31/12/2025
अजमेर शरीफ़ के उर्स और “रस्म” के नाम पर चल रहा तमाशा
अजमेर शरीफ़ में उर्स के मौक़े पर इन दिनों कुछ ऐसी हरकतें देखने को मिल रही हैं, जिन्हें बड़े आराम से “चिश्तियों की रस्म” कह दिया जाता है। सवाल यह है कि जिस काम का इस्लाम से कोई ताल्लुक़ नहीं, जिसका ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ से दूर-दूर तक वास्ता नहीं, उसे रस्म कहकर कब से पाक बना दिया गया?
अजमेर शरीफ़ में उर्स के मौके पर अब इबादत नहीं, बल्कि पानी की बोतलों का खेल खेला जा रहा है। लोग बोतलों में पानी भरकर एक-दूसरे पर डाल रहे हैं — मर्द भी, औरतें भी, जैसे यह कोई पिकनिक या वाटर फेस्टिवल हो।
कुछ लोग दुआ और इबादत के लिए नहीं, बल्कि मज़े और तमाशे के लिए दरगाह पहुँच रहे हैं। ऐसे कामों से क्या हासिल होगा, यह कहना मुश्किल है — हाँ, इतना तय है कि इससे न तो रूह पाक होती है और न ही अक़्ल जागती है।
हिंद के सुल्तान ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के दर पर आज भी सिर्फ़ अदब से झुका हुआ सिर क़बूल होता है, न कि दिखावे से भरा हुआ तमाशा। यहाँ तो सिर्फ़ हाज़िरी ही दुआ बन जाती है, लेकिन अफ़सोस कि कुछ लोग अपनी जहालत को भी नज़राने की तरह पेश कर रहे हैं।
हाल ही में एक वीडियो में देखा गया कि कुछ लोग अजीब-ओ-गरीब जानवरों का चोला पहनकर, चादर के साथ दरगाह की ओर चले आ रहे हैं। सवाल यह है कि क्या ख़्वाजा साहब का पैग़ाम यही था?
अगर ऐसा होता, तो ख़ानक़ाहें इबादतगाह नहीं, सर्कस बन चुकी होतीं।
सच तो यह है कि इस तरह की हरकतों का ख़्वाजा साहब की तालीमात से रत्ती भर भी लेना-देना नहीं। ये सब रस्म के नाम पर चल रही वह जहालत है, जिसे अगर आज नहीं रोका गया, तो कल इसे ही परंपरा बताया जाएगा। आने वोाली नस्ल इसे जरूरी समझेंगी
अब ज़िम्मेदारी वहाँ के ज़िम्मेदारों पर भी बनती है कि वे दरगाह को तमाशागाह बनने से बचाएँ।
ख़्वाजा का पैग़ाम साफ़ है —
दिखावा नहीं, दीवानगी नहीं,
बल्कि अदब, इंसानियत और मोहब्बत।