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22/10/2017
04/08/2017
12/12/2016

बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट की कविता (हिन्‍दी व अंग्रेजी में) - जब कूच हो रहा होता है / WHEN IT COMES TO MARCHING

जब कूच हो रहा होता है
बहुतेरे लोग नहीं जानते
कि दुश्मन उनकी ही खोपड़ी पर
कूच कर रहा है।
वह आवाज जो उन्हें हुक्म देती है
उन्हीं के दुश्मन की आवाज होती है
और वह आदमी जो दुश्मन के बारे में बकता है
खुद दुश्मन होता है।

WHEN IT COMES TO MARCHING MANY DO NOT KNOW
That their enemy is marching at their head.
The voice which gives them their orders
Is their enemy’s voice and
The man who speaks of the enemy
Is the enemy himself.

16/11/2016

*अवतार सिंह 'पाश' की दो कविताएं*

1. भारत
भारत -
मेरे आदर का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयुक्त किया जाये
शेष सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं।
इस शब्द का अभिप्राय
खेतों के उन बेटों से है
जो आज भी पेड़ों की परछाइयों से
वक़्त मापते हैं।
उनकी पेट के बिना, कोई समस्या नहीं
और भूख लगने पर
वे अपने अंग भी चबा सकते हैं।
उनके लिए ज़ि‍न्दगी एक परम्परा है,
और मौत का अर्थ है मुक्ति।
जब भी कोई पूरे भारत की,
‘राष्ट्रीय एकता’ की बात करता है
तो मेरा दिल करता है -
उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ,
उसे बताऊँ
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यन्त से सम्बन्धित नहीं
बल्कि खेतों में दायर हैं
जहाँ अनाज पैदा होता है
जहाँ सेंधें लगती हैं---

2. अधूरी कविता
हमारे लहू को आदत है
मौसम नहीं देखता महफिल नहीं देखता
ज़ि‍न्दगी के जश्न शुरू कर लेता है
सूली के गीत छू लेता है

शब्द हैं कि पत्थरों पर बह-बहकर घिस जाते हैं
लहू है कि तब भी गाता है
ज़रा सोचो कि रूठी सर्द रातों को मनाये कौन?
निर्मोही पलों को हथेली पर खिलाये कौन?
लहू ही है जो नित्य धाराओं के होंठ चूमता है
लहू तारीख की दीवारों को लाँघ आता है
ये जशन ये गीत किसी को बहुत...हैं
जो कल तक हमारे लहू के मौन दरिया में
तैरने का अभ्यास करते थे।

24/04/2016
23 मार्च / पाशउसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग किसी दृश्य की तरह बचे ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाँकी की देश सार...
24/04/2016

23 मार्च / पाश

उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाँकी की
देश सारा बच रहा बाक़ी

उसके चले जाने के बाद
उसकी शहादत के बाद
अपने भीतर खुलती खिडकी में
लोगों की आवाज़ें जम गयीं

उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने
अपने चेहरे से आँसू नहीं, नाक पोंछी
गला साफ़ कर बोलने की
बोलते ही जाने की मशक की

उससे सम्बन्धित अपनी उस शहादत के बाद
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया

शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था

आह्वान / अशफ़ाकउल्ला ख़ांकस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे,आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।हटने के नहीं पीछे, ...
06/02/2016

आह्वान / अशफ़ाकउल्ला ख़ां

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएंगे,
आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।

हटने के नहीं पीछे, डरकर कभी जुल्मों से,
तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।

बेशस्त्र नहीं हैं हम, बल है हमें चरख़े का,
चरख़े से ज़मीं को हम, ता चर्ख़ गुंजा देंगे।

परवा नहीं कुछ दम की, ग़म की नहीं, मातम की,
है जान हथेली पर, एक दम में गंवा देंगे।

उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज़ न निकालेंगे,
तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे।

सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीका,
चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे।

दिलवाओ हमें फांसी, ऐलान से कहते हैं,
ख़ूं से ही हम शहीदों के, फ़ौज बना देंगे।

मुसाफ़िर जो अंडमान के, तूने बनाए, ज़ालिम,
आज़ाद ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे।

रचनाकाल: सं 1930

सपना / गोरख पाण्डेयसूतन रहलीं सपन एक देखलींसपन मनभावन हो सखिया,फूटलि किरनिया पुरुब असमनवाउजर घर आँगन हो सखिया,अँखिया के ...
29/01/2016

सपना / गोरख पाण्डेय

सूतन रहलीं सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया,
फूटलि किरनिया पुरुब असमनवा
उजर घर आँगन हो सखिया,
अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा
त खेत भइलें आपन हो सखिया,
गोसयाँ के लठिया मुरइआ अस तूरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया,
केहू नाहीं ऊँचा नीच केहू के न भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिय,
मेहनति माटी चारों ओर चमकवली
ढहल इनरासन हो सखिया,
बैरी पैसवा के रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया ।

(रचनाकाल : 1979)

http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BE_/_%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%96_%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%AF

Art by Shreyam
25/11/2015

Art by Shreyam

13/11/2015

क्या-क्या नहीं है मेरे पास
शाम की रिमझिम
नूर में चमकती ज़िंदगी
लेकिन मैं हूं
घिरा हुआ अपनों से
क्या झपट लेगा कोई मुझ से
रात में क्या किसी अनजान में
अंधकार में क़ैद कर देंगे
मसल देंगे क्या
जीवन से जीवन
अपनों में से मुझ को क्या कर देंगे अलहदा
और अपनों में से ही मुझे बाहर छिटका देंगे
छिटकी इस पोटली में क़ैद है आपकी मौत का इंतज़ाम
अकूत हूँ सब कुछ हैं मेरे पास
जिसे देखकर तुम समझते हो कुछ नहीं उसमें....
-----------पाश

To Those Born AfterTo the cities I came in a time of disorderThat was ruled by hunger.I sheltered with the people in a t...
28/10/2015

To Those Born After

To the cities I came in a time of disorder
That was ruled by hunger.
I sheltered with the people in a time of uproar
And then I joined in their rebellion.
That's how I passed my time that was given to
me on this Earth.
I ate my dinners between the battles,
I lay down to sleep among the murderers,
I didn't care for much for love
And for nature's beauties I had little patience.
That's how I passed my time that was given to
me on this Earth.
The city streets all led to foul swamps in my time
My speech betrayed me to the butchers.
I could do only little
But without me those that ruled could not sleep
so easily:
That's what I hoped.
That's how I passed my time that was given to
me on this Earth.
Our forces were slight and small,
Our goal lay in the far distance
Clearly in our sights,
If for me myself beyond my reaching.
That's how I passed my time that was given to
me on this Earth.
II
You who will come to the surface
From the flood that's overwhelmed us and
drowned us all
Must think, when you speak of our weakness in
times of darkness
That you've not had to face:
Days when we were used to changing countries
More often than shoes,
Through the war of the classes despairing
That there was only injustice and no outrage.
Even so we realised
Hatred of oppression still distorts the features,
Anger at injustice still makes voices raised and
ugly.
Oh we, who wished to lay for the foundations for
peace and friendliness,
Could never be friendly ourselves.
And in the future when no longer
Do human beings still treat themselves as
animals,
Look back on us with indulgence.......
................ Bertolt Brecht

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