18/05/2026
इनसे मिलिए... हीरालाल जी
सुबह के सात बजते ही हिसार की उन गलियों से एक साइकिल निकलती है, जिसकी चेन की आवाज़ सालों से वही पुरानी, पर भरोसेमंद है। उस साइकिल पर सवार है हीरालाल जी — 6० के करीब उम्र, माथे पर गहरी लकीरें, आँखों में वो चमक जो कभी हारी नहीं।
35 साल... लगातार 35 साल।
हिसार शहर से निकलकर आसपास के 4० किलोमीटर के इलाके में — गांव-गांव, ढाणी-ढाणी — वो अपनी साइकिल पर भुजिया, बिस्किट, टॉफी, चायपत्ती, साबुन, नमक-मिर्च और रोज़मर्रा की सैकड़ों छोटी-छोटी चीजें ले जाते हैं। किराना की छोटी-छोटी दुकानों तक, जहां कभी-कभी एक-एक रुपए का सामान भी बिकता है।
उनकी कहानी...
हीरालाल जी सुबह चार बजे उठते हैं। चाय पीते हैं, मंदिर में जल चढ़ाते हैं और फिर साइकिल को तैयार करते हैं। सामान लादते वक्त उनकी पीठ थोड़ी झुक जाती है, लेकिन मुस्कान नहीं। "बेटा, बोझ तो शरीर पर है, दिल पर तो हल्कापन ही रखना पड़ता है," वे हंसते हुए कहते हैं।
साइकिल पर दो-दो सौ किलो का सामान लादकर वे निकल पड़ते हैं। गर्मी हो, बारिश हो, सर्दी की हड्डियां चीरती ठंड हो — कोई बहाना नहीं। कभी पहाड़ी जैसी उबड़-खाबड़ सड़क पर टायर पंक्चर हो जाता है, तो साइकिल को कंधे पर रखकर दो-तीन किलोमीटर पैदल चलते हैं। फिर भी दुकानदार इंतजार कर रहा होता है, इसलिए समय पर पहुंचना ज़रूरी है।
"पहले लोग मुझे देखकर कहते थे — 'भैया, मोटरसाइकिल ले लो।' मैं हंसकर कहता था — 'बेटा, मोटरसाइकिल तो ले सकता था, लेकिन फिर ये रिश्ते कैसे जुड़ते?'"
और सचमुच, 35 सालों में उन्होंने सिर्फ़ सामान नहीं पहुंचाया, रिश्ते पहुंचाए हैं।
गांव की दुकानदार माताएं उन्हें "हीरा भैया" कहकर बुलाती हैं। बच्चे स्कूल से आते ही पूछते हैं — "चाचा, आज कौन-सी नई टॉफी लाए हो?" बूढ़े दुकानदार उन्हें चाय पिलाते हैं और अपनी परेशानियां सुनाते हैं। हीरालाल जी चुपचाप सुनते हैं, कभी सलाह देते हैं, कभी बस हंसकर कह देते हैं — "सब ठीक हो जाएगा।"
संघर्ष और समर्पण
घर पर उनकी पत्नी और बेटे-बहू हैं। लेकिन हीरालाल जी अभी भी साइकिल छोड़ने को तैयार नहीं।
"जब तक सांस है, तब तक काम। बैठकर खाना मुझे फूटी आंख नहीं भाता।"
वे बताते हैं कि कई बार साइकिल पंक्चर होने पर या बीमार पड़ने पर भी उन्होंने डिलीवरी रोकी नहीं। "एक बार तेज़ बारिश में नाला पार करते वक्त पानी में बह गए थे सारे सामान। अगले दिन फिर से सामान लिया और गया। दुकानदार भाई इंतजार कर रहे थे।"
बस यही काफी है।
आज भी जब सूरज ढल रहा होता है और हीरालाल जी थके-हारे, पसीने से तर साइकिल लेकर घर लौटते हैं, तो उनकी आंखों में संतोष होता है। न कोई दौड़, न कोई चमक-दमक, बस एक सादा-सा जीवन, जो अपनी मेहनत और ईमानदारी से जी रहे हैं।
हीरालाल जी जैसे लोग आज के दौर में अनमोल हैं।
वे हमें याद दिलाते हैं कि सफलता हमेशा बड़ी गाड़ी या बड़े बंगले में नहीं होती।
कभी-कभी वो पुरानी साइकिल पर, धूल-मिट्टी से सने कपड़ों में, पसीने की बूंदों के साथ भी होती है — जो 35 साल से बिना रुके, बिना शिकवे, सिर्फ़ मुस्कुराते हुए चल रही है।
जय हो हीरालाल जी की मेहनत की!🙏