22/07/2026
पिता की मौत के सिर्फ 3 दिन बाद चाचा ने बेटी को फाटक से बाहर फेंककर कहा, “अब सब मेरा है”—लेकिन बंद अलमारी से मिला एक सीलबंद लिफाफा पूरे परिवार की सबसे बड़ी धोखाधड़ी खोलने वाला था।
भाग 1
“इस घर से अभी निकल जाओ, वरना पहरेदार तुम्हें धक्के देकर बाहर करेंगे।”
अपने पिता की चिता की राख ठंडी होने से पहले ही नंदिनी त्रिपाठी ने यह वाक्य अपने चाचा महेश के मुँह से सुना। लखनऊ के गोमती नगर वाले सफेद बंगले के भीतर महेश खड़ा था और बाहर नंदिनी की टूटी अटैची पड़ी थी। आँगन में वही आम का पेड़ था जिसे देवेंद्र ने उसके 8वें जन्मदिन पर लगाया था। अब लोहे का फाटक पिता की स्मृतियों और बेटी के बीच दीवार बन चुका था।
नंदिनी ने काँपती आवाज़ में कहा, “यह पिताजी का घर है।”
महेश मुस्कराया। “था। अब सब मेरा है। बंगला, दुकानें, कारखाने, बैंक की रकम और दान न्यास भी।”
“पिताजी ऐसा कभी नहीं कर सकते।”
महेश ने कुछ कागज़ हवा में लहराए। “वसीयत पर उनके हस्ताक्षर हैं। सब विधि के अनुसार हुआ है।”
देवेंद्र पिछले 2 वर्षों से कर्क रोग से जूझ रहे थे। नंदिनी ने दिल्ली की छात्रवृत्ति छोड़ी, एक बड़ी औषधि कंपनी की नौकरी ठुकराई और दिन-रात उनकी सेवा की। वह दवाइयों का समय लिखती, अस्पताल की पर्चियाँ सँभालती और रात को उनके कमरे के बाहर ही सोती थी। अंतिम रात देवेंद्र ने उसका हाथ दबाकर कहा था, “सच देर से आता है, पर रास्ता कभी नहीं भूलता।”
तब नंदिनी ने समझा था कि पिता उसे सांत्वना दे रहे हैं। अब उसे लगा, शायद वे किसी आने वाले धोखे की ओर संकेत कर रहे थे।
फाटक के पास खड़े रिश्तेदारों में से किसी ने उसका साथ नहीं दिया। बुआ ने आँखें झुका लीं। एक चचेरे भाई ने धीरे से कहा, “महेश चाचा वर्षों से कारोबार देखते थे। शायद देवेंद्र ताऊ ने सोच-समझकर किया होगा।”
नंदिनी के भीतर कुछ टूट गया। उसने महेश को घूरकर कहा, “ये कागज़ झूठे हैं।”
महेश का चेहरा कठोर हो गया। “सिद्ध कर दो। तब तक सड़क तुम्हारी है।”
उस रात नंदिनी ने एक जर्जर हवेली में छोटा कमरा किराए पर लिया। मकान मालकिन शारदा देवी ने उसकी सूजी आँखें देखकर बिना पूछे पानी रखा। अगले 3 सप्ताह में हर जगह काम न मिला तो उसने चारबाग के पास छोटी मेज़ लगाकर आलू की कचौरी और चाय बेचना शुरू किया।
एक दोपहर काली चमचमाती गाड़ी उसके ठेले के सामने रुकी। महेश उतरा, रिश्तेदारों के सामने कचौरी उठाकर हँसा और बोला, “जिस लड़की को अपने पिता का न्यास चलाना था, वह अब सड़क पर तेल गरम कर रही है।”
फिर उसने उसके कान के पास झुककर कहा, “कल मैंने देवेंद्र की दूसरी कोठी भी बेच दी।”
नंदिनी का चेहरा सफेद पड़ गया। महेश गाड़ी में बैठा ही था कि भीड़ में खड़े एक वृद्ध व्यक्ति ने उसे रोककर पूछा, “तुमने किस देवेंद्र त्रिपाठी की कोठी बेची?”
महेश ने मुड़कर देखा। वृद्ध की आँखों में पहचान की चमक थी। वह देवेंद्र का पुराना अधिवक्ता अरविंद सक्सेना था, जो 8 महीने से पक्षाघात के बाद सबकी नज़रों से गायब था।
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