 5:30 बजे
शिकोहाबाद: 6:15 बजे
टुंडला: 7:00 बजे
अलीगढ़: 8:30 बजे
गाजियाबाद: 10:15 बजे
नई दिल्ली: 11:00 बजे
🚆 वापसी
नई दिल्ली प्रस्थान: शाम 6:00 बजे
गाजियाबाद: 6:40 बजे
अलीगढ़: 8:15 बजे
टुंडला: 9:45 बजे
मैनपुरी आगमन: रात 11:00 बजे
🚆 गाजियाबाद–टूंडला MEMU का मैनपुरी विस्तार
सुबह
मैनपुरी: 6:00 बजे
टुंडला: 7:00 बजे
गाजियाबाद: 11:00 बजे
शाम वापसी
गाजियाबाद: 5:00 बजे
टुंडला: 9:00 बजे
मैनपुरी: 10:00 बजे
इससे क्या फायदा होगा?
✅ दिल्ली में पूरे दिन का काम करके उसी दिन वापसी
✅ छात्रों और नौकरीपेशा लोगों को सुविधा
✅ स्लीपर बसों की मजबूरी कम होगी
✅ व्यापारियों और मरीजों को राहत
✅ रोजाना यात्रियों की संख्या बढ़ेगी
मैनपुरी के लिए सबसे उपयोगी मॉडल होगा: सुबह दिल्ली पहुंचाने वाली और शाम को वापस लाने वाली इंटरसिटी एक्सप्रेस + एक MEMU सेवा। यही संयोजन सबसे ज्यादा सवारी और सबसे ज्यादा जनहित वाला रहेगा।