19/07/2025
दीमक किसान का मित्र होता है – एक विस्तृत लेख
🌱 भूमिका:
जब भी "दीमक" का नाम आता है, तो हमारे मन में पहला विचार नुकसान और विनाश का आता है – लकड़ी को खोखला कर देना, किताबें चट कर जाना या घरों को नुकसान पहुँचाना। परंतु क्या आपने कभी यह सोचा है कि यह वही दीमक प्रकृति के लिए, विशेषकर किसान के लिए एक अमूल्य मित्र भी हो सकता है? जी हाँ, दीमक (Termite) प्रकृति की एक अद्भुत रचना है जो मृदा उर्वरता, जल संरक्षण और पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन में एक अहम भूमिका निभाती है।
🌾 दीमक और मृदा सुधार:
दीमक को मृदा वैज्ञानिकों ने “प्राकृतिक मृदा इंजीनियर” की संज्ञा दी है। इसकी भूमिगत सुरंगें मिट्टी को भीतर तक खुरदरी बनाती हैं, जिससे मिट्टी में हवा का संचार और जल का प्रवेश आसान होता है। इसके परिणामस्वरूप:
भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है।
जड़ें अधिक गहराई तक जाती हैं।
मिट्टी ढीली होकर जैविक कृषि के लिए उपयुक्त बनती है।
🌿 जैव अपघटन और पोषक तत्व चक्र:
दीमक लकड़ी, सूखे पत्ते और मृत जैविक पदार्थों को खाकर उनका अपघटन (decomposition) करती है। ये पदार्थ जब अपघटित होते हैं, तो वे ह्यूमस में बदल जाते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता का मुख्य स्रोत होता है। इससे:
मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व अन्य खनिजों की उपलब्धता बढ़ती है।
प्राकृतिक रूप से जैविक खाद तैयार होती है।
रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।
🌳 वनस्पति और पारिस्थितिकी में संतुलन:
दीमक विशेष रूप से सूखे और मरते हुए पौधों को खाकर उन्हें मिट्टी में परिवर्तित करती है। इसके कारण:
पारिस्थितिक तंत्र में मृत जैविक पदार्थों का संचय नहीं होता।
नए पौधों को पोषणयुक्त भूमि प्राप्त होती है।
पर्यावरण स्वच्छ और संतुलित बना रहता है।
🌧️ जल संरक्षण में भूमिका:
दीमक जब अपनी बस्ती (mound) बनाती है, तो मिट्टी को पानी के प्रति संवेदनशील बनाती है। उनके द्वारा बनाई गई सुरंगें वर्षा जल को भूमि के भीतर तक पहुँचाती हैं, जिससे:
भूजल स्तर में वृद्धि होती है।
भूमि में नमी लंबे समय तक बनी रहती है।
सूखा प्रभावित क्षेत्रों में खेती करना आसान हो जाता है।
🧪 वैज्ञानिकों की पुष्टि:
अनेक शोध बताते हैं कि जहां दीमक की उपस्थिति होती है, वहां की मिट्टी 10 से 30% अधिक उपजाऊ होती है। ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और भारत के मरुस्थलीय क्षेत्रों में यह देखा गया है कि दीमक वाले खेतों में फसल उत्पादन अधिक होता है।
🧘♂️ पर्यावरणीय दृष्टिकोण से दीमक:
पर्यावरणविदों और प्राकृतिक कृषि समर्थकों जैसे कि फुकुओका, श्यामसुंदर ज्याणी और खिलेरी बाबा जैसे विशेषज्ञों ने दीमक को प्रकृति का एक महान सहायक बताया है। वे मानते हैं कि जिस प्रकार गाय गोबर से मिट्टी को समृद्ध करती है, उसी तरह दीमक भी जैविक संतुलन बनाए रखने में योगदान देती है।
⚠️ दीमक से डर नहीं, समझदारी जरूरी है:
दीमक तभी नुकसान पहुँचाती है जब:
जंगल काटकर लकड़ी के घर बनाए जाएं।
मिट्टी का संतुलन रसायनों से बिगाड़ा जाए।
कृषि भूमि पर अत्यधिक कीटनाशकों का प्रयोग हो।
इसलिए दीमक को नष्ट करने के बजाय उसके प्राकृतिक संतुलन को समझना और बनाए रखना ज़रूरी है।
🌾 निष्कर्ष:
दीमक कोई दुश्मन नहीं है। यह तो प्रकृति का एक अदृश्य किसान है, जो बिना वेतन, बिना आराम के दिन-रात मिट्टी, जल और जैविक तंत्र की सेवा करता है। यदि हम इसे समझें, सम्मान दें और प्राकृतिक खेती को अपनाएं, तो यही दीमक किसानों का सबसे बड़ा मित्र बनकर उभर सकती है।
🌳 हरित संदेश:
“प्रकृति की हर रचना में उपयोगिता है, बस हमें उसे देखने की दृष्टि चाहिए।”
– खिलेरी बाबा